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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • पूना समझौते के प्रावधानों पर प्रकाश डालें इसने दलितों की स्थिति को किस प्रकार प्रभावित किया। चर्चा करें।

    14 Aug, 2020 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    भूमिका

    पूना समझौते के प्रावधान

    दलितों पर प्रभाव

    निष्कर्ष

    24 सितंबर 1932 को डॉ॰ अंबेडकर तथा अन्य हिंदू नेताओं के प्रयत्न से सवर्ण हिंदुओं तथा दलितों के मध्य एक समझौता किया गया। इसे पूना समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के अनुसार- दलित वर्ग के लिये पृथक निर्वाचक मंडल समाप्त कर दिया गया तथा व्यवस्थापिका सभा में अछूतों के स्थान हिंदू वर्ग के अंतर्गत ही सुरक्षित रखे गये। प्रांतीय विधानमंडलों में दलित वर्गों के लिये 147 सीटें आवंटित की गई जबकि सांप्रदायिक पंचाट में उन्हें 71 सीटें प्रदान करने का वचन दिया गया था। मद्रास में 30, बंगाल में 30 मध्य प्रांत एवं संयुक्त प्रांत में 20-20, बिहार एवं उड़ीसा में 18 बम्बई एवं सिंध में 15, पंजाब में 8 तथा असम में 7 स्थान दलितों के लिये सुरक्षित किये गए।
    साथ ही यह वादा भी किया गया कि गैर-मुस्लिमों निर्वाचन क्षेत्रों को आवंटित सीटों का एक निश्चित प्रतिशत दलित वर्गों के लिये आरक्षित कर दिया जाएगा। केंद्रीय विधानमंडल में दलित वर्ग को प्रतिनिधित्व देने के लिये संयुक्त निर्वाचन की प्रक्रिया तथा प्रांतीय विधानमंडल में प्रतिनिधियों को निर्वाचित करने की व्यवस्था को मान्यता दी गई। दलित वर्ग को सार्वजनिक सेवाओं तथा स्थानीय संस्थाओं में उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उचित प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई। कांग्रेस ने स्वीकार किया कि दलित वर्गों को प्रशासनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाएगा।अंबेडकर के नेतृत्व में दलित वर्गों ने संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया।
    वंचित वर्गों के लिये केंद्रीय एवं प्रांतीय विधानमंडलों में मताधिकार लोथियन समिति की रिपोर्ट में निर्दिष्ट व्यवस्था के अनुसार किया जाएगा। केंद्रीय विधानमंडल में, ब्रिटिश भारत के सामान्य निर्वाचक वर्ग के लिये प्रदत्त 18 प्रतिशत सीटें दलित वर्गों के लिये आरक्षित होंगी। किसी को भी स्थानीय निकाय के किसी चुनाव या लोक सेवाओं में नियुक्ति के संदर्भ में मात्र दलित वर्ग से संबद्ध होने के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।

    प्रभाव-

    पूना समझौते ने दलितों को राजनीतिक हथियार बना दिया। संयुक्त निर्वाचन में वास्तविक दलितों को हराकर हिंदू जाति के संगठनों का एजेंट बना दिया और केवल उन दलितों की चुनावी जीत को पक्का किया जो इन संगठनों के एजेंट या हथियार थे।
    पूना समझौते ने दलितों के राजनीतिक, वैचारिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अवनयन को बढ़ावा दिया और इस प्रकार ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था से लड़ने वाले दलितों के वास्तविक एवं स्वतंत्र नेतृत्व को बर्बाद कर दिया।
    इसने हिंदू से पृथक एवं अलग दलित अस्तित्व को स्वीकार न करके उसे हिंदू सामाजिक व्यवस्था के एक हिस्से के रूप में रखा।
    इस समझौते ने समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व-न्याय पर आधारित ‘आदर्श समाज’ के सामने बाधा खड़ी की।
    दलित वर्ग को एक पृथक एवं भिन्न तत्व न मानकर इसने दलित एवं अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों एवं सुरक्षा संबंधी रक्षोपायों को भारत के संविधान में स्पष्ट करने से रोक दिया।
    सांप्रदायिक निर्णय द्वारा भारतीयों को विभाजित करने तथा पूना समझौते के द्वारा हिंदुओं से दलितों को पृथक करने की व्यवस्थाओं ने गांधी जी को आहत कर दिया। गांधी जी ने पूना समझौते के प्रावधानों को पूरी तरह पालन किये जाने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के उद्देश्य से गांधी जी ने अन्य कार्यों को छोड़कर पूर्णरूपेण ‘अश्पृश्यता निवारण अभियान’ में जुट गए।

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