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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • मानसिक स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता का मुख्य निर्धारक होने के साथ सामाजिक स्थिरता का भी परिचायक होता है। पूर्वाग्रह तथा सामाजिक रूढ़िवादिता ने मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को और जटिल बना दिया है। कथन का परीक्षण करें।

    13 Oct, 2020 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाज

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण

    • भूमिका

    • मानसिक स्वास्थ्य - संक्षिप्त परिचय 

    • मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज का दृष्टिकोण

    • निष्कर्ष

    हाल ही में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो पूर्व के महानिदेशक और नगालैंड राज्य के पूर्व राज्यपाल अश्विनी कुमार ने अवसाद से ग्रसित होने के कारण आत्महत्या कर ली। ऐसा देखा गया है कि विगत कुछ वर्षों में मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या या अन्य सामाजिक अपराधों की प्रवृत्ति में भी वृद्धि देखी गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 तक भारत की लगभग 20 प्रतिशत आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित होगी।

    मानसिक विकार का एक महत्त्वपूर्ण कारक आनुवंशिक होता है। यह रोग उन लोगों में अधिक पाए जाते हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य इनसे पीड़ित होता है। ऐसे व्यक्ति के बच्चों में यह खतरा लगभग दोगुना हो जाता है। मनोवैज्ञानिक कारणों को भी आज इसकी मुख्य वजह मान जा रहा है। उदाहरण के लिये आपसी संबंधों में टकराहट, किसी निकटतम व्यक्ति की मृत्यु, सम्मान को ठेस, आर्थिक हानि, तलाक, परीक्षा में असफलता इत्यादि। इसके अलावा सहनशीलता का अभाव, बाल्यावस्था के अनुभव, खतरनाक किस्म के वीडियो गेम, तनावपूर्ण परिस्थितियाँ और इनका सामना करने की असमर्थता मानसिक विकार के लिये ज़िम्मेदार प्रमुख कारक माने जाते हैं।

    मानसिक स्वास्थ्य और समाज :

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में उसकी सक्रियता और स्थिति मानसिक स्वास्थ्य पर सबसे ज़्यादा निर्भर करती है। मानसिक स्वास्थ्य हमारे दैनिक जीवन का सक्रिय और स्थिर लक्षण भी है जो रोज़मर्रा के क्रिया-कलापों में परिलक्षित होता है। संक्षेप में कहें तो मानसिक स्वास्थ्य जीवन समायोजन की प्रक्रिया है जिसमें समझौता, सामंजस्य, विकास और निरंतरता समाहित है।

    वस्तुतः मनुष्य जिस समाज में रहता हैं वहाँ सार्वजनिक और निजी दोनों स्तरों पर मानसिक बीमारी हमेशा से एक उपेक्षित मुद्दा रहा है। हमारे सामाजिक संबंध मानसिक स्वास्थ्य के मानक होतें हैं। संबंधों की गुणवत्ता हमारे मानसिक स्वास्थ्य का स्तर बताती है। इसके विषय में न केवल समाज का रवैया बेरूखा है बल्कि सरकार की दृष्टि में भी यह एक उपेक्षित विषय ही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति को पागल समझा जाता है और उस व्यक्ति को समाज में उपेक्षा भरी नज़रों से देखा जाने लगता है।

    मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति समाज व परिवार के उपेक्षापूर्ण बर्ताव के कारण अकेलेपन का भी शिकार हो जाता है। अकेलेपन के कारण वह अपने विचारों को दूसरे के साथ साझा नहीं कर पाता है, ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति या तो स्वयं को हानि पँहुचाता है या अन्य लोगों को। यदि कोई व्यक्ति एक बार किसी मानसिक रोग से ग्रसित हो जाता है तो जीवन भर उसे इसी तमगे के साथ जीना पड़ता है। आज भी भारत में इस प्रकार के लोगों के लिये समाज की मुख्य धारा से जुड़ना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।

    वैश्विक महामारी COVID-19 के दौर में देश में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ऐसे में आवश्यक है कि इससे निपटने के लिये क्षमताओं का विकास किया जाए और संसाधनों में वृद्धि की जाए क्योंकि दुनिया के सारे ध्वंस, निर्माण, संघर्ष, क्रांति और आंदोलन-अभियान मानव मस्तिष्क की ही उपज हैं। यह सब व्यक्ति ने ही, व्यक्तियों द्वारा, व्यक्तियों के लिए किए हैं। इसलिए समाज की प्राथमिक इकाई व्यक्ति और व्यक्ति का मस्तिष्क दोनों का स्वास्थ्य सृष्टि के स्वास्थ्य की तरह है जिस पर शेष सभी व्यवस्था निर्भर करती है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य किसी भी व्यक्ति, समूह, समाज या राष्ट्र के लिए चिंता का विषय होना ही चाहिए।

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