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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत-कनाडा साझेदारी का पुनर्मूल्यांकन

  • 09 Mar 2026
  • 149 min read

यह एडिटोरियल 04/03/2026 को द हिंदू में प्रकाशित ‘A reboot: On Canada-India ties’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख वर्ष 2023 की निज्जर घटना के बाद बदलते भू-राजनीतिक एवं व्यापारिक परिदृश्यों के बीच भारत और कनाडा द्वारा अपने तनावपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को फिर से मज़बूत करने के लिये किये जा रहे सतर्क प्रयासों पर प्रकाश डालता है।

प्रिलिम्स के लिये: भारत  कनाडा संबंध, व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA), यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था, स्माइलिंग बुद्धा, कार्बन कैप्चर 

मेन्स के लिये: भारत-कनाडा संबंध: अवसर एवं चुनौतियाँ, भारत की विदेश नीति में ऊर्जा कूटनीति और महत्त्वपूर्ण खनिज, प्रवासी राजनीति और द्विपक्षीय संबंधों पर इसका प्रभाव

वर्ष 2023 की निज्जर घटना के बाद उत्पन्न राजनयिक तनाव के बाद भारत और कनाडा ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को पुनः स्थापित करने की दिशा में सावधानीपूर्वक, लेकिन सार्थक कदम उठाने शुरू कर दिये हैं। नई दिल्ली में हाल ही में हुई उच्च स्तरीय यात्रा इस क्रमिक सुधार का सबसे स्पष्ट संकेत है। वैश्विक व्यापार नीतियों में अनिश्चितताओं सहित बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने दोनों पक्षों को साझा रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए संबंधों को पुनः मज़बूत करने और स्थिर करने के लिये प्रोत्साहित किया है। व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) ढाँचे की दिशा में प्रगति और प्रस्तावित यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था जैसे उभरते परिणाम सहयोग को सुदृढ़ करने की नई तत्परता को दर्शाते हैं। 

Canada

समय के साथ भारत-कनाडा संबंधों में किस प्रकार बदलाव आया है? 

  • सहयोग का युग (1947-1970 का दशक)
    • वर्ष 1947 के बाद, दोनों देशों के बीच संबंध असाधारण रूप से सौहार्दपूर्ण रहे। कनाडा स्वयं को नव स्वतंत्र भारत और पश्चिमी दुनिया के बीच एक 'सेतु' के रूप में देखता था।
    • कोलंबो योजना (1951): भारत और कनाडा इसके संस्थापक सदस्यों में से थे। हालाँकि कनाडा ने बाद में इससे अलग होने का विकल्प चुना।
      • कनाडा विकासात्मक सहायता प्रदान करने वाला एक प्रमुख देश था, जिसने कुंडा जलविद्युत परियोजना जैसी वृहत परियोजनाओं का समर्थन किया।
    • परमाणु साझेदारी: कनाडा ने 1950 के दशक में भारत के पहले अनुसंधान रिएक्टर, CIRUS के निर्माण में सहायता की थी। 
  • परमाणु 'हिमयुग' (1974-2000 का दशक)
    • भारत की परमाणु महत्त्वाकांक्षाओं के कारण दोनों देशों के संबंधों में तीव्र गिरावट आई जिसके परिणामस्वरूप दशकों तक प्रतिबंध लगे रहे।
      • स्माइलिंग बुद्धा (1974): कनाडा ने आरोप लगाया कि भारत ने अपने प्रथम परमाणु परीक्षण के लिये 'CIRUS' रिएक्टर से प्राप्त प्लूटोनियम का उपयोग किया। इसके पश्चात कनाडा ने परमाणु सहयोग समाप्त कर दिया तथा प्रतिबंध लगा दिये।
      • एयर इंडिया फ्लाइट 182 घटना (1985): कनाडा में सक्रिय खालिस्तानी अलगाववादियों द्वारा 'कनिष्क' विमान में किये गए बम विस्फोट, जो कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकी हमला था, ने संबंधों को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया।
        • भारत को प्रायः यह अनुभव होता था कि कनाडा अपने क्षेत्र में सक्रिय अलगाववादी तत्त्वों के प्रति अत्यधिक उदार है।
      • पोखरण-II (1998): भारत द्वारा परमाणु परीक्षणों की दूसरी शृंखला के बाद तनाव फिर से चरम पर पहुँच गया, जिसके कारण कनाडा द्वारा एक और चरण के प्रतिबंध लागू किये गए। 
  • पुनरुत्थान एवं रणनीतिक साझेदारी (2010-2022)
    • भारत की अर्थव्यवस्था में संवृद्धि के साथ, कनाडा ने संबंधों को फिर से मज़बूत करने की कोशिश की, जिसका परिणाम वर्ष 2018 में एक 'रणनीतिक साझेदारी' के रूप में सामने आया।
    • परमाणु पुनर्स्थापन (2010): भारत सरकार और कनाडा सरकार के बीच परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग में सहयोग के लिये एक समझौते पर हस्ताक्षर किये गए।
    • वर्ष 2015 में, 42 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय यात्रा एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। व्यापार में लगातार वृद्धि हुई और भारत कनाडा के लिये अंतर्राष्ट्रीय छात्रों का शीर्ष स्रोत बन गया।
  • कूटनीतिक तनाव से रणनीतिक पुनर्स्थापन तक (वर्ष 2023 से वर्तमान)
    • प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में 21वीं शताब्दी में दोनों देशों के संबंध अपने निम्नतम स्तर पर पहुँच गए । हालाँकि हाल ही में एक नई दिशा में परिवर्तन दिखाई दिया है।
    • सितंबर 2023 में कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री ट्रूडो ने खालिस्तानी कार्यकर्त्त्ता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों की 'संभावित भूमिका' का आरोप लगाया।
      • इसके परिणामस्वरूप राजनयिकों को निष्कासित कर दिया गया और व्यापार वार्ता को निलंबित कर दिया गया।
    • नेतृत्व में बदलाव के बाद, कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने वर्ष 2026 की शुरुआत में भारत का दौरा किया। 
      • दोनों देशों ने 'व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते' को तीव्र गति से आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की तथा वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया।

भारत और कनाडा के बीच सहयोग के प्रमुख क्षेत्र कौन-कौन से हैं? 

  • रणनीतिक ऊर्जा और परमाणु सुरक्षा: ऊर्जा साझेदारी सामान्य सहयोग से आगे बढ़कर दीर्घकालिक संसाधन सुरक्षा के माध्यम से भारत के विकसित भारत 2047 लक्ष्यों का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बन गई है।
    • स्थिर यूरेनियम आपूर्ति सुनिश्चित करके भारत घरेलू उत्पादन घाटे को कम करता है तथा वैश्विक बाज़ार की अस्थिरता के बीच भी अपने विस्तारित परमाणु बेड़े की सतत परिचालन निरंतरता सुनिश्चित करता है।
    • मार्च 2026 में कनाडा की Cameco के साथ 2.6 बिलियन कैनेडियन डॉलर का एक ऐतिहासिक नौ वर्षीय समझौता किया गया था, जिसके तहत 22 मिलियन पाउंड यूरेनियम कंसन्ट्रेट की आपूर्ति जाएगी।
      • यह वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता हासिल करने के भारत के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य का समर्थन करता है।
  • आर्थिक एकीकरण और व्यापार विविधीकरण: दोनों राष्ट्र व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (जो वर्तमान में वार्ता के अधीन है) के माध्यम से अस्थायी लेन-देन से आगे बढ़कर एक 'स्थायी आर्थिक आधार' की ओर व्यापार को संस्थागत रूप दे रहे हैं।
    • इस समझौते का उद्देश्य फार्मास्यूटिकल्स और उन्नत विनिर्माण जैसे उच्च विकास वाले क्षेत्रों में टैरिफ बाधाओं को समाप्त करना है, जिससे निवेश के लिये अधिक पूर्वानुमेय परिवेश विकसित हो सकें।
    • वर्तमान में, द्विपक्षीय व्यापार 8.66 बिलियन डॉलर (वित्त वर्ष 2025) का है। CEPA के लिये संदर्भ की शर्तें मार्च 2026 में हस्ताक्षरित की गईं, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक 50 बिलियन डॉलर के व्यापार की मात्रा हासिल करना है।
  • महत्त्वपूर्ण खनिज और आपूर्ति शृंखला समुत्थानशीलता: कनाडा के विशाल खनिज भंडार और विद्युत वाहनों तथा इलेक्ट्रॉनिक्स के लिये भारत की विशाल विनिर्माण मांग के मध्य स्वाभाविक समन्वय उत्पन्न होता है, जो एकल-स्रोत आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भरता को कम करता है।
    • यह साझेदारी हरित परिवर्तन के लिये आवश्यक खनिजों के मध्यवर्ती प्रसंस्करण और उत्तरोत्तर विनिर्माण पर केंद्रित है।
    • हाल ही में भारत और कनाडा ने स्वच्छ ऊर्जा एवं उन्नत प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को समर्थन देने वाली सुरक्षित तथा विविध आपूर्ति शृंखलाओं के निर्माण के लिये महत्त्वपूर्ण खनिजों के सहयोग पर एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। 
      • भारत ने महत्त्वपूर्ण खनिज मूल्य शृंखलाओं में उत्तरदायित्वपूर्ण उत्पादन, निवेश और नवाचार को बढ़ावा देने के लिये G7 महत्त्वपूर्ण खनिज कार्य योजना का भी समर्थन किया।
  • उच्च-तकनीकी और विश्वसनीय पारिस्थितिकी तंत्र: डिजिटल अवसंरचना में राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये सहयोग 'विश्वसनीय प्रौद्योगिकी' की ओर उन्मुख हो गया है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
    • यह ऑस्ट्रेलिया-कनाडा-भारत (ACITI) त्रिपक्षीय साझेदारी से भी प्रेरित है, जिसका उद्देश्य महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग को बढ़ाना है।
    • हाल ही में कनाडा-भारत प्रतिभा और नवाचार रणनीति का शुभारंभ किया गया, जिसके अंतर्गत शीर्ष विश्वविद्यालयों के बीच 13 नई साझेदारियाँ शामिल हैं।
      • इसमें मैकगिल विश्वविद्यालय के नेतृत्व में स्थापित एक नया AI सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भी शामिल है।
  • सुरक्षा और समुद्री क्षेत्र जागरूकता: भारत-कनाडा रक्षा संवाद का संस्थानीकरण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यावहारिक सैन्य सहयोग और संयुक्त सुरक्षा हितों की दिशा में एक परिवर्तन का प्रतीक है। 
    • यह परिपक्वता दोनों देशों को समुद्री सुरक्षा तथा आतंकवाद-रोधी सहयोग जैसी साझा चुनौतियों का समाधान करने में सक्षम बनाती है, साथ ही एक मुक्त और खुले क्षेत्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में भी सहायक है।
    • हाल ही में भारत ने इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA) में संवाद साझेदार के रूप में कनाडा की रुचि का स्वागत किया है, क्योंकि समुद्री प्रशासन, जलवायु अनुकूलन, ब्लू इकोनॉमी तथा क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में कनाडा का अनुभव उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

भारत और कनाडा के बीच मतभेद के प्रमुख क्षेत्र कौन से हैं? 

  • अलगाववादी सक्रियता और 'अनुमेय' राजनीति: कनाडा में खालिस्तानी अलगाववाद के संबंध में राजनीतिक अभिव्यक्ति बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की भिन्न-भिन्न व्याख्या ही मूल विवाद का कारण बनी हुई है।
    • भारत इन समूहों के प्रति कनाडा की सहिष्णुता को अपनी क्षेत्रीय अखंडता के लिये खतरा मानता है, जबकि कनाडा का संवैधानिक ढाँचा नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है।
    • नई दिल्ली कनाडा के बिल C-9 पर विधायी प्रगति पर बारीकी से नज़र रख रही है, जिसका उद्देश्य आतंकवादी प्रतीकों को अपराध घोषित करना है, फिर भी इसके क्रियान्वयन को लेकर संशय बना हुआ है।
  • अंतर्राष्ट्रीय दमन और खुफिया विश्वास: वर्ष 2023–2024 के दौरान कनाडा की भूमि पर भारतीय खुफिया अभियानों से संबंधित आरोपों ने विश्वास के गहरे संकट को जन्म दिया है जिसे केवल व्यापार-केंद्रित 'रीसेट' पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता।
    • हालाँकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) चैनल के माध्यम से खुफिया सहयोग को पुनर्गठित किया जा रहा है फिर भी राज्य-प्रायोजित हस्तक्षेप के प्रति संरचनात्मक संदेह कूटनीतिक स्थिरता के लिये दीर्घकालिक खतरा बना हुआ है।
    • सत्र 2023-2024 के दौरान हुए व्यवधान के समय राजनयिकों की आकस्मिक वापसी और निष्कासन से परिचालन गतिरोध उत्पन्न हो गया, जो अभी भी व्यापार-सुगमता एवं छात्रों की गतिशीलता को प्रभावित करता है।
  • कृषि संरक्षणवाद और दलहन शुल्क: 'संवेदनशील' वस्तुओं जैसे दलहनों का व्यापार आवर्ती विवाद का कारण बनता है क्योंकि भारत खाद्य उत्पादन में 'आत्मनिर्भरता' की नीति पर ज़ोर देता है जबकि कनाडा को अपने निर्यात बाज़ार की स्थिरता की आवश्यकता होती है।
    • घरेलू किसानों की रक्षा और खाद्य कीमतों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये भारत ने पीले मटर पर 30% एवं मसूर पर 10% का उच्च शुल्क लागू कर रखा है। ये संरक्षणवादी उपाय कनाडा के भारत को निर्यात किये जाने वाले सबसे बड़े निर्यात क्षेत्र को सीमित करते हैं तथा कृषि व्यापार सहयोग को और गहरा करने में लगातार बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • विधिक एवं न्यायिक भिन्नता: कनाडा की विधिवत प्रक्रिया और मानवाधिकारों पर केंद्रित कानूनी दृष्टिकोण तथा भारत का शून्य-सहिष्णुता वाला सुरक्षा ढाँचा मौलिक रूप से असंगत है।
    • जब कनाडा की अदालतों में 'गैंगस्टर-आतंकवादी' नेटवर्क से संबंधित कानूनी प्रत्यर्पण अनुरोध या साक्ष्य साझा करने में बाधा आती है तो नई दिल्ली इसे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के रूप में देखती है, जिससे द्विपक्षीय तनाव और गहरा जाता है।
    • हालाँकि भारत-कनाडा पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (1994) औपचारिक ढाँचा बनी हुई है, लेकिन व्यावहारिक कार्यान्वयन ऐतिहासिक रूप से धीमा रहा है, जिसमें भारत प्रायः प्रत्यर्पण के संबंध में कनाडाई अदालतों में साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिये उच्च सीमा की आलोचना करता रहा है।
  • परमाणु और उच्च-प्रौद्योगिकी में विनियामक विषमता: 2.6 अरब कनाडाई डॉलर के यूरेनियम सौदे के बावजूद, भारतीय धरती पर कनाडाई सुरक्षा और पर्यावरण मानकों के 'विनियामक अतिरेक' को लेकर विवाद बना हुआ है।
    • कनाडा द्वारा द्वि-उपयोगी प्रौद्योगिकियों के संदर्भ में कठोर अंतिम-उपयोग निगरानी पर दिया जा रहा ज़ोर नई दिल्ली को ‘वर्ष 1974 के पश्चात् विकसित हुई दीर्घकालिक शंका’ की निरंतरता के रूप में प्रतीत होता है, जो उच्च-प्रौद्योगिकी सहयोग की पूर्ण संभावनाओं के विकास में अवरोध उत्पन्न करता है।
    • भारत अमेरिका के समान 'विश्वसनीय भागीदार' का दर्जा चाहता है, जबकि कनाडा अधिक कठोर, बहुस्तरीय सुरक्षा ढाँचा बनाए रखता है। 

भारत कनाडा के साथ अपने संबंधों को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय अपना सकता है? 

  • 'शांत कूटनीति' और सुरक्षा संपर्कों को संस्थागत रूप देना: भारत को उच्च-स्वर सार्वजनिक बयानबाज़ी के स्थान पर विवेकपूर्ण, वरिष्ठ-स्तरीय संस्थागत संवाद माध्यमों के माध्यम से अपनी सहभागिता को स्थानांतरित करना चाहिये, ताकि आधारभूत विश्वास का पुनर्निर्माण हो सके।
    • राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर पर एक स्थायी द्विपक्षीय सुरक्षा और संप्रभुता संवाद स्थापित करने से खुफिया जानकारी साझा करने तथा कानूनी समन्वय के लिये एक संरचित प्रोटोकॉल तैयार होगा। 
    • यह तंत्र पेशेवर विधि प्रवर्तन अभिकरणों के माध्यम से दोनों देशों को उग्रवाद तथा अंतर्राष्ट्रीय अपराध से संबंधित चिंताओं का समाधान करने की सुविधा देगा, जिससे व्यापक कूटनीतिक तथा आर्थिक संबंधों को समय-समय पर उत्पन्न होने वाली राजनीतिक उत्तेजनाओं से पृथक रखा जा सके।
  • ऊर्जा मूल्य शृंखला के माध्यम से रणनीतिक विविधीकरण: पारंपरिक व्यापार से आगे बढ़ते हुए, भारत को कनाडा के यूरेनियम और महत्त्वपूर्ण खनिजों के विशाल भंडार के लिये प्राथमिक डाउनस्ट्रीम भागीदार के रूप में अपनी स्थिति स्थापित करनी चाहिये। 
    • 'रणनीतिक ऊर्जा और खनिज गलियारे' को चालू करके, भारत दीर्घकालिक ऑफटेक समझौतों को सुरक्षित कर सकता है, जो उसके विशाल परमाणु विस्तार एवं इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक होंगे। 
    • स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR) तथा लिथियम प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में यह गहन आर्थिक पारस्परिक निर्भरता ‘टू-बिग-टू-फेल’ (इतना वृहत कि उसके विफल होने की संभावना नगण्य हो) प्रकार का वाणिज्यिक बंधन निर्मित करेगी, जो कूटनीतिक तनाव की अवस्थाओं में भी द्विपक्षीय संबंधों को एक स्थिर आधार प्रदान करेगा।
  • ज्ञान को जनसंपर्क में परिणत करने वाली प्रतिभाओं की शृंखला को बढ़ावा देना: भारत को अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा मॉडल को परिष्कृत करने के लिये कनाडा के साथ मिलकर काम करना चाहिये, जिसमें बड़े पैमाने पर भर्ती के बजाय उच्च-मूल्य वाले अनुसंधान एवं तकनीकी व्यावसायिक प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। 
    • वर्ष 2026 की रणनीति के तहत संयुक्त 'हाइब्रिड कैंपस' और AI उत्कृष्टता केंद्रों की शुरुआत यह सुनिश्चित करेगी कि भारतीय छात्र कनाडा के कम वेतन वाले सेवा क्षेत्र के बजाय उसके उच्च-तकनीकी श्रम बाज़ार में एकीकृत हों। 
    • यह गुणात्मक बदलाव कनाडा में आवास एवं अवसंरचनाओं पर घरेलू दबाव को कम करेगा, जबकि भारतीय प्रवासी समुदाय की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता और सॉफ्ट पावर को बढ़ाएगा।
  • उप-राष्ट्रीय और संघीय राज्य कूटनीति का लाभ उठाना: 'ओटावा-नई दिल्ली' की अड़चन को दूर करने के लिये, भारत को सस्केचेवान, अल्बर्टा और ओंटारियो जैसे कनाडाई प्रांतों के साथ प्रत्यक्ष संवाद को महत्त्वपूर्ण रूप से विस्तारित करना चाहिये, जिनके अपने विशिष्ट आर्थिक हित हैं।
    • विशिष्ट साझा आर्थिक हितों— जैसे दालें, पोटाश तथा खनन प्रौद्योगिकी पर केंद्रित ‘सिस्टर-स्टेट’ समझौतों का संस्थानीकरण करके भारत संबंधों के लिये विकेंद्रीकृत आधार निर्मित कर सकता है।
    • यह उप-राष्ट्रीय दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि कनाडा में क्षेत्रीय आर्थिक हितधारक स्थिर द्विपक्षीय संबंधों के मुखर समर्थक बनें, जिससे वैचारिक रूप से प्रेरित घरेलू राजनीतिक गुटों के प्रभाव को संतुलित किया जा सके।
  • 'इंडो-पैसिफिक ब्लू इकोनॉमी' में सहयोगात्मक नेतृत्व: भारत को अपने समुद्री सुरक्षा हितों को संरेखित करने के लिये एक संवाद भागीदार के रूप में हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) में कनाडा के एकीकरण को सुगम बनाना चाहिये।
    • समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA) और सतत गहन समुद्र खनन पर सहयोग करके, भारत महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों को सुरक्षित करने के लिये कनाडा की उच्च-तकनीकी विशेषज्ञता का लाभ उठा सकता है।
    • द्विपक्षीय दृष्टिकोण से आगे बढकर एक साझा क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना की ओर यह परिवर्तन कनाडा को भारत के प्राथमिक प्रभाव क्षेत्र में एक रणनीतिक हितधारक के रूप में परिणत कर सकता है, जिससे संबंधों के लिये एक व्यापक भू-राजनीतिक आधार तैयार होता है।
  • स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) पारिस्थितिकी तंत्र में संयुक्त उद्यम: परमाणु नवाचार में कनाडा की विशेषज्ञता का लाभ उठाते हुए, भारत को केवल यूरेनियम आयातक होने से आगे बढ़कर अगली पीढ़ी की SMR प्रौद्योगिकी का सह-विकासकर्त्ता बनना चाहिये।
    • SMR तैनाती के लिये एक संयुक्त अनुसंधान एवं विकास केंद्र की स्थापना से दोनों देशों को विकेंद्रीकृत परमाणु ऊर्जा के लिये वैश्विक सुरक्षा एवं अप्रसार मानदंडों को सह-लेखन करने की अनुमति मिलेगी। 
    • यह औद्योगिक-तकनीकी गठबंधन एक अद्वितीय 'प्रौद्योगिकी-बंध' बनाता है जिसे भविष्य की सरकारों के लिये पारंपरिक व्यापार समझौतों की तुलना में तोड़ना कहीं अधिक कठिन होगा तथा यह दो परमाणु-सक्षम लोकतंत्रों के बीच एक स्थायी उच्च-तकनीकी सेतु प्रदान करता है।

निष्कर्ष: 

भारत–कनाडा संबंध सहयोग, अलगाव और सावधानीपूर्ण पुनर्नवीनीकरण के विभिन्न चरणों से विकसित हुए हैं, जो सामरिक हितों एवं राजनीतिक संवेदनशीलताओं की अंतःक्रिया को प्रतिबिंबित करते हैं। यद्यपि पृथकतावाद, विधिक ढाँचे और व्यापारिक अवरोधों से उत्पन्न तनाव अभी भी इस संबंध की परीक्षा लेते हैं, फिर भी ऊर्जा सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स, प्रौद्योगिकी तथा व्यापार जैसे क्षेत्रों में उभरता सहयोग गहन सहभागिता का मार्ग प्रस्तुत करता है। भविष्य में संबंधों को स्थिर बनाने के लिये निरंतर संवाद, संस्थागत स्तर पर विश्वास-निर्माण तथा आर्थिक परस्पर-निर्भरता अत्यंत महत्त्वपूर्ण होंगे। 

दृष्टि मेन्स का प्रश्न:

भू-राजनीतिक, सुरक्षा एवं घरेलू राजनीतिक कारकों के कारण भारत-कनाडा संबंध सहयोग और मतभेद के बीच परिवर्तनशील बने रहे हैं। भारत-कनाडा संबंधों के विकास पर चर्चा कीजिये तथा द्विपक्षीय साझेदारी को मज़बूत करने के प्रमुख अवसरों और चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: 

प्रश्न 1. क्या हाल ही में भारत-कनाडा संबंधों में राजनयिक स्तर पर कोई नई शुरुआत हुई है? 
'वर्ष 2023 के निज्जर प्रकरण से उत्पन्न तनाव के बाद भारत–कनाडा संबंधों में धीरे-धीरे स्थिरता आने लगी है। नये राजनयिक संवाद तथा शीर्ष नेतृत्व स्तर पर संपर्कों के माध्यम से विश्वास और सहयोग को पुनः स्थापित करने का सावधानीपूर्ण प्रयास किया जा रहा है।

प्रश्न 2. भारत और कनाडा के बीच सहयोग के प्रमुख क्षेत्र कौन-कौन से हैं? 
प्रमुख क्षेत्रों में ऊर्जा और परमाणु सहयोग, व्यापार और निवेश, महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाएँ, उभरती प्रौद्योगिकियाँ (AI और सेमीकंडक्टर), शिक्षा एवं प्रतिभा की गतिशीलता तथा हिंद-प्रशांत सुरक्षा सहयोग शामिल हैं।

प्रश्न 3. प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) द्विपक्षीय संबंधों के लिये किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है? 
CEPA का उद्देश्य व्यापार के लिये एक स्थायी संस्थागत ढाँचा प्रदान करना, शुल्क बाधाओं को कम करना, बाज़ार पहुँच का विस्तार करना तथा वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को लगभग 50 अरब डॉलर तक बढ़ाने में सहायता करना है।

प्रश्न 4. भारत-कनाडा संबंधों में मतभेद के प्रमुख स्रोत क्या हैं? 
प्राथमिक चुनौतियों में कनाडा में खालिस्तानी अलगाववादी सक्रियता, खुफिया आरोपों से उत्पन्न विश्वास की कमी, विधिक एवं प्रत्यर्पण विवाद तथा कृषि शुल्क जैसे व्यापारिक मुद्दे शामिल हैं।

प्रश्न 5. भारत भविष्य में कनाडा के साथ अपने संबंधों को किस प्रकार सुदृढ़ कर सकता है? 
भारत शांत कूटनीति, ऊर्जा तथा क्रिटिकल मिनरल्स साझेदारी को गहरा करने, उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग का विस्तार करने, कनाडा के प्रांतों के साथ उप-राष्ट्रीय स्तर पर सहभागिता बढ़ाने तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग के माध्यम से संबंधों को सुदृढ़ कर सकता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से किस समूह के सभी चारों देश G20 के सदस्य हैं? (2020)

(a) अर्जेंटीना, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका एवं तुर्की

(b) ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मलेशिया एवं न्यूज़ीलैंड

(c) ब्राज़ील, ईरान, सऊदी अरब एवं वियतनाम

(d) इंडोनेशिया, जापान, सिंगापुर एवं दक्षिण कोरिया

उत्तर : (a)

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