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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • महासागरीय धाराओं से आपका क्या तात्पर्य है? महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना करें।

    06 Jan, 2019 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भूगोल

    उत्तर :

    भूमिका:


    महासागरीय धाराओं के बारे में बताते हुए उत्तर प्रारंभ करें-

    महासागरों में जल के एक निश्चित दिशा व मार्ग में होने वाले नियमित प्रवाह को धाराएँ कहते हैं। महासागरीय धाराएँ महासागरों में नदी प्रवाह के समान होती हैं।

    विषय-वस्तु


    विषय-वस्तु के मुख्य भाग में हम महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति को प्रभावित करने वाले कारकों पर चर्चा करेंगे-

    महासागराें में धाराओं की उत्पत्ति के पीछे कई कारक ज़िम्मेदार होते हैं। महासागरीय धाराएँ दो प्रकार के बलों द्वारा प्रभावित होती हैं-

    1. प्राथमिक बल: ये जल की गति को प्रारंभ करते हैं।
    2. द्वितीयक बल: ये धाराओं के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।

    • प्राथमिक बल-

    (a) सौर ऊर्जा से जल का गर्म होना- हम जानते हैं कि सौर ऊर्जा से गर्म होकर जल पैलता है। पृथ्वी पर सूर्यातप के वितरण में भी भिन्नता पाई जाती है। यही कारण है कि विषुवत वृत्त के पास महासागरीय जल का स्तर मध्य अक्षांशों की अपेक्षा 8 से.मी. अधिक होता है। इससे विषुवतरेखीय जल धाराओं के रूप में गतिशील हो जाता है और विषुवत वृत्त पर जल की पूर्ति के लिये जल धाराएँ ध्रुवों की ओर से विषुवत रेखा की ओर प्रवाहित होने लगती है।

    (b) वायु- महासागर की सतह पर बहने वाली वायु जल को गतिमान करती है। इस क्रम में वायु एवं जल की सतह के बीच उत्पन्न होने वाला घर्षण बल जल की गति को प्रभावित करता है। साथ ही जहँा वायुदाब अधिक होता है वहाँ जल के आयतन में होने वाली कमी के कारण जल-तल नीचा हो जाता है और जहाँ वायुदाब निम्न होता है वहाँ जल-तल ऊँचा हो जाता है। उच्च जल तल से निम्न जल तल की ओर जल के गतिशील होने से महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति होती है।

    (c) गुरूत्वाकर्षण बल- इसके कारण जल नीचे बैठ जाता है और यह एकत्रित जल दाब प्रवणता में भिन्नता लाता है।

    (d) कोरियोलिस बल- पृथ्वी के पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर अपनी अक्षीय रेखा के सहारे परिक्रमा करने के कारण कोरियोलिस बल की उत्पत्ति होती है। इस गति के कारण जल स्थल के साथ नहीं बह पाता और पीछे रह जाता है। इसके चलते उत्तरी गोलार्द्ध में जल पृथ्वी की गति की दिशा के दाहिनी तरफ तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर प्रवाहित होता है। इनके कारण सभी महासागरीय बेसिनों में वृहत्त धाराएँ उत्पन्न होती है।

    • द्वितीयक बल-

    (a) घनत्व में भिन्नता- जल के घनत्व में अंतर के कारण भी महासागरीय जलधाराओं की ऊर्ध्वाधर गति प्रभावित होती है। सघन जल में नीचे बैठने की प्रवृत्ति होती है, जबकि हल्के जल की प्रवृत्ति ऊपर उठने की होती है। जब ठंडे जल वाली महासागरीय धाराएँ उत्पन्न होती है, तब ध्रुवों के पास बहने वाला जल नीचे बैठ जाता है एवं धीरे-धीरे विषुवत वृत्त की ओर गति करता है। गर्म जलधाराएँ विषुवत वृत्त से सतह के साथ होते हुए ध्रुवों की ओर बहती है और ठंडे जल का स्थान ले लेती है।

    (b) लवणता में भिन्नता- सागरीय लवणता से सागरीय जल का घनत्व प्रभावित होता है तथा घनत्व में अंतर के कारण धाराएँ उत्पन्न होती हैं। अधिक खारा जल निम्न खारे जल की अपेक्षा ज़्यादा सघन होता है तथा इसी प्रकार ठंडा जल, गर्म जल की अपेक्षा अधिक सघन होता है।

    निष्कर्ष


    अंत में संक्षिप्त, संतुलित एवं सारगर्भित निष्कर्ष लिखें-

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