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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • दुर्लभ प्रजातियों के विलोपन का उल्लेख करते हुये वन्य प्राणी संरक्षण के उपाय सुझाइयें।

    26 Aug, 2020 वैकल्पिक विषय भूगोल

    उत्तर :

    प्रश्न विच्छेद:

    • भूमिका
    • दुर्लभ प्रजातियों के बारे में संक्षिप्त में बताइये
    • दुर्लभ प्रजातियों के विलोपन के बारे में संक्षिप्त में बताइए
    • वन्य प्राणी संरक्षण के उपाय बताइए
    • निष्कर्ष

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • संक्षिप्त भूमिका लिखें।
    • की-वर्ड को परिभाषित करें
    • दुर्लभ प्रजातियों एवं उनके विलोपन के बारे में संक्षिप्त में बताइये
    • वन्य प्राणी संरक्षण के उपाय बताइए।
    • शब्द सीमा कम करने के लिये चित्र/माइंड मैप का प्रयोग करें।
    • निष्कर्ष (उपाय से संबंधित हालिया घटना का उल्लेख कीजिये)

    दुर्लभ प्रजातियों के अंतर्गत वे सभी जीव प्रजातियाँ आती हैं जिनकी संख्या, दिन-प्रतिदिन भौगोलिक क्षेत्र कम होने तथा जीवों के जनसंख्या घनत्व में कमी होने के कारण घटती जा रही है। ऐसी प्रजातियाँ सिर्फ एक क्षेत्र विशेष जलवायु में निवास करती हैं। विभिन्न पर्यावरणीय एवं मानव जनित समस्याओं के कारण इनका तेज़ी से क्षरण हो रहा है। उदाहरण के लिये इंडोनेशिया के एक द्वीप पर पाया जाने वाला कमोडो ड्रैगन नामक बड़ी छिपकली, भारत-बांग्लादेश व नेपाल में पाया जाने वाला पैंगोलिन, भारत के सिक्किम, असम व अरुणाचल प्रदेश में पाया जाने वाला लाल पांडा आदि। दुर्लभ प्रजातियों के विलोपन के लिये प्राकृतिक तथा मानवीय दोनों ही कारण ज़िम्मेदार है किंतु वर्तमान समय में मानवीय गतिविधियाँ सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी हैं।

    संरक्षण (Conservation), वन्यजीवों एवं प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, रखरखाव, प्रबंधन या पुनर्स्थापन है। संरक्षण को आम तौर पर दो प्रकार से विभाजित किया जा सकता है:

    • इन-सीटू संरक्षण (In-situ Conservation)
    • एक्स-सीटू संरक्षण (Ex-situ conservation)
    • इन-सीटू संरक्षण (In-situ Conservation): इन-सीटू से तात्पर्य है, ”इसके वास्तविक स्थान पर या इसके उत्पत्ति के स्थान तक सीमित।“ इन-सीटू संरक्षण का एक उदाहरण आरक्षित या सुरक्षित क्षेत्रों का गठन करना है। यह अपने प्राकृतिक आवास में एक लुप्तप्राय पौधे या जीव प्रजातियों की रक्षा करने की प्रक्रिया है। इन-सीटू संरक्षण के अंतर्गत राष्ट्रीय उद्यान (National parks), वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife sanctuaries), जैवमंडल रिज़र्व (Biosphere reserves)।
      • राष्ट्रीय उद्यान (National parks): राष्ट्रीय उद्यान एक ऐसा क्षेत्र है जो वन्यजीवों की सुरक्षा एवं रखरखाव के लिये आरक्षित है और जहाँ वानिकी, पशु चराई जैसी गतिविधियों की अनुमति नहीं होती है। इन उद्यानों में निजी स्वामित्व के अधिकारों की भी अनुमति नहीं दी जाती है। जैसे- दुधवा राष्ट्रीय उद्यान आदि।
      • वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife sanctuaries): एक अभयारण्य एक संरक्षित क्षेत्र है जहाँ केवल जानवरों का संरक्षण किया जाता है यहाँ लकड़ी की कटाई जैसी मानवीय गतिविधियों, मामूली वन उत्पादों को इकट्ठा करना और निजी स्वामित्व के अधिकारों की अनुमति दी जाती है किंतु मानवीय गतिविधियों से वन्यजीवों के संरक्षण से कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिये। जैसे- मुदुमलाई वन्यजीव अभयारण्य आदि।
      • जैवमंडल रिज़र्व (Biosphere Reserves): यह संरक्षित क्षेत्रों की एक विशेष श्रेणी है जहाँ मानव आबादी भी वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था का हिस्सा होती है। ये आमतौर पर 5000 वर्ग किमी. से अधिक बड़े संरक्षित क्षेत्र होते हैं। बायोस्फीयर रिज़र्व में 3 भाग होते हैं- कोर (Core), बफर (Buffer) और ट्रांज़िशन ज़ोन (Transition Zone)।
        • कोर ज़ोन, एक इनर ज़ोन है। यह अविभाजित एवं कानूनी रूप से संरक्षित क्षेत्र है। बफर ज़ोन, कोर एवं ट्रांज़िशन ज़ोन के बीच स्थित होता है। कुछ शोध एवं शैक्षिक गतिविधियों की यहाँ अनुमति दी जाती है। ट्रांज़िशन ज़ोन, जैवमंडल रिज़र्व का सबसे बाहरी हिस्सा होता है। यहाँ फसल, वानिकी, मनोरंजन, मछली पालन एवं अन्य गतिविधियों की अनुमति दी जाती है।
    • एक्स-सीटू संरक्षण (Ex-situ conservation): एक्स-सीटू संरक्षण में प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवासों के बाहर संरक्षित किया जाता है। इसमें अनुवांशिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ वन्यजीवों एवं वनस्पतियों की प्रजातियाँ भी शामिल हैं। इस तरह की रणनीतियों में वनस्पतिक उद्यान, चिड़ियाघर, जीन बैंक, एवं डीएनए बैंक की स्थापना आदि शामिल हैं।
      • जीन बैंक (Gene Bank): ये ठंडे भंडार हैं जहाँ भंडारण के लिये जर्म प्लाम (Germ Plam) को नियंत्रित तापमान एवं आर्द्रता के तहत रखा जाता है, यह आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण का एक महत्त्वपूर्ण तरीका है।
      • क्रायोप्रिज़र्वेशन (Cryopreservation): यह बायोटिक भागों के संरक्षण के लिये प्रौद्योगिकी का सबसे नया अनुप्रयोग है। इस प्रकार का संरक्षण तरल नाइट्रोजन में बहुत कम तापमान (196°C) पर किया जाता है। जीवों की चयापचय गतिविधियों को कम तापमान के तहत संपन्न कराया जाता है जिन्हें बाद में अनुसंधान उद्देश्यों के लिये उपयोग किया जाता है।
      • एनिमल ट्रांसलोकेशन (Animal Translocation): इसका तात्पर्य ‘एक नए इलाके में जानवरों को छोड़ना जो कहीं और से आते हैं।’

    इसके अतिरिक्त वन्य जीवों के संरक्षण के लिये निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं:

    • अवैध शिकार तथा कालाबाज़ारी पर नियंत्रण: लुप्तप्राय जीवों या पक्षियों की हत्या एवं उनके अवैध शिकार तथा कालाबाज़ारी पर नियंत्रण किया जाना चाहिये।
    • वन्य जीवों से संबंधित डिजिटल डेटा प्रबंधन: भारत सरकार के विभाग को वनों के संरक्षण के संबंध में नियमित अंतराल पर सर्वेक्षण की प्रक्रिया को बढ़ाकर इसका सुचारु क्रियान्वयन सुनिश्चित करना तथा जंगली जानवरों व पक्षियों तथा प्रजातियों की आबादी का ज्ञान होना ताकि प्राकृतिक आपदा के समय उन तक मदद पहुँचाई जा सके।
    • ईंधन व अवसंरचना निर्माण हेतु वनों के अंधाधुंध कटाई पर रोक लगानी चाहिये तथा वनीकरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिये जिससे उनके प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहें।
    • प्रजनन कार्यक्रम: दुर्लभ प्रजातियों की जनसंख्या बढ़ाने हेतु प्रजनन कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिये।

    इस प्रकार राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वन्य जीवों के संरक्षण हेतु किये जा रहे प्रयासों को गति देने के लिये तकनीक का सहारा लिया जाना चाहिये जिससे न केवल सतत् संधारणीय विकास को बढ़ावा दिया जा सके बल्कि समस्त जीव प्रजाति का अस्तित्व भी बचा रह सके। इस दिशा में वैश्विक स्तर पर रूस का इंटरनेशनल कोऑपरेशन फॉर एनिमल रिसर्च यूजिंग स्पेस (इकारस) प्रोग्राम अहम भूमिका निभा सकता है।

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