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भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों पर पुनर्विचार

  • 27 Mar 2026
  • 198 min read

यह एडिटोरियल 26/03/2026 को द हिंदू में प्रकाशित 'The Transgender Persons Amendment Bill is a flawed fix' शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख वर्ष 2026 के संशोधन विधेयक के उपरांत भारत के ट्रांसजेंडर अधिकार ढाँचे में हुए संरचनात्मक परिवर्तनों का विश्लेषण करता है तथा राज्य कल्याण एवं व्यक्तिगत स्वायत्तता के मध्य विद्यमान तनाव को रेखांकित करता है। यह इंटरसेक्स सुरक्षा, नागरिक अधिकारों एवं अंतर्संबंधी सुरक्षा उपायों में बनी हुई खामियों की आलोचना करता है तथा वैज्ञानिक आधार पर आधारित GISC वर्गीकरण की ओर अग्रसर होने का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है।

प्रिलिम्स के लिये: ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम 2019, स्माइल योजना, गरिमा गृह, नालसा निर्णय, ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक 2026।

मेन्स के लिये: भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों को मान्यता देने के लिये उठाए गए कदम, ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक 2026 के प्रमुख प्रावधान, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय।

भारत का ट्रांसजेंडर अधिकार ढाँचा, जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 पर आधारित है, वर्ष 2026 के संशोधन विधेयक के पश्चात् पुनः गहन परीक्षण के दायरे में आ गया है, क्योंकि यह विधेयक पहचान की परिभाषाओं को संकुचित करते हुए स्व-पहचान के सिद्धांत को कमज़ोर करता प्रतीत होता है। वर्ष 2011 की जनगणना में मात्र 4.9 लाख ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का ही पंजीकरण किया गया था, जिसे सामाजिक कलंक तथा त्रुटिपूर्ण वर्गीकरण के कारण व्यापक रूप से अल्पानुमानित माना जाता है। वैश्विक स्तर पर लगभग 1-2% जन्मों में इंटरसेक्स भिन्नताएँ पाई जाती हैं, तथापि भारत में अब तक बिना सहमति के किये जाने वाले शल्य-चिकित्सकीय हस्तक्षेपों पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध अथवा स्वतंत्र विधिक ढाँचा स्थापित नहीं किया गया है। यह स्थिति अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त संवैधानिक गारंटी तथा लैंगिक विविधता वाले समुदायों की वास्तविक परिस्थितियों के मध्य विद्यमान स्थायी अंतर को स्पष्ट रूप से उजागर करती है।

भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों के सशक्तीकरण हेतु क्या प्रयास किये गए हैं?

  • न्यायिक पुष्टि एवं पहचान की मान्यता: सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2014 के NALSA निर्णय ने स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान को संवैधानिक आधार प्रदान किया, जिससे कठोर द्विआधारी प्रतिमान का विघटन हुआ।
    • इस निर्णय के माध्यम से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को औपचारिक रूप से ‘तीसरे लिंग’ के रूप में मान्यता प्रदान की गई।
    • जेन कौशिक बनाम भारत संघ (2025) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि ट्रांसजेंडर सुरक्षा को लागू करने में राज्य की विफलता 'अस्पष्ट भेदभाव' के बराबर है, जो मूल अधिकारों का उल्लंघन है।
    • न्यायालय ने उचित समायोजन (Reasonable Accommodation) को राज्य तथा निजी संस्थाओं (जिनमें विद्यालय एवं नियोक्ता सम्मिलित हैं) दोनों पर बाध्यकारी दायित्व के रूप में स्थापित करते हुए वास्तविक समानता के दायरे का विस्तार किया।
  • शोषण के विरुद्ध विधिक संरक्षण: संसद की विधायी संरचना ने हाल ही में ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक, 2026 के माध्यम से पहचान सत्यापन के मानकीकरण तथा व्यवस्थित भेदभाव के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधानों को सुदृढ़ करने की दिशा में अग्रसर होकर शोषण-निरोधी उपायों को अधिक कठोर बनाया है।
    • धारा 18 में निहित नवीन प्रावधानों के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को ‘ट्रांसजेंडर प्रस्तुति’ के लिये बाध्य करना अथवा उसे भीख मांगने या बंधुआ श्रम/गुलामी के लिये विवश करना, गंभीर दंडनीय अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसके लिये पाँच से चौदह वर्ष तक के कठोर कारावास का प्रावधान किया गया है।
  • आयुष्मान TG प्लस के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा का एकीकरण: लिंग-पुष्टि स्वास्थ्य सेवाओं में विद्यमान महत्त्वपूर्ण अंतरालों को दूर करने तथा समान चिकित्सा पहुँच सुनिश्चित करने हेतु, राज्य ने अपने प्रमुख बीमा दायरे का विस्तार करते हुए इसमें ट्रांसजेंडर-विशिष्ट चिकित्सा हस्तक्षेपों को स्पष्ट रूप से सम्मिलित किया है।
    • इस नीतिगत समावेशन के परिणामस्वरूप समुदाय के सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित वर्गों पर पड़ने वाले उच्च स्वास्थ्य व्यय में कमी लाने में सहायता मिलेगी।
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) एवं सामाजिक न्याय मंत्रालय के मध्य संपन्न एक समझौता ज्ञापन (MoU) के अंतर्गत प्रत्येक ट्रांसजेंडर लाभार्थी को 5 लाख रुपये का वार्षिक बीमा कवर प्रदान किया गया है।
  • सामाजिक-आर्थिक पुनर्वास (SMILE योजना): व्यवस्थागत दरिद्रता को दृष्टिगत रखते हुए, सरकार ने SMILE योजना के माध्यम से पुनर्वास, कौशल संवर्द्धन तथा सुरक्षित अस्थायी आवास पर केंद्रित एक लक्षित कल्याणकारी दृष्टिकोण अपनाया है।
    • यह प्रगतिशील ढाँचा शासन की प्रवृत्ति को अनियमित दान-आधारित मॉडल से परिवर्तित कर संरचनात्मक सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण एवं आजीविका सृजन की दिशा में उन्मुख करता है।
    • इस पहल के अंतर्गत, मंत्रालय द्वारा प्रमुख महानगरीय राज्यों में 20 से अधिक ‘गरिमा गृह’ आश्रय गृहों का सफल संचालन किया जा रहा है।
    • ये विशेषीकृत सुविधाएँ खाद्य सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक परामर्श तथा स्थानीय व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसी सेवाएँ प्रदान करते हुए 2800 से अधिक लाभार्थियों को प्रत्यक्ष सहायता उपलब्ध करा रही हैं।
  • शैक्षिक समावेशिता एवं अवसंरचनात्मक समानता: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 ने उच्च ड्रॉपआउट दरों को कम करने तथा लैंगिक रूप से गैर-अनुरूप युवाओं के लिये सुरक्षित शैक्षणिक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रोत्साहित करने हेतु लक्षित वित्तीय तंत्रों को लागू कर शैक्षिक समानता को संस्थागत रूप प्रदान किया है।
    • इस बहुआयामी दृष्टिकोण का उद्देश्य प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा संस्थानों में विद्यमान विषमलैंगिकता-आधारित बाधाओं का व्यवस्थित उन्मूलन करना है।
    • NEP के अंतर्गत एक समर्पित ‘जेंडर इंक्लूजन फंड’ की स्थापना की गई है, जिसका उपयोग राज्य के विद्यालयों में समान एवं लिंग-तटस्थ स्वच्छता अवसंरचना के विकास हेतु किया जा रहा है।
  • चुनावी मुख्यधाराकरण एवं सहभागी लोकतंत्र: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने ट्रांसजेंडर नागरिकों के राजनीतिक मुख्यधाराकरण को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करते हुए सशक्त सहभागी लोकतंत्र एवं वर्णनात्मक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस प्रयास किये हैं।
    मतदाता पंजीकरण में विद्यमान जटिल प्रशासनिक अवरोधों को दूर कर यह संस्था वंचित समुदायों की आवाज़ को मुख्यधारा के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में सुदृढ़ करने का प्रयास कर रही है।
    • प्रमुख ट्रांसजेंडर हस्तियों को आधिकारिक राज्य चुनाव राजदूत के रूप में नियुक्त करने जैसी रणनीतिक पहलों ने उनकी राजनीतिक दृश्यता में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
      वर्ष 2024 के आम चुनावों में पंजीकृत तृतीय-लिंग मतदाताओं की संख्या वर्ष 2019 के 39,000 से बढ़कर 48,000 से अधिक हो गई, जो लगभग 23.5% की वृद्धि को दर्शाती है।
  • निर्वाचन मुख्यधारा में समावेशन एवं सहभागी लोकतंत्र: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने ट्रांसजेंडर नागरिकों के राजनीतिक मुख्यधारा में समावेशन को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करते हुए सशक्त सहभागी लोकतंत्र एवं वर्णनात्मक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस प्रयास किये हैं।
    • मतदाता पंजीकरण में विद्यमान जटिल प्रशासनिक अवरोधों को दूर कर यह संस्था वंचित समुदायों की आवाज़ को मुख्यधारा के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में सुदृढ़ करने का प्रयास कर रही है।
    • प्रमुख ट्रांसजेंडर हस्तियों को आधिकारिक राज्य चुनाव राजदूत के रूप में नियुक्त करने जैसी रणनीतिक पहलों ने उनकी राजनीतिक दृश्यता में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
    • वर्ष 2024 के आम चुनावों में पंजीकृत तृतीय-लिंग मतदाताओं की संख्या वर्ष 2019 के 39,000 से बढ़कर 48,000 से अधिक हो गई, जो लगभग 23.5% की वृद्धि है।
  • वैधानिक शिकायत निवारण का संस्थानीकरण: नीति कार्यान्वयन की प्रभावी निगरानी तथा संस्थागत शिकायतों के समाधान के लिये राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (NCTP) एवं राज्य कल्याण बोर्डों के माध्यम से विकेंद्रीकृत शासन तंत्र स्थापित किये गए हैं।
    • ये संस्थाएँ प्राथमिक नोडल इंटरफेस के रूप में कार्य करते हुए वंचित समुदायों एवं राज्य तंत्र के मध्य विद्यमान अविश्वास को कम करने में सहायक हैं।
    • NCTP की संरचना में पाँच भौगोलिक क्षेत्रों से सामुदायिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है, जिससे समावेशी एवं अखिल भारतीय नीति-निर्माण को सुदृढ़ आधार प्राप्त हो सके।
    • इसके अतिरिक्त, गृह मंत्रालय के हालिया निर्देशों के अंतर्गत राज्य पुलिस विभागों में समर्पित ट्रांसजेंडर सुरक्षा प्रकोष्ठों की स्थापना को अनिवार्य किया गया है, जिससे पहचान-आधारित भेदभाव से संबंधित शिकायतों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
  • सार्वजनिक रोज़गार एवं कॉर्पोरेट सकारात्मक कार्रवाई: कार्यस्थल पर व्याप्त बहिष्करण का समाधान करने हेतु, राज्य तंत्र एवं कॉर्पोरेट प्रशासन ढाँचे दोनों ही क्षैतिज आरक्षण तथा अनिवार्य विविधता प्रावधानों के माध्यम से समावेशी आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रहे हैं।
    • यह सुनियोजित आर्थिक एकीकरण समुदाय को असुरक्षित अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से सुरक्षित एवं विनियमित औपचारिक क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • इस संदर्भ में, कर्नाटक ने सिविल सेवा श्रेणियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों हेतु 1% क्षैतिज आरक्षण लागू कर एक अग्रणी राज्य के रूप में उदाहरण प्रस्तुत किया है।
    • इंडिया वर्कप्लेस इक्वालिटी इंडेक्स (IWEI) एक समग्र बेंचमार्किंग उपकरण है, जो संगठनों को संरचित मूल्यांकन मानकों के माध्यम से LGBT+ समावेशन का आकलन एवं सुधार करने में सक्षम बनाता है।
    • इसमें वास्तविक कार्यस्थल अनुभवों को जानने के लिये एक वैकल्पिक कर्मचारी सर्वेक्षण भी शामिल है, जो संगठनों को समावेशिता और सहयोग का प्रभावी ढंग से मूल्यांकन करने में मदद करता है।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं? 

  • ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की संशोधित परिभाषा: विधेयक ‘जन्म के समय लिंग असंगति’ पर आधारित सामान्य परिभाषा से हटकर विशिष्ट श्रेणियों की सूची पर आधारित परिभाषा को अपनाता है।
  • हटाए गए प्रावधान: विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्ति की सामान्य परिभाषा के साथ-साथ ट्रांस-मैन, ट्रांस-वुमन और जेंडरक्वीर जैसी विशिष्ट श्रेणियों को हटा दिया गया है।
    • इसमें सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्तियों (किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता) और जैविक यौन विशेषताओं में भिन्नता वाले व्यक्तियों जैसी श्रेणियों को शामिल किया गया है।
    • इसमें  नपुंसक (eunuchs) और उन व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है जिन्हें अंग-भंग, नपुंसकता या बधियाकरण के माध्यम से जबरन ट्रांसजेंडर पहचान में धकेल दिया गया है।
  • अपवाद: यह यौन अभिविन्यास अथवा स्व-परिकल्पित लैंगिक पहचान के आधार पर व्यक्तियों को स्पष्ट रूप से बाहर करता है।
  • पहचान की मान्यता: विधेयक विधिक पहचान प्राप्त करने की प्रशासनिक प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाता है।
  • चिकित्सा बोर्ड की निगरानी: मूल अधिनियम के विपरीत, ज़िला मजिस्ट्रेट (DM) को अब एक नामित चिकित्सा बोर्ड (जिसकी अध्यक्षता मुख्य/उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी करते हैं) की सिफारिशों की जाँच करने के बाद ही पहचान-पत्र जारी करना होगा।
  • दस्तावेज़ीकरण अधिकार: यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जारी किये गए पहचान-पत्र के आधार पर जन्म प्रमाण पत्र और अन्य आधिकारिक दस्तावेज़ों पर अपना प्रथम नाम बदलने का अधिकार प्रदान करता है।
  • लिंग में परिवर्तन: विधेयक स्वैच्छिक प्रक्रिया से हटकर लिंग-पुष्टि प्रक्रियाओं के संबंध में अनिवार्य प्रावधानों की ओर अग्रसर होता है।
  • अनिवार्य संशोधित प्रमाण-पत्र: इसके तहत लिंग परिवर्तन सर्जरी कराने के बाद व्यक्ति को पहचान का संशोधित प्रमाण-पत्र प्राप्त करना अनिवार्य है।
  • रिपोर्टिंग: चिकित्सा संस्थानों को अब इस प्रकार की सर्जरी से संबंधित जानकारी सीधे ज़िला मजिस्ट्रेट को देनी होगी।
  • अपराध और दंड: विधेयक विशेष अपराधों, विशेषतः बलपूर्वक कृत्यों अथवा नाबालिगों से संबंधित मामलों में दंड की कठोरता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाता है।

अपराध

वयस्क पीड़ित के लिये दंड

बाल पीड़ित के लिये दंड

बलपूर्वक पहचान परिवर्तन (अपहरण, गंभीर चोट या अंग-भंग के माध्यम से)

10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास + 2 लाख रुपये का जुर्माना

आजीवन कारावास + 5 लाख रुपये का जुर्माना

बलपूर्वक प्रस्तुतीकरण (भीख माँगने, बंधुआ श्रम या बंधुआ मज़दूरी)

5 से 10 वर्ष का कारावास + 1 लाख रुपये का जुर्माना

10 से 14 वर्ष का कारावास + 3 लाख रुपये का जुर्माना

भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को किन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

  • व्यक्तिगत स्वायत्तता एवं पहचान सत्यापन में परिवर्तन: आलोचकों के अनुसार, वर्ष 2026 के संशोधन विधेयक में सबसे गंभीर संरचनात्मक प्रतिगमन व्यक्तिगत स्वायत्तता के व्यवस्थित क्षरण के रूप में देखा जाता है, जहाँ स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को स्पष्ट रूप से समाप्त कर दिया गया है।
    • मुख्य अधिनियम, 2019 की धारा 4(2) को हटाकर राज्य ने पहचान के सत्यापन की शक्ति व्यक्ति से लेकर एक अत्यधिक चिकित्सकीयकृत तथा कठोर नौकरशाही नियंत्रण तंत्र को हस्तांतरित कर दी है।
    • परिणामस्वरूप, नागरिक अधिकार संगठनों का अनुमान है कि यह निरसन अनेक नॉन-बाइनरी तथा गैर-परिवर्तनशील व्यक्तियों को प्रभावित करेगा, जिससे उनकी उस मौलिक संवैधानिक गारंटी का हनन होगा, जो लैंगिक पहचान को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से गहराई से जोड़ती है।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना की कमी एवं अनियंत्रित चिकित्सकीय पद्धतियाँ: लिंग-पुष्टि करने वाले स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना की एक प्रणालीगत कमी समुदाय को अनियमित, असुरक्षित चिकित्सा पद्धतियों की ओर धकेलती है, जिससे गंभीर शारीरिक और मनोवैज्ञानिक आघात बढ़ जाता है। 
    • इसके अलावा, बिना सहमति के की जाने वाली 'सामान्यीकरण' सर्जरी पर स्पष्ट कानूनी प्रतिबंधों की अनुपस्थिति के कारण इंटरसेक्स शिशु चिकित्सकीय रूप से अनैतिक शारीरिक विकृति के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं। 
  • नागरिक और पारिवारिक न्यायशास्त्र से बहिष्कार: विविध लैंगिक पहचानों के संदर्भ में भारतीय पारिवारिक कानून की पूर्ण निष्क्रियता/मौन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को मौलिक नागरिक संस्थानों से विधिक रूप से वंचित करती है, जिसके परिणामस्वरूप उनका सामाजिक अलगाव एक संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
    • यह कमी उन्हें समान अधिकारों से वंचित करते हुए विधिक रूप से मान्यता प्राप्त नातेदारी अथवा पारिवारिक संरचना के निर्माण की उनकी क्षमता को गंभीर रूप से सीमित कर देती है।
    • विशेष रूप से, विवाह, कानूनी गोद लेने, विरासत एवं उत्तराधिकार जैसे औपचारिक नागरिक प्रावधानों का अभाव ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
    • हालिया विधायी विमर्शों ने यह उजागर किया है कि यह उपेक्षा उन्हें संपत्ति अधिकारों तथा पारिवारिक सामाजिक सुरक्षा तंत्र से भी वंचित बनाए रखती है।
  • शैक्षिक बहिष्कार एवं अवसंरचनात्मक असमानताएँ: व्यापक बुलिंग, उत्पीड़न तथा कठोर लैंगिक द्वैत पर आधारित विषाक्त शैक्षिक वातावरण, लैंगिक रूप से गैर-अनुरूप युवाओं में अत्यधिक ड्रॉपआउट दर को जन्म देता है।
    • समावेशी शैक्षिक अवसंरचना के एकीकरण में प्रणालीगत विफलता इन विद्यार्थियों को और अधिक हाशिए पर धकेलती है, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता एवं बौद्धिक विकास पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
    • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अनुसार, लगभग 50% ट्रांसजेंडर व्यक्ति कभी विद्यालय नहीं जाते, जबकि केवल 6% ही औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं।
    • NHRC के आँकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि व्यापक भेदभाव के कारण ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग माध्यमिक शिक्षा पूर्ण करने से पूर्व ही औपचारिक शिक्षा प्रणाली से बाहर हो जाता है।
    • लिंग-तटस्थ शौचालयों एवं समावेशी पाठ्यक्रमों की स्पष्ट कमी ट्रांसजेंडर युवाओं को संस्थागत शिक्षण वातावरण से सक्रिय रूप से बहिष्कृत कर रही है।
  • आर्थिक अभाव एवं व्यावसायिक असुरक्षा: कार्यस्थल पर व्याप्त सामाजिक कलंक तथा औपचारिक क्षैतिज आरक्षण के अभाव के कारण समुदाय का एक बड़ा वर्ग औपचारिक अर्थव्यवस्था से बहिष्कृत होकर अनिश्चित एवं कलंकित अनौपचारिक क्षेत्रों में प्रविष्ट होने के लिये विवश होता है।
    • यह संरचनात्मक आर्थिक बहिष्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी के चक्र को सुदृढ़ करता है, जिससे वे बंधुआ श्रम एवं व्यवस्थित मानव तस्करी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बन जाते हैं।
    • विभिन्न अध्ययनों से यह निरंतर परिलक्षित होता है कि भेदभावपूर्ण कॉर्पोरेट भर्ती प्रक्रियाओं के कारण ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का एक महत्त्वपूर्ण भाग भीख मांगने अथवा यौन कार्य जैसे अनियमित व्यवसायों में संलग्न है।
    • भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की यौन कार्य में असमान भागीदारी के परिणामस्वरूप, उनमें HIV प्रसार दर वर्ष 2021 में लगभग 3.8% दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग 20 गुना अधिक है।
    • यद्यपि वर्ष 2026 का संशोधन विधेयक बलपूर्वक ट्रांसजेंडर प्रस्तुतीकरण को दंडनीय (5–14 वर्ष का कारावास) बनाता है, तथापि यह पारंपरिक हिजड़ा जमात-घराना आधारित शोषणकारी आर्थिक संरचनाओं को संरचनात्मक रूप से समाप्त करने में विफल रहा है। 
  • अंतरक्षेत्रीय उत्पीड़न एवं नीतिगत कमियाँ: ट्रांसजेंडर समुदाय एक समान सामाजिक-आर्थिक इकाई नहीं है; विशेषतः हाशिए पर स्थित जातीय समूहों अथवा दिव्यांगता से ग्रस्त व्यक्तियों को संरचनात्मक भेदभाव के जटिल एवं बहुआयामी रूपों का सामना करना पड़ता है।
    • वर्तमान नीतिगत ढाँचे में अंतर्संबंधीयता (Intersectionality) का स्पष्ट अभाव है, जिसके कारण द्विगुणित रूप से वंचित उपसमूहों हेतु लक्षित संरक्षण उपाय प्रभावी रूप से विकसित नहीं हो पाते।
    • विशेष रूप से, अनुसूचित जाति (SC) अथवा अनुसूचित जनजाति (ST) पृष्ठभूमि से संबंधित ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अस्पृश्यता एवं ट्रांसफोबिया दोनों का सामना करना पड़ता है तथा उनके पास विशिष्ट विधिक उपचार एवं सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा तंत्र का अभाव होता है।
  • आँकड़ों की अदृश्यता एवं सांख्यिकीय विलोपन: विविध SOGISC समुदायों के संबंध में वैज्ञानिक रूप से विखंडित जनसांख्यिकीय आँकड़ों की दीर्घकालिक कमी साक्ष्य-आधारित एवं लक्षित राज्य नीतियों के निर्माण में गंभीर अवरोध उत्पन्न करती है।
    • इंटरसेक्स तथा ट्रांसजेंडर जनसंख्या का स्पष्ट रूप से पृथक गणना न करने से राज्य प्रभावी रूप से उनके सांख्यिकीय विलोपन को संस्थागत रूप प्रदान करता है, जिससे वे राष्ट्रीय सामाजिक-आर्थिक विकास की रूपरेखा से बाहर रह जाते हैं।
    • लाखों इंटरसेक्स तथा ट्रांसजेंडर व्यक्ति औपचारिक जनगणना प्रणालियों में दर्ज नहीं हैं, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का आवंटन त्रुटिपूर्ण हो जाता है तथा शासन प्रक्रिया बहिष्करणकारी बन जाती है।

भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों को सशक्त करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • वैधानिक पृथक्करण एवं लैंगिक-पहचान/अभिव्यक्ति तथा जैविक लक्षणों का वर्गीकरण (GIESC): भारत को एक वैज्ञानिक रूप से सटीक विधायी ढाँचे की ओर अग्रसर होना चाहिये, जिसके अंतर्गत सभी आधिकारिक दस्तावेजों में जैविक लैंगिक-लक्षणों को मनोवैज्ञानिक लैंगिक पहचान से पृथक किया जाये।
    • एकरूपी ‘ट्रांसजेंडर’ श्रेणी से हटकर ‘लैंगिक पहचान/अभिव्यक्ति तथा जैविक लैंगिक-लक्षण’ आधारित समावेशी नामकरण अपनाने से यह सुनिश्चित होगा कि इंटरसेक्स से संबंधित विशिष्ट आवश्यकताएँ उपेक्षित न रहें।
    • यह संरचनात्मक पुनर्वर्गीकरण विविध लैंगिक पहचान समुदायों के पृथक मानवाधिकारों का सम्मान करते हुए लक्षित नीतिनिर्माण को संभव बनाता है तथा संवैधानिक शारीरिक शुचिता को भी बनाए रखता है।
  • क्षैतिज आरक्षण और आर्थिक एकीकरण: राज्य को चाहिये कि वह सार्वजनिक रोज़गार और उच्च शिक्षा के कुछ वर्गों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये क्षैतिज आरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान करे, ताकि जाति-आधारित ऊर्ध्वाधर आरक्षण की जटिलताओं से बचा जा सके।
    • यह सकारात्मक कार्रवाई का मॉडल संरचनात्मक आर्थिक वंचना का समाधान करते हुए लैंगिक विविधता वाले व्यक्तियों को औपचारिक श्रम बाज़ार में सुनिश्चित प्रवेश प्रदान करता है।
    • अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा सामान्य वर्ग के अंतर्गत एक निश्चित प्रतिशत सीटें सुनिश्चित करके भारत वास्तविक सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता को बढ़ावा दे सकता है और भिक्षा-वृत्ति तथा बंधुआ श्रम के चक्र को समाप्त कर सकता है।
  • बिना सहमति के किये जाने वाले इंटरसेक्स सर्जरी पर प्रतिबंध: इंटरसेक्स शिशुओं और बच्चों पर चिकित्सकीय रूप से अनावश्यक ‘सामान्यीकरण’ हेतु की जाने वाली कॉस्मेटिक सर्जरी पर राष्ट्रव्यापी, विधिक रूप से बाध्यकारी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये।
    • ऐसा जनादेश शारीरिक स्वायत्तता के मूल अधिकार की रक्षा करेगा तथा बिना सहमति के किये गए चिकित्सा हस्तक्षेपों के कारण होने वाले आजीवन शारीरिक और मनोवैज्ञानिक आघात को रोकेगा। 
    • एक समर्पित इंटरसेक्स अधिकार अधिनियम के माध्यम से इसे लागू करने से भारतीय घरेलू कानून अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप हो जाएगा तथा विषमलैंगिक सामाजिक अनुरूपता पर इंटरसेक्स विविधताओं की गरिमा को प्राथमिकता दी जाएगी।
  • विकेंद्रीकृत नागरिक एवं पारिवारिक विधिक सुधार: सरकार को ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स व्यक्तियों को व्यापक नागरिक अधिकार प्रदान करने चाहिये।
    • वर्तमान व्यक्तिगत विधियों में लैंगिक-तटस्थ भाषा को सम्मिलित करना अथवा लैंगिक विविधता समुदायों के लिये एक विशेष नागरिक संहिता निर्मित करना उन्हें स्थायी पारिवारिक संरचनाएँ स्थापित करने हेतु आवश्यक विधिक मान्यता प्रदान करेगा।
    • ये सुधार समुदाय को पूर्ण नागरिकता प्रदान करने तथा यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हैं कि उनके परिवारों को भी अन्य नागरिकों के समान सामाजिक सुरक्षा और संपत्ति संबंधी अधिकार प्राप्त हों।
  • नियंत्रित लैंगिक-पुष्टि स्वास्थ्य सेवा प्रोटोकॉल का विनियमन: भारत को लैंगिक-पुष्टि उपचार हेतु एक मानकीकृत, राज्य-नियंत्रित चिकित्सकीय ढाँचा स्थापित करना चाहिये, जो प्रशासनिक बाधाओं के स्थान पर रोगी की सुरक्षा और सूचित सहमति को प्राथमिकता दे।
    • इस उपाय में चिकित्सा आनुवंशिकीविदों द्वारा आनुवंशिक परामर्श को अनिवार्य करना और हार्मोन थेरेपी के दीर्घकालिक प्रभावों पर भारत-विशिष्ट स्वास्थ्य अध्ययन करना शामिल है। 
    • इन विशेष सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा स्तर में एकीकृत करके और राष्ट्रीय बीमा योजनाओं के तहत कवरेज सुनिश्चित करके, राज्य अनियमित 'अयोग्य (अप्रमाणित) चिकित्सकों' और गुप्त शल्य चिकित्साओं के खतरनाक प्रचलन पर अंकुश लगा सकता है।
  • हिजड़ा जमात-घराना शासन में सुधार: केवल बाहरी शोषण को दंडित करने के बजाय राज्य को एक विनियमित पुनर्वास ढाँचा विकसित करना चाहिये, जिससे औपनिवेशिक काल से चली आ रही हिजड़ा संरचनाओं के आंतरिक शोषणकारी तंत्र को समाप्त किया जा सके।
    • इसके अंतर्गत परित्यक्त लैंगिक-विविध युवाओं के लिये सुरक्षित, राज्य-समर्थित आवास और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किये जाने चाहिये, ताकि उन्हें बंधुआ श्रम में जाने से रोका जा सके।
    • सहकारी मॉडल या कल्याणकारी समितियों के माध्यम से इन पारंपरिक समुदायों को औपचारिक रूप देने से उनके सदस्यों को अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से निकालकर सम्मानजनक, आत्मनिर्भर आजीविका प्रदान करने में सहायता मिल सकती है, जिससे उन्हें औपचारिक शिक्षा तक पहुँच प्राप्त हो सके।
  • डिजिटल SOGIESC जनगणना और साक्ष्य-आधारित नीति: आँकड़ों की अदृश्यता के संकट को हल करने के लिये, भारत को अपनी विविध आबादी की जनांकिकीय और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं का सटीक मानचित्रण करने के लिये एक राष्ट्रव्यापी, वैज्ञानिक रूप से विखंडित SOGIESC जनगणना आयोजित करनी चाहिये।
    • संसाधनों के न्यायसंगत आवंटन और कल्याणकारी योजना के लिये अंतर-लिंगी विविधताओं एवं लिंग-परिवर्तनशील पहचानों पर विस्तृत डेटा प्राप्त करने के लिये 'थर्ड जेंडर' के चेकबॉक्स से आगे बढ़ना महत्त्वपूर्ण है। 
    • यह साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण राज्य को सतही और वैचारिक उपायों से आगे बढ़ाकर ठोस, आँकड़ा-आधारित हस्तक्षेपों की दिशा में ले जायेगा, जो समुदाय की वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें।

निष्कर्ष: 

वर्ष 2014 के NALSA निर्णय से लेकर ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 तक की यात्रा संवैधानिक सशक्तीकरण और प्रशासनिक अति-नियमन के बीच एक जटिल अंतर्विरोध को दर्शाती है। SMILE और आयुष्मान TG प्लस जैसी आर्थिक योजनाएँ जहाँ आवश्यक भौतिक राहत प्रदान करती हैं, वहीं चिकित्सा संबंधी नियंत्रण की ओर विधायी परिवर्तन आत्मनिर्णय के मूल अधिकार को कमज़ोर करने का जोखिम उत्पन्न करता है। केवल औपनिवेशिक काल की पदानुक्रमों को समाप्त करके और अंतर-क्षेत्रीय क्षैतिज आरक्षणों को अपनाकर ही भारत सभी लैंगिक विविधता वाले नागरिकों के लिये वास्तविक गरिमा सुनिश्चित कर सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026’ द्वारा ‘स्व-पहचान’ से ‘चिकित्सा प्रमाणन’ की ओर हुए परिवर्तन का प्रतीक है।' निजता के अधिकार एवं शारीरिक स्वायत्तता पर इसके सामाजिक एवं विधिक प्रभावों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1: पहचान के संबंध में वर्ष 2026 के संशोधन में मुख्य परिवर्तन क्या है?
यह स्व-अनुभूत पहचान के अधिकार को समाप्त करता है और एक मुख्य चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व वाले चिकित्सा प्राधिकरण द्वारा प्रमाणन को अनिवार्य बनाता है।

2: क्या वर्ष 2026 के विधेयक में विवाह संबंधी अधिकारों का प्रावधान है?
नहीं, इस विधेयक में विवाह, दत्तक ग्रहण और उत्तराधिकार जैसे नागरिक अधिकारों के संबंध में कोई बात नहीं कही गई है।

3: 'SMILE' योजना क्या है?
यह एक केंद्रीय योजना है जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये समग्र पुनर्वास प्रदान करती है, जिसमें ‘गरिमा गृह’ आश्रय-गृह और कौशल विकास सम्मिलित हैं।

4: यह विधेयक इंटरसेक्स भिन्नताओं को किस प्रकार वर्गीकृत करता है?
यह इंटरसेक्स भिन्नताओं को ‘ट्रांसजेंडर’ की एक व्यापक श्रेणी के अंतर्गत ही सम्मिलित रखता है तथा शिशुओं पर बिना सहमति के किये जाने वाले लिंग-निर्धारण शल्यक्रियाओं पर प्रतिबंध लगाने में विफल रहता है।

5: नए विधेयक में भिक्षावृत्ति हेतु बाध्य करने पर दंड का क्या प्रावधान है?
यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भिक्षावृत्ति या बंधुआ श्रम में बाध्य करने पर 5 से 14 वर्ष तक के कठोर कारावास का प्रावधान करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1.  भारत में, विधिक सेवा प्रदान करने वाले प्राधिकरण (Legal Services Authorities) निम्नलिखित में से किस प्रकार के नागरिकों को नि:शुल्क विधिक सेवाएँ प्रदान करते हैं? (2020)

  1. 1,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले व्यक्ति को
  2.  2,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले ट्रांसजेंडर को
  3.  3,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले अन्य पिछडे़ वर्ग (OBC) के सदस्य को
  4.  सभी वरिष्ठ नागरिकों को

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये-

(a) केवल 1 और 2 

(b) केवल 3 और 4

(c) केवल 2 और 3

(d) केवल 1 और 4

उत्तर : (a) 


मेन्स

प्रश्न 1. भारत में महिला सशक्तीकरण के लिये जेंडर बजटिंग अनिवार्य है। भारतीय प्रसंग में जेंडर बजटिंग की क्या आवश्यकताएँ एवं स्थिति हैं? (2016)

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