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भारत में लोकपाल स्थापना दिवस

  • 17 Jan 2026
  • 65 min read

स्रोत: पी.आई.बी.

चर्चा में क्यों?

भारत में लोकपाल स्थापना दिवस 16 जनवरी को मनाया गया, जो लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 3 के लागू होने का प्रतीक है। वर्ष 2014 में भारत में लोकपाल की स्थापना का प्रावधान इसी धारा के माध्यम से किया गया था।

भारत में लोकपाल के संबंध में प्रमुख प्रावधान क्या हैं?

  • भारत में लोकपाल की स्थापना: लोकपाल की अवधारणा सबसे पहले वर्ष 1963 में प्रस्तुत की गई थी, जिसका प्रेरणा स्रोत ओम्बड्समैन मॉडल था और इसकी औपचारिक अनुशंसा  प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) द्वारा की गई थी।
    • भारत ने वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय को स्वीकार किया, जिसके परिणामस्वरूप लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 पारित हुआ। यह अधिनियम 16 जनवरी, 2014 को लागू हुआ और अधिनियम की धारा 3 के तहत औपचारिक रूप से भारत में लोकपाल की स्थापना की गई।
    • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के पारित होने से पहले, कई राज्यों ने अपनी स्वीय विधियों के अंतर्गत लोकायुक्त संस्थाएँ स्थापित कर ली थीं, जिसमें महाराष्ट्र वर्ष 1971 में सबसे पहला राज्य था जिसने लोकायुक्त की स्थापना की।
  • लोकपाल की संरचना: लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य होते हैं। इसमें कम से कम 50% न्यायिक सदस्य होने चाहिये और SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक तथा महिलाओं का अनिवार्य रूप से 50% प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है।
    • सदस्य पाँच वर्षों के लिये या 70 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद पर रहते हैं, जिससे संस्था में विशेषज्ञता के साथ-साथ सामाजिक समावेशन सुनिश्चित होता है।
  • नियुक्ति प्रक्रिया: इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो एक चयन समिति की अनुशंसाओं के आधार पर होती है। इस चयन समिति में शामिल हैं: प्रधानमंत्री, लोकसभा के अध्यक्ष, विपक्ष के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके नामित व्यक्ति और राष्ट्रपति द्वारा नामित एक प्रतिष्ठित न्यायविद।
  • पात्रता मानदंड: लोकपाल के अध्यक्ष के लिये आवश्यक है कि वे सेवा में या सेवानिवृत्त भारत के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च  न्यायालय के न्यायाधीश हों।
    • न्यायिक सदस्य सेवा में या सेवानिवृत्त सर्वोच्च  न्यायालय के न्यायाधीश या उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश में से चयनित किये जाते हैं।
    • गैर-न्यायिक सदस्य सत्यनिष्ठ और ईमानदार होने चाहिये और अधिनियम के तहत निर्दिष्ट क्षेत्रों में कम से कम 25 वर्षों का अनुभव अनिवार्य है।
  • लोकपाल का क्षेत्राधिकार: लोकपाल के क्षेत्राधिकार का विस्तार प्रधानमंत्री (राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश संबंध, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और लोक व्यवस्था से संबंधित मामलों को छोड़कर), केंद्रीय मंत्री, संसद सदस्य और केंद्रीय सरकार के समूह A से D तक के अधिकारी तक होता है। 
    • यह उन संस्थाओं को भी शामिल करता है जिन्हें निर्दिष्ट शर्तों के तहत पर्याप्त सरकारी अनुदान या विदेशी योगदान प्राप्त होता है।
  • अधिकार और कार्य: लोकपाल को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा संदर्भित मामलों में किये जाने वाले जाँच पर पर्यवेक्षण का अधिकार प्राप्त है और प्रारंभिक जाँच के दौरान नागरिक न्यायालय के अधिकारों का प्रयोग करता है।
    • यह तलाशी और जब्ती की अनुमति दे सकता है, अभियोजन या अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, CVC को दिशानिर्देश जारी कर सकता है तथा संस्थागत भ्रष्टाचार के समाधान हेतु प्रणालीगत सुधार सुझा सकता है
  • शिकायत दर्ज करना: कोई भी व्यक्ति, NGO, कंपनी, ट्रस्ट, लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (LLP), यहाँ तक कि विदेशी नागरिक (पासपोर्ट के साथ) भी शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
    • शिकायतें केवल भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act), 1988 के तहत अपराधों से संबंधित होनी चाहिये।
    • शिकायतें लोकपाल (शिकायत) नियम, 2020 के तहत निर्दिष्ट प्रारूप में ऑनलाइन या ऑफलाइन जमा की जा सकती हैं, और इसकी सीमित अवधि सात वर्ष होती है।
  • गोपनीयता और सुरक्षा: लोकपाल जाँच और अन्वेषण के दौरान शिकायतकर्त्ता, गवाह और सरकारी कर्मचारियों की कड़ी गोपनीयता सुनिश्चित करता है।
  • शिकायत निपटान तंत्र: शिकायतों को सामान्यतः जाँच के बाद 15 कार्यदिवसों के भीतर लोकपाल बेंच के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
    • दोषपूर्ण शिकायतों पर भी विचार किया जाता है, सुधार के अवसर दिये जाते हैं और सरकारी कर्मचारियों को अपना बचाव प्रस्तुत करने के लिये कई चरण प्रदान किये जाते हैं, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित होता है।
  • लोकपाल का महत्त्व: लोकपाल भारत के भ्रष्टाचार-विरोधी ढाँचे को सुदृढ़ करता है, क्योंकि यह उच्च सरकारी पदाधिकारियों को जवाबदेह ठहराने के लिये एक स्वतंत्र, वैधानिक तंत्र प्रदान करता है।
    • जाँच अधिकार को प्रक्रिया संबंधी निष्पक्षता और गोपनीयता के साथ जोड़कर, लोकपाल लोकतांत्रिक प्रणाली में लोक विश्वास तथा नैतिक शासन को सुदृढ़ करता है।

LOKPAL

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013

  • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 निर्दिष्ट लोक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार संबंधी  शिकायतों की जाँच के लिये केंद्र स्तर पर लोकपाल और राज्य स्तर पर लोकायुक्त की स्थापना का प्रावधान करता है।
  • यह अधिनियम एक स्वतंत्र और वैधानिक भ्रष्टाचार-रोधी ढाँचे के माध्यम से लोक प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और सत्यनिष्ठा को सुदृढ़ करने का उद्देश्य रखता है।
  • इस अधिनियम में वर्ष 2016 में संशोधन किया गया ताकि लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति में लोकपाल चयन समिति का सदस्य बनाया जा सके।
  • लोकायुक्त एक राज्य-स्तरीय भ्रष्टाचार-विरोधी प्राधिकारी है, जिसे लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों और आरोपों की जाँच के लिये नियुक्त किया गया है।
    • लोकायुक्त और उपलोकायुक्त की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से परामर्श के बाद की जाती है।
    • अधिकांश राज्यों में, लोकायुक्त पाँच वर्ष की अवधि के लिये या 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, पद धारण करता है और उसे कार्यकाल की सुरक्षा प्राप्त होती है, क्योंकि उसे हटाना केवल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित महाभियोग प्रस्ताव के माध्यम से ही संभव है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भारत का लोकपाल क्या है?
लोकपाल एक स्वतंत्र वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत निर्दिष्ट लोक पदाधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जाँच करने के लिये की गई है।

2. लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में कौन-कौन आते हैं?
लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में प्रधानमंत्री (कुछ अपवादों के साथ), केंद्रीय मंत्री, सांसद और समूह A–D के केंद्रीय सरकारी अधिकारी, साथ ही कुछ वित्त पोषित निकाय शामिल हैं।

3. लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति कैसे होती है?
इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर की जाती है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित व्यक्ति और एक प्रख्यात न्यायविद शामिल होते हैं।

4. भ्रष्टाचार के मामलों में लोकपाल के पास क्या-क्या अधिकार होते हैं?
लोकपाल CBI जैसी एजेंसियों के माध्यम से पूछताछ और जाँच का आदेश दे सकता है, दीवानी न्यायालयों की शक्तियों का प्रयोग कर सकता है और अभियोजन या अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है।

5. वर्ष 2016 में लोकपाल अधिनियम में किये गए संशोधन का क्या महत्त्व था?
इसने लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को मान्यता प्राप्त नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति में चयन समिति का हिस्सा बनने की अनुमति दी।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स  

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)

  1. भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन [यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन (UNCAC)] का 'भूमि, समुद्र और वायुमार्ग से प्रवासियों की तस्करी के विरुद्ध एक प्रोटोकॉल' होता है।
  2. UNCAC अब तक का सबसे पहला विधितः बाध्यकारी सार्वभौम भ्रष्टाचार निरोधी लिखत है।
  3. राष्ट्र-पार संगठित अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अर्गेस्ट ट्रांसनैशनल ऑर्गेनाइज्ड क्राइम (UNTOC)] की एक विशिष्टता ऐसे एक विशिष्ट अध्याय का समावेशन है, जिसका लक्ष्य उन संपत्तियों को उनके वैध स्वामियों को लौटाना है जिनसे वे अवैध तरीके से ले ली गई थीं।
  4. मादक द्रव्य और अपराध विषयक संयुक्त राष्ट्र कार्यालय [यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स ऐंड क्राइम (UNODC)] संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों द्वारा UNCAC और UNTOC दोनों के कार्यान्वयन में सहयोग करने के लिए अधिदेशित है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 और 3

(b) केवल 2, 3 और 4

(c) केवल 2 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (c) 


मेन्स 

प्रश्न. 'राष्ट्रीय लोकपाल कितना भी प्रबल क्यों न हो, सार्वजनिक मामलों में अनैतिकता की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता।' विवेचना कीजिये। (2013) 

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