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वन हेल्थ दृष्टिकोण: मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य का समन्वय

  • 09 Apr 2026
  • 178 min read

यह  एडिटोरियल 07/04/2026 को द हिंदू में प्रकाशित ‘Reinforcing the case for a वन हेल्थ approach’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत की जैव सुरक्षा के लिये एक रणनीतिक आवश्यकता के रूप में वन हेल्थ दृष्टिकोण का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें वर्तमान संस्थागत प्रगति, ज़ूनोटिक रोग के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और पर्यावरणीय अखंडता तथा  सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन के मध्य विद्यमान अंतराल को पाटने हेतु व्यावहारिक उपायों का सम्यक परीक्षण किया गया है।

प्रिलिम्स के लिये: राष्टीय वन हेल्थ मिशनक्यासानूर वन रोग, एक स्वास्थ्य सेवा।

मेन्स के लिये: वन हेल्थ दृष्टिकोण क्या है, वन हेल्थ दृष्टिकोण की आवश्यकता क्यों है, भारत ने वन हेल्थ दृष्टिकोण की दिशा में क्या कदम उठाए हैं, आवश्यक उपाय क्या हैं?

कोविड -19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि लगभग 60% उभरती संक्रामक बीमारियाँ पशुओं से मनुष्यों में संचरित होती हैं, जिससे मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के मध्य गहन अंतर्संबंध उजागर होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, वन हेल्थ दृष्टिकोण को वैश्विक स्तर पर व्यापक मान्यता प्राप्त हुई है, जो वर्ष 2025 के WHO महामारी समझौते तथा भारत के राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन में परिलक्षित होती है। जलवायु परिवर्तन, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) तथा पर्यावासीय व्यवधान के कारण रोग-जोखिम में निरंतर वृद्धि हो रही है, जिसके परिप्रेक्ष्य में क्षेत्र-विशिष्ट पृथक प्रतिक्रियाएँ अपर्याप्त सिद्ध हो रही हैं। अतः ‘वन हेल्थ’ एक डेटा-आधारित, सहयोगात्मक ढाँचे के रूप में उभरता है, जो भविष्य की महामारी तैयारी तथा सतत जनस्वास्थ्य शासन के लिये अनिवार्य है।

वन हेल्थ दृष्टिकोण क्या है? 

  • परिचय: वन हेल्थ दृष्टिकोण एक एकीकृत एवं समन्वित ढाँचा है, जिसका उद्देश्य मानव, पशु तथा पारिस्थितिकी तंत्रों के स्वास्थ्य को सतत रूप से संतुलित एवं अनुकूलित करना है।
  • वन हेल्थ के तीन स्तंभ:  यह दृष्टिकोण इस मूल अवधारणा पर आधारित है कि किसी एक क्षेत्र की सुरक्षा अन्य क्षेत्रों से पृथक होकर संभव नहीं है-
    • मानव स्वास्थ्य: जनसंख्या के शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगों के प्रसार को प्रभावी रूप से नियंत्रित करना।
    • पशु स्वास्थ्य: वन्यजीवों, पशुधन और पालतू जानवरों को बीमारियों से बचाना और सतत कृषि पद्धतियों को सुनिश्चित करना।
    • पर्यावरण स्वास्थ्य: स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र, स्वच्छ जल और स्थिर जलवायु को बनाए रखना, जो मानव और पशु दोनों के अस्तित्व के लिये मूलभूत हैं।

भारत को वन हेल्थ दृष्टिकोण अपनाना क्यों आवश्यक है?

  • पशु-जनित संक्रमण (Zoonotic Spillover) के जोखिम में कमी: भारत में मानव एवं वन्यजीवों के बीच उच्च संपर्क इसे रोगजनक संक्रमण का एक प्रमुख हॉटस्पॉट बनाता है, जहाँ पर्यावास अतिक्रमण के कारण वायरस का पशुओं से मनुष्यों में संचरण तीव्र होता है। 
    • यद्यपि उभरती संक्रामक बीमारियों में से लगभग 60–75% जूनोटिक होती हैं, फिर भी भारत में इनकी निगरानी प्रणाली अभी भी खंडित एवं क्षेत्र-विशिष्ट है, जिसके परिणामस्वरूप वन्यजीवों में प्रारंभिक चेतावनी संकेत प्रायः अनदेखे रह जाते हैं। 
    • अंतर्राष्ट्रीय पशुधन अनुसंधान संस्थान (ILRI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष 13 प्रकार के मानव रोगों के कारण लगभग 2.4 अरब रोग-प्रकरण तथा 22 लाख से अधिक मृत्यु दर्ज की जाती हैं। 
    • केरल में हालिया निपाह वायरस तथा क्यासानूर वन रोग (KFD) के प्रकोप इस जोखिम की गंभीरता को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं।
  • एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) की ‘मूक महामारी’ से सामना: भारत में AMR का प्रसार मानव चिकित्सा, पोल्ट्री तथा मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक के परस्पर उपयोग के कारण तीव्र हो रहा है, जिससे पर्यावरण में ‘सुपरबग’ का उद्भव हो रहा है। 
    • वन हेल्थ दृष्टिकोण के अभाव में औषधि अपशिष्ट एवं पशु आहार से एंटीबायोटिक रिसाव को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप जीवन-रक्षक औषधियाँ अप्रभावी होती जा रही हैं। 
    • भारत का NAP-AMR 2.0 (2025–2029) कार्यक्रम इंगित करता है कि बहु-दवा प्रतिरोधी रोगजनक अस्पताल में होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय वृद्धि के लिये उत्तरदायी हैं; साथ ही, विभिन्न अध्ययनों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि प्रमुख भारतीय नदी तंत्रों से प्राप्त अपशिष्ट जल नमूनों में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जीवाणु व्यापक रूप से विद्यमान हैं।
  • विश्व की विशाल पशुधन अर्थव्यवस्था की सुरक्षा: पशुधन क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का एक महत्त्वपूर्ण उपक्षेत्र है, जिसकी वर्ष 2014-15 से 2023-24 के बीच चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) लगभग 12.77% रही है। तथापि, यह क्षेत्र अभी भी सीमा-पार संक्रामक रोगों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, जो ग्रामीण आय को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। 
    • वन हेल्थ दृष्टिकोण के अंतर्गत पशु-चिकित्सा निगरानी को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ एकीकृत किया जाता है, जिससे फुट एंड माउथ डिज़ीज़ (FMD) तथा लंपी स्किन डिज़ीज़ (LSD) जैसी बीमारियों के कारण कृषि अर्थव्यवस्था के अवरोध को रोका जा सके। 
    • वर्ष 2025 की पशुधन गणना के अनुसार, भारत में 53.5 करोड़ से अधिक पशुधन का प्रबंधन किया जाता है, तथापि पोल्ट्री उद्योग को  एवियन इन्फ्लुएंज़ा के कारण उल्लेखनीय क्षति का सामना करना पड़ा है। 
  • जलवायु परिवर्तन एवं रोग प्रसार के स्वरूप में परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के प्रभावस्वरूप मच्छरों एवं टिक्स जैसे रोग-वाहकों के भौगोलिक वितरण में परिवर्तन हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप वन-जनित रोग अब शहरी क्षेत्रों तक विस्तार कर रहे हैं तथा इसके विपरीत प्रवृत्ति भी परिलक्षित हो रही है।
    • बढ़ते तापमान एवं असामान्य बाढ़ की घटनाएँ रोगजनकों की परिपक्वता को तीव्र करती हैं, जिसके कारण नवीन प्रकोप क्षेत्रों की पूर्वानुमान हेतु एक एकीकृत जलवायु-स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली की आवश्यकता स्पष्ट होती है। 
    • ‘भारत के पर्यावरण की स्थिति 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक खराब मौसम वाले दिनों (जैसे—हिमाचल में 267, केरल में 173) की वृद्धि के कारण वेक्टर-जनित रोगों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 
    • परिणामस्वरूप, पूर्व में कम जोखिम वाले उच्च-ऊँचाई क्षेत्रों में भी डेंगू एवं मलेरिया के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है।
  • जैव विविधता संरक्षण- एक स्वास्थ्य सुरक्षा कवच: अक्षुण्ण पारिस्थितिकी तंत्र एक ‘जैविक बफर’ के रूप में कार्य करते हैं, जो रोगजनकों की सघनता को नियंत्रित करते हैं। तथापि, भारत में भूमि उपयोग परिवर्तन की तीव्रता इन प्राकृतिक सुरक्षा कवचों को क्षीण कर रही है। 
    • जैवमंडलीय अखंडता का संरक्षण एक महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति है, क्योंकि वनों का विखंडन चमगादड़ एवं प्राइमेट जैसी प्रजातियों को मानव बस्तियों के निकट लाकर संक्रमण जोखिम को बढ़ाता है। हालिया अध्ययनों से यह पुष्ट हुआ है कि वनोन्मूलन, शहरीकरण तथा कृषि विस्तार जैसे भूमि उपयोग परिवर्तन उभरते संक्रामक रोगों (EID) के प्रमुख कारक हैं।
  • महामारी तैयारी एवं स्वास्थ्य बुद्धिमत्ता: वन हेल्थ फ्रेमवर्क विभिन्न क्षेत्रों में AI तथा जीनोमिक अनुक्रमण का उपयोग करते हुए ‘प्रतिक्रियात्मक क्षतिपूर्ति’ से ‘सक्रिय रोकथाम’ की ओर संक्रमण को सशक्त बनाता है। 
    • ICMR (मानव) एवं IVRI (पशु) के मध्य एकीकृत डेटा लेजर की स्थापना द्वारा भारत शहरी अस्पतालों तक पहुँचने से पूर्व ही ‘Pathogen X’ जैसे संभावित खतरों का वन क्षेत्रों में प्रारंभिक स्तर पर पता लगाने में सक्षम हो सकता है।
    • नेशनल वन हेल्थ मिशन (2026) के अंतर्गत BSL-3/4 प्रयोगशालाओं की स्थापना इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, क्योंकि रोग-प्रकोप की रोकथाम हेतु की गई समयबद्ध कार्रवाइयों से अनुमानतः 86% तक लाभ प्राप्त होता है, जिसमें स्वास्थ्य व्यय में प्रत्यक्ष बचत तथा कृषि उत्पादकता एवं खाद्य सुरक्षा के संरक्षण से प्राप्त अप्रत्यक्ष लाभ सम्मिलित हैं।
  • खाद्य एवं पोषण सुरक्षा: दूषित खाद्य शृंखलाएँ, विशेषकर मांस में कीटनाशक अवशेषों अथवा पशु-जनित रोगजनकों के कारण, भारत के राष्ट्रीय पोषण मिशन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।
    • खाद्य-जनित रोगों के परिणामस्वरूप भारत को उत्पादकता हानि के रूप में प्रतिवर्ष लगभग 15 अरब डॉलर का नुकसान होता है, जो एक गंभीर आर्थिक बोझ को दर्शाता है। 
    • इसके फलस्वरूप स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि, कार्यबल की दक्षता में कमी तथा मानव पूंजी पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
    • वन हेल्थ दृष्टिकोण मृदा स्वास्थ्य, सिंचाई जल की गुणवत्ता तथा पशु-चिकित्सा औषधियों के अवशेषों की सतत निगरानी के माध्यम से ‘खेत से थाली तक’ सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जो एक स्वस्थ एवं उत्पादक कार्यबल के लिये अनिवार्य है।
  • रणनीतिक वैश्विक नेतृत्व (विकसित भारत@2047): ग्लोबल साउथ में नेतृत्व स्थापित करने हेतु भारत को एक अनुकूलनीय वन हेल्थ मॉडल का विकास एवं नेतृत्व करना होगा, जो विकासात्मक उद्देश्यों और पारिस्थितिकीय सुरक्षा के मध्य संतुलन स्थापित कर सके।
    • नेशनल वन हेल्थ मिशन के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से भारत ने उष्णकटिबंधीय एवं उच्च-जनसंख्या घनत्व वाले देशों के लिये सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की प्राप्ति के साथ-साथ आर्थिक संरक्षण (GDP सुरक्षा) का एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
    • केंद्रीय बजट 2026-27 में स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के लिये आवंटन में लगभग 24% की वृद्धि (₹4,821 करोड़ से अधिक) इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रेरक कारक सिद्ध हो सकती है, जो एकीकृत अनुसंधान एवं निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करते हुए भारत को वन हेल्थ-आधारित शासन में एक वैश्विक आदर्श के रूप में स्थापित करेगी।

भारत ने ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण की दिशा में कौन-कौन से प्रमुख कदम उठाए हैं?

  • नेशनल वन हेल्थ मिशन (NOHM) के माध्यम से संस्थागत शासन: ऐतिहासिक प्रशासनिक बाधाओं को समाप्त करते हुए भारत ने मानव-पशु-पर्यावरण अंतर्संबंधों के प्रभावी प्रबंधन हेतु अपने जैव-सुरक्षा शासन तंत्र को अधिक समन्वित एवं केंद्रीकृत रूप प्रदान किया है।
    • इस मिशन की शुरुआत 21वें प्रधानमंत्री की विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार सलाहकार परिषद (PM-STIAC) की सिफारिशों के आधार पर की गई, जिसे फरवरी 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति प्राप्त हुई। 
    • इसका संचालन प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय (OPSA) द्वारा किया जा रहा है, जिसमें आयुष मंत्रालय सहित 16 से अधिक केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई है।
    • स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ मिलकर इसकी प्रमुख कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
  • बहु-प्रजातीय रोगजनकों के प्रसार से संबंधित अनुसंधान अंतराल को दूर करने के उद्देश्य से, भारत ने एकीकृत जीनोमिक एवं महामारी विज्ञान अनुसंधान हेतु एक समर्पित केंद्रीकृत संस्थान की स्थापना की है।
    • यह प्रमुख राष्ट्रीय संस्था राष्ट्रव्यापी जैव-निगरानी का समन्वय करते हुए ऐसे मानकीकृत प्रोटोकॉल विकसित करती है, जिनके माध्यम से पशु-जनित खतरों का पूर्वानुमान एवं नियंत्रण मानव महामारी में परिवर्तित होने से पूर्व ही संभव हो सके।
  • पशु महामारी तैयारी पहल (APPI) के अंतर्गत पशुधन सुरक्षा: यह स्वीकार करते हुए कि कृषि-पशुधन का स्वास्थ्य मानव जैव-सुरक्षा एवं आर्थिक स्थिरता से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, भारत ने अपने पशु-चिकित्सा रक्षा ढाँचे का रणनीतिक परिवर्तन किया है। 
    • यह पहल सामान्य टीकाकरण कार्यक्रमों से आगे बढ़कर सक्रिय आनुवंशिक निगरानी तथा सामुदायिक क्षमता निर्माण पर आधारित एक समेकित ‘खेत से थाली तक’ सुरक्षा तंत्र का निर्माण करती है।
    • वन हेल्थ परियोजना हेतु पशु स्वास्थ्य प्रणाली सुदृढ़ीकरण के अंतर्गत ₹1,228.70 करोड़ के वित्तीय प्रावधान तथा विश्व बैंक के समर्थन से APPI को 151 संवेदनशील ज़िलों में सक्रिय रूप से क्रियान्वित किया जा रहा है।
  • NAP-AMR 2.0 (2025–2029) के माध्यम से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) का नियंत्रण: दवा-प्रतिरोधी रोगजनकों की उभरती ‘मूक महामारी’ से निपटने के लिये भारत औषधि, कृषि एवं नैदानिक क्षेत्रों में एंटीबायोटिक उपयोग के विनियमन हेतु सुदृढ़ नीतिगत कदम उठा रहा है। 
    • एक बहु-क्षेत्रीय नियामक ढाँचा अपनाकर, देश का लक्ष्य उन ‘सुपरबग्स’ के पर्यावरणीय प्रसार को नियंत्रित करना है, जो जीवन-रक्षक उपचारों को निष्प्रभावी बना देते हैं।
  • विकेंद्रीकृत उच्च-जोखिम रोगजनक निगरानी नेटवर्क: निदान क्षमताओं में विद्यमान संसाधन असमानताओं को दूर करने हेतु भारत अपने उन्नत रोगजनक पहचान एवं नियंत्रण अवसंरचना का तीव्र गति से विकेंद्रीकरण कर रहा है। 
    • यह रणनीति एक भौगोलिक रूप से लचीला सुरक्षा तंत्र विकसित करती है, जो स्थानीय स्तर पर मेटाजेनोमिक अनुक्रमण एवं त्वरित सिंड्रोमिक निगरानी को सुदृढ़ बनाती है, जिससे उभरते प्रकोपों की शीघ्र पहचान एवं नियंत्रण संभव हो सके।
  • एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP): वर्ष 2004 से संचालित IDSP वर्तमान में सभी 36 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 33 से अधिक संक्रामक रोगों की निगरानी एवं त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करता है। 
    • यह कार्यक्रम ज़िला सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं (DPHL) तथा राज्य रेफरल प्रयोगशालाओं (SRL) के माध्यम से रोग निगरानी एवं मीडिया स्कैनिंग को सुदृढ़ करते हुए प्रकोप की शीघ्र पहचान और प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र को सक्षम बनाता है।
  • पारिस्थितिकी एवं जलवायु-स्वास्थ्य अभिसरण का एकीकरण: जलवायु परिवर्तन तथा जैव विविधता के तीव्र क्षरण को रोग संचरण के प्रमुख प्रेरक कारक के रूप में स्वीकार करते हुए, भारत पारिस्थितिकी संरक्षण को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के साथ संरचनात्मक एवं रणनीतिक रूप से एकीकृत कर रहा है।
    • यह समग्र दृष्टिकोण अक्षुण्ण पारिस्थितिकी तंत्रों को एक आवश्यक जैविक सुरक्षा कवच के रूप में मान्यता देता है, जो ‘एज इफेक्ट’ जैसी खतरनाक परिस्थितियों को कम करता है, जहाँ वनोन्मूलन के कारण तनावग्रस्त वन्यजीव मानव बस्तियों के निकट आ जाते हैं।
    • हालिया पहलें डेंगू जैसी बीमारियों के जलवायु-प्रेरित भौगोलिक विस्तार का सक्रिय मानचित्रण कर रही हैं, जो अब उच्च-ऊँचाई क्षेत्रों तक फैल रही हैं तथा पर्यावरणीय अखंडता को स्वास्थ्य सुरक्षा के एक मात्रात्मक संकेतक के रूप में उपयोग में ला रही हैं।
  • ज़मीनी स्तर पर क्षमता विकास कार्यक्रम (FEP-OH): यह मानते हुए कि प्रकोपों की शीघ्र पहचान पूर्णतः स्थानीय परिचालन क्षमता पर निर्भर करती है, भारत अपने मानव संसाधन प्रशिक्षण ढाँचे को वन हेल्थ त्रयी (मानव-पशु-पर्यावरण) के अनुरूप व्यवस्थित रूप से पुनर्गठित कर रहा है। 
    • यह शैक्षिक पुनर्संरचना सुनिश्चित करती है कि फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मी, वन्यजीव संरक्षक तथा चिकित्सा अधिकारी जटिल अंतर-प्रजातीय प्रकोप जॉंच के दौरान एक समन्वित सामरिक ढाँचे का प्रभावी उपयोग कर सकें।
    • इसके अतिरिक्त, PM-ABHIM योजना तथा ‘नेशनल वन हेल्थ मिशन हेतु एकीकृत रोग नियंत्रण एवं महामारी तैयारी के लिये अनुसंधान एवं विकास सुदृढ़ीकरण कार्यक्रम’ के अंतर्गत हितधारक प्रशिक्षण, कार्यशालाएँ, सामुदायिक सहभागिता, जोखिम संचार एवं क्षमता निर्माण के लिये व्यापक प्रावधान सुनिश्चित किये गए हैं। 

भारत में ‘वन हेल्थ दृष्टिकोण’ के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?

  • विकेंद्रीकृत ग्राम-स्तरीय जैव-शासन: ग्राम पंचायतों एवं स्थानीय जल-स्वच्छता समितियों जैसी ज़मीनी संस्थाओं को सशक्त बनाना एक स्थानीय एवं वास्तविक-समय महामारी सुरक्षा तंत्र स्थापित करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 
    • सामुदायिक पशु-चिकित्सकों तथा ग्राम स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं को रोगसूचक निगरानी में प्रशिक्षित कर वन्यजीव मृत्यु अथवा जल निकायों के प्रदूषण जैसे प्रारंभिक संकेतों का समय रहते नियंत्रण संभव हो पाता है। 
    • यह विकेंद्रीकृत प्रशासनिक ढाँचा निष्क्रिय ग्रामीण समुदायों को वैश्विक जैव-सुरक्षा के सक्रिय प्रहरी में परिवर्तित करता है तथा एक लचीली, ज़मीनी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करता है, जो पारंपरिक नौकरशाही विलंब को प्रभावी रूप से कम करता है।
  • डीप-टेक एवं AI-संचालित पूर्वानुमानित मेटाजेनोमिक्स: उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं मशीन लर्निंग (ML) आधारित प्रणालियों के माध्यम से उपग्रह-आधारित जलवायु विसंगतियों, मानव नैदानिक लक्षणों तथा पशुधन रुग्णता से संबंधित विविध डेटासेट्स का समेकित विश्लेषण करना आवश्यक है।
    • यह तकनीकी एकीकरण महामारी विज्ञान की पश्च-दृष्टि आधारित ट्रेसिंग से आगे बढ़कर उच्च-पूर्वानुमानित एवं स्वायत्त जैव-निगरानी एल्गोरिदम की दिशा में परिवर्तन को सक्षम बनाता है, जो संभावित प्रकोप हॉटस्पॉट्स का पूर्वानुमान कर सकते हैं।
    • वास्तविक-समय मेटाजेनोमिक अनुक्रमण को पर्यावरणीय निगरानी सेंसरों के साथ संयोजित कर नीति-निर्माताओं को नवीन रोगजनक संकेतों की त्वरित पहचान करने में सक्षम बनाया जा सकता है। 
    • इससे एक सक्रिय डिजिटल सुरक्षा कवच निर्मित होता है, जो शहरी प्रसार से पूर्व ही स्वचालित रोकथाम प्रोटोकॉल को सक्रिय कर देता है।
  • विधायी एकीकरण एवं वैधानिक जनादेश: तदर्थ प्रशासनिक तंत्रों से आगे बढ़ते हुए, वन हेल्थ फ्रेमवर्क को एक मज़बूत एवं विधिक रूप से संस्थापित सार्वजनिक नीति कानून के अंतर्गत संरचनात्मक रूप से समाहित करना आवश्यक है।
    • कठोर वैधानिक प्रावधानों के माध्यम से स्वास्थ्य, कृषि एवं पर्यावरण जैसे परंपरागत रूप से पृथक मंत्रालयों को अधिकार-क्षेत्रीय बाधाओं से मुक्त होकर महामारी विज्ञान संबंधी संवेदनशील सूचनाओं का निर्बाध आदान-प्रदान सुनिश्चित करना होगा।
    • यह औपचारिक विधिक ढाँचा यह सुनिश्चित करता है कि अंतर-क्षेत्रीय समन्वय एक अनिवार्य प्रशासनिक दायित्व बने, न कि केवल स्वैच्छिक अंतर-विभागीय अभ्यास
    • परिणामस्वरूप, यह एक एकीकृत नियामक परिवेश का निर्माण करता है, जो उभरते संकटों के दौरान व्यापक जैव-सुरक्षा उपायों को त्वरित एवं प्रभावी रूप से लागू करने में सक्षम होता है।
  • प्राकृतिक खेती की ओर कृषि-पारिस्थितिक संक्रमण: रासायनिक-गहन कृषि से सतत प्राकृतिक खेती पद्धतियों की ओर व्यापक संक्रमण को एक मूलभूत निवारक स्वास्थ्य रणनीति के रूप में प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। 
    • यह पारिस्थितिकी परिवर्तन क्षीण हो चुके मृदा सूक्ष्मजीव तंत्र को पुनर्स्थापित करता है तथा पशु-चिकित्सा एंटीबायोटिक अपवाह एवं विषाक्त कीटनाशक अवशेषों के पर्यावरणीय संचय को उल्लेखनीय रूप से कम करता है, जो एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को बढ़ावा देते हैं।
    • कृषि स्थिरता को मानव पोषण सुरक्षा के साथ समेकित करते हुए, यह दृष्टिकोण ‘खेत से थाली तक’ आपूर्ति शृंखला को सुदृढ़ बनाता है तथा उन हानिकारक रासायनिक मार्गों को समाप्त करता है, जो पारिस्थितिकी तंत्र की जीवंतता एवं मानव प्रतिरक्षा दोनों के लिये जोखिम उत्पन्न करते हैं।
  • आर्द्रभूमि एवं उच्च-ऊँचाई पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण: संवेदनशील भौगोलिक बायोम, विशेषकर महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमियाँ तथा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का संरचनात्मक संरक्षण रोगजनकों के प्रसार के विरुद्ध एक प्राथमिक जैविक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है। 
    • प्राकृतिक पारिस्थितिक अखंडता को बनाए रखने से वन्यजीवों में वायरल सांद्रता में कमी आती है तथा मानवजनित अतिक्रमण से उत्पन्न ‘एज इफेक्ट’ को नियंत्रित किया जा सकता है।
    • यह सक्रिय पर्यावरण प्रबंधन सुनिश्चित करता है कि तनावग्रस्त जूनोटिक भंडार मानव बस्तियों के संपर्क में आने के बजाय अपने प्राकृतिक आवासों तक सीमित रहें। 
      • इस प्रकार जैव विविधता संरक्षण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा के एक अपरिहार्य एवं गैर-परक्राम्य स्तंभ के रूप में स्थापित किया जाता है।
  • वन हेल्थ बजटिंग के माध्यम से राजकोषीय समेकन: समर्पित ‘वन हेल्थ बजटिंग’ को शामिल करने के लिये मैक्रोइकोनॉमिक योजना का पुनर्गठन यह सुनिश्चित करता है कि सक्रिय महामारी की तैयारी को निरंतर, गैर-व्यपगत वित्त पोषण प्राप्त हो। 
    • राजकोषीय स्थिरता तथा ऋण समेकन रणनीतियों को जैव-सुरक्षा में अग्र-सक्रिय निवेश से संरचनात्मक रूप से जोड़कर, सरकारें आपदा-प्रतिक्रियात्मक व्यय से आगे बढ़कर निवारक आर्थिक लचीलापन की दिशा में अग्रसर हो सकती हैं।
    • इस वित्तीय प्रतिमान के अंतर्गत यह अनिवार्य हो जाता है कि अवसंरचना निवेश स्वीकृति से पूर्व पारिस्थितिकी एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम आकलन को प्राथमिकता दी जाए। 
    • अंततः यह दृष्टिकोण दीर्घकालिक आर्थिक राष्ट्रवाद को वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के संरक्षण के साथ प्रत्यक्ष रूप से समेकित करता है।
  • कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले अवसंरचना में जलवायु-स्वास्थ्य समन्वय: कार्बन कैप्चर एवं स्टोरेज (CCS) जैसी जलवायु शमन प्रौद्योगिकियों के व्यापक उपयोग में महामारी-जोखिम पूर्वानुमान का एकीकरण, औद्योगिक संक्रमण और जैव-सुरक्षा के अंतर्संबंधों को संबोधित करता है।
    • जैसे-जैसे राष्ट्रीय नीतियाँ कार्बन उत्सर्जन में कटौती के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों की ओर अग्रसर हैं, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि ये अवसंरचनात्मक परिवर्तन अनजाने में स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति न पहुँचाए अथवा वन्यजीवों के विस्थापन का कारण न बने।
    • यह समेकित दृष्टिकोण स्थानीय वायुमंडलीय एवं तापीय परिवर्तनों के वेक्टर-जनित रोगों के भौगोलिक विस्तार पर प्रभाव का गहन विश्लेषण करता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जलवायु अभियांत्रिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य स्थिरता के मध्य प्रभावी समन्वय स्थापित हो।
  • सूचना महामारी प्रबंधन हेतु डिजिटल विनियमन: बहु-प्रजातीय रोग प्रकोपों के दौरान अवैज्ञानिक स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रचार के तीव्र प्रसार को नियंत्रित करने के लिये सोशल मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र में सुदृढ़ नियामक ढाँचे की स्थापना अत्यंत आवश्यक है।
    • डिजिटल प्लेटफॉर्मों को यह सुनिश्चित करने हेतु वैधानिक रूप से बाध्य किया जाना चाहिये कि वे एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राधिकरणों द्वारा सत्यापित महामारी संबंधी निर्देशों को प्राथमिकता दें, जिससे दहशत-प्रेरित ‘सूचना महामारी’ को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी किया जा सके, जो अन्यथा रोकथाम प्रयासों को कमज़ोर करती है।
    • यह सक्रिय डिजिटल शासन तंत्र स्थानीय पशु-नियंत्रण उपायों से लेकर आपातकालीन टीकाकरण अभियानों तक, जटिल जैव-सुरक्षा प्रोटोकॉल के प्रति जन-सहभागिता एवं अनुपालन को सुनिश्चित करते हुए सामाजिक समन्वय एवं अनुकूलन को सुदृढ़ करता है।
    • परिणामस्वरूप, यह डिजिटल नेटवर्क को मात्र दहशत प्रसार के माध्यम से परिवर्तित कर समन्वित सामाजिक लचीलेपन के प्रभावी उपकरणों में रूपांतरित करता है।

निष्कर्ष: 

वन हेल्थ दृष्टिकोण संकट प्रबंधन की प्रतिक्रियात्मक पद्धति से आगे बढ़कर पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित जैव-सुरक्षा की दिशा में एक मौलिक परिवर्तन का द्योतक है।  मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एकीकृत शासन ढाँचे में समाहित करके, भारत ज़ूनोटिक रोगों (Zoonoses) से उत्पन्न खतरों तथा बढ़ते AMR संकट को प्रभावी रूप से नियंत्रित कर सकता है। अंततः इस बहुआयामी रणनीति को क्रियान्वित करना केवल एक स्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं है, बल्कि वर्ष 2047 तक एक अनुकूलित और विकसित भारत के दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिये एक मूलभूत आवश्यकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न: भारत में बार-बार होने वाले ज़ूनोटिक रोगों का प्रकोप पारिस्थितिकी असंतुलन का एक उदाहरण है। इस कथन के आलोक में, भारत की महामारी-अनुक्रिया क्षमता को सुदृढ़ करने में नेशनल वन हेल्थ मिशन के महत्त्व का मूल्यांकन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. वन हेल्थ ट्रायड क्या है?

यह मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण/पारिस्थितिकी तंत्र स्वास्थ्य का कार्यात्मक अंतर्संबंध है।

2. वन हेल्थ पहल का नेतृत्व कौन-से वैश्विक निकाय करते हैं?

यह पहल विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), FAO, WOAH तथा UNEP से मिलकर बने चतुर्पक्षीय गठबंधन के माध्यम से संचालित होती है।

3. जूनोटिक स्पिलओवर क्या है?

किसी कशेरुकी प्राणी से मानव शरीर में रोगजनक का संचरण।

4. भारत का प्रमुख वन हेल्थ संस्थान कहाँ स्थित है?

राष्ट्रीय  वन हेल्थ संस्थान (NIOH) नागपुर में स्थित है।

5. जलवायु परिवर्तन वन हेल्थ को कैसे प्रभावित करता है?

जलवायु परिवर्तन संक्रमण वाहक जीवों के आवासीय स्वरूप में परिवर्तन करते हुए तथा वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच संपर्क को बाध्य बनाकर रोग जोखिमों को बहुगुणित रूप से बढ़ा देता है।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

मेन्स 

“एक कल्याणकारी राज्य के नैतिक अनिवार्यता के अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना धारणीय विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है।” विश्लेषण कीजिये। (2021)

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