रैपिड फायर
श्यामजी कृष्ण वर्मा
- 31 Mar 2026
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भारत के प्रधानमंत्री ने श्यामजी कृष्ण वर्मा की पुण्यतिथि (30 मार्च) पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित करने में उनकी भूमिका की सराहना की।
- प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा: 4 अक्तूबर, 1857 को गुजरात के कच्छ ज़िले के मांडवी में जन्म हुआ। वे संस्कृत के विद्वान थे और काशी के पंडितों द्वारा ‘पंडित’ की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले गैर-ब्राह्मण बने।
- आर्य समाज से संबंध: वे स्वामी दयानंद सरस्वती से गहराई से प्रभावित थे और 1877 में बॉम्बे आर्य समाज के प्रथम अध्यक्ष बने।
- व्यावसायिक उपलब्धियाँ: उन्होंने रतलाम, अजमेर और जूनागढ़ जैसी रियासतों में दीवान (मुख्यमंत्री) के रूप में कार्य किया।
- ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ का शुभारंभ: जनवरी 1905 में उन्होंने लंदन से अंग्रेज़ी मासिक पत्रिका ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ की शुरुआत की, जो ब्रिटिश शासन-विरोधी प्रचार और राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार का एक सशक्त वैचारिक माध्यम बनी।
- श्यामजी कृष्ण वर्मा को 1905 में उनके ब्रिटिश शासन-विरोधी लेखन के कारण लंदन में वकालत करने से इनर टेंपल (लंदन की चार ऐतिहासिक ‘इंस ऑफ कोर्ट’ में से एक, जो बैरिस्टर और न्यायाधीशों के लिये पेशेवर संस्था एवं प्रशिक्षण निकाय है) द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था, किंतु उन्हें वर्ष 2015 में मरणोपरांत पुनः बहाल किया गया।
- इंडियन होम रूल सोसाइटी की स्थापना: फरवरी 1905 में उन्होंने लंदन में इंडियन होम रूल सोसाइटी की स्थापना की।
- वे उन प्रारंभिक भारतीय राजनीतिक नेताओं में से एक थे जिन्होंने ‘स्वराज’ (स्व-शासन) शब्द का प्रयोग किया और ब्रिटिश निरंकुश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की।
- ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना: इंग्लैंड में नस्लीय भेदभाव का सामना कर रहे भारतीय छात्रों को आश्रय देने के लिये उन्होंने वर्ष 1905 में लंदन में ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना की।
- यह छात्रावास शीघ्र ही क्रांतिकारी गतिविधियों का एक सशक्त केंद्र बन गया, जहाँ विनायक दामोदर सावरकर, मैडम भीकाजी कामा और वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय जैसे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों का मार्गदर्शन एवं पोषण हुआ।
- अंतिम वर्ष: ब्रिटिश विरोध और दबाव के चलते वर्मा इंग्लैंड छोड़कर पेरिस चले गए और प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंततः जिनेवा में स्थायी रूप से बस गए, जहाँ 30 मार्च, 1930 को उनके निधन तक उन्होंने निवास किया।
- उनकी स्मृति में ‘क्रांति तीर्थ’ नामक एक स्मारक का निर्माण किया गया, जिसका उद्घाटन वर्ष 2010 में मांडवी के समीप किया गया।
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