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डॉ. अनन्या राव एक वरिष्ठ औषधि नियामक हैं। वे एक ऐसे राज्य में कार्यरत हैं जो घरेलू और निर्यात बाज़ारों के लिये बाल चिकित्सा कफ सिरप जैसी किफायती दवाओं के निर्माण का प्रमुख केंद्र है। ये दवाएँ अपनी किफायत के कारण आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं।
हाल ही में यह रिपोर्ट सामने आई कि एक स्थानीय कंपनी द्वारा निर्मित कफ सिरप के एक बैच के सेवन के बाद कई बच्चों की मृत्यु से उसका संबंध पाया गया। प्रारंभिक जाँच में यह संकेत मिला कि निम्न-स्तरीय कच्चे माल और खराब गुणवत्ता नियंत्रण के कारण दवाओं में विषैले संदूषक मौजूद थे। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया कवरेज ने भारत के औषधि नियामक मानकों पर गंभीर चिंताएँ उठाई हैं, जिससे ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ के रूप में देश की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई है।
निर्माण कंपनी का दावा है कि उसने मौजूदा विनियमों का पालन किया है तथा तर्क दिया है कि कड़े प्रवर्तन और बार-बार निरीक्षण से उत्पादन लागत बढ़ जाएगी, जिससे दवाएँ गरीबों के लिये महँगी हो जाएँगी और निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को नुकसान पहुँचेगा। कुछ राजनीतिक और उद्योग से जुड़े हितधारकों ने अनौपचारिक रूप से डॉ. राव से अनुरोध किया है कि वे लाइसेंस निलंबन जैसे कठोर कदमों से बचें, यह कहते हुए कि इससे संभावित रूप से नौकरियों का नुकसान, निवेशकों की नकारात्मक प्रतिक्रिया और कूटनीतिक संवेदनशीलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
इसी समय, प्रभावित बच्चों के परिवार जवाबदेही, आपराधिक मुकदमे और मुआवज़े की माँग कर रहे हैं। स्वास्थ्य प्रणाली और दवा सुरक्षा तंत्र में जनता का भरोसा स्पष्ट रूप से कम होता दिखाई दे रहा है।प्रश्न
सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़
1. दवाओं की किफायत, औद्योगिक विकास और जैव-नीतिशास्त्र के ‘अहानिकारिता’ सिद्धांत के बीच नैतिक दुविधा पर चर्चा कीजिये।
2. इस संकट का सामना करने में डॉ. अनन्या राव के पास कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक विकल्प के नैतिक गुणों और सीमाओं का आकलन कीजिये।
3. डॉ. राव को चिकित्सा नैतिकता, जवाबदेही और सार्वजनिक हित को कायम रखते हुए स्वास्थ्य प्रणाली की दीर्घकालिक विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिये कौन-सा कार्य-पथ अपनाना चाहिये? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिये।