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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत के विनिर्माण क्षेत्र का पुनरुद्धार

  • 19 Jan 2026
  • 186 min read

यह लेख 15/01/2026 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित “Keeping India open and secure” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में उल्लेख किया गया है कि भारत की विनिर्माण वृद्धि आयात, वैश्विक पूंजी और प्रौद्योगिकी सुलभता तथा रणनीतिक क्षेत्रों की सशक्त सुरक्षा पर निर्भर करती है। इसमें निर्यात को बढ़ावा देने के लिये प्रेस नोट 3 जैसे व्यापक प्रतिबंधों को एक पारदर्शी, जोखिम-आधारित निवेश जाँच प्रणाली से प्रतिस्थापित करने का आह्वान किया गया है।

प्रिलिम्स के लिये: मेक इन इंडिया, PLI स्कीम, MSME सेक्टर, विनिर्माण क्षेत्र, FDI, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, वैश्विक मूल्य शृंखला, प्रच्छन्न बेरोज़गारी

मेन्स के लिये: विनिर्माण क्षेत्र की वर्तमान स्थिति और विकास, प्रमुख मुद्दे तथा उपाय।

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में विनिर्माण निर्यात को बढ़ावा देने के लिये अपनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) रूपरेखा, विशेष रूप से प्रेस नोट 3 (PN3) की समीक्षा कर रहा है। निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता इंटीग्रेटेड सर्किट्स तथा बैटरियों जैसे मध्यवर्ती तथा पूंजीगत वस्तुओं के आयात पर निर्भर करती है। नवीनतम सुधारों जैसे वस्तु एवं सेवा कर (GST) का युक्तिकरण, गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCO) की समाप्ति और नए श्रम कोड्स यह संकेत देते हैं कि भारत जोखिम-आधारित FDI मूल्यांकन प्रणाली की ओर अग्रसर है। हालाँकि कमज़ोर पारितंत्र एवं नियामक अनिश्चितता विनिर्माण वृद्धि को बाधित कर रही है। भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी विनिर्माण केंद्र बनाने के लिये इन कमियों को दूर करना अत्यंत आवश्यक है। 

भारत के विनिर्माण क्षेत्र की वर्तमान स्थिति क्या है? 

  • GDP में योगदान और उत्पादन: विनिर्माण क्षेत्र भारत की GDP में लगभग 16-17% का योगदान देता है तथा वित्तीय वर्ष 2024 की कमज़ोर स्थिति के बाद इसने फिर से गति पकड़ ली है। यह क्षेत्र GDP के 25% तक विनिर्माण को बढ़ाने के भारत के मध्यम अवधि के लक्ष्य के लिये केंद्रीय महत्त्व रखता है।
  • औद्योगिक उत्पादन: विनिर्माण उत्पादन में वृद्धि हुई है, जो औद्योगिक उत्पादन में निरंतर विस्तार और क्षमता उपयोग के स्तर में सुधार से परिलक्षित होता है। 
    • विनिर्माण क्षेत्र में 8.0% की वृद्धि के कारण, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) ने नवंबर 2025 में पिछले वर्ष की तुलना में 6.7% की वृद्धि दर्ज की।
    • RBI के OBICUS सर्वेक्षण के 65वें दौर के अनुसार, विनिर्माण कंपनियों की उत्पादन क्षमता मार्च 2024 तिमाही में बढ़कर 76.8% हो गई, जबकि दिसंबर 2023 की तिमाही में यह 74.7% थी।
  • विनिर्माण PMI: विनिर्माण क्षेत्र की मज़बूती का संकेत HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI (परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स) में परिलक्षित होता है।
    • भारत का विनिर्माण PMI लगातार विस्तार क्षेत्र (50 से ऊपर) में बना हुआ है, जो नए ऑर्डर, उत्पादन और रोज़गार में व्यापक सुधार को दर्शाता है। यह घरेलू उपभोग तथा निर्यात आधारित मांग दोनों में सुधार का प्रतिबिंब है।
  • निर्यात: विनिर्माण निर्यात उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल की ओर बढ़ रहा है, जिससे वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में भारत की भूमिका मज़बूत हो रही है।
    • उदाहरण के लिये, PLI योजना के तहत तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में मोबाइल फोन विनिर्माण समूहों के नेतृत्व में वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात आठ गुना बढ़कर ₹38,000 करोड़ से ₹3.27 लाख करोड़ हो गया।

प्रेस नोट 3 (2020)

  • परिचय: कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कंपनियों पर संभावित अवसरवादी अधिग्रहणों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सरकार ने अप्रैल 2020 में प्रेस नोट 3 (2020) जारी किया।
    • इस नियम के तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से या जहाँ लाभकारी स्वामी ऐसे देशों से है, ऐसे किसी भी निवेश को केवल सरकारी अनुमोदन के माध्यम से ही किया जा सकता है, स्वचालित रूप से नहीं।
    • यह नियम पूर्वव्यापी रूप से भी प्रभावी है: यदि किसी मौजूदा या भविष्य के विदेशी निवेश के स्वामित्व में परिवर्तन होता है और वास्तविक स्वामी इस श्रेणी में आता है तो नए अनुमोदन की अनिवार्यता लागू होती है।
    • प्रेस नोट 3 को FEMA नियमों में संशोधन के माध्यम से लागू किया गया, जिससे इसके उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई की जा सके। प्रवर्तन का अधिकार भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के पास सुरक्षित रखा गया है।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र में कौन-से प्रमुख सुधार हो रहे हैं?

  • मेक इन इंडिया और PLI योजना के साथ विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि : मेक इन इंडिया ने हाल के सकारात्मक रुझानों को दर्शाया है, जिसमें रिकॉर्ड FDI, इलेक्ट्रॉनिक्स/ऑटो सेक्टर में महत्त्वपूर्ण वृद्धि और रक्षा तथा फार्मा सेक्टर की सफलता शामिल है, जो आत्मनिर्भरता तथा रोज़गार सृजन को बढ़ावा दे रही हैं।
    • PLI के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा उपकरण और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में उत्पादन तथा रोज़गार में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जिससे भारत के निर्यात को समर्थन मिला है एवं आयात पर निर्भरता कम हुई है।
    • इस योजना ने विनिर्माण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विस्तार को गति दी है, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2025 के अंत तक 14 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का निवेश प्राप्त हुआ है।
      • उदाहरण के लिये, मोबाइल फोन का घरेलू उत्पादन 2014-15 में 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 5.45 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो 28 गुना वृद्धि है।
    • इसके अलावा, भारत ने वर्ष 2025-2026 के केंद्रीय बजट में राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (NMM) की शुरुआत की, जो भारत के विनिर्माण विकास को बढ़ावा देने के लिये एक महत्त्वपूर्ण पहल है।
  • चार श्रम संहिता का कार्यान्वयन: वर्ष 2025 के अंत में चार श्रम संहिताओं के ऐतिहासिक कार्यान्वयन ने औपनिवेशिक काल के खंडित ढाँचे को एक एकीकृत अनुपालन व्यवस्था से बदल दिया है। 
    • इससे निर्माता वैश्विक मांग चक्र के अनुसार कर्मचारी संख्या समायोजित कर सकते हैं (Fixed Term Employment) और एक समान सुरक्षा जाल सुनिश्चित होता है।
      • उदाहरण के लिये, देश में पहली बार सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 113 और 114 के तहत असंगठित, गिग तथा प्लेटफॉर्म श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान किये गए हैं।
  • विदेशी निवेश को प्रोत्साहन: सरकार वैश्विक पूंजी आकर्षित करने के लिये रणनीतिक नीतियों का पुनर्गठन कर रही है। उदाहरण के लिये, भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को स्वचालित मार्ग से 74% और सरकारी मार्ग से 100% तक बढ़ाकर उदारीकृत किया है।
    • इसका उद्देश्य उन्नत प्रौद्योगिकी के माध्यम से घरेलू उत्पादन को मज़बूत करना और विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाना है।
    • सरकारी आँकड़ों से पता चलता है कि विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के रूप में इक्विटी प्रवाह में 69% की वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2004-14 में ₹8.37 लाख करोड़ (US$ 97.7 बिलियन) से बढ़कर 2014-24 में ₹14.15 लाख करोड़ (US$ 165.1 बिलियन) हो गया है।
  • सेमीकंडक्टर का व्यावसायीकरण और स्वायत्तता: वर्ष 2025 में भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) ने ‘नीति’ से ‘उत्पादन’ चरण में कदम रखा।
    • इस रणनीतिक बदलाव का उद्देश्य घरेलू निर्माण प्रणाली स्थापित करके चीनी आपूर्ति शृंखलाओं से स्वतंत्र होना है। 
      • यह कदम न केवल इलेक्ट्रॉनिक्स के लिये बल्कि ऑटो और रक्षा क्षेत्रों को वैश्विक चिप की कमी से बचाने के लिये भी महत्त्वपूर्ण है। 
        • उदाहरण के लिये, अगस्त 2025 तक भारत ने छह राज्यों में 10 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को स्वीकृति दी है, जिनमें कुल निवेश ₹1.60 लाख करोड़ है।
      • इसके अलावा, चार प्रमुख इकाइयाँ (टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, माइक्रोन, सीजी पावर, केन्स) 2026 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने वाली हैं।
  • पीएम गति शक्ति के माध्यम से लॉजिस्टिक्स अनुकूलन: ‘गति शक्ति’ प्लेटफॉर्म ने विभागीय बाधाओं को सफलतापूर्वक कम कर दिया है, जिससे बहुआयामी कनेक्टिविटी संभव हो पाई है और परिवहन समय में अत्यंत कमी आई है। 
    • रेलवे को बंदरगाहों और सड़कों के साथ एकीकृत करके उच्च रसद लागत की संरचनात्मक कमी को दूर किया जा रहा है, जिसके कारण पहले भारतीय निर्यात वियतनाम के निर्यात की तुलना में अधिक महॅंगा होता था। 
    • उदाहरण के लिये, भारत की लॉजिस्टिक्स लागत GDP के 14% से घटकर 7.97% हो गई है। साथ ही रेल द्वारा माल ढुलाई को सुगम बनाने के लिये 2025 के अंत तक 118 गति शक्ति कार्गो टर्मिनलों को चालू किया गया था।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से MSME का औपचारीकरण: MSME को औपचारिक अर्थव्यवस्था में एकीकृत करने में ‘डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना’ मॉडल (ONDC + उद्यम) का महत्त्वपूर्ण योगदान है। बाज़ार और ऋण तक सुलभता बढ़ाकर, छोटे निर्माताओं को ‘बौनेपन’ के जाल से बाहर निकाला जा रहा है, जिससे वे महॅंगे बिचौलियों के बिना सीधे बड़े वैश्विक OEM को आपूर्ति कर सकते हैं। 
    • उदाहरण के लिये, जून 2025 तक उद्यम पंजीकरण और सहायता प्लेटफॉर्म पर 5.70 करोड़ से अधिक MSME पंजीकृत हैं।
      • इसके अलावा विश्व बैंक द्वारा समर्थित भारतीय सरकार का एक कार्यक्रम, रेजिंग एंड एक्सेलरेटिंग MSME परफॉर्मेंस (RAMP) योजना, जिसका परिव्यय ₹6,062.45 करोड़ है, जिसका उद्देश्य सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र के विकास, बाज़ार पहुँच, वित्त और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना है।
  • रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण और निर्यात में वृद्धि: ‘सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों’ की आक्रामक अधिसूचना ने घरेलू बाज़ार को प्रभावी रूप से सुरक्षित कर दिया है, जिससे विदेशी औद्योगिक निर्माताओं को प्रत्यक्ष बिक्री के बजाय स्थानीय उत्पादन के लिये संयुक्त उद्यम बनाने के लिये मजबूर होना पड़ा है। 
    • इस संरचनात्मक संरक्षण ने निजी कंपनियों को उपकरण आपूर्तिकर्त्ताओं से पूर्ण-प्रणाली एकीकरणकर्त्ताओं के रूप में विकसित होने की अनुमति दी है, जिससे आयात पर निर्भरता काफी हद तक कम हो गई है और साथ ही वैश्विक निर्यात बाज़ार खुल गए हैं।
    • वित्तीय वर्ष 2025 में रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचकर 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जबकि निर्यात सर्वकालिक उच्च स्तर 23,622 करोड़ रुपये तक पहुँच गया।
  • जैव-विनिर्माण क्रांति (BioE3 नीति): BioE3 नीति (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोज़गार के लिये जैव प्रौद्योगिकी) के लागू होने से भारत पेट्रोकेमिकल आधारित विनिर्माण को जैव-आधारित विकल्पों से प्रतिस्थापित करकेहरित औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व करने की स्थिति में आ गया है। यह नीति उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण को एआई के साथ एकीकृत करके सतत रसायन, स्मार्ट प्रोटीन और सामग्री के उत्पादन हेतु एक नया औद्योगिक क्षेत्र सृजित करती है।
    • यह नीति जैव रसायन और कार्यात्मक खाद्य पदार्थों सहित 6 विषयगत क्षेत्रों पर केंद्रित है। सरकार प्रयोगशाला में किये गए नवाचारों को वाणिज्यिक उत्पादन तक पहुँचाने के लिये Bio-AI हब एवं बायो-फाउंड्री स्थापित कर रही है।
  • क्षेत्रीय और राज्य-नेतृत्व वाली औद्योगिक विकास पहल: राज्य औद्योगिक विकास के विकेंद्रीकरण और विस्तार के लिये रणनीतिक विनिर्माण क्षेत्रों तथा निर्यात समूहों को बढ़ावा दे रहे हैं, जो लघु एवं मध्यम उद्यमों और बड़े निर्माताओं दोनों का समर्थन करते हैं।
    • गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र को एक बहु-क्षेत्रीय विनिर्माण और निर्यात क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसमें सिरेमिक, ऑटोमोटिव पार्ट्स तथा रक्षा विनिर्माण के क्लस्टर एकीकृत किये जा रहे हैं।
    • इसके अतिरिक्त, वाइब्रेंट गुजरात और ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट जैसे राज्य स्तरीय व्यापार तथा निवेश शिखर सम्मेलनों ने बड़े समझौता ज्ञापनों को सुगम बनाया है, जिससे कारखानों की स्थापना एवं क्षमता विस्तार में तीव्रता आई है।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • GDP और वैश्विक विनिर्माण में कम हिस्सेदारी: निरंतर सुधारों और विकास के बावजूद, भारत का विनिर्माण क्षेत्र GDP के 16-17% तक ही सीमित है। 
    • चीन या वियतनाम के विपरीत, भारत ने लुईस टर्निंग पॉइंट तक नहीं पहुँचा है, क्योंकि अतिरिक्त श्रम अभी भी कृषि या अनौपचारिक सेवाओं में फँसा हुआ है और उत्पादक विनिर्माण में इसका समावेश नहीं हो पाया है।
      • इसके अलावा, वैश्विक विनिर्माण बाज़ार में भारत की हिस्सेदारी केवल 2.8% है, जबकि चीन की हिस्सेदारी 28.8 % है, जो कि काफी प्रभावशाली है।
    • कृषि क्षेत्र अभी भी लगभग 42-45% कार्यबल को रोज़गार देता है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसका योगदान केवल 15% है, जो बड़े पैमाने पर प्रच्छन्न बेरोज़गारी को दर्शाता है। वहीं, विनिर्माण क्षेत्र केवल 11-12% श्रमिकों को रोज़गार देता है, जो विकास के समान स्तर पर पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के तुलनात्मक स्तरों से काफी कम है।
  • महत्त्वपूर्ण इनपुट के लिये आयात पर अत्यधिक निर्भरता: भारत का विनिर्माण आयातित मध्यवर्ती तथा पूंजीगत वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भर है, विशेषकर उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर में। घरेलू उद्योग ने अभी तक अपस्ट्रीम इनपुट्स विकसित नहीं किये हैं, जो मूल्य संवर्द्धन एवं संवेदनशीलता को कम कर सकें।
    • वित्तीय वर्ष 2023-24 में, भारत का इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का कुल आयात लगभग 34.4 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें से 12 बिलियन डॉलर से अधिक सीधे चीन से और 6 बिलियन डॉलर हांगकांग से आया, जो मिलकर स्मार्टफोन तथा टीवी जैसे 'मेड-इन-इंडिया' उत्पादों में उपयोग किये जाने वाले इन महत्त्वपूर्ण भागों के आधे से अधिक की आपूर्ति करते हैं
      • इसके अलावा, सेमीकंडक्टर का आयात बहुत अधिक बना हुआ है, वर्ष 2021-22 में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के चिप आयात की गईं, जो बाहरी निर्माण प्रणालियों पर भारत की लगभग पूर्ण निर्भरता को उजागर करता है। 
  • MSME का 'मिसिंग मिडिल': भारत का विनिर्माण क्षेत्र MSME संरचना में लगातार क्षमता की कमी के कारण प्रभावित है, जहाँ 95% से अधिक विनिर्माण उद्यम सूक्ष्म या छोटे इकाईयाँ हैं, जिनमें से अनेक अनौपचारिक रूप से कार्यरत हैं और कुशल क्षमता से नीचे कार्यरत हैं।
    • इसके विपरीत, पूर्व एशियाई विनिर्माण क्लस्टर, विशेषकर चीन में, सघन नेटवर्क, विशेषीकृत आपूर्तिकर्त्ता, साझा अवसंरचना और धैर्यशील क्रेडिट के साथ संचालित होते हैं, जिससे छोटे फर्म भी सहविकास अर्थव्यवस्था (agglomeration economies) का लाभ उठा सकते हैं।
  • लॉजिस्टिक्स और अवसंरचना की बाधाएँ: भारत की विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धात्मकता लॉजिस्टिक्स और अवसंरचना की अक्षमताओं के कारण लंबे समय से कमज़ोर रही है तथा हाल की सुधार पहलों ने केवल आंशिक रूप से अंतर को कम किया है।
    • हालाँकि भारत की लॉजिस्टिक्स लागत GDP के 13–14% से घटकर लगभग 7.97% हो गई है, मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी अभी भी सर्वोत्तम प्रथाओं वाले देशों जैसे दक्षिण कोरिया की तुलना में कमज़ोर है।
    • इसका परिणाम लंबे पोर्ट विलंब, उच्च इन्वेंटरी लागत और समय-संवेदनशील निर्यातों में कम विश्वसनीयता के रूप में सामने आता है, जो भारत की जस्ट-इन-टाइम वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में प्रतिस्पर्द्धात्मकता को कम करता है।
  • कौशल की असंगतता और श्रम उत्पादकता: भारत के विनिर्माण क्षेत्र की विडंबना प्रचुर मात्रा में श्रम की उपलब्धता लेकिन असमान कौशल और कम फैक्ट्री उत्पादकता में निहित है, जो कार्यबल की उपलब्धता एवं औद्योगिक आवश्यकताओं के बीच अंतर को दर्शाती है। 
    • हालाँकि भारत में प्रतिवर्ष लाखों श्रमिक कार्यबल में प्रवेश करते हैं, लेकिन कार्यबल के 5% से भी कम लोगों को औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त है, जबकि दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों में यह आँकड़ा 50% से अधिक है। 
    • परिणामस्वरूप, इलेक्ट्रॉनिक्स, सटीक इंजीनियरिंग और सेमीकंडक्टर पैकेजिंग जैसे उन्नत विनिर्माण क्षेत्र प्रायः विदेशी तकनीशियनों, प्रवासी पर्यवेक्षकों या महंगे आंतरिक प्रशिक्षण पर निर्भर करते हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है तथा विस्तार की गति धीमी हो जाती है। 
  • नियामक अनिश्चितता और नीतिगत दबाव: भारत का विनिर्माण निवेश वातावरण नियामक अनिश्चितता और नीतिगत दबाव से ग्रस्त बना हुआ है, जहाँ बार-बार नियम परिवर्तन, स्तरित अनुमोदन और विवेकाधीन स्वीकृति दीर्घकालिक पूंजी लगाने की लागत को बढ़ा देती है। 
    • यह प्रेस नोट 3 (2020) से स्पष्ट है, जो भूमि-सीमा वाले देशों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिये सरकार की पूर्व स्वीकृति को अनिवार्य बनाता है। 
    • राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य से बनाई गई इन योजनाओं की अपारदर्शी स्वीकृतियों में 6-12 महीने का समय लगता है, जिससे ऑटो कंपोनेंट्स, नवीकरणीय ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अंतर्निहित इलेक्ट्रॉनिक्स सहायक उपकरणों जैसे कम जोखिम वाले क्षेत्रों में भी निवेश में विलंब हुआ है।
  • कार्बन सीमा जोखिम (ग्रीन वॉल): कोयले से चलने वाली बिजली पर इस क्षेत्र की भारी निर्भरता भारतीय निर्यात को यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) जैसे 'ग्रीन प्रोटेक्शनिज़्म' के प्रति संवेदनशील बनाती है। 
    • जैसे-जैसे पश्चिमी बाज़ार ‘अंतर्निहित कार्बन’ पर कर लगा रहे हैं, इस्पात, एल्यूमीनियम और सीमेंट में भारत का लागत लाभ हरित ऊर्जा से चलने वाले प्रतिस्पर्द्धियों के मुकाबले तेज़ी से कम हो रहा है। 
    • उदाहरण के लिये, हालाँकि यूरोपीय संघ को भारत के CBAM-प्रभावित निर्यात उसके सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.2% हैं, लेकिन लौह एवं इस्पात क्षेत्र इन निर्यातों का 90% हिस्सा है, जो बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
  • प्रौद्योगिकी और अनुसंधान एवं विकास में अंतर: भारत के विनिर्माण क्षेत्र की प्रगति लगातार बने रहने वाले प्रौद्योगिकी और अनुसंधान एवं विकास के अंतर से बाधित है। भारत का अनुसंधान एवं विकास व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 1% (लगभग 0.7%) से कम है, जबकि दक्षिण कोरिया और जापान जैसी उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में यह 2-3% से अधिक है। 
    • इसके अलावा, भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में ग्लोबल पेटेंट का हिस्सा कम है, मालिकाना डिज़ाइन सीमित हैं तथा मानकों के मामले में नेतृत्व कमज़ोर है, जिससे कंपनियों को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के निचले स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये विवश होना पड़ता है।

विनिर्माण क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है? 

  • घरेलू मूल्य शृंखलाओं और तकनीकी क्षमताओं को मज़बूत करना: भारत को घटक, सामग्री, उपकरण और पूंजीगत वस्तुओं जैसे अपस्ट्रीम सेगमेंट में गहन निर्माण करके असेंबली-आधारित विनिर्माण की संरचनात्मक कमज़ोरी को दूर करने की आवश्यकता है।
    • सेमीकंडक्टर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, प्रीसाइज़ मशीनरी और औद्योगिक इनपुट के लिये घरेलू पारितंत्र के अभाव में, विनिर्माण आयात संबंधी झटकों के प्रति संवेदनशील बना रहता है तथा केवल मामूली लाभ ही अर्जित कर पाता है। 
    • इसलिये, PLI जैसी प्रोत्साहन व्यवस्थाएँ सकल उत्पादन के बजाय स्थानीय मूल्यवर्द्धन, आपूर्तिकर्त्ता स्वदेशीकरण और प्रौद्योगिकी आत्मसात में सत्यापन योग्य वृद्धि पर आधारित होनी चाहिये।
  • ‘मिसिंग मिडिल’ पर नियंत्रण: विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धा के लिये कम लेकिन मज़बूत फर्मों की आवश्यकता होती है, जिन्हें धैर्यपूर्ण वित्तपोषण, क्लस्टर-आधारित साझा सुविधाओं एवं बड़े एंकर फर्मों के साथ संरचित संबंधों के माध्यम से समर्थन प्राप्त हो। 
    • लघु एवं मध्यम आकार के उद्यमों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी मध्यम आकार के निर्माताओं के रूप में विकसित होने में सक्षम बनाए बिना, भारत में कई कंपनियाँ तो होंगी, लेकिन औद्योगिक शक्ति बहुत कम होगी।
  • विनिर्माण क्षेत्र की रोज़गार सृजनकारी भूमिका को पुनः स्थापित करना: विनिर्माण नीति को रोज़गार-हीन विकास की समस्या का स्पष्ट रूप से सामना करना चाहिये, जहाँ उत्पादन तो बढ़ता है लेकिन अतिरिक्त श्रम को अवशोषित नहीं करता है। 
    • इसके लिये अत्यधिक पूंजी-गहन असेंबली की तुलना में  घटक निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण, लाइट इंजीनियरिंग और औद्योगिक सेवाओं जैसे श्रम-गहन और मध्यम-कौशल वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
      • रोज़गार के परिणाम औद्योगिक नीति की सफलता का एक मुख्य मापदंड बनना चाहिये, न कि एक उप-उत्पाद। 
  • लॉजिस्टिक्स सुधार को लागत में कमी से विश्वसनीयता की ओर मोड़ना: हालाँकि मुख्य लॉजिस्टिक्स लागत में गिरावट आई है, भारतीय विनिर्माण क्षेत्र अभी भी अविश्वसनीय डिलीवरी समय-सीमा, बंदरगाहों पर भीड़भाड़ तथा खंडित मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी से जूझ रहा है। 
    • वैश्विक निर्माताओं के लिये, पूर्वानुमानशीलता प्रायः औसत लागत से अधिक महत्त्व रखती है। रेल-सड़क-बंदरगाह एकीकरण को सुदृढ़ करना, टर्नअराउंड समय को कम करना और लॉजिस्टिक्स शृंखलाओं में डिजिटल समन्वय सुनिश्चित करना भारतीय कंपनियों को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में समय पर एकीकृत करने के लिये आवश्यक है।
  • कौशल और कारखाने की उत्पादकता के अंतर को न्यूनतम करना: भारत में श्रम की प्रचुरता तब तक विनिर्माण शक्ति में तब्दील नहीं हो सकती, जब तक कि यह लगातार कारखाने के कौशल, प्रक्रिया अनुशासन और गुणवत्ता नियंत्रण क्षमताओं से संतुलन स्थापित नहीं कर लेती। 
    • ध्यान अल्पकालिक कौशल विकास लक्ष्यों से हटकर कार्यस्थल-आधारित शिक्षा, शिक्षुता एकीकरण और निरंतर कौशल उन्नयन पर केंद्रित होना चाहिये, विशेष रूप से उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों में।
  • औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास और नवाचार की तीव्रता बढ़ाना: व्यावहारिक अनुसंधान एवं विकास, उत्पाद विकास तथा प्रक्रिया नवाचार में निरंतर निवेश के बिना विनिर्माण मूल्य शृंखला में अग्रसर नहीं हो सकता।
    • सार्वजनिक नीति को उद्योग-अकादमिक सहयोग, साझा परीक्षण सुविधाओं और प्रारंभिक चरण के औद्योगिक नवाचार के लिये जोखिम-साझाकरण का समर्थन करके निजी अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना चाहिये।
  • नियामकीय पूर्वानुमान और नीतिगत विश्वसनीयता सुनिश्चित करना: विनिर्माण क्षेत्र में निवेश प्रोत्साहन के साथ-साथ नीतिगत निश्चितता पर भी उतना ही निर्भर करता है। बार-बार होने वाले नियामकीय परिवर्तन, अनुमोदन में विलंब और अपारदर्शी निर्णय-निर्माण प्रक्रिया दीर्घकालिक पूंजी की लागत को बढ़ाती है तथा कंपनियों को निवेश स्थगित करने या उसे दूसरी दिशा में मोड़ने के लिये प्रोत्साहित करती है। 
    • राष्ट्रीय सुरक्षा आधारित विनियमों को स्पष्ट समय-सीमा, पारदर्शी मानदंड और पूर्वानुमानित प्रक्रियाओं से युक्त होना चाहिये, ताकि जोखिम प्रबंधन मात्र जोखिम से बचने की प्रवृत्ति में परिवर्तित न हो पाए।

निष्कर्ष: 

भारत के विनिर्माण क्षेत्र की मुख्य चुनौती व्यापक स्तर पर उत्पादन और नीतिगत प्रोत्साहनों को गहन क्षमताओं, उत्पादक रोज़गार तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता में परिवर्तित करने में निहित है। एक प्रभावी और विश्वसनीय रणनीति का उद्देश्य विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को रोज़गार के संदर्भ में लगभग 18–20% तक बढ़ाना, स्थानीय मूल्यवर्द्धन को सुदृढ़ कर आयात निर्भरता को कम करना तथा औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास में निवेश को सकल घरेलू उत्पाद के 1.5–2% स्तर तक ले जाना होना चाहिये। केवल उत्पादन-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर नवाचार एवं उत्पादकता-संचालित विनिर्माण की ओर संक्रमण ही संरचनात्मक परिवर्तन, समावेशी रोज़गार सृजन और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित कर सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

अनेक नीतिगत पहलों के बावजूद, भारत में विनिर्माण क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 16–17% तक ही सीमित क्यों बना हुआ है? रोज़गार सृजन और संरचनात्मक परिवर्तन में इसकी भूमिका को सीमित करने वाली संरचनात्मक बाधाओं का विश्लेषण कीजिये।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. विनिर्माण क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 16–17% तक ही सीमित क्यों बना हुआ है?
क्योंकि विकास कमज़ोर घरेलू मूल्य शृंखलाओं, अनुसंधान एवं विकास का निम्न स्तर और सीमित लघु एवं मध्यम उद्यमों के कारण संयोजन-आधारित रहा है।

प्रश्न 2. विनिर्माण क्षेत्र ने पर्याप्त रोज़गार क्यों नहीं सृजित किये हैं?
क्योंकि विस्तार पूंजी आधारित रहा है और यह कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित है, जिसके परिणामस्वरूप रोज़गार सृजन कम रहा है।

प्रश्न 3. विनिर्माण क्षेत्र में MSME की प्रमुख समस्या क्या है?
अधिकांश MSME उप-स्तरीय बने हुए हैं और ऋण-संकुचित हैं, जिससे उत्पादकता में वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में बाधा उत्पन्न होती है।

प्रश्न 4. आयात पर निर्भरता एक रणनीतिक चिंता का विषय क्यों है?
आयातित घटकों पर अत्यधिक निर्भरता मूल्यवर्द्धन को सीमित करती है और विनिर्माण को आपूर्ति-शृंखला और भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है।

प्रश्न 5. सबसे महत्त्वपूर्ण सुधार कौन-सा है जिसकी आवश्यकता है?
प्रोत्साहन-आधारित उत्पादन वृद्धि से हटकर रोज़गार, प्रौद्योगिकी और क्षमता-प्रेरित विनिर्माण की ओर संक्रमण।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. ‘आठ कोर उद्योग सूचकांक' में निम्नलिखित में से किसको सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है? (2015)

(a) कोयला उत्पादन
(b) विद्युत उत्पादन
(c) उर्वरक उत्पादन
(d) इस्पात उत्पादन

उत्तर: b 


मेन्स:

प्रश्न 1. “सुधारोत्तर अवधि में सकल-घरेलू-उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है।” कारण बताइये। औद्योगिक-नीति में हाल में किये गए परिवर्तन औद्योगिक संवृद्धि दर को बढ़ाने में कहाँ तक सक्षम हैं ? (2017)

प्रश्न 2. “सामान्यतः देश कृषि से उद्योग और बाद में सेवाओं को अंतरित होते हैं पर भारत सीधे ही कृषि से सेवाओं को अंतरित हो गया है।” देश में उद्योग के मुकाबले सेवाओं की विशाल संवृद्धि के क्या कारण हैं? क्या भारत सशक्त औद्योगिक आधार के बिना एक विकसित देश बन सकता है? (2014)

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