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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • ‘पृथक् राज्यों की मांग में प्रादेशिकता की भावना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।’ विवेचना कीजिये।

    13 May, 2020 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • भूमिका

    • पृथक राज्यों के निर्माण में प्रादेशिकता की भावना का योगदान

    • निष्कर्ष

    प्रादेशिकता की भावना के अंतर्गत एक राज्य अथवा क्षेत्र के हितों को पूरे देश अथवा दूसरे क्षेत्रों या राज्यों के विरुद्ध पेश करने की कोशिश की जाती है, साथ ही राजनीतिक महत्वाकांक्षा के आधार पर संघर्ष को प्रोत्साहित करने की कोशिश की जाती है। भारत में प्रादेशिकता की भावना भारत की भाषाओं, जनजातियों, संस्कृतियों, धर्मों तथा भौगोलिक विविधताओं के कारण पाई जाती है।

    स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की तीव्र मांग उठी। अत: भारत को नृजातीय भाषायी राज्यों के रूप में पुनर्गठित करना पड़ा। इसके पश्चात् भी देश में कई क्षेत्रों में पृथक् राज्यों की मांग जारी रही। वर्ष 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के रूप में तीन नवीन राज्यों का गठन हुआ। ये राज्य विकास की प्रक्रिया में पिछड़ने के साथ-साथ प्रादेशिक पहचान के आधार पर निर्मित हुए। 2014 में तेलंगाना के रूप में पृथक् राज्य के निर्माण के आधार में भी विकास के साथ-साथ क्षेत्रीयता का मुद्दा प्रमुख था।

    वर्तमान समय में भी महाराष्ट्र में विदर्भ, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड तथा पूर्वांचल, गुजरात में सौराष्ट्र तथा असम में बोडोलैंड के रूप में पृथक् राज्यों की मांग जारी है। यद्यपि इन मांगों के पीछे प्रादेशिकता की भावना, साथ ही इन क्षेत्रों के विकास में अनदेखी, प्रमुख कारणों के रूप में विद्यमान है, किंतु कुछ मामलों में प्रादेशिकता की यह प्रवृत्ति राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का भी परिणाम है। विभिन्न राजनीतिक दल क्षेत्रीय पिछड़ेपन को आधार बनाकर आम जनता को भावनात्मक आधार पर संगठित करने का प्रयास करते हैं।

    निष्कर्षत: पृथक् राज्यों की मांग में प्रादेशिकता की भावना का एक प्रमुख कारक के रूप में विद्यमान है और इस प्रादेशिकता को बढ़ावा देने में राजनीतिक महत्वाकांक्षा तथा क्षेत्रीय वंचना ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

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