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ज़ोजिला दर्रे पर हिमस्खलन

  • 30 Mar 2026
  • 20 min read

स्रोत: इकॉनोमिक टाइम्स 

ज़ोजिला दर्रे के पास एक विनाशकारी हिमस्खलन के परिणामस्वरूप कई लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए, जिससे कश्मीर घाटी और लद्दाख के बीच इस महत्त्वपूर्ण कड़ी की सुरक्षा पर बहस छिड़ गई।

  • हिमस्खलन से तात्पर्य एक तीव्र, गुरुत्वाकर्षण-प्रेरित हिम, हिम एवं अपशिष्ट का पर्वतीय ढाल के पश्चात् दक्षिण की ओर खिसकने से है। संरचनात्मक अस्थिरता, अधिक हिमपात अथवा तापमान वृद्धि से प्रेरित, ये मुख्यतः 30°-45° ढालों पर घटित होते हैं।

ज़ोजिला दर्रा

  • परिचय: ज़ोजिला दर्रा केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख में एक उच्च-तुंगता वाला पहाड़ी दर्रा है। यह लगभग 11,575 फीट की ऊँचाई पर राष्ट्रीय राजमार्ग 1 (NH-1) पर स्थित है।
    • भारी हिमपात और हिमस्खलन के लगातार खतरे के कारण यह दर्रा पारंपरिक रूप से प्रत्येक वर्ष लगभग 6 माह (देर से शरद ऋतु से वसंत तक) के लिये बंद रहता है। यह लद्दाख को सड़क मार्ग से देश के बाकी हिस्सों से काट देता है, जिससे हवाई यात्रा ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।
    • हालाँकि, यह 2025-26 की शीतकालीन अवधि में खुला रहा, जो उन्नत हिम-निर्मूलन उपकरण और उत्कृष्ट संचालन योजना के माध्यम से प्राप्त एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
  • भौगोलिक और रणनीतिक महत्त्व: ज़ोजिला दर्रा जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर को लद्दाख के लेह से जोड़ता है और यह दोनों क्षेत्रों के बीच एक महत्त्वपूर्ण मार्ग के रूप में कार्य करता है।
    • महान हिमालयी शृंखला में स्थित कश्मीर घाटी की हरित उपत्यका और द्रास तथा कारगिल के शुष्क परिदृश्यों के बीच एक प्राकृतिक विभाजन बनाता है।
    • यह लद्दाख को भारत के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाले दो प्रमुख भौगोलिक मार्गों में से एक है, जिसमें श्रीनगर-लेह सड़क (434 किमी.) और मनाली-लेह सड़क (सार्चू मार्ग के माध्यम से 475 किमी.) शामिल हैं।
  • ऐतिहासिक महत्त्व: जोज़िला दर्रा 1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान एक प्रमुख युद्धक्षेत्र रहा। ऑपरेशन बायसन (1948) के तहत भारतीय सेना ने इस ऊँचाई पर पहली बार इतिहास में टैंक (स्टुअर्ट लाइट टैंक्स) तैनात किये, ताकि पाकिस्तानी घुसपैठियों से पास को पुनः प्राप्त किया जा सके।
  • ज़ोजिला सुरंग: लद्दाख की मौसमी अलगाव की समस्या को दूर करने के लिये भारत सरकार वर्तमान में ज़ोजिला सुरंग का निर्माण कर रही है। पूर्ण होने पर यह भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग होगी और एशिया की सबसे लंबी द्विदिश सुरंग बनने की संभावना है, जिसकी लंबाई 14.15 किमी. है। यह दर्रा पार करने का समय 3.5 घंटे से घटाकर केवल 15 मिनट कर देगा।

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