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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत की खनिज सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण

  • 26 Mar 2026
  • 195 min read

यह एडिटोरियल 23/03/2026 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित “Resource rush: Current crisis highlights the need to double down on mineral security, rework policies” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय भारत के खनिज ढाँचे की रणनीतिक अनिवार्यताओं का विश्लेषण करता है। यह आयात पर निर्भरता को कम करने तथा आत्मनिर्भर, चक्रीय खनिज अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिये एक व्यापक रोडमैप प्रदान करता है।

प्रिलिम्स के लिये: महत्त्वपूर्ण खनिज मिशनMMDR संशोधन अधिनियम, दुर्लभ मृदा तत्त्व (REE), मिशन समुद्र मंथन 

मेन्स के लिये: खनिज सुरक्षा की दिशा में भारत की प्रगति, प्रमुख चुनौतियाँ और आवश्यक उपाय।

बढ़ते भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान भारत की खनिज सुरक्षा एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक चिंता का विषय बन गई है, जिससे आयात पर इसकी अत्यधिक निर्भरता उजागर होती है। लिथियम और कोबाल्ट जैसे प्रमुख खनिजों का लगभग 100% आयात किया जाता है। साथ ही, भारत के सकल बाज़ार मूल्य (GVAC) में खनन की हिस्सेदारी 4.8% (वर्ष 1999-2000) से घटकर लगभग 2% हो गई है, जो घरेलू क्षमता की कमजोरी को दर्शाती है। बाह्य निर्भरता और घरेलू उत्पादन में कमी का यह संयोजन भारत के खनिज सुरक्षा ढाँचे को सुदृढ़ करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

भारत के खनिज सुरक्षा ढाँचे को आकार देने वाले हालिया घटनाक्रम क्या हैं?

  • संसाधन सुरक्षा का संस्थागतकरण: राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM) की स्थापना खनिजों को महज वस्तुओं के रूप में मान्यता से हटकर उन्हें महत्त्वपूर्ण रणनीतिक संपत्तियों के रूप में मान्यता की दिशा में एक मूलभूत परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। 
    • यह समग्र ढाँचा प्रारंभिक अन्वेषण से लेकर अंतिम पुनर्चक्रण तक संपूर्ण मूल्य शृंखला को सुनिश्चित करता है, जिससे वैश्विक आपूर्ति संबंधी व्यवधानों के प्रति दीर्घकालिक समुत्थानशीलता सुनिश्चित होती है। 
    • सात वर्षों में ₹34,300 करोड़ के महत्त्वपूर्ण व्यय द्वारा समर्थित यह मिशन, भारत के हरित ऊर्जा संक्रमण के जोखिम को मौलिक रूप से कम करता है। 
    • इस मिशन के तहत, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) को सत्र 2024-25 से 2030-31 तक 1,200 अन्वेषण परियोजनाओं को संचालित करने का कार्य सौंपा गया है। 
  • पारदर्शी नीलामी ढाँचों का विस्तार: प्रौद्योगिकी-आधारित, पारदर्शी ई-नीलामी तंत्र की ओर संक्रमण ने ऐतिहासिक आवंटन अवरोधों को सफलतापूर्वक समाप्त किया है और सहकारी संघवाद को प्रोत्साहित किया है।
    • राज्यों को अपने संसाधन-संपदा का प्रबंधन करने और उससे लाभ अर्जित करने में सशक्त बनाकर इस ढाँचे ने खनन पट्टों के क्रियान्वयन की गति को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया है। 
    • भारत के खनिज क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2025-26 में 200 खनिज ब्लॉकों की सफल नीलामी के साथ एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, जो एक वर्ष में अब तक की सबसे बड़ी नीलामी है।
    • राज्य स्तर पर दक्षता में भारी वृद्धि हुई है, जिसमें गुजरात (32 ब्लॉक), राजस्थान (30 ब्लॉक) और तमिलनाडु (22 ब्लॉक) राष्ट्रीय स्तर पर सबसे आगे हैं।
  • KABIL के माध्यम से व्यापक वैश्विक परिसंपत्ति अधिग्रहण: भारत निष्क्रिय बाज़ार खरीद से हटकर विदेशी खनन परिसंपत्तियों में सक्रिय इक्विटी स्वामित्व की ओर रुख करके अपनी भौगोलिक कमज़ोरियों को सक्रिय रूप से कम कर रहा है। 
    • यह सक्रिय विदेशी रणनीति लिथियम और कोबाल्ट जैसी अत्यधिक सांद्रित पदार्थों की आपूर्ति पर प्रत्यक्ष नियंत्रण सुनिश्चित करती है, जिससे घरेलू उद्योगों को भू-राजनीतिक बाधाओं से बचाया जा सकता है। 
    • खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) ने हाल ही में अर्जेंटीना के कैटामार्का प्रांत में 15,703 हेक्टेयर के लिथियम ब्लॉक में अपने अन्वेषण कार्य को शुरू किया है। 
    • इसके अलावा, KABIL ऑस्ट्रेलिया और चिली जैसे संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में इसी तरह की मूल्य-शृंखला साझेदारी को आगे बढ़ाकर इस योजना का सक्रिय रूप से विस्तार कर रहा है।
  • अपतटीय हाइड्रोकार्बन विस्तार: भारत क्रमिक ड्रिलिंग से हटकर ‘मिशन मोड’ रणनीति अपनाते हुए गहन समुद्र और अति-गहन समुद्र में स्थित, अब तक कम अन्वेषित तेल और गैस भंडारों को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
    • यह रणनीति अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी साझेदारियों और बड़े पैमाने पर पूंजीगत प्रतिबद्धताओं के माध्यम से सीमावर्ती बेसिनों के जोखिम को प्रभावी ढंग से कम करती है, जिसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर बढ़ती निर्भरता की प्रवृत्ति में परिवर्तन करना है (जो वित्त वर्ष 2025 में 88.2% तक पहुँच गई थी)। 
    • इस दिशा में सरकार ने मिशन समुद्र मंथन की एक महत्त्वाकांक्षी योजना प्रस्तावित की है, जो अपतटीय अन्वेषण प्रयासों में बड़े पैमाने पर वृद्धि का संकेत देती है।
  • विनियमित खनिज विनिमय तंत्र में संक्रमण: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2025 ने खनिज एक्सचेंजों को संस्थागत रूप देकर खनन बाज़ार को मौलिक रूप से पुनर्गठित किया है, जिससे यह क्षेत्र अपारदर्शी द्विपक्षीय अनुबंधों से दूर होकर पारदर्शी, इलेक्ट्रॉनिक व्यापार की ओर अग्रसर हुआ है। 
    • इस सुधार से वास्तविक काल में कीमतों का पता लगाना संभव हो पाता है तथा कैप्टिव खनिकों को मनमानी सीमाओं के बिना अतिरिक्त उत्पादन बेचने में सहायता मिलती है, जिससे औद्योगिक कच्चे माल की घरेलू उपलब्धता में काफी वृद्धि होती है। 
    • भारतीय खनिज ब्यूरो (IBM) को वर्ष 2025 के अंत में इन विनिमय संस्थाओं के नियामक के रूप में नियुक्त किया गया, ताकि बाज़ार में हेर-फेर को रोका जा सके।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी को उत्प्रेरित करना: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2025 ने अन्वेषण क्षेत्र को निजी उद्यमों के लिये खोलकर प्रभावी रूप से क्राउडसोर्सिंग के माध्यम से पूंजी और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को आकर्षित किया है।
    • इस रणनीतिक उदारीकरण से वित्तीय और परिचालन संबंधी जोखिम सार्वजनिक कोष से हटकर विशेषीकृत निजी संस्थाओं पर स्थानांतरित हो जाता है, जिससे घरेलू खोजों की गति तेज़ हो जाती है। 
    • निजी कंपनियाँ तेज़ी से इसका लाभ उठा रही हैं, जिनमें वेदांता जैसी कंपनियों ने कोबाल्ट, वैनेडियम और दुर्लभ मृदा तत्त्वों को कवर करने वाले 10 महत्त्वपूर्ण खनिज ब्लॉक हासिल किये हैं। 
    • इसी प्रकार, हिंदुस्तान पावर ने हाल ही में मध्य प्रदेश में एक अत्यंत रणनीतिक 200 वर्ग किलोमीटर का प्लैटिनम ग्रुप एलिमेंट्स (PGE) ब्लॉक हासिल किया है।
  • वित्तीय जोखिम कम करना और नियामकीय लचीलापन: सरकार ने लचीले वित्तीय साधनों को पेश करके खनन क्षेत्र में प्रवेश बाधाओं को संरचनात्मक रूप से कम किया है और व्यापार-सुगमता को बढ़ाया है। 
    • कठोर पूँजी अवरोध तंत्र से हटकर यह व्यवस्था बोली-दाताओं की निष्क्रियता को रोकती है और मध्यम स्तर की कंपनियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करती है।
    • हाल ही में पेश किये गए खनिज (नीलामी) संशोधन नियम, 2026 के अंतर्गत बीमा जमानत बॉण्ड को पारंपरिक बैंक गारंटी के विकल्प के रूप में स्वीकार किया गया है।
    • इस लचीले ढाँचे का लाभ उठाते हुए, खान मंत्रालय ने मार्च 2026 में अपनी नीलामी का 7वाँ चरण शुरू किया, जिसमें सफलतापूर्वक 19 नए रणनीतिक ब्लॉक पेश किये गए।
  • चक्रीय खनिज अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका: प्राथमिक निष्कर्षण पर अत्यधिक दबाव को कम करने और पर्यावरणीय फूटप्रिंट को घटाने के लिये, भारत अपने खनिज सुरक्षा ढाँचे में चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को निर्णायक रूप से शामिल कर रहा है। 
    • एक सशक्त पुनर्चक्रण तंत्र की स्थापना ‘घरेलू द्वितीयक खदान’ के रूप में कार्य करती है, जो प्रयुक्त तकनीकी अपशिष्ट को मूल्यवान औद्योगिक कच्चे माल में परिवर्तित करती है।
    • वर्ष 2025 के बजट में, भारतीय वित्त मंत्री ने कोबाल्ट पाउडर और अपशिष्ट, लिथियम-आयन बैटरी स्क्रैप, सीसा, जस्ता और 12 महत्त्वपूर्ण खनिजों पर सीमा शुल्क से छूट की घोषणा की, यह कदम भारत के ऊर्जा परिवर्तन को गति देने के उद्देश्य से उठाया गया है।
    • वर्ष 2025 के अंत में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ई-अपशिष्ट से महत्त्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण की क्षमता को तेज़ी से बढ़ाने के लिये 1,500 करोड़ रुपये की एक समर्पित प्रोत्साहन योजना शुरू की। 
  • मध्यवर्ती प्रसंस्करण अंतर को समाप्त करना: यह स्वीकार करते हुए कि मध्यवर्ती प्रसंस्करण क्षमताओं के बिना कच्चे अयस्क का निष्कर्षण अपर्याप्त है, भारत निष्कर्षण धातु विज्ञान और अनुसंधान एवं विकास की ओर भारी मात्रा में पूंजी लगा रहा है। 
    • यह रणनीतिक परिवर्तन यह सुनिश्चित करता है कि देश खनिज आपूर्ति शृंखला के सबसे मूल्यवान खंडों पर अधिग्रहण कर ले, जिससे वह केवल कच्चे माल का निर्यातक बने रहने से बच सके।
    • नवंबर 2025 में, सरकार ने उन्नत रिकवरी प्रौद्योगिकियों को वित्त पोषित करने के लिये ₹210 करोड़ के ANRF-MAHA CRM अनुसंधान कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

भारत की खनिज सुरक्षा को प्रभावित करने वाली मुख्य चुनौतियाँ कौन-सी हैं?

  • मध्य-प्रवाह प्रसंस्करण अंतराल: यद्यपि भारत खनिज निष्कर्षण को तीव्र गति से बढ़ा रहा है, तथापि कच्चे अयस्कों को उच्च-शुद्धता वाले औद्योगिक उत्पादों में परिवर्तित करने हेतु आवश्यक उन्नत ‘स्मेल्टिंग एवं रिफाइनिंग’ अवसंरचना का अभाव है।
    • इसके परिणामस्वरूप एक ‘मूल्य-शृंखला जाल’ (value-chain trap) उत्पन्न होता है, जहाँ भारत कच्चे बॉक्साइट या लौह अयस्क का निर्यात करता है और बदले में उच्च मूल्य वाले एल्युमिनियम और इस्पात मिश्र धातुओं का आयात करता है।
    • वर्तमान में भारत भारत अपने चुंबकों और संबंधित सामग्रियों का 80-90% हिस्सा चीन से आयात करता है, जो वैश्विक दुर्लभ मृदा तत्त्व (REE) प्रसंस्करण का 90% से अधिक नियंत्रण रखता है।
    • यद्यपि जम्मू-कश्मीर में लिथियम की खोज हुई है, तथापि भारत में वर्तमान में बैटरी-ग्रेड लिथियम कार्बोनेट के उत्पादन हेतु वाणिज्यिक स्तर की रिफाइनरियों का अभाव है।
  • भूराजनीतिक संवेदनशीलता के संकरे मार्ग: भारत की हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता केवल कच्चे तेल तथा LNG तक सीमित नहीं है, बल्कि सल्फर तथा कॉपर तार जैसे महत्त्वपूर्ण औद्योगिक उत्पादों तक भी विस्तारित है, जो मुख्यतः पश्चिम एशिया से आयात किये जाते हैं।
    • इस संकरे समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार का व्यवधान रासायनिक उद्योगों तथा उससे संबंधित विनिर्माण प्रक्रियाओं को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है, जिससे आर्थिक आघात और तीव्र हो सकते हैं।
    • यह स्थिति शीघ्र ही घरेलू अति-मुद्रास्फीति (hyper-inflation) तथा चालू खाता घाटा (CAD) के बिगड़ने में परिवर्तित हो सकती है।
  • खनन क्षेत्र का स्थिर सकल मूल्य वर्द्धन (GVA): राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में खनन क्षेत्र का योगदान असामान्य रूप से निम्न स्तर पर स्थिर बना हुआ है, जो देश की समग्र GDP वृद्धि के साथ अपेक्षित सामंजस्य स्थापित करने में असफल रहा है।
    • यह ठहराव घरेलू संसाधनों के अपर्याप्त उपयोग तथा निष्कर्षण उद्योगों में गहराई तक व्याप्त संरचनात्मक उत्पादकता की कमी का द्योतक है।
    • खनन एवं उत्खनन क्षेत्र का सकल मूल्यवर्द्धन (GVA), देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मात्र 2 प्रतिशत (जुलाई 2024 तक) है।
    • भारत में ताँबे की मांग वर्ष 2050 तक बढ़कर 20 मिलियन टन होने का अनुमान है, तथापि घरेलू उत्पादन आयात पर 55% निर्भरता के साथ उल्लेखनीय रूप से पीछे बना हुआ है।
  • निजी अन्वेषकों हेतु उच्च ‘जोखिम प्रीमियम: गहन खनिज अन्वेषण की ‘उच्च जोखिम, उच्च लाभ’ प्रकृति, भूवैज्ञानिक डेटा की पारदर्शिता के अभाव तथा दीर्घकालिक परिपक्वता अवधि के कारण अवरुद्ध होती है।
    • एक सुदृढ़ ‘जूनियर माइनिंग’ संस्कृति के अभाव में, अन्वेषण का दायित्व लगभग पूर्णतः राज्य पर ही केंद्रित रहता है, जिसमें निजी वेंचर कैपिटल की चपलता का अभाव परिलक्षित होता है।
    • ऑस्ट्रेलिया तथा कनाडा जैसे देश संभावित खनन पट्टों पर प्रति वर्ग किमी 5,000 अमेरिकी डॉलर से अधिक व्यय करते हैं, जबकि भारत अपने विशाल खनिज संसाधनों के बावजूद प्रति वर्ग किमी केवल 9 अमेरिकी डॉलर व्यय करता है।
  • संसाधन शासन का विखंडन: वर्तमान में खनिज सुरक्षा केंद्र तथा राज्य सरकारों के मध्य ‘अतिव्यापी अधिकार क्षेत्रों’ के कारण बाधित है, जिसके परिणामस्वरूप ‘वन एवं पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियों’ में विलंब होता है।
    • इस संघीय गतिरोध के कारण नीलाम की गई संपत्तियाँ प्रायः वर्षों तक ‘गैर-परिचालन’ अवस्था में बनी रहती हैं, जिससे महत्त्वपूर्ण पूंजी अवरुद्ध हो जाती है।
    • उदाहरणार्थ, वाणिज्यिक कोयला खनन सुधारों (2020 के पश्चात्) के अंतर्गत नीलाम किये गए अनेक कोयला ब्लॉकों को लंबित वन स्वीकृतियों तथा भूमि अधिग्रहण संबंधी समस्याओं के कारण विलंब का सामना करना पड़ा है, जिससे उनके संचालन में देरी हुई है।
    • इसी प्रकार, ओडिशा तथा कर्नाटक में लौह अयस्क खनन ऐतिहासिक रूप से पर्यावरणीय वाद-विवाद एवं नियामकीय अनुमोदनों के कारण बाधित रहा है, जो शासन संबंधी अवरोधों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
  • गहन खनन में प्रौद्योगिकी कमी: भारत में महत्त्वपूर्ण ‘सतही’ भंडार (जैसे लोहा तथा बॉक्साइट) उपलब्ध हैं, तथापि गहरे स्तर के खनिजों (जैसे तांबा, सोना, REE) के अन्वेषण हेतु आवश्यक ‘दिशात्मक ड्रिलिंग’ तथा AI-संचालित भूकंपीय तकनीक का अभाव है।
    • ज्ञात भंडारों की उपलब्धता के बावजूद, मलंजखंड तांबा परियोजना जैसी परियोजनाओं को तकनीकी बाधाओं के कारण गहन अन्वेषण के विस्तार में सीमाओं का सामना करना पड़ा है।
    • इस प्रौद्योगिकीय अभाव के परिणामस्वरूप महत्त्वपूर्ण खनिजों का घरेलू निष्कर्षण, आयात की तुलना में अधिक महंगा सिद्ध होता है। 
    • यही कारण है कि भारत अपनी परिष्कृत तांबे की आवश्यकताओं का 90% से अधिक आयात करता है।
    • इसी प्रकार, उन्नत निष्कर्षण एवं प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों की सीमित उपलब्धता के कारण भारत की REE क्षमता (केरल में मोनाजाइट-समृद्ध समुद्री तटीय रेत) का पूर्णतः उपयोग नहीं हो पा रहा है, जिसके फलस्वरूप आयात निर्भरता बनी हुई है।
  • रणनीतिक खनिज भंडार (SMR) का अभाव: पेट्रोलियम के विपरीत, भारत के पास लिथियम, कोबाल्ट तथा निकेल जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिये कोई केंद्रीकृत ‘रणनीतिक भंडार’ उपलब्ध नहीं है, जो आपूर्ति शृंखला झटकों से प्रभावी रूप से निपट सके।
    • भारत की ‘जस्ट-इन-टाइम’ क्रय मॉडल पर निरंतर निर्भरता उसके निर्माण क्षेत्र को वैश्विक मूल्य अस्थिरता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है।
    • उदाहरणार्थ, वर्ष 2022 में लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर वैश्विक निकेल कीमतों में आई तीव्र वृद्धि के दौरान, कीमतें कुछ ही दिनों में दो गुने से अधिक बढ़ गईं, जिससे बैटरी तथा स्टेनलेस स्टील उद्योगों की आपूर्ति शृंखलाएं बाधित हो गईं।
    • इसी प्रकार, भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन तथा इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता, लिथियम एवं कोबाल्ट की आपूर्ति में उत्पन्न झटकों के प्रति संवेदनशील बने हुए हैं, जिन पर पर्याप्त नियंत्रण चीन जैसे देशों का है। यह स्थिति बफर भंडार की रणनीतिक आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।
  • अविकसित चक्रीय अर्थव्यवस्था तंत्र: भारत में ‘शहरी खनन’ क्षेत्र (ई-अपशिष्ट तथा प्रयुक्त बैटरियों से खनिज निष्कर्षण) अभी भी बड़े पैमाने पर अनौपचारिक तथा प्रौद्योगिकीय दृष्टि से पिछड़ा हुआ है।
    • इसके परिणामस्वरूप बहुमूल्य द्वितीयक संसाधनों की हानि होती है, जो अन्यथा प्राथमिक आयात निर्भरता को कम करने में सहायक हो सकते थे।
    • भारत वर्तमान में ई-अपशिष्ट के तीव्र संकट का सामना कर रहा है, जहाँ प्रतिवर्ष 16 लाख मीट्रिक टन से अधिक ई-कचरा उत्पन्न होता है तथा इसमें लगभग 23% की वृद्धि हो रही है। इस कुल अपशिष्ट का लगभग 95% प्रबंधन अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा किया जाता है।
    • आर्थिक परिप्रेक्ष्य में, भारत के ई-अपशिष्ट में अत्यधिक अप्रयुक्त क्षमता निहित है, जिसका अनुमान पुनर्चक्रण के माध्यम से प्राप्त सामग्रियों (मुख्यतः धातुएँ) से लगभग 6 बिलियन डॉलर के समतुल्य है।
    • यदि कुशल औपचारिक पुनर्चक्रण तथा धातु पुनर्प्राप्ति तंत्र को सुदृढ़ किया जाए, तो भारत की धातु आयात मांग में लगभग 1.7 बिलियन डॉलर तक की कमी संभव है, साथ ही चक्रीय अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ समर्थन प्राप्त हो सकता है।

भारत अपनी खनिज सुरक्षा को और प्रभावी करने हेतु क्या कदम उठा सकता है?

  • जूनियर माइनिंग इकोसिस्टम का एकीकरण: भारत को विशिष्ट जूनियर माइनिंग कंपनियों को आकर्षित करने हेतु ‘फ्लो-थ्रू शेयर’ कर प्रोत्साहन प्रदान करते हुए उच्च-जोखिम अन्वेषण स्तर को औपचारिक स्वरूप देना चाहिये।
    • यह मॉडल ‘ग्रीनफील्ड’ खोज के प्रारंभिक वित्तीय भार को राज्य से स्थानांतरित कर विशेषीकृत भूवैज्ञानिक विशेषज्ञता से युक्त, उद्यम पूंजी समर्थित फर्मों पर आरोपित करता है।
    • इन स्टार्टअप्स के लिये एक समर्पित ‘एक्सप्लोरेशन एक्सचेंज’ की स्थापना करके, भारत G4 (प्रारंभिक सर्वेक्षण) डेटा को G1 (खनन योग्य) भंडार में रूपांतरित करने की प्रक्रिया को तेज़ कर सकता है।
  • राष्ट्रीय खनिज प्रसंस्करण क्षेत्रों (MPZ) की स्थापना: बाह्य शक्तियों द्वारा धारित मध्यवर्ती एकाधिकार को समाप्त करने के लिये, भारत को साझा ‘प्लग-एंड-प्ले’ अवसंरचना तथा सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्रों के साथ विशेष ‘खनिज प्रसंस्करण पार्क’ स्थापित करने चाहिये।
    • ये क्षेत्र विशेषतः लिथियम एवं कोबाल्ट के लिये बैटरी-ग्रेड शुद्धता स्तर को लक्षित करते हुए गलन, शोधन एवं मिश्र धातुकरण हेतु स्थानीय स्तर पर वृहद् स्तर की अर्थव्यवस्था उपलब्ध कराएंगे।
    • साथ ही, प्रमुख बंदरगाहों अथवा औद्योगिक गलियारों के निकट रणनीतिक सह-स्थान से ‘लॉजिस्टिक्स टैक्स’ में कमी आएगी तथा कच्चे अयस्क से उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण तक निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित किया जा सकेगा।
  • रणनीतिक खनिज बफर (SMB) का क्रियान्वयन: रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की तर्ज पर, भारत को आपूर्ति शृंखला झटकों अथवा समुद्री नाकाबंदी जैसी परिस्थितियों से निपटने हेतु महत्त्वपूर्ण खनिजों का भौतिक तथा ‘पेपर’ भंडार निर्मित करना आवश्यक है।
    • इसके लिये राज्य-नेतृत्व वाली ‘काउंटर-साइक्लिकल प्रोक्योरमेंट’ रणनीति अपनाई जानी चाहिये, जिसमें वैश्विक कीमतें कम होने पर खनिजों की खरीद तथा संकट के समय घरेलू उद्योगों को उनकी आपूर्ति की जाए।
    • यह बफर एक महत्त्वपूर्ण ‘मैक्रो-इकोनॉमिक शॉक एब्जॉर्बर’ के रूप में कार्य करेगा, जिससे भू-राजनीतिक तनाव के दौरान घरेलू इलेक्ट्रिक वाहन एवं एयरोस्पेस उत्पादन की निरंतरता सुनिश्चित होती है।
  • अनिवार्य विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के माध्यम से ‘अर्बन माइनिंग’: भारत को ‘रेखीय निष्कर्षण’ मॉडल से आगे बढ़कर ‘चक्रीय खनिज अर्थव्यवस्था’ की ओर संक्रमण करना चाहिये, जिसके लिये लिथियम-आयन बैटरियों तथा ई-कचरे हेतु प्रौद्योगिकी-सम्मिलित EPR ढाँचों का सख्ती से प्रवर्तन आवश्यक है।
    • उच्च-उत्पादकता वाले हाइड्रो-मेटलर्जिकल पुनर्चक्रण संयंत्रों को सब्सिडी प्रदान कर देश प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दुर्लभ मृदा तत्त्वों तथा बहुमूल्य धातुओं की पुनर्प्राप्ति कर सकता है, जो प्राथमिक खनन की तुलना में अत्यंत कम ऊर्जा व्यय पर संभव है।
    • यह एक ‘द्वितीयक घरेलू खदान’ का निर्माण करता है, जो घरेलू उपभोग के साथ अनुपातिक रूप से विकसित होती है तथा दीर्घकालिक आयात निर्भरता को उल्लेखनीय रूप से कम करती है।
  • AI-संचालित गहन अन्वेषण का कार्यान्वयन: खान मंत्रालय को पूर्वानुमानित खनिज मानचित्रण के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं मशीन लर्निंग (ML) एल्गोरिदम के साथ एकीकृत ‘ओपन-एक्सेस राष्ट्रीय भू-स्थानिक डेटा भंडार’ स्थापित करना चाहिये।
    • सतही भंडारों से आगे बढ़ने हेतु ‘डायरेक्शनल ड्रिलिंग’ तथा ‘एयरो-मैग्नेटिक सर्वेक्षण’ आवश्यक हैं, जिनसे ‘अदृश्य’ (blind) भंडारों की पहचान की जा सकती है, जो पारंपरिक भूवैज्ञानिक विधियों से दृष्टिगोचर नहीं होते।
    • साथ ही, ‘‘नेशनल रिपॉज़िटरी ऑफ कोर रॉक्स’ का डिजिटलीकरण वैश्विक विशेषज्ञों को भारत की भूमिगत खनिज क्षमता का दूरस्थ विश्लेषण करने में सक्षम बनाएगा, जिससे ‘खोज से उत्पादन’ चक्र में उल्लेखनीय कमी आएगी।
  • संसाधन-आधारित अवसंरचना के माध्यम से कूटनीति: भारत को अपने 'ग्लोबल साउथ' नेतृत्व का लाभ उठाते हुए अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के संसाधन-समृद्ध देशों के साथ द्विपक्षीय 'खनिज-आधारित बाज़ार' या 'खनिज-आधारित अवसंरचना' सौदों पर वार्ता करनी चाहिये। 
    • दीर्घकालिक 'ऑफ-टेक समझौतों' के बदले तकनीकी सहयोग, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI), या स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों की पेशकश करके, भारत खुले बाज़ार की प्रतिस्पर्द्धी बोली-प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सकता है। 
    • यह 'रणनीतिक विनिमय' तंत्र एक स्थिर आपूर्ति शृंखला सुनिश्चित करता है और ऐसे गहन भू-राजनीतिक संबंध स्थापित करता है जो बाह्य दबावों के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं।
  • एकल-खिड़की 'ग्रीन-चैनल' मंजूरी: केंद्र और राज्य सरकारों के बीच 'मंजूरी गतिरोध' को समाप्त करने हेतु, भारत को समयबद्ध पर्यावरणीय और वन अनुमोदनों के लिये ब्लॉकचेन-आधारित 'एकीकृत खनिज नियामक पोर्टल' लागू करना चाहिये।
    • 'मानित अनुमोदन' खंड को लागू करने से (जहाँ एक विशिष्ट समय सीमा के भीतर प्रक्रिया पूरी न होने पर स्वचालित रूप से मंजूरी प्रदान की जाती है) बड़े पैमाने पर विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को आकर्षित करने के लिये आवश्यक नियामक निश्चितता मिलेगी। 
    • इससे संघीय स्तर पर होने वाले मतभेदों में सामंजस्य स्थापित होता है और यह सुनिश्चित होता है कि नीलाम किये गए ब्लॉक 24 महीनों के भीतर 'प्रथम अयस्क' चरण तक पहुँच जाएं।
  • स्वदेशी निष्कर्षण धातु विज्ञान अनुसंधान एवं विकास: सरकार को भारत के विशिष्ट, निम्न श्रेणी के खनिज अयस्कों के प्रसंस्करण के लिये कम कार्बन उत्सर्जन एवं उच्च दक्षता वाले निष्कर्षण धातु विज्ञान पर केंद्रित 'डीप-टेक मूनशॉट्स' को वित्त पोषित करना चाहिये। 
    • स्वदेशी 'आयन-एक्सचेंज' या 'बायो-लीचिंग' प्रौद्योगिकियों को विकसित करने से भारत को उन खनिजों के भंडारों से आर्थिक रूप से खनिज निकालने में सहायता मिलेगी जिन्हें वर्तमान में वैश्विक मानकों के अनुसार 'अव्यवहार्य' माना जाता है। 
    • 'सार्वजनिक-निजी अनुसंधान संघों' को प्रोत्साहन देकर, भारत अगली पीढ़ी के खनिज प्रसंस्करण के लिये बौद्धिक संपदा (IP) का स्वामित्व प्राप्त कर सकता है, जिससे वह 'प्रौद्योगिकी ग्रहणकर्त्ता' से 'प्रौद्योगिकी प्रदाता' में परिवर्तित हो जाएगा।
  • संप्रभु 'खनिज संपदा कोष' की स्थापना: भारत को भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी दिग्गजों को उच्च मूल्य वाली विदेशी खनन कंपनियों के अधिग्रहण के लिये कम लागत वाला, दीर्घकालिक ऋण प्रदान करने हेतु एक समर्पित 'संप्रभु खनिज अधिग्रहण कोष' स्थापित करना चाहिये। 
    • यह फंड एक 'रणनीतिक युद्ध कोष' के रूप में कार्य करेगा, जिससे भारतीय कंपनियों को बाज़ार में मंदी के दौरान वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त या टियर-1 संपत्तियों के लिये सक्रिय रूप से बोली लगाने की अनुमति मिलेगी। 
    • विदेशी अधिग्रहणों की पूंजी-गहन प्रकृति के जोखिम को कम करके, सरकार यह सुनिश्चित करती है कि भारतीय उद्योग की वैश्विक 'अपस्ट्रीम' संसाधन बाज़ार में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी हो।

निष्कर्ष: 

भारत का 'संसाधन-आश्रित उपभोक्ता' देश से 'रणनीतिक खनिज शक्ति' बनने की यात्रा महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती प्रसंस्करण अंतर को समाप्त करने और निजी अन्वेषण से जुड़े जोखिम को कम करने पर निर्भर करता है। राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM) जैसी पहल एक मज़बूत संस्थागत रूपरेखा प्रदान करती हैं, लेकिन सफलता के लिये संघीय शासन में सामंजस्य स्थापित करना और रणनीतिक सुरक्षा उपायों को क्रियान्वित करना आवश्यक है। अंततः, खनिज सुरक्षा खंडित वैश्विक व्यवस्था में भारत की हरित ऊर्जा संप्रभुता और दीर्घकालिक औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धा की रीढ़ है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

“खनिज सुरक्षा भारत की आर्थिक संवृद्धि और ऊर्जा परिवर्तन के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।” खनिज सुरक्षा प्राप्त करने में आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिये और उनसे निपटने के लिये एक व्यापक रणनीति का सुझाव दीजिये।

 

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

1. राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन का प्राथमिक लक्ष्य क्या है?
अन्वेषण, पुनर्चक्रण और प्रसंस्करण पर ध्यान केंद्रित करते हुए, ₹34,300 करोड़ के परिव्यय के माध्यम से भारत की संपूर्ण खनिज मूल्य शृंखला को सुरक्षित करना।

2. 'शहरी खनन' खनिज सुरक्षा में किस प्रकार सहायता करता है?
यह ई-अपशिष्ट से लिथियम और कोबाल्ट जैसी रणनीतिक धातुओं को पुनर्प्राप्त करता है, जिससे एक द्वितीयक घरेलू संसाधन चक्र बनता है।

3. KABIL के अर्जेंटीना सौदे का क्या महत्त्व है?
यह लिथियम ब्राइन ब्लॉकों का प्रत्यक्ष इक्विटी स्वामित्व सुरक्षित करता है, जिससे भारत के EV बैटरी निर्माण के लिये एक स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित होती है।

4. भारत के लिये 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य' इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?
यह एक प्रमुख वैश्विक चोकपॉइंट है, जिसके माध्यम से लगभग वैश्विक तेल आपूर्ति का 20% तथा भारत के ऊर्जा आयात का लगभग आधा भाग होकर गुजरता है।

5. 'जूनियर माइनिंग' क्या है?
यह ऐसी छोटी, दक्ष निजी कंपनियों को निरूपित करती है, जो उच्च-जोखिम तथा प्रारंभिक चरण के खनिज अन्वेषण एवं खोज में विशेषज्ञता रखती हैं।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. हाल में तत्त्वों के एक वर्ग, जिसे 'दुर्लभ मृदा धातु' कहते हैं, की कम आपूर्ति पर चिंता जताई गई। क्यों? (2012) 

  1. चीन, जो इन तच्चों का सबसे बड़ा उत्पादक है, द्वारा इनके निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगा दिया गया है।
  2.  चीन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और चिली को छोड़कर अन्य किसी भी देश में ये तत्त्व नहीं पाये जाते हैं।
  3.  दुर्लभ मृदा धातु विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक सामानों के निर्माण में आवश्यक हैं और इन तत्त्वों की माँग बढ़ती जा रही है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b)  केवल 2 और 3

(c)  केवल 1 और 3

(d) 1, 2 ओर 3 

उत्तर: (c)  


प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये–  (2021)

  1. वैश्विक सागर आयोग (ग्लोबल ओशन कमीशन) अंतर्राष्ट्रीय जल-क्षेत्र में समुद्र-संस्तरीय (सीबेड) खोज और खनन के लिये लाइसेंस प्रदान करता है। 
  2.  भारत ने अंतर्राष्ट्रीय जल-क्षेत्र में समुद्र-संस्तरीय खनिज की खोज के लिये लाइसेंस प्राप्त किया है। 
  3.  ‘दुर्लभ मृदा खनिज (रेयर अर्थ मिनरल)’ अंतर्राष्ट्रीय जल-क्षेत्र में समुद्र अधस्तल पर उपलब्ध है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c)  केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)       


मेन्स

प्रश्न 1. गोंडवानालैंड के देशों में से एक होने के बावजूद भारत के खनन उद्योग अपने सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में बहुत कम प्रतिशत का योगदान देते हैं। विवेचना कीजिये। (2021)

प्रश्न 2. “प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव के बावजूद, कोयला खनन विकास के लिये अभी भी अपरिहार्य है विवेचना कीजिये। (2017)

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