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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत के जनांकिकीय परिवर्तन का लाभ उठाना

  • 23 Mar 2026
  • 231 min read

यह लेख 19/03/2026 को द हिंदू में प्रकाशित 'India’s future demographic challenges' शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के बदलते जनांकिकीय परिदृश्य का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें युवा नेतृत्व वाले विस्तार से वृद्ध और शहरीकृत समाज की ओर संक्रमण का अन्वेषण किया गया है। यह जनांकिकीय लाभांश के सीमित होते अवसर का लाभ उठाने के लिये आवश्यक नीतिगत हस्तक्षेपों का मूल्यांकन करता है, जिनमें विनिर्माण प्रोत्साहन से लेकर वृद्धावस्था देखभाल तक शामिल हैं।

प्रिलिम्स के लिये: कुल प्रजनन दर, सिल्वर इकॉनमी, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, पीएम-विकास

मेन्स के लिये: भारत के जनांकिकीय लाभांश की वर्तमान स्थिति, प्रमुख मुद्दे और उपाय

भारत की जनांकिकीय संरचना में संरचनात्मक परिवर्तन हो रहा है, जहाँ जनसंख्या वृद्धि दर घटकर मात्र 0.5% वार्षिक रह गई है और इसके वर्ष 2051 तक लगभग 1.59 अरब तक पहुँचने का अनुमान है। कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या वर्ष 2041 के आसपास चरम पर पहुँचने वाली है, जो जनांकिकीय लाभांश के उपयोग हेतु उपलब्ध सीमित समय को रेखांकित करती है। साथ ही, अनुमान है कि सदी के मध्य तक वृद्धजन आबादी दोगुनी से अधिक बढ़कर 20.5% (325 मिलियन) हो जाएगी, जो तीव्र वृद्धावस्था का संकेत है। इस प्रकार भारत का जनांकिकीय संक्रमण युवा-प्रधान विकास चरण से एक वृद्ध एवं उच्च आर्थिक दायित्व वाली संरचना की ओर स्पष्ट रूप से अग्रसर है।

भारत की वर्तमान जनसांख्यिकीय संरचना क्या है?

  • कुल जनसंख्या और विकास पथ: वर्ष 2026 तक भारत की कुल जनसंख्या लगभग 1.44 अरब होने का अनुमान है, जिससे मानव पूंजी के संदर्भ में इसकी वैश्विक नेतृत्वकारी स्थिति बनी रहेगी।
    • हालाँकि, वार्षिक वृद्धि दर घटकर लगभग 0.8% हो गई है, जो इस बात का संकेत है कि 'जनसंख्या विस्फोट' की धारणा अब स्थिर और दीर्घकालिक चरण में परिवर्तित हो गई है।
  • कुल प्रजनन दर (TFR) का महत्त्व: भारत ने प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन दर (2.1) को निर्णायक रूप से पार कर लिया है तथा वर्तमान TFR लगभग 1.9–2.0 के बीच स्थिर है। 
    • यह प्रतिस्थापन से कम प्रजनन दर इस ओर संकेत करती है कि यद्यपि जनसांख्यिकीय जड़त्व (momentum) के कारण निकट भविष्य में जनसंख्या वृद्धि जारी रहेगी, किंतु दीर्घकाल में जनसंख्या संकुचन की आधारशिला पहले ही स्थापित हो चुकी है।
  • औसत आयु और युवा आबादी में वृद्धि: भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष है, जो इसे अभी भी एक युवा-प्रधान समाज के रूप में स्थापित करती है। यह स्थिति वैश्विक उत्तर तथा पूर्वी एशिया के तीव्र वृद्धावस्था संक्रमण से गुजर रहे समाज के विपरीत एक विशिष्ट जनांकिकीय लाभ प्रदान करती है। 
    • यह ‘युवा अधिशेष’ श्रम उत्पादकता को बढ़ाने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है, बशर्ते अर्थव्यवस्था प्रतिवर्ष श्रम बाज़ार में प्रवेश करने वाले विशाल कार्यबल को प्रभावी रूप से समायोजित कर सके। 
  • निर्भरता अनुपात एवं कार्यशील आयु वर्ग: UNFPA के अनुसार, कार्यशील आयु वर्ग (15–59 वर्ष) की जनसंख्या अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुँच चुकी है, जो कुल जनसंख्या का लगभग 64–65% है।
    • इससे एक अनुकूल निर्भरता अनुपात निर्मित होता है, जहाँ उत्पादक वयस्कों की संख्या निर्भर जनसंख्या (बच्चे एवं वृद्ध) की तुलना में अधिक होती है, जो सैद्धांतिक रूप से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि को प्रोत्साहित करता है।
  • शहरीकरण एवं आंतरिक प्रवासन: भारत वर्तमान में एक तीव्र ‘स्थानिक पुनर्संरचना’ के दौर से गुजर रहा है, जहाँ लगभग 36–38% जनसंख्या अब शहरी क्षेत्रों में निवास कर रही है। 
    • यह प्रवृत्ति संकट-प्रेरित एवं अवसर-प्रेरित प्रवासन दोनों के कारण उत्पन्न हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप शहर आर्थिक विकास (GDP) के प्रमुख इंजन के रूप में उभर रहे हैं, किंतु साथ ही नगरपालिका अवसंरचना एवं सुलभ आवास पर अभूतपूर्व दबाव भी बढ़ रहा है।
  • वृद्धावस्था संक्रमण: यद्यपि नीतिगत विमर्श प्रायः युवा जनसंख्या पर केंद्रित रहता है, तथापि वृद्धजन आबादी (60+) के वर्ष 2011 के 100 मिलियन से बढ़कर वर्ष 2036 तक 230 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान, भारत के युवा-प्रधान जनांकिकीय रूपरेखा से एक तेज़ी से वृद्ध समाज की ओर संक्रमण को स्पष्ट रूप से इंगित करता है। 
    • यह ‘मौन जनांकिकीय क्रांति’ नीतिगत प्राथमिकताओं को वृद्धावस्था स्वास्थ्य देखभाल, सामाजिक सुरक्षा तंत्र तथा उभरती हुईसिल्वर इकॉनमी’ की दिशा में पुनर्संरेखित कर रही है।
  • लिंग अनुपात और सामाजिक समानता: कठोर सामाजिक हस्तक्षेपों के कारण बाल लिंग अनुपात में लगातार सुधार हो रहा है, हालाँकि उत्तरी क्षेत्रों में क्षेत्रीय असंतुलन अभी भी बना हुआ है। 
    • वर्ष 2026 तक प्रति 1,000 पुरुषों पर 950–952 महिलाओं के रूढ़िवादी अनुमानों के बावजूद, NFHS-5 द्वारा दर्ज 1,020 का लिंग अनुपात भारत में लैंगिक संतुलन में सुधार तथा क्रमिक जनांकिकीय पुनर्संतुलन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत प्रस्तुत करता है।
  • साक्षरता और मानव पूंजी की गुणवत्ता: भारत की राष्ट्रीय साक्षरता दर बढ़कर लगभग 80.9% हो चुकी है, किंतु विश्लेषणात्मक ध्यान अब मात्र विद्यालयी शिक्षा (schooling) तक सीमित न रहकर ‘सीखने के परिणामों’ तथा व्यावसायिक कौशल (employability skills) पर केंद्रित हो गई है। 
    • इस संदर्भ में, कौशल अंतर (skill gap) एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रहा है, क्योंकि जनांकिकीय लाभांश का वास्तविक मूल्य युवा कार्यबल की तकनीकी दक्षता एवं उत्पादक क्षमता पर निर्भर करता है।

विकास और प्रगति हेतु भारत अपने जनसांख्यिकीय परिवर्तन का किस प्रकार लाभ उठा रहा है?

  • PLI योजनाओं के माध्यम से रणनीतिक विनिर्माण: भारत उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के माध्यम से वैश्विक एवं घरेलू कंपनियों को स्थानीय विनिर्माण आधार स्थापित करने हेतु प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे विशाल युवा कार्यबल को कम उत्पादक कृषि से हटाकर उच्च-मूल्य विनिर्माण क्षेत्र की ओर संरचनात्मक रूप से स्थानांतरित किया जा सके। 
    • यह रणनीति भू-राजनीतिक आपूर्ति शृंखला पुनर्संरचना का लाभ उठाते हुए निम्न एवं मध्यम कौशल वाले श्रमिकों को प्रत्यक्ष रोज़गार प्रदान करती है तथा भारत को एक निर्यातोन्मुख अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करने की दिशा में अग्रसर करती है।
    • उत्पादन-आधारित प्रोत्साहनों को वास्तविक उत्पादन वृद्धि से जोड़कर राज्य व्यापक उत्पादन, गुणवत्ता संवर्द्धन तथा औपचारिक रोज़गार सृजन को सुनिश्चित करता है। 
    • वर्ष 2025 के मध्य तक, PLI योजना ने ₹1.76 लाख करोड़ से अधिक निवेश आकर्षित किया, प्रत्यक्ष रूप से 12 लाख से अधिक रोज़गार सृजित किये तथा वर्ष 2014 के बाद मोबाइल फोन निर्यात में 127 गुना वृद्धि को सक्षम बनाया।
  • लैंगिक लाभांश का लाभ उठाना: यह स्वीकार करते हुए कि महिला सहभागिता के बिना जनसांख्यिकीय लाभांश का पूर्ण उपयोग संभव नहीं है, भारत लक्षित कौशल विकास एवं वित्तीय समावेशन के माध्यम से महिला आर्थिक भागीदारी में विद्यमान संरचनात्मक अवरोधों को दूर करने का प्रयास कर रहा है।
    • नीतिगत लक्ष्य अब मात्र शैक्षिक नामांकन तक सीमित न रहकर वास्तविक रोज़गार क्षमता के संवर्द्धन पर केंद्रित है, जहाँ गिग प्लेटफॉर्म एवं महिला-केंद्रित ऋण सुविधाएँ पारंपरिक पितृसत्तात्मक बाधाओं को चुनौती दे रही हैं।
    • महिला कार्यबल को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में एकीकृत करना आर्थिक वृद्धि का गुणक (growth multiplier) सिद्ध हो सकता है। 
    • वर्ष 2024-25 के PLFS आँकड़ों के अनुसार, महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) बढ़कर 41.7% हो गई है, जबकि जुलाई 2025 में लगभग 4.42 लाख महिलाओं की शुद्ध वेतन वृद्धि (EPFO में पंजीकरण) दर्ज की गई, जो औपचारिक रोज़गार में लैंगिक समावेशन के सुदृढ़ीकरण को दर्शाती है।
  • कौशल विकास संरचना में परिवर्तन: भारत अपनी जनसांख्यिकीय अनुकूलता को शिक्षित बेरोज़गारी में परिवर्तित होने से रोकने हेतु पारंपरिक सामान्य डिग्री-आधारित शिक्षा प्रणाली से हटकर उद्योग-उन्मुख व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं प्रौद्योगिकी-संचालित शिक्षुता कार्यक्रमों की ओर संरचनात्मक रूप से अग्रसर हो रहा है। 
    • सरकार शैक्षणिक उत्पादन एवं बाज़ार मांग के मध्य विद्यमान अंतर को पाटने के लिये निजी क्षेत्र सह-प्रबंधित ‘हब-एंड-स्पोक’ मॉडल के माध्यम से पारंपरिक संस्थानों का पुनर्गठन कर रही है।
    • यह स्थानीयकृत कौशल रणनीति कार्यबल को हरित ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं उन्नत लॉजिस्टिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों में शीघ्र तैनाती हेतु सक्षम बनाती है। 
    • वर्ष 2025 में सरकार ने लगभग 20 लाख युवाओं के प्रशिक्षण हेतु 1,000 ITI के उन्नयन को स्वीकृति प्रदान की, जबकि प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना के अंतर्गत ₹99,446 करोड़ का आवंटन कर लगभग 3.5 करोड़ नए औपचारिक रोज़गार सृजन को प्रोत्साहित किया गया।
  • सिल्वर इकॉनमी का संवर्द्धन: वृद्धावस्था प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए, भारत एक सुदृढ़ ‘सिल्वर इकॉनमी’ के विकास की दिशा में सक्रिय प्रयास कर रहा है, जिससे वृद्धजन आबादी की चुनौतियों को नवाचार एवं उद्यमशीलता के एक नए इंजन में परिवर्तित किया जा सके। 
    • नीति निर्माता निजी स्टार्टअप को रिमोट मॉनिटरिंग, असिस्टेड लिविंग और एल्डर-टेक के क्षेत्र में नवाचार करने के लिये प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिससे वरिष्ठ नागरिकों की छवि आश्रितों से बदलकर सक्रिय उपभोक्ताओं के रूप में सामने आ रही है। 
    • यह दोहरा दृष्टिकोण एक ओर जहाँ आवश्यक वृद्धावस्था देखभाल सेवाएँ सुनिश्चित करता है, वहीं दूसरी ओर युवा देखभालकर्ता कार्यबल के लिये विशेषीकृत एवं स्थानीय रोज़गार के अवसर भी सृजित करता है। 
    • SAGE पोर्टल जैसी पहलें वृद्ध देखभाल क्षेत्र के स्टार्टअप्स को वित्तीय समर्थन प्रदान करती हैं, जबकि आयुष्मान भारत योजना के विस्तार के अंतर्गत 70 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को ₹5 लाख रुपये तक का वार्षिक स्वास्थ्य कवरेज प्रदान कर वरिष्ठ नागरिकों हेतु स्वास्थ्य एवं देखभाल अवसंरचना को सुदृढ़ किया गया है।
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का विस्तार: भारत अपने विश्व स्तरीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ उठाकर अपने विशाल शहरीकरण वाले युवा वर्ग को तेज़ी से विस्तारित हो रही गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में औपचारिक रूप देने और समाहित करने का प्रयास कर रहा है।
    • डिजिटल भुगतान, डिजिटल पहचान तथा ऋण तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण करते हुए राज्य सूक्ष्म उद्यमियों एवं स्वतंत्र श्रमिकों को पारंपरिक, धीमी गति से विकसित होने वाली कॉर्पोरेट रोज़गार संरचनाओं से परे अवसर प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।
    • यह अति-संयुक्त डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र न केवल तत्काल आजीविका अवसर सृजित करता है, बल्कि अनौपचारिक क्षेत्र तक सामाजिक सुरक्षा विस्तार के लिये आवश्यक डेटा अवसंरचना भी निर्मित करता है। 
    • इस जनसांख्यिकीय एकीकरण के परिणामस्वरूप, UPI ने हाल ही में 172 बिलियन वार्षिक लेनदेन का प्रसंस्करण कर एक सशक्त डिजिटल अर्थव्यवस्था को समर्थन प्रदान किया है, जो ई-कॉमर्स, फिनटेक एवं हेल्थ-टेक लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में लाखों युवाओं को रोज़गार उपलब्ध करा रही है।
  • उद्यमशीलता को उत्प्रेरित करना: कार्यबल में प्रतिवर्ष होने वाली विशाल वृद्धि के कारण औपचारिक रोज़गार बाज़ार पर पड़ने वाले दबाव को कम करने हेतु भारत ने अपने आर्थिक दृष्टिकोण को स्थानीय स्तर की उद्यमशीलता की ओर पुनर्संरेखित किया है। 
    • बिना गारंटी के ऋण की उपलब्धता तथा लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के लिये नियामकीय प्रक्रियाओं का सरलीकरण युवा नवोन्मेषकों को स्थानीय समाधान-आधारित उद्यम स्थापित करने हेतु सशक्त बनाता है।
    • यह विकेंद्रीकृत रोज़गार सृजन मॉडल विशेष रूप से द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों के संतुलित विकास के लिये महत्त्वपूर्ण है, जिससे अत्यधिक भीड़भाड़ वाले महानगरों की ओर होने वाले असंतुलित प्रवासन को नियंत्रित किया जा सकता है।
    • मुद्रा योजना जैसी पहलों ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जहाँ लगभग 68% ऋण महिला उद्यमियों को प्रदान किये गए हैं, जबकि MSME क्षेत्र वर्तमान में 328.2 मिलियन से अधिक व्यक्तियों को रोज़गार प्रदान कर रहा है।
  • रणनीतिक वैश्विक गतिशीलता: जहाँ यूरोप एवं पूर्वी एशिया के विकसित देश वृद्धावस्था एवं घटती जनसंख्या के कारण श्रम संकट का सामना कर रहे हैं, वहीं भारत अपने युवा कार्यबल को एक वैश्विक प्रतिभा स्रोत के रूप में रणनीतिक रूप से स्थापित कर रहा है। 
    • सरकार वृद्ध अर्थव्यवस्थाओं के साथ लक्षित गतिशीलता एवं प्रवासन साझेदारियाँ विकसित कर रही है, जिससे उच्च-कौशल तकनीकी पेशेवरों तथा व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित श्रमिकों का संगठित एवं वैध अंतरराष्ट्रीय प्रवाह सुनिश्चित हो सके।
    • यह रणनीति एक ओर घरेलू बेरोज़गारी दबाव को कम करती है, वहीं दूसरी ओर विदेशी प्रेषण (remittances) के माध्यम से महत्त्वपूर्ण विदेशी मुद्रा प्रवाह को सुदृढ़ करती है। 
    • वर्तमान में भारत वैश्विक तकनीकी कार्यबल का एक बड़ा भाग उपलब्ध कराता है तथा प्रतिवर्ष 135 बिलियन डॉलर से अधिक प्रेषण प्राप्त कर विश्व का सर्वाधिक प्रेषण प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है।
  • महामारी विज्ञान संबंधी संक्रमण के अनुरूप स्वास्थ्य सेवा का पुनर्गठन: जैसे-जैसे भारत की जनसांख्यिकीय संरचना परिपक्व हो रही है, देश एक साथ संक्रामक रोगों के पारंपरिक बोझ तथा जीवनशैली-जनित गैर-संचारी रोगों (NCD) में तीव्र वृद्धि जैसी दोहरी स्वास्थ्य चुनौती का सामना कर रहा है। 
    • विशेष रूप से कार्यशील आयु वर्ग में बढ़ते NCD, आर्थिक उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
    • इस परिप्रेक्ष्य में राज्य प्रतिक्रियात्मक अस्पताल-आधारित उपचार प्रणाली से हटकर निवारक एवं प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में अग्रसर है। 
    • कार्यबल की शारीरिक एवं मानसिक सुदृढ़ता को जनसांख्यिकीय लाभांश के सतत आर्थिक दोहन हेतु एक अनिवार्य पूर्वशर्त के रूप में मान्यता दी जा रही है।
    • नीतिगत हस्तक्षेपों के अंतर्गत, सरकार ने प्रारंभिक स्तर पर गैर-संचारी रोगों की जाँच पर केंद्रित 1,84,235 आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की स्थापना की है। साथ ही स्वास्थ्य अवसंरचना के तीव्र विस्तार हेतु वर्ष 2024–25 में 1.5 बिलियन डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का आकर्षण इस क्षेत्र में बढ़ती संस्थागत क्षमता निर्माण एवं निवेशीय विश्वास को भी परिलक्षित करता है। 

भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • ‘अव्यवहार्य स्कूलों’ का विरोधाभास: जैसे-जैसे कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे जा रही है, प्राथमिक आयु वर्ग के बच्चों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है, जिसके परिणामस्वरूप शैक्षिक अवसंरचना का अधिशेष उत्पन्न हो रहा है, जो अब वित्तीय रूप से अव्यवहार्य बनता जा रहा है। 
    • यह स्थिति सरकारी परिसंपत्तियों के जटिल समेकन की आवश्यकता उत्पन्न करती है तथा कुछ क्षेत्रों में शिक्षकों की संभावित छंटनी का जोखिम भी बढ़ाती है।
    • इस परिप्रेक्ष्य में नीति का लक्ष्य ‘शिक्षा तक पहुँच के विस्तार’ से हटकर ‘शिक्षा की गुणवत्ता में संवर्द्धन’ की ओर स्थानांतरित होना अनिवार्य हो गया है, जिससे मौजूदा अवसंरचना का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। 
    • इस प्रवृत्ति की पुष्टि UDISE+ आँकड़ों से होती है, जिनके अनुसार वर्ष 2020–25 के बीच सरकारी विद्यालयों की संख्या में 18,727 की कमी दर्ज की गई है, जो नामांकन में गिरावट एवं कम-नामांकन वाले विद्यालयों के समेकन के परिणामस्वरूप हुई है।
  • आसन्न लाभांश की समाप्ति: भारत वर्तमान में एक ‘समय के विरुद्ध दौड़’ की स्थिति में है, जहाँ उसे अपनी कार्यशील आयु जनसंख्या में गिरावट प्रारंभ होने से पूर्व तीव्र औद्योगीकरण एवं उत्पादकता वृद्धि सुनिश्चित करनी होगी। 
    • अनुमानतः जनांकिकीय लाभांश की अवधि वर्ष 2041 के पश्चात क्षीण होने लगेगी, जिसके पश्चात वृद्धजन आबादी का अनुपात तीव्रता से बढ़ेगा।
    • इस संदर्भ में, वर्तमान कार्यबल की उच्च उत्पादकता भविष्य की आर्थिक स्थिरता के लिये अत्यंत आवश्यक है। यदि इस अवसर का प्रभावी उपयोग नहीं किया गया तो भारत के समक्ष ‘समृद्ध होने से पूर्व वृद्ध होने’ का जोखिम उत्पन्न हो सकता है। 
    • आँकड़ों के अनुसार, कार्यशील आयु वर्ग (15–59 वर्ष) वर्ष 2041 में लगभग 1,009 मिलियन के शिखर पर पहुँचेगा, जिसके पश्चात् यह घटकर वर्ष 2051 तक 998.1 मिलियन रह जाएगा, जबकि औसत आयु वर्ष 2011 के 24.9 वर्ष से बढ़कर वर्ष 2036 तक 34.5 वर्ष होने का अनुमान है।
  • अतिवृद्धावस्था एवं वृद्धावस्था देखभाल का अंतर: भारत में ‘युवा-प्रधान जनसंख्या’ से ‘तेज़ी से वृद्ध होती जनसंख्या’ की ओर संक्रमण विकसित देशों की तुलना में कहीं अधिक तीव्र गति से हो रहा है, जबकि इसके अनुरूप सामाजिक सुरक्षा तंत्र का विस्तार अपेक्षाकृत धीमा रहा है। 
    • असंतुलन के परिणामस्वरूप पेंशन दायित्वों तथा विशेषीकृत स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक वित्त पर अभूतपूर्व दबाव उत्पन्न हो रहा है, विशेषकर तब जब संयुक्त परिवार व्यवस्था जैसी पारंपरिक सहायक संरचनाएँ भी क्रमशः क्षीण हो रही हैं।
    • वर्तमान में भारत की ‘सिल्वर इकोनॉमी’ वृद्ध नागरिकों की जटिल बहुरोगीय (multi-morbidity) आवश्यकताओं के समाधान हेतु पर्याप्त रूप से विकसित नहीं है। 
    • आँकड़ों के अनुसार, 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग की जनसंख्या वर्ष 2021 के 130.5 मिलियन से बढ़कर 2051 तक लगभग 325.3 मिलियन हो जाएगी, जबकि वर्ष 2036 तक कुछ राज्यों में प्रत्येक चार व्यक्तियों में से एक वरिष्ठ नागरिक होगा।
  • वृद्धावस्था एवं अवैतनिक देखभाल कार्य का स्त्रीकरण: बढ़ती दीर्घायु के साथ वृद्ध जनसंख्या में महिलाओं का अनुपात तीव्रता से बढ़ रहा है, जिससे विधवा एवं आर्थिक रूप से आश्रित महिलाओं के बीच ‘गरीबी का स्त्रीकरण’ परिलक्षित होता है। 
    • साथ ही निर्भर आबादी (बच्चे एवं वृद्ध) के अनुपात में परिवर्तन के कारण कार्यशील आयु वर्ग की महिलाओं पर अवैतनिक देखभाल कार्यों का बोझ बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप वे प्रायः औपचारिक श्रम बाज़ार से बाहर हो जाती हैं।
    • यह प्रवृत्ति ‘जेंडर डिविडेंड’ के प्रभावी दोहन में एक संरचनात्मक बाधा उत्पन्न करती है। अनुमानतः 2036 तक महिला जनसंख्या लगभग 48.8% तक पहुँच जाएगी तथा 60+ आयु वर्ग में लिंग अनुपात पहले से ही अधिक है। 
    • उच्च निर्भरता अनुपात का प्रत्यक्ष संबंध महिलाओं द्वारा किये जाने वाले अवैतनिक देखभाल कार्यों में वृद्धि से है।
  • स्थानिक विषमता एवं आंतरिक प्रवासन का दबाव: भारत वर्तमान में वृद्ध होते दक्षिणी एवं पश्चिमी राज्य तथा अपेक्षाकृत युवा उत्तरी राज्यों के मध्य एक स्पष्ट ‘जनांकिकीय विभाजन’ का सामना कर रहा है, जो व्यापक अंतर-राज्यीय प्रवासन को प्रेरित कर रहा है। 
    • यह स्थानिक असंतुलन प्राप्तकर्त्ता राज्यों में शहरी अवसंरचना पर दबाव बढ़ाता है, जबकि स्रोत क्षेत्रों में ‘निर्जन गाँवों’ (depopulated villages) की स्थिति उत्पन्न करता है।
    • यह परिघटना राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं राजकोषीय संघवाद को भी जटिल बनाती है। अंतर-राज्यीय श्रम प्रवाह का प्रभावी प्रबंधन राष्ट्रीय उत्पादकता बनाए रखने के लिये अत्यंत आवश्यक हो गया है। 
    • पुरुष-प्रधान प्रवासन के कारण शहरी लिंग अनुपात घटकर वर्ष 2036 तक लगभग 926 होने का अनुमान है, जबकि कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या का आकार इन उभरते प्रवासन गलियारों का प्रमुख प्रेरक बना हुआ है।
  • महामारी विज्ञान संबंधी संक्रमण और ‘दोहरा बोझ’: जनसांख्यिकीय परिवर्तन के साथ-साथ भारत एक ऐसे संक्रमणकालीन स्वास्थ्य परिदृश्य का सामना कर रहा है, जहाँ गैर-संचारी रोग (NCD) तीव्रता से बढ़ रहे हैं, जबकि संक्रामक रोग अभी भी विद्यमान हैं। यह ‘दोहरा बोझ’ कार्यबल की प्रभावी उत्पादकता को क्षीण करता है, क्योंकि श्रमिक अपने सर्वाधिक उत्पादक वर्षों में ही मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप जैसी दीर्घकालिक बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। 
    • अतः युवा आबादी के स्वास्थ्य संरक्षण को अब व्यावसायिक कौशल विकास के समान ही रणनीतिक प्राथमिकता प्रदान करना अनिवार्य हो गया है।
    • वर्ष 2051 तक औसत आयु के 40 वर्ष तक पहुँचने के अनुमान के साथ, एक ऐसी आयु-संरचना का उदय होगा, जहाँ NCD का प्रभुत्व होगा। 
    • इस संदर्भ में, अनुमानित 62.8% कार्यबल की उत्पादकता बनाए रखने हेतु सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को वृद्धावस्था तथा दीर्घकालिक रोग प्रबंधन की दिशा में पुनर्संरचित करना आवश्यक होगा।
  • प्रतिस्थापन स्तर में गिरावट और श्रम की संभावित कमी: कुल प्रजनन दर (TFR) के प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे गिरने के परिणामस्वरूप, भारत दीर्घकाल में ऐसे आर्थिक परिदृश्य की ओर अग्रसर है जहाँ विशिष्ट क्षेत्रों में श्रम की कमी उत्पन्न हो सकती है। 
    • वर्तमान में श्रम की प्रचुरता विद्यमान है, तथापि भविष्य में श्रम-आधारित अर्थव्यवस्था के संकुचन से श्रम-प्रधान उद्योगों को प्रतिभा संकट का सामना करना पड़ सकता है।
    • यह प्रवृत्ति स्वचालन तथा पूंजी-प्रधान विनिर्माण की ओर शीघ्र संक्रमण को अनिवार्य बनाती है। इसके अतिरिक्त, युवा (0-14) आबादी के 2011 के 373.9 मिलियन से घटकर वर्ष 2036 तक 306.4 मिलियन होने का अनुमान इस प्रवृत्ति को और पुष्ट करता है।
  • राजकोषीय सुरक्षा कवच का क्षरण: अब तक घटते हुए कुल निर्भरता अनुपात ने राज्य को एक प्रकार का राजकोषीय लाभ प्रदान किया है, किंतु वृद्धावस्था निर्भरता अनुपात में वृद्धि के साथ यह लाभ क्रमशः समाप्त होता जा रहा है। 
    • बुज़ुर्ग आबादी की देखभाल तथा सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ता सार्वजनिक व्यय, दीर्घकालिक अवसंरचना एवं नवाचार में निवेश की क्षमता को सीमित कर सकता है।
    • अतः एक स्थिर जनसंख्या संरचना को ध्यान में रखते हुए, एक सतत राजकोषीय मॉडल की ओर संक्रमण आगामी नीतिगत प्राथमिकता बन जाता है। 
    • वर्ष 2036 तक कुल निर्भरता अनुपात के 54% तक घटने के साथ-साथ, वृद्धजन अनुपात के 13.8% से बढ़कर 23.0% होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2051 तक लगभग 20.5% आबादी 60 वर्ष से अधिक आयु की होगी। यह स्थिति राज्य की वित्तीय संरचना में व्यापक पुनर्संतुलन की मांग करती है। 

भारत अपने जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रभावी उपयोग कैसे कर सकता है?

  • 'क्षेत्र-विशिष्ट प्रवासन गलियारों' का कार्यान्वयन: भारत को संस्थागत स्तर पर 'वैश्विक श्रम गतिशीलता भागीदारी' (GLMP) की स्थापना करनी चाहिये, जो तदर्थ प्रवासन की प्रवृत्ति से आगे बढ़कर अधिशेष युवा कार्यबल के लिये संरचित तथा कौशल-आधारित प्रवासन गलियारों का निर्माण करे
    • यूरोप एवं पूर्वी एशिया की वृद्ध होती अर्थव्यवस्थाओं के विशिष्ट विधिक एवं तकनीकी मानकों के साथ घरेलू व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का समन्वय करके, राज्य 'प्रतिभा पलायन' को 'प्रतिभा के चक्रीय प्रवाह' में रूपांतरित कर सकता है।
    • यह रणनीति उच्च-मूल्य प्रेषण को सुनिश्चित करने के साथ-साथ वैश्विक विशेषज्ञता के पुनःआगमन के माध्यम से जनसांख्यिकीय अधिशेष का इष्टतम उपयोग करती है।
  • देखभाल अवसंरचना के माध्यम से 'लैंगिक लाभांश' का क्रियान्वयन: महिलाओं की आर्थिक क्षमता के समुचित दोहन हेतु राज्य को सुलभ एवं मानकीकृत क्रेच तथा वृद्धावस्था देखभाल केंद्रों के राष्ट्रव्यापी नेटवर्क को प्रोत्साहित करते हुए 'देखभाल कार्य' को एक औपचारिक अवसंरचना क्षेत्र के रूप में मान्यता प्रदान करनी चाहिये।
    • यह द्विपक्षीय लाभ वाला दृष्टिकोण एक ओर देखभाल अर्थव्यवस्था में युवा कार्यबल के लिये औपचारिक रोज़गार सृजित करता है, वहीं दूसरी ओर उच्च-कुशल महिलाओं को अवैतनिक घरेलू कार्यों से मुक्त कर उनकी श्रम बाज़ार में भागीदारी को सुदृढ़ करता है।
    • इस प्रकार महिला श्रम बल भागीदारी में विद्यमान संरचनात्मक अंतर को प्रभावी रूप से कम किया जा सकता है।
  • 'हाइपर-लोकल वोकेशनल हब' की ओर संक्रमण: केंद्रीकृत एवं सामान्यीकृत शिक्षा प्रणाली के स्थान पर भारत को 'हब-एंड-स्पोक' आधारित कौशल विकास मॉडल को अपनाना चाहिये, जिसमें औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) का सह-प्रबंधन स्थानीय औद्योगिक समूहों द्वारा किया जाए, ताकि 'जस्ट-इन-टाइम' रोज़गार की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।
    • इस मॉडल के अंतर्गत हरित प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, लॉजिस्टिक्स तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऑडिटिंग जैसे उभरते क्षेत्रों में मॉड्यूलर एवं अल्पकालिक प्रमाणन को बढ़ावा दिया जाना चाहिये, जिससे डिग्री-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर 'योग्यता-आधारित समानता' को सुदृढ़ किया जा सके।
    • इस प्रकार का सूक्ष्म-स्तरीय समन्वय 'कौशल-विसंगति' की समस्या को न्यूनतम करता है, जो वर्तमान में युवा आबादी के एक बड़े वर्ग में बेरोज़गारी का प्रमुख कारण है।
  • 'सिल्वर इकोनॉमी' उद्यमी पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण: भारत को वृद्धावस्था-तकनीक, सार्वभौमिक डिज़ाइन आवास और आयु-अनुकूल वित्तीय उत्पादों का विकास करने वाले स्टार्टअप्स को राजकोषीय प्रोत्साहन प्रदान करके 'सिल्वर इकोनॉमी' को सक्रिय रूप से उत्प्रेरित करना चाहिये।
    • ये उपाय वृद्ध आबादी के 'खतरे' को 'बाज़ार के अवसर' में बदल देते हैं, जिससे एक नया आर्थिक स्तंभ तैयार होता है जो वर्ष 2036 तक 227 मिलियन से अधिक वरिष्ठ नागरिकों की विशेष उपभोग आवश्यकताओं को पूरा करता है। 
    • 'सक्रिय वृद्धावस्था' को बढ़ावा देकर, राज्य यह सुनिश्चित कर सकता है कि बुज़ुर्ग लोग निष्क्रिय आश्रितों के बजाय जीडीपी में शुद्ध योगदानकर्त्ता बने रहें।
  • 'डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना' का रणनीतिक उपयोग: सरकार को अपनी विश्व-अग्रणी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का उपयोग करते हुए एक 'एकीकृत श्रम खाता बही' विकसित करनी चाहिये, जो व्यापक प्रवासी एवं गिग कार्यबल के लिये सामाजिक सुरक्षा लाभों की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करे।
    • यह तंत्र युवा कार्यबल को स्वास्थ्य सेवा एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली तक अपनी पहुँच बनाए रखते हुए राज्य सीमाओं के पार उच्च-विकास क्षेत्रों में सहज गतिशीलता प्रदान करता है, जिससे प्रभावी रूप से एक 'एकल राष्ट्रीय श्रम बाज़ार' का निर्माण होता है।
    • डिजिटल पहचान के माध्यम से अनौपचारिक क्षेत्र का औपचारिककरण, भारत के वर्तमान जनसांख्यिकीय लाभांश की अनिश्चितता को स्थिर करने का सबसे त्वरित एवं प्रभावी उपाय सिद्ध हो सकता है।
  • 'शैक्षिक संपत्तियों' का युक्तिकरण: बाल जनसंख्या (0-14) में निरंतर गिरावट के परिप्रेक्ष्य में, भारत को कम उपयोग वाले सरकारी विद्यालयों के लिये 'रणनीतिक संपत्ति पुनःउद्देश्यीकरण' नीति अपनानी चाहिये, जिसके अंतर्गत इन्हें सामुदायिक 'जीवन पर्यंत अधिगम' या 'वृद्धावस्था कल्याण' केंद्रों में परिवर्तित किया जा सके।
    • यह दृष्टिकोण पुरानी अवसंरचना के अपव्यय को रोकते हुए यह सुनिश्चित करता है कि निम्न प्रजनन दर के परिवेश में सार्वजनिक संपत्तियाँ वित्तीय रूप से व्यवहार्य तथा सामाजिक रूप से प्रासंगिक बनी रहें।
    • साथ ही, शैक्षिक संसाधनों का 'उचित आकार निर्धारण' कर राज्य बचाए गए संसाधनों को भविष्य के छोटे एवं विशिष्ट छात्र समूहों के लिये उच्च-प्रौद्योगिकी शिक्षण साधनों में पुनर्निर्देशित कर सकता है।
  • 'निवारक उत्पादकता' आधारित स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का संस्थानीकरण: 'प्रभावी श्रम आपूर्ति' की सुरक्षा हेतु भारत को अपनी प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली को 'उपचारात्मक-सामयिक' दृष्टिकोण से हटाकर 'निवारक-दीर्घकालिक' मॉडल की ओर पुनर्संरेखित करना होगा, विशेषकर कार्यशील आयु वर्ग में गैर-संचारी रोगों (NCD) पर केंद्रित करते हुए।
    • इस रणनीति के अंतर्गत औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों प्रकार के कार्यस्थलों पर अनिवार्य व्यावसायिक स्वास्थ्य जाँच तथा पोषण संबंधी हस्तक्षेपों का एकीकरण किया जाना चाहिये, ताकि प्रारंभिक अवस्था में ही पुरानी बीमारियों से होने वाली उत्पादकता हानि को न्यूनतम किया जा सके।
    • 15-59 आयु वर्ग की अधिकतम आर्थिक उत्पादकता को बनाए रखने के लिये एक स्वस्थ कार्यबल अनिवार्य पूर्वशर्त है।
  • अंतर-राज्यीय जनसांख्यिकीय समता का संस्थागतकरण: भारत को 'राजकोषीय संघवाद' की पुनर्रचना करते हुए एक 'जनसांख्यिकीय समता कोष' की स्थापना करनी चाहिये, जो दक्षिणी राज्यों की वृद्ध आबादी एवं उत्तरी राज्यों की युवा आबादी की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं के मध्य संतुलन स्थापित कर सके।
    • यह तंत्र राज्यों को 'प्रबंधित श्रम हस्तांतरण' तथा साझा सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाओं में सहयोग हेतु वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करेगा, जिससे एक क्षेत्र का 'युवा-अधिशेष' दूसरे क्षेत्र के 'पूंजी-अधिशेष' के साथ समन्वित हो सके।
    • जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर में राष्ट्रीय सामाजिक सामंजस्य एवं आर्थिक संतुलन बनाए रखने हेतु इस प्रकार का संरचनात्मक ढाँचा अत्यंत आवश्यक है।

निष्कर्ष: 

भारत का जनांकिकीय संक्रमण एक महत्त्वपूर्ण ‘संरचनात्मक परिपक्वता’ को प्रतिबिंबित करता है, जहाँ युवा लाभांश की सीमित समय-सीमा उच्च-मूल्य उत्पादकता आधारित अर्थव्यवस्था की ओर तीव्र परिवर्तन को अनिवार्य बनाती है। इस प्रक्रिया की सफलता एक ‘बहु-क्षेत्रीय धुरी’ पर निर्भर करती है, जिसके अंतर्गत वृद्ध जनसंख्या को एक सुदृढ़ सिल्वर इकॉनमी में तथा युवा कार्यबल को डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से वैश्विक प्रतिभा भंडार में रूपांतरित किया जा सकता है। इन विविध आयु-प्रोफाइलों के अनुरूप राजकोषीय संघवाद का प्रभावी समन्वय न होने पर सामाजिक-आर्थिक स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिसके परिणामस्वरूप अमीर होने से पहले ही लोग वृद्ध हो जाते हैं। अंततः इस परिवर्तन को सफलतापूर्वक  प्रबंधन करने हेतु जनसंख्या की मात्रा को नियंत्रित करने से लेकर मानव पूंजी की गुणवत्ता को अधिकतम करने की दिशा में एक दूरदर्शी एवं संरचनात्मक नीतिगत प्रयास अनिवार्य है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

भारत जनसंख्या विस्फोट के चरण से जनांकिकीय परिपक्वता की ओर संक्रमण कर रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में, प्रतिस्थापन स्तर से कम प्रजनन दर के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का आलोचनात्मक विश्लेषण  कीजिये।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. भारत का वर्तमान TFR क्या है?
भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर लगभग 1.9–2.0 के स्तर पर पहुँच गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से कम है।

2. भारत की कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या कब चरम पर पहुँचेगी?
अनुमानों के अनुसार, भारत की कार्यशील आयु जनसंख्या वर्ष 2041 के आसपास अपने चरम पर पहुँचेगी, जिसके पश्चात इसमें क्रमिक गिरावट की प्रवृत्ति देखी जाएगी।

3. ‘सिल्वर इकॉनमी’ क्या है? 
यह एक ऐसा आर्थिक तंत्र है, जो बढ़ती वृद्धजन आबादी की उपभोग, स्वास्थ्य देखभाल एवं सेवा आवश्यकताओं को लक्षित कर विकसित किया जाता है।

4. ‘अव्यवहार्य स्कूलों’ की संकल्पना क्या है?
जन्म दर में गिरावट के परिणामस्वरूप विद्यालयों में नामांकन में तीव्र कमी आने से अनेक शैक्षणिक संस्थान आर्थिक दृष्टि से अव्यवहार्य (non-viable) हो जाते हैं।

5. बीमारियों का ‘दोहरा भार’ क्या है?
संचारी रोगों तथा गैर-संचारी रोगों (NCDs) दोनों की एक साथ बढ़ती व्यापकता से उत्पन्न स्वास्थ्य संबंधी चुनौती

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न, जनांकिकीय लाभांश के पूर्ण लाभ को प्राप्त करने के लिये भारत को क्या करना चाहिये? (2023)

(a) कुशलता विकास का प्रोत्साहन
(b) और अधिक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रारंभ
(c) शिशु मृत्यु दर में कमी
(d) उच्च शिक्षा का निजीकरण

उत्तर: (a)


प्रश्न. आर्थिक विकास से जुड़े जनांकिकीय संक्रमण के निम्नलिखित विशिष्ट चरणों पर विचार कीजिये:

  1. निम्न जन्म दर के साथ निम्न मृत्यु दर 
  2.  उच्च जन्म दर के साथ उच्च मृत्यु दर 
  3.  निम्न मृत्यु दर के साथ उच्च जन्म दर

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर उपर्युक्त चरणों का सही क्रम चुनिये:

(a) 1, 2, 3
(b) 2, 1, 3
(c) 2, 3, 1
(d) 3, 2, 1

उत्तर: (c)


मेन्स 

प्रश्न 1. 'भारत में जनांकिकीय लाभांश तब तक सैद्धांतिक ही बना रहेगा जब तक कि हमारी जनशक्ति अधिक शिक्षित, जागरूक, कुशल और सृजनशील नहीं हो जाती।' सरकार ने हमारी जनसंख्या को अधिक उत्पादनशील और रोज़गार-योग्य बनने की क्षमता में वृद्धि के लिये कौन-से उपाय किये हैं? (2016)

प्रश्न 2. 'जिस समय हम भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) को शान से प्रदर्शित करते हैं, उस समय हम रोज़गार योग्यता की पतनशील दरों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। क्या हम ऐसा करने में कोई चूक कर रहे हैं? भारत को जिन जॉबों की बेसबरी से दरकार है, वे जॉब कहाँ से आएंगे? स्पष्ट कीजिये। (2014)

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