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रमेश वर्मा एक खनिज-समृद्ध लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़े ज़िले में ज़िला खनन अधिकारी (DMO) के रूप में नियुक्त हैं। यह क्षेत्र लंबे समय से अवैध रेत एवं पत्थर खनन की समस्या से जूझ रहा है, जिस पर स्थानीय ठेकेदारों का नियंत्रण है और जिन्हें सुदृढ़ राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। इन गतिविधियों के कारण पर्यावरणीय क्षति, राज्य के राजस्व की हानि तथा ग्रामीणों से जुड़े बार-बार होने वाले दुर्घटनात्मक हादसे सामने आते रहे हैं।
कार्यभार सँभालने के शीघ्र बाद ही रमेश ने पाया कि बार-बार की गई शिकायतों के बावजूद रात के समय अवैध खनन खुलेआम जारी है। जब उन्होंने औचक निरीक्षण के आदेश दिये और वाहनों को ज़ब्त किया, तो उन्हें एक स्थानीय विधायक का फोन आया, जिसने सामाजिक शांति और रोज़गार बनाए रखने के हित में “Go slow” रहने की सलाह दी। अनौपचारिक रूप से रमेश को वरिष्ठ सहकर्मियों द्वारा यह भी बताया गया कि जो अधिकारी पहले सख़्ती से कार्रवाई करते थे, उनका कुछ ही महीनों में स्थानांतरण कर दिया गया।
समय के साथ एक स्पष्ट सांठगांठ का मामला उजागर हुआ। जिसमें स्थानीय राजनेता खनन संचालकों को संरक्षण देते थे, पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने से बचती थी और आपराधिक समूह उन ग्रामीणों को डराने-धमकाने का काम करते थे, जो इन गतिविधियों का विरोध करते थे। इसके बदले अवैध खनन संचालक चुनावी अभियानों के लिये धन उपलब्ध कराते थे तथा विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों को नियमित रिश्वत देते थे। ज़िला कार्यालयों में खनन उल्लंघनों से संबंधित फाइलों को जानबूझकर विलंबित रखा जाता था या उनके प्रावधानों को कमज़ोर कर दिया जाता था।
एक शाम एक गंभीर दुर्घटना घटी, जब अत्यधिक भार से लदा एक खनन ट्रक ग्रामीणों के एक समूह को कुचलता हुआ निकल गया, जिससे दो लोगों की मृत्यु हो गई। जनाक्रोश भड़क उठा और मीडिया का ध्यान प्रशासन की विफलता पर केंद्रित हो गया। राजनीतिक नेताओं ने इसे ‘अनैतिक तत्त्वों’ का कृत्य बताकर टालने की कोशिश की और रमेश पर दबाव डाला कि वे यह प्रमाणित करें कि ट्रक वैध रूप से संचालित हो रहा था।
अब रमेश एक गंभीर नैतिक दुविधा का सामना कर रहे हैं। यदि वह सच्चाई दर्ज करते हैं और कड़ी कार्रवाई आरंभ करते हैं, तो उन्हें राजनीतिक दबाव, व्यक्तिगत खतरों एवं संभावित स्थानांतरण का जोखिम उठाना पड़ सकता है। यदि वह समझौता करते हैं, तो वह राजनीतिक-प्रशासनिक-आपराधिक गठजोड़ का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे विधि के शासन, पर्यावरण संरक्षण और जन-विश्वास को गहरी क्षति पहुँचेगी।
एक लोक सेवक के रूप में रमेश को यह निर्णय लेना है कि वह ऐसे वातावरण में, जहाँ संस्थागत समर्थन कमज़ोर प्रतीत होता है और निहित स्वार्थ गहराई तक जमे हुए हैं, सत्यनिष्ठा, वैधता एवं उत्तरदायित्व को किस प्रकार बनाए रखें।
प्रश्न 1: उपर्युक्त प्रकरण में निहित नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये।
प्रश्न 2: राजनीतिक–प्रशासनिक–आपराधिक गठजोड़ जनहित, पर्यावरणीय प्रशासन एवं सार्वजनिक संस्थानों की विश्वसनीयता को किस प्रकार प्रभावित करता है?
प्रश्न 3: इस मामले में सर्वाधिक नैतिक रूप से उपयुक्त कार्य-पथ क्या होना चाहिये? तात्कालिक प्रशासनिक कदमों तथा दीर्घकालिक संस्थागत सुधारों दोनों का सुझाव दीजिये, ताकि इस प्रकार के राजनीतिक–प्रशासनिक–आपराधिक गठजोड़ की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।
सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़