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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक, 2020 के प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख करते हुए मीडिया विनियमन हेतु दिये गए निर्देशों पर प्रकाश डालें साथ ही बताएं की प्रेस की आज़ादी में कमी के मूल कारण क्या हैं?

    26 Aug, 2020 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • भूमिका 

    • रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु 

    • विनियमन के बिंदु 

    • प्रेस की आज़ादी में कमी के क्या कारण है?

    • निष्कर्ष

    दुनिया भर में प्रेस की आज़ादी पर नज़र रखने वाली संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ ने विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक, 2020 रिपोर्ट जारी की है। इस वार्षिक रिपोर्ट में भारत दो पायदान नीचे खिसक गया है। प्रेस की आज़ादी के मामले में भारत जहाँ पिछले वर्ष 140वें पायदान पर था, वहीं इस वर्ष 142वें पायदान पर आ गया है।

    ऐसे में यह प्रश्न उठना ज़रूरी है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इस तरह कमज़ोर क्यों हो रहा है? एक ऐसे देश में जहाँ सैकड़ों न्यूज़ चैनल और हज़ारों समाचार पत्र काम कर रहे हों, वहाँ पत्रकारिता का कमज़ोर होना कितना सही है? वे कौन सी ताकतें हैं जो इसे कमज़ोर बना रही हैं या मीडिया की स्थिति में गिरावट में उनकी कितनी भूमिका है?

    रिपोर्ट की मुख्य बातें-

    • पेरिस स्थित ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ नामक गैर-लाभकारी संस्था वर्ष 2002 से ही वार्षिक रूप से यह सूचकांक जारी करती आ रही है। यह दुनिया भर के देशों में प्रेस की आज़ादी के स्तर का पता लगाने का काम करती है।
    • यह सूचकांक बहुलवाद के स्तर, मीडिया के स्वतंत्रता, मीडिया के लिये वातावरण और स्वयं-सेंसरशिप, कानूनी ढाँचे, पारदर्शिता के साथ-साथ समाचार और सूचना के लिये मौज़ूद बुनियादी ढाँचे की गुणवत्ता के आकलन के आधार पर तैयार किया जाता है।
    • मौजूदा सूचकांक की बात करें तो नार्वे को पहला, फिनलैंड को दूसरा तथा डेनमार्क को तीसरा स्थान मिला है, जबकि उत्तर कोरिया को अंतिम पायदान पर जगह मिली है।
    • रिपोर्ट के अनुसार, 180 देशों में से महज़ 24 प्रतिशत देश ऐसे हैं जहाँ पत्रकारिता की स्थिति अच्छी या संतोषजनक है जबकि पिछले वर्ष यह आँकड़ा 26 प्रतिशत था। इसी तरह पत्रकारिता के लिहाज़ से 37 प्रतिशत देशों को समस्याग्रस्त, 29 प्रतिशत देशों को कठिन परिस्थिति और 11 प्रतिशत देशों को बेहद गंभीर स्थिति की श्रेणी में रखा गया है।
    • अगर भारत के पड़ोसी देशों की बात करें तो भूटान, अफगानिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार की रैंकिंग भारत से बेहतर बताई गई है जबकि पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश की स्थिति भारत से खराब है।

    मीडिया विनियमन हेतु दिशा-निर्देश-

    • रिपोर्टिंग में निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता: सत्यता और संतुलन बनाए रखना टी.वी समाचार चैनलों का उत्तरदायित्व है।
    • तटस्थता सुनिश्चित करना: टी.वी समाचार चैनलों को किसी भी विवाद या संघर्ष में सभी प्रभावित पक्षों, हितधारकों और अभिकर्ताओं से समानता का व्यवहार कर तटस्थ रहना चाहिये ताकि वे अपना विचार प्रस्तुत कर सकें।
      • अपराध और सुरक्षा उपायों पर रिपोर्टिंग करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि अपराध और हिंसा का महिमामंडन न किया जाए।
    • समाचार चैनलों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि कोई भी महिला, बालिका या किशोर, जो यौन हिंसा, आक्रामकता, आघात से पीड़ित है अथवा इसका साक्षी रही/रहा है, को टी.वी पर दिखाने के दौरान उनकी पहचान को उजागर न किया जाए।
    • चैनल को व्यक्तियों के निजी जीवन या व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने के नियम का पालन करना चाहिये, जब तक कि इस तरह के प्रसारण के स्पष्ट रूप से स्थापित वृहद और अभिज्ञेय सार्वजनिक हित न हों।

    प्रेस की आज़ादी में आ रही कमी के मूल कारण-

    • पिछले एक दशक में जिस तरह प्रेस की आज़ादी में कमी आई है उससे यह पता चलता है कि प्रेस की आज़ादी का आकलन जिन संकेतकों पर किया जाता है उनकी स्थिति दिनोंदिन बिगड़ रही है।इसलिये ज़रूरी है कि इन संकेतकों पर ही गौर किया जाए।
    • अगर बहुलवाद के स्तर की बात करें तो इससे मीडिया में अपने विचारों को प्रस्तुत करने की सीमा का पता चलता है लेकिन हाल के दिनों में मीडिया पर ईमानदारी से रिपोर्टिंग न करने के आरोप लगते रहे हैं। इसे ज़रूरी मुद्दों की बजाय गैर-ज़रूरी मुद्दों पर बात करने की मीडिया की प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। मीडिया के लिये वातावरण और स्वयं-सेंसरशिप की बात की जाए तो स्थिति चिंताजनक है। बीते वर्षों में पत्रकारों की हत्या, उन पर हुए जानलेवा हमले आदि का कारण उनकी पेशेवर रिपोर्टिंग ही है। इसलिये बहुत संभव है कि पत्रकारों में डर का माहौल होने की वजह से उनकी रिपोर्टिंग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हो। ऐसे में न केवल खोजी पत्रकारिता की भावना खत्म जो जाती है बल्कि डर के वातावरण के कारण सच को छुपाने का भी प्रयास किया जाता है। ऐसे में मुख्यधारा की मीडिया में स्वयं ही अपने ऊपर सेंसरशिप लगाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
    • हालाँकि कानूनी ढाँचे की बात करें तो प्रत्यक्ष रूप से पत्रकारिता पर नियंत्रण करने के लिये वर्तमान में कोई ठोस कानून तो नहीं है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से कुछ कानूनों में प्रेस पर नियंत्रण के प्रावधान ज़रूर हैं।
    • हाल ही में ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 के तहत ‘द हिंदू’ समाचार पत्र पर कार्रवाई की बात इसी का एक उदाहरण है। ऐसा भी कहा जाता है कि सरकारें परदे के पीछे से भी प्रेस को नियंत्रित करने की कोशिश करती हैं जिसके कारण मीडिया सरकारों की आलोचना करने से परहेज़ करता है।
    • हालिया वर्षों में मीडिया पर जनसरोकार के मुद्दों को प्रकाश में लाने की बजाय सरकार का पक्ष लेने के भी आरोप लगते रहे हैं। इसलिये संभव है कि सरकारी तंत्र के दबाव में होने की वजह से मीडिया का यह स्वरूप सामने आ रहा है।
    • प्रेस से संबंधित बुनियादी ढाँचे की बात करें तो इसकी गुणवत्ता में भारी कमी देखी जा रही है। खबरों की रिपोर्टिंग करने के लिये जिन संसाधनों की ज़रुरत होती है उन्हें पत्रकारों को मुहैया न कराया जाना एक बड़ी समस्या है।
    • इसके अलावा, प्रेस की आज़ादी में मीडिया का निगमीकरण भी एक बड़ी रुकावट है। ज़्यादातर मीडिया हाउसेज़ के कमान अब उद्योगपतियों के हाथों में चले जाने से सच्ची पत्रकारिता के बजाय अधिक-से-अधिक मुनाफा कमाना प्रेस की प्राथमिकता हो गई है। इसे लोकतंत्र की विडंबना ही कहेंगे कि जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है वह मीडिया आज पूंजीपतियों का हिमायती बनता दिख रहा है।

    सर्वप्रथम मीडियाकर्मियों के कामकाज की दशा को बेहतर करने की ज़रुरत है। उन्हें सेवा की सुरक्षा देना, मीडिया की आज़ादी की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि देश की आज़ादी में प्रेस द्वारा जागृत जनमत और जागरूकता का अहम् योगदान रहा है। अगर प्रेस के ज़रिये ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ को मुखर न किया गया होता तो आज़ाद हवा में साँस लेने के लिये हमें शायद और इंतज़ार करना पड़ता। इसलिये सरकार को लोकतंत्र की मज़बूती हेतु प्रेस की आज़ादी सुनिश्चित करने की ज़रुरत है ताकि भारत का लोकतंत्र हर मायने में एक कामयाब लोकतंत्र की छवि हासिल कर सके।

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