भारतीय अर्थव्यवस्था
महिला नेतृत्व वाला भारत: विकास का नया प्रतिमान
- 10 Mar 2026
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यह एडिटोरियल 08/03/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘From women’s development to women-led development: The journey to Viksit Bharat’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में भारत के विकासात्मक विमर्श में हो रहे परिवर्तन को रेखांकित किया गया है, जिसमें महिलाओं के सशक्तीकरण से आगे बढ़कर महिलाओं द्वारा संचालित विकास की ओर संक्रमण दिखाई देता है। यह परिवर्तन विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी तथा गणित जैसे क्षेत्रों, अनुसंधान एवं उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी में परिलक्षित होता है।
प्रिलिम्स के लिये: महिला आरक्षण अधिनियम, 2023, लखपति दीदी पहल, स्वयं सहायता समूह, पीएम जन धन योजना, वूमनिया, सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM), महिला श्रम बल भागीदारी दर, पीएम मातृ वंदना योजना।
मेन्स के लिये: महिला-नेतृत्व आधारित विकास की दिशा में भारत द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम, भारत में प्रभावी महिला-नेतृत्व आधारित विकास में बाधा डालने वाले प्रमुख मुद्दे।
भारत का विकास-वृत्तांत अब केवल महिलाओं के सशक्तीकरण तक सीमित नहीं रहा है बल्कि यह उस चरण में प्रवेश कर चुका है जहाँ विकास की गति स्वयं महिलाओं की भागीदारी से संचालित हो रही है। कक्षाओं से लेकर अत्याधुनिक अनुसंधान प्रयोगशालाओं तक महिलाएँ अभूतपूर्व गति से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित के क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति स्थापित कर रही हैं। सत्र 2024-25 में उच्च शिक्षा के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में कुल नामांकन का लगभग 43% तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा की शोध छात्रवृत्तियों का 53% से अधिक हिस्सा महिलाओं को प्राप्त हुआ है। उच्च शिक्षा में महिला नामांकन 1.57 करोड़ से बढ़कर 2.18 करोड़ हो गया है, जबकि एक दशक से भी कम समय में डॉक्टरेट नामांकन में 135% से अधिक की वृद्धि हुई है। जैसे-जैसे भारत वर्ष 2047 के विकसित भारत की ओर अग्रसर हो रहा है, नारी शक्ति अब केवल एक कल्याणकारी लक्ष्य नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था का आधार है।
भारत ने महिला-नेतृत्व आधारित विकास की दिशा में कौन-कौन से प्रमुख कदम उठाए हैं?
- राजनीतिक सक्रियता और विधायी सशक्तीकरण: नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण अधिनियम, 2023) का अधिनियमन भारतीय विधि निर्माण के सर्वोच्च स्तरों में महिलाओं की भूमिका को औपचारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण अनिवार्य करके, भारत प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित कर रहा है कि लैंगिक रूप से संवेदनशील नीति निर्माण एक संरचनात्मक वास्तविकता बन जाए।
- भारत की स्थानीय शासन व्यवस्था में पंचायती राज संस्थाओं में पहले से ही 14.5 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि मौजूद हैं।
- लखपति दीदी कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामीण आर्थिक परिवर्तन: लखपति दीदी पहल ने महिला नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों (SHG) को उच्च-मूल्य वाली शृंखलाओं में समेकित करके ग्रामीण उद्यमिता को पुनर्परिभाषित किया है, जिससे ध्यान केवल जीवन निर्वाह से हटकर स्थायी धन सृजन पर केंद्रित हो गया है।
- यह योजना ड्रोन प्रौद्योगिकी, जैविक खेती और सौर ऊर्जा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सामूहिक वित्तीय शक्ति का लाभ उठाती है, जिससे विकेंद्रीकृत आर्थिक विकास सुनिश्चित होता है।
- सरकार का लक्ष्य महिलाओं को व्यवसाय बढ़ाने और ग्रामीण भारत में सतत विकास में योगदान देने में सहायता करके 3 करोड़ 'लखपति दीदियाँ' (प्रति वर्ष 1 लाख रुपये या उससे अधिक कमाने वाली महिलाएँ) तैयार करना है।
- वर्तमान में देश में 2 करोड़ से अधिक स्व-सहायता समूहों की महिलाएँ ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं।
- विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित ( STEM) और नवाचार के बीच अंतर को समाप्त करना: भारत WISE-KIRAN तथा विज्ञान ज्योति जैसी लक्षित छात्रवृत्तियों एवं अनुसंधान अनुदानों के माध्यम से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) में लैंगिक अंतराल को सक्रिय रूप से न्यूनतम कर रहा है।
- विद्यालय स्तर से लेकर उच्च शोध स्तर तक एक सुदृढ़ शैक्षणिक मार्ग तैयार करके यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि महिलाएँ ‘चौथी औद्योगिक क्रांति’ के नेतृत्व में सक्रिय भूमिका निभाएँ तथा भारत की वैश्विक वैज्ञानिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करें।
- अनुसंधान एवं विकास सांख्यिकी रिपोर्ट 2023 के अनुसार, राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 18.6% है तथा विभिन्न पहलों के माध्यम से शिक्षा से लेकर अनुसंधान तक इस शृंखला को और सशक्त बनाने पर बल दिया जा रहा है।
- वित्तीय समावेशन और डिजिटल सॉवरेनिटी : प्रधानमंत्री जन धन योजना और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पर वुमनिया पहल के माध्यम से डिजिटल वित्त के लोकतंत्रीकरण ने महिलाओं को उनकी संपत्तियों पर सीधा नियंत्रण प्रदान किया है।
- यह डिजिटल स्वायत्तता पुरुष मध्यस्थों पर निर्भरता को कम करती है, ऋण-योग्यता को बढ़ाती है तथा महिला-नेतृत्व वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को राष्ट्रीय सरकारी खरीद बाज़ार तक सीधे पहुँच प्रदान करती है।
- वित्त मंत्रालय के अनुसार, कुल खातों में से 56% खाते महिलाओं के हैं।
- श्रम बल सहभागिता और औपचारिकीकरण: हालिया सरकारी आँकड़ों से महिला श्रम बल सहभागिता दर (FLFPR) में एक संरचनात्मक 'यू-टर्न' का संकेत मिलता है, जो विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं द्वारा MGNREGA और उद्यमिता जैसे विविध माध्यमों से कार्यबल में प्रवेश करने से प्रेरित है।
- औपचारिक अर्थव्यवस्था में इस सकारात्मक गति को बनाए रखने के लिये, कार्यस्थल के बेहतर अधोसंरचनओं को उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसमें सुरक्षा के लिये निर्भया कोष का विस्तार तथा मातृत्व लाभों में वृद्धि शामिल है।
- उदाहरण के लिये, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग में महिला श्रम बल भागीदारी दर में वर्ष 2025 के दौरान निरंतर वृद्धि दर्ज की गई और दिसंबर 2025 में यह 35.3 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो उस वर्ष का सर्वोच्च स्तर था।
- रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा में रणनीतिक नेतृत्व: भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं की भूमिका में संरचनात्मक परिवर्तन हुआ है। अब महिलाओं को सहायक सेवाओं तक सीमित रखने के स्थान पर युद्धक और कमान संबंधी भूमिकाओं में भी अवसर प्रदान किये जा रहे हैं।
- राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में महिलाओं की स्थायी भर्ती तथा वायु सेना के लड़ाकू विमानों के संचालन में अवसर प्रदान करना इस परिवर्तन का प्रमाण है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति लैंगिक रूप से तटस्थ दृष्टिकोण को दर्शाता है।
- सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों की संख्या वर्ष 2014 में लगभग 3,000 से बढ़कर 11,000 से अधिक हो गई है, जिसका उदाहरण कर्नल सोफिया कुरैशी एवं विंग कमांडर व्योमिका सिंह द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के लिये वर्ष 2025 की ऐतिहासिक हाई-प्रोफाइल मीडिया ब्रीफिंग का नेतृत्व करना है।
- लैंगिक समानता को ध्यान में रखते हुए शहरी परिवहन और अवसंरचना: पीएम ई-बस सेवा और विभिन्न राज्य स्तरीय 'पिंक बस' पहलों के माध्यम से महिलाओं को चालक, कंडक्टर एवं तकनीकी कर्मचारी के रूप में सक्रिय रूप से भर्ती करके शहरी क्षेत्रों को नया रूप दिया जा रहा है, जिससे एक सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का निर्माण हो रहा है।
- महिलाओं को 'हरित गतिशीलता' कार्यबल में एकीकृत करके, भारत जलवायु लक्ष्यों एवं सुरक्षित गतिशीलता आवश्यकताओं दोनों को पूरा कर रहा है, जो महिला श्रम बल की भागीदारी बढ़ाने के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- इसके अलावा, टोल संचालन में महिलाओं के सशक्तीकरण और समावेशिता को बढ़ावा देने के लिये, NHAI ने देश भर में राष्ट्रीय राजमार्गों एवं एक्सप्रेसवे नेटवर्क पर 1,140 से अधिक टोल प्लाज़ा पर टोल बूथों के प्रबंधन के लिये दिन की शिफ्ट के दौरान 5,100 से अधिक महिला कर्मचारियों को तैनात किया है।
- जीवन-चक्र स्वास्थ्य सेवा और पोषण संबंधी संप्रभुता: भारत ने मिशन शक्ति 2.0 के माध्यम से महिलाओं के स्वास्थ्य के लिये एक मज़बूत 'जीवन-चक्र दृष्टिकोण' अपनाया है, जो प्रजनन संबंधी अधिकारों, पोषण संबंधी स्वायत्तता और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से मातृ वित्तीय सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करता है।
- इससे यह सुनिश्चित होता है कि स्वास्थ्य संबंधी बाधाएँ किसी महिला की आर्थिक क्षमता में रुकावट न बनें, विशेष रूप से पीएम मातृ वंदना योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से स्वास्थ्य संबंधी जेब-से-खर्च के बोझ को कम करके।
भारत में प्रभावी महिला-नेतृत्व आधारित विकास में बाधा डालने वाले प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- समय की व्यवस्थागत कमी और अवैतनिक देखभाल का बोझ: घरेलू तथा देखभाल संबंधी अवैतनिक कार्यों की असमान रूप से अधिक ज़िम्मेदारी महिलाओं पर होने के कारण ‘टाइम पॉवर्टी (समय की कमी)’ का ऐसा जाल बन जाता है जो उन्हें उच्च-मूल्य वाले नेतृत्व या उद्यमशील गतिविधियों में भागीदारी से वंचित कर देता है।
- सामाजिक व्यवस्था में उनके व्यापक योगदान के बावजूद, यह श्रम राष्ट्रीय लेखांकन में अदृश्य बना रहता है, जो प्रभावी रूप से महिलाओं की पेशेवर और राजनीतिक आकांक्षाओं पर 'जेंडर टैक्स' के रूप में कार्य करता है।
- उदाहरण के लिये, भारत में अवैतनिक देखभाल संबंधी कार्यों का लगभग 84% भाग महिलाओं द्वारा किया जाता है, किंतु यह महत्त्वपूर्ण श्रम अभी भी मान्यता से वंचित है तथा सकल घरेलू उत्पाद की गणना में इसका समावेश नहीं किया जाता।
- इसका अनुमानित आर्थिक मूल्य GDP का 15-17% है, जो विनिर्माण या व्यापार जैसे प्रमुख क्षेत्रों के बराबर या उससे भी अधिक है।
- पूंजी प्राप्ति में अदृश्य संरचनात्मक बाधाएँ: महिला उद्यमियों को संपार्श्विक (भूमि/संपत्ति स्वामित्व) की कमी तथा पारंपरिक उद्यम पूंजी और बैंकिंग प्रणालियों के भीतर प्रणालीगत पूर्वाग्रह के कारण गंभीर ऋण-सीमाबद्धता का सामना करना पड़ता है।
- बेहतर वित्तीय लाभ के बावजूद, महिलाओं के नेतृत्व वाले स्टार्टअप को प्रायः उच्च जोखिम वाला माना जाता है, जिससे 'वित्त पोषण की कमी' की स्थिति उत्पन्न होती है और ये स्टार्टअप सूक्ष्म उद्यमों से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर तक विस्तार करने में बाधित हो जाते हैं।
- हालिया आकलनों के अनुसार भारत में महिला-नेतृत्व वाले स्टार्टअप को संस्थापकों द्वारा जुटाई गई प्रत्येक ₹100 की पूंजी में से केवल ₹4 ही प्राप्त होते हैं।
- प्रतिभा के निरंतर बहिर्गमन की समस्या और वेतन असमानता: शिक्षा में उपलब्धियों और कार्यस्थल पर निरंतरता के बीच संरचनात्मक असंतुलन के कारण ‘निरंतर बहिर्गमन (Leaky pipeline)’ की स्थिति बनती है, जिसमें जहाँ मातृत्व के कारण होने वाले नुकसान और लचीले कार्य ढाँचे की कमी के कारण महिलाएँ मध्य-प्रबंधन स्तरों पर नौकरी छोड़ देती हैं।
- यह समस्या स्थायी लैंगिक वेतन-अंतर से और अधिक गंभीर हो जाती है, जहाँ महिलाओं को प्रायः कम वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्रों तक सीमित कर दिया जाता है, जिनमें सामाजिक सुरक्षा या उन्नति के अवसर लगभग नहीं होते।
- वर्ष 2025 के ‘वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक’ में भारत 131वें स्थान पर पहुँच गया, जहाँ समानता का अंक मात्र 64.1% है। यद्यपि महिला STEM स्नातकों का प्रतिशत 43% है, फिर भी वरिष्ठ नेतृत्व भूमिकाओं में उनका प्रतिनिधित्व स्थिर बना हुआ है।
- क्रियान्वयन की कमी और 'सरपंच-पति' जैसी प्रवृत्तियाँ: चुनावों में महिला आरक्षण जैसे विधायी प्रयासों को क्रियान्वयन के अंतिम स्तर पर सामाजिक मान्यताओं से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जहाँ निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की वास्तविक शक्ति का प्रयोग उनके पुरुष परिजन करते हैं, जिसे ‘सरपंच-पति’ प्रवृत्ति के रूप में जाना जाता है।
- यह प्रतीकात्मकता ज़मीनी स्तर पर महिला-नेतृत्व वाले विकास की गुणवत्ता को कमज़ोर कर देती है और संस्थागत सशक्तीकरण को वास्तविक निर्णयकारी शक्ति के स्थान पर केवल प्रतीकात्मक उपलब्धि तक सीमित कर देती है।
- इसके अलावा, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी प्रमुख योजनाओं में निधियों के अपर्याप्त उपयोग के कारण भी क्षेत्रीय प्रगति बाधित होती है।
- जलवायु संबंधी भेद्यता और श्रमसाध्य श्रम का 'तिहरा बोझ': सूखा तथा भीषण गर्मी जैसी जलवायु-प्रेरित आपदाएँ विशेष रूप से उन महिलाओं को प्रभावित करती हैं जो भारत के ग्रामीण एवं प्राथमिक क्षेत्रों की अनदेखी किंतु प्रमुख आधारशिला के रूप में कार्य करती हैं।
- जलवायु संकट के कारण पुरुषों के नगरों की ओर प्रवास करने पर महिलाओं को ‘तिहरे बोझ (Triple burden)’ अर्थात् खेतों में शारीरिक श्रम, घरेलू अवैतनिक कार्य तथा संसाधनों की कमी का प्रबंधन— इन तीनों जिम्मेदारियों का एक साथ वहन करना पड़ता है।
- शोध से पता चलता है कि ग्रामीण महिलाओं में से 85% कृषि में लगी हुई हैं, लेकिन केवल 13% के पास ही भूमि का स्वामित्व है। भूमि उनके नाम पर न होने के कारण वे कृषि ऋण का लाभ भी नहीं ले पातीं।
- व्यावसायिक अलगाव और 'अस्थिर स्थिति': भारत में महिलाएँ 'अस्थिर स्थिति' में फँसी हुई हैं, जो कृषि और वस्त्र उद्योगों के भीतर कम वेतन वाली, दोहराव वाली तथा अनौपचारिक भूमिकाओं में केंद्रित हैं, जो न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा या कॅरियर प्रगति प्रदान करती हैं।
- महिलाओं के लिये उपयुक्त एर्गोनॉमिक उपकरणों की कमी तथा डीप-टेक और विनिर्माण जैसे उच्च-विकास वाले क्षेत्रों में लगातार बनी हुई 'बॉयज़ क्लब' संस्कृति इस व्यावसायिक अलगाव को और सुदृढ़ करती है।
- जनवरी 2026 तक, ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत 31 करोड़ श्रमिकों में से लगभग 54% महिलाएँ हैं, फिर भी चौंकाने वाली बात यह है कि कामकाज़ी महिलाओं में से 94% अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं तथा समान श्रम के लिये उन्हें पुरुषों की तुलना में कम पारिश्रमिक प्राप्त होता है।
- प्रौद्योगिकी-प्रेरित दुर्व्यवहार और डिजिटल उत्पीड़न: डिजिटल इकॉनमी के उदय ने दुर्व्यवहार का एक नया मोर्चा खोल दिया है, जहाँ डीपफेक एवं ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी प्रौद्योगिकी-प्रेरित हिंसा के माध्यम से महिलाओं को लक्षित किया जाता है और उनकी आवाज़ को दबाने का प्रयास किया जाता है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार के साथ यह डिजिटल असुरक्षा महिलाओं को व्यवसाय विस्तार या राजनीतिक अभिव्यक्ति के लिये ऑनलाइन मंचों के उपयोग से हतोत्साहित करती है, जिससे विद्यमान डिजिटल लैंगिक विभाजन और गहरा हो जाता है।
- एक प्रमुख समस्या यह भी है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास और निर्माण में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित है।
- महिलाएँ लगभग 22% पेशेवरों और वरिष्ठ पदों में 14% से भी कम हैं, जिसके कारण विविध दृष्टिकोणों की कमी रहती है तथा अनेक उपकरण महिलाओं की सुरक्षा संबंधी चिंताओं की उपेक्षा कर देते हैं।
भारत प्रभावी महिला-नेतृत्व वाले विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिये कौन से उपाय अपना सकता है?
- 'लिंग-संवेदनशील शहरीकरण' को संस्थागत रूप देना: भारत को ऐसा लैंगिक-संवेदनशील नगरीय नियोजन अपनाना चाहिये जो केवल बुनियादी सुरक्षा तक सीमित न रहकर ‘अनुभव-आधारित अवसंरचना’ पर केंद्रित हो।
- इसके अंतर्गत ‘महिला सुरक्षा एवं उपयोगिता आकलन’ किये जाने चाहिये ताकि यातायात-केंद्रित विकास क्षेत्रों को उच्च दृश्यता वाले स्थानों और एकीकृत ‘देखभाल गलियारों’ (निकटवर्ती विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र तथा बाज़ार) के साथ विकसित किया जा सके।
- इन सिद्धांतों को नगर निगम की मास्टर योजनाओं में शामिल करके, शहरी केंद्र 'गतिशीलता की अप्रत्यक्ष लागत' को कम कर सकते हैं और रात्रिकालीन समय में भी महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
- 'SHE-Mart' ज़िला सहकारी समितियों का विस्तार: सूक्ष्म निर्वाह से आगे बढ़ने के लिये, भारत को प्रत्येक ज़िले में SHE-Mart सामुदायिक खुदरा केंद्रों को 'सामूहिक ब्रांडिंग' के लिये संरचित प्लेटफॉर्म के रूप में संचालित करना चाहिये।
- ये केंद्र ग्रामीण स्वयं-सहायता समूहों द्वारा निर्मित उत्पादों के लिये विशेष लॉजिस्टिक तथा विपणन मंच के रूप में कार्य करेंगे और उन्हें हवाई अड्डों एवं बड़े वाणिज्यिक परिसरों जैसे अधिक भीड़-भाड़ वाले शहरी बाज़ारों तक प्रत्यक्ष पहुँच प्रदान करेंगे।
- इस प्रकार की ‘मूल्य-शृंखला एकीकरण’ प्रक्रिया से ग्रामीण महिलाएँ केवल उत्पादक न रहकर ‘स्व-रोज़गार उद्यमी’ बन सकेंगी तथा उनके उत्पादों को व्यापक बाज़ार पहचान प्राप्त होगी।
- निजी कंपनियों में ‘पुनः-प्रवेश व्यवस्था’ को अनिवार्य बनाना: महिलाओं के कॅरियर में आने वाली ‘निरंतरता की कमी’ की समस्या को दूर करने के लिये सरकार को ऐसा वैधानिक ढाँचा प्रोत्साहित करना चाहिये जो कंपनियों को कॅरियर अवकाश के बाद महिलाओं के लिये संरचित ‘पुनः-प्रवेश मार्ग’ उपलब्ध कराने के लिये बाध्य करे।
- इसके अंतर्गत ‘प्रदर्शन सामान्यीकरण’ की व्यवस्था लागू की जा सकती है, जिसमें मातृत्व अवकाश के बाद लौटने वाली महिलाओं का मूल्यांकन केवल उनके सक्रिय कार्यकाल के आधार पर किया जाये, जिससे ‘मातृत्व दण्ड’ की प्रवृत्ति समाप्त हो।
- इस प्रकार की पुनः-प्रवेश व्यवस्था वाली कार्य-संस्कृति मध्य-कॅरियर नेतृत्व के अवसरों को सुरक्षित रखेगी और महत्त्वपूर्ण मानव संसाधन की हानि को रोकेगी।
- महिलाओं के लिये 'जलवायु-अनुकूल कृषि-तकनीक' का उपयोग: 'कृषि के नारीकरण' के साथ, महिला-केंद्रित एर्गोनोमिक उपकरण और 'ड्रोन दीदी' मॉड्यूल जैसी परिशुद्ध कृषि-तकनीक को तैनात करने की तत्काल आवश्यकता है।
- उपायों का ध्यान महिला किसान संघों द्वारा संचालित स्थानीय 'जलवायु-अनुकूल कस्टम हायरिंग सेंटर' के माध्यम से महिला किसानों को 'तकनीकी संप्रभुता' प्रदान करने पर केंद्रित होना चाहिये।
- इस परिवर्तन से यह सुनिश्चित होता है कि महिलाएँ केवल शारीरिक श्रम करने वाली मजदूर ही नहीं बल्कि 'कृषि प्रबंधक' भी हों, जो सतत, उच्च उपज वाली जैविक खेती की ओर संक्रमण का नेतृत्व कर रही हों।
- 'देखभाल अर्थव्यवस्था' के बुनियादी ढाँचे को मुख्यधारा में लाना: भारत को 'देखभाल के बुनियादी ढाँचे' को सड़कों या बिजली के समान सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे की प्राथमिकता के रूप में मानना चाहिये, जिसके लिये 'एकीकृत आँगनवाड़ी-सह-क्रेच' केंद्र स्थापित किये जाने चाहिये।
- परिसर में ही बच्चों की देखभाल की सुविधा उपलब्ध कराकर निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने से राज्य प्रभावी रूप से 'अवैतनिक श्रम का पुनर्वितरण' कर सकता है।
- यह 'समय-संप्रभुता' उपाय महिलाओं को 'समय की कमी' से 'रणनीतिक रोज़गार' की ओर बढ़ने में सक्षम बनाता है, जिससे राष्ट्रीय महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
- ऑनलाइन गतिविधियों के लिये 'डिजिटल सुरक्षा कवच' का निर्माण: प्रौद्योगिकी-आधारित दुरुपयोग से निपटने के लिये, भारत को एक 'राष्ट्रीय डिजिटल सुरक्षा कवच' स्थापित करना चाहिये, जो डीपफेक एवं साइबर उत्पीड़न के त्वरित निवारण के लिये एक विशेष नियामक और तकनीकी ढाँचा हो।
- इस उपाय में 'लिंग-संवेदनशील एल्गोरिदम ऑडिट' की व्यवस्था विकसित करना शामिल है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि AI और सोशल प्लेटफॉर्म अनजाने में महिलाओं की आवाज़ को सीमित ना कर सकें या उन्हें हाशिये पर न धकेलें।
- महिलाओं के लिये ‘डिजिटल सार्वजनिक मंच’ की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि वे बिना किसी भय के इंटरनेट का उपयोग राजनीतिक अभिव्यक्ति, सामाजिक सहभागिता तथा वैश्विक वाणिज्य के साधन के रूप में कर सकें।
निष्कर्ष:
महिला-नेतृत्व आधारित विकास ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में भारत की यात्रा का एक परिवर्तनकारी स्तंभ बनकर उभर रहा है, जिसमें महिलाओं को केवल कल्याणकारी योजनाओं की लाभार्थी के रूप में नहीं बल्कि विकास, नवाचार तथा शासन की अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित किया जा रहा है। तथापि, अवैतनिक देखभाल कार्य का बोझ, कार्यस्थल पर असमानताएँ तथा डिजिटल असुरक्षा जैसी संरचनात्मक बाधाओं का व्यवस्थित समाधान किया जाना आवश्यक है। संस्थागत सहयोग, देखभाल अवसंरचना तथा डिजिटल सुरक्षा को सुदृढ़ करने से ‘नारी शक्ति’ की पूर्ण क्षमता का उपयोग किया जा सकता है। इस दिशा में प्रगति सतत विकास लक्ष्य— SDG5 की प्राप्ति को भी तीव्र गति प्रदान करेगी।
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दृष्टि मेन्स का प्रश्न: “महिला-नेतृत्व आधारित विकास भारत की विकास यात्रा का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है।” महिला-नेतृत्व आधारित विकास को बढ़ावा देने के लिये भारत द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों पर चर्चा कीजिये। साथ ही उन संरचनात्मक चुनौतियों का भी विश्लेषण कीजिये, जो इसके साकार होने में बाधा उत्पन्न करते हैं। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न 1. भारत में 'महिला सशक्तीकरण' से 'महिला-नेतृत्व आधारित विकास' की ओर परिवर्तन का क्या अर्थ है?
यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि महिलाएँ केवल कल्याणकारी नीतियों की लाभार्थी नहीं रह गई हैं, बल्कि आर्थिक विकास, शासन, नवाचार एवं सामाजिक रूपांतरण की सक्रिय संचालक बन रही हैं तथा भारत की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
प्रश्न 2. भारत में महिला-नेतृत्व आधारित विकास को प्रोत्साहित करने वाली प्रमुख नीतिगत पहलें कौन-सी हैं?
प्रमुख पहलों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिये नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023), ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने हेतु लखपति दीदी कार्यक्रम, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के लिये ‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में महिला उन्नयन कार्यक्रम (STEM) तथा विज्ञान ज्योति कार्यक्रम, वित्तीय समावेशन के लिये प्रधानमंत्री जन-धन योजना तथा रक्षा एवं प्रशासनिक क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती सहभागिता शामिल है।
प्रश्न 3. भारत में शिक्षा और विज्ञान, प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग (STEM) में महिलाओं की भागीदारी कैसे विकसित हुई है?
उच्च शिक्षा में STEM नामांकन में महिलाओं की हिस्सेदारी अब लगभग 43% है तथा UGC-NET अनुसंधान फैलोशिप (2024-25) में 53% से अधिक है, जो अनुसंधान, नवाचार एवं उन्नत शैक्षणिक क्षेत्रों में बढ़ती भागीदारी को दर्शाता है।
प्रश्न 4. प्रभावी महिला-नेतृत्व आधारित विकास में बाधा डालने वाली प्रमुख संरचनात्मक बाधाएँ क्या हैं?
प्रमुख चुनौतियों में अवैतनिक देखभाल कार्य का अत्यधिक बोझ, महिला उद्यमियों के लिये पूंजी तक सीमित पहुँच, कार्यस्थलों पर वेतन असमानता, नेतृत्व पदों में अल्प प्रतिनिधित्व, कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता तथा बढ़ती डिजिटल उत्पीड़न की घटनाएँ शामिल हैं।
प्रश्न 5. भारत में महिला-नेतृत्व आधारित विकास को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
भारत देखभाल अर्थव्यवस्था से संबंधित अवसंरचना में निवेश करके, लैंगिक दृष्टि से उत्तरदायी नगरीय नियोजन को प्रोत्साहित करके, महिला पेशेवरों के लिये पुनः-प्रवेश कार्यक्रमों को बढ़ावा देकर, महिला कृषकों के लिये जलवायु-अनुकूल कृषि प्रौद्योगिकी को बढ़ाकर तथा अधिक सुदृढ़ डिजिटल सुरक्षा ढाँचा सुनिश्चित करके महिला-नेतृत्व आधारित विकास को और त्वरित कर सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न 1. “महिला सशक्तीकरण जनसंख्या संवृद्धि को नियंत्रित करने की कुंजी है।” चर्चा कीजिये। (2019)
प्रश्न 2. भारत में महिलाओं पर वैश्वीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों पर चर्चा कीजिये। (2015)
प्रश्न 3. "महिला संगठनों को लिंग भेद से मुक्त करने के लिये पुरुषों की सदस्यता को बढ़ावा मिलना चाहिये।” टिप्पणी कीजिये। (2013)
