शासन व्यवस्था
‘वन हेल्थ' दृष्टिकोण
- 08 Apr 2026
- 66 min read
प्रिलिम्स के लिये: ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण, विश्व स्वास्थ्य संगठन, निपाह, एवियन इन्फ्लूएंजा (H5N1), रेबीज़, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद
मेन्स के लिये: ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण: अवधारणा, महत्त्व और प्रासंगिकता, एकीकृत रोग निगरानी प्रणाली, पर्यावरणीय क्षरण और स्वास्थ्य के बीच संबंध
चर्चा में क्यों?
विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 के उपलक्ष्य में विशेषज्ञों ने महामारी की बेहतर तैयारी और सभी के लिये समान स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करने हेतु ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
सारांश:
- विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 के अवसर पर भारत में जूनोटिक रोगों, जलवायु से जुड़े जोखिमों से निपटने तथा महामारी की तैयारी को मज़बूत करने के लिये वन हेल्थ दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया गया।
- नेशनल वन हेल्थ मिशन जैसी पहलों के माध्यम से भारत एक समन्वित, निवारक और सतत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की ओर आगे बढ़ रहा है।
विश्व स्वास्थ्य दिवस:
- विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की स्थापना की वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व भर के लोगों के लिये चिंता का विषय बने किसी विशिष्ट स्वास्थ्य मुद्दे पर वैश्विक ध्यान आकर्षित करना और महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के प्रयासों को एकजुट करना है।
- विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 का केंद्रीय विषय “टुगेदर फॉर हेल्थ, स्टैंड विद साइंस” है। यह थीम वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में वैज्ञानिक सहयोग और 'वन हेल्थ' (एक स्वास्थ्य) दृष्टिकोण के महत्त्व को रेखांकित करती है।
- वैश्विक अभियान:
- अंतर्राष्ट्रीय वन हेल्थ शिखर सम्मेलन: फ्राँस द्वारा (फ्राँसीसी G7 अध्यक्षता के तहत) आयोजित, जिसमें मानव, पशु और पर्यावरण क्षेत्रों में बहुपक्षीय सहयोग को प्राथमिकता दी गई।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोगी केंद्रों का वैश्विक मंच: 80 से अधिक देशों के 800 वैज्ञानिक संस्थानों का एक विशाल सम्मेलन।
- इन आयोजनों के परिणामस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे बड़े वैज्ञानिक नेटवर्क का निर्माण हुआ है, जो वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिये एक प्राथमिक उपकरण के रूप में विज्ञान-आधारित सहयोग को बढ़ावा देता है।
'वन हेल्थ' दृष्टिकोण क्या है?
- वन हेल्थ: यह एक एकीकृत और समन्वित दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य मानव, पशु तथा पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित करना एवं उसे सतत रूप से अनुकूलित करना है।
- यह मानता है कि मानव, घरेलू एवं जंगली पशुओं, पौधों तथा व्यापक पर्यावरण का स्वास्थ्य आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ और परस्पर निर्भर है।
- वन हेल्थ व्यापक रोग नियंत्रण को सक्षम बनाता है और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
- यह सामुदायिक, उप-राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तरों पर लागू होता है तथा समग्र व न्यायसंगत समाधान के लिये समन्वय, सहयोग एवं साझा शासन पर आधारित होता है।
- भारत के लिये 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण की आवश्यकता:
- उच्च जैव विविधता एवं अंतःक्रिया: विश्व की केवल 2.4% भूमि होने के बावजूद भारत में 8% प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिससे मानव और वन्यजीवों के बीच अधिक संपर्क होता है तथा ज़ूनोटिक रोगों (जो पशुओं से मनुष्यों में फैलते हैं) का जोखिम बढ़ जाता है।
- निपाह, एवियन इन्फ्लूएंज़ा (H5N1) और रेबीज़ के प्रकोप दर्शाते हैं कि भारत में उभरने वाले 60–70% से अधिक संक्रामक रोग पशुजनित (animal-borne) होते हैं।
- बड़े पैमाने पर पशुधन जनसंख्या: भारत में विश्व की सबसे बड़ी पशुधन आबादियों में से एक है, जो अक्सर वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच संक्रमण के प्रसार में एक कड़ी (सेतु) का कार्य करती है।
- एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR): मनुष्यों और पशुधन में एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग से ‘सुपरबग्स’ विकसित होते हैं, जो पर्यावरण और खाद्य शृंखला के माध्यम से फैलकर सामान्य संक्रमणों को भी उपचार-प्रतिरोधी बना देते हैं।
- जलवायु परिवर्तन और वेक्टरजनित रोग: वनों की कटाई, भूमि उपयोग में बदलाव तथा ग्लोबल वार्मिंग रोग वाहकों (जैसे– मच्छर तथा किलनी) के आवासों को बदल रहे हैं। इसके कारण डेंगू व मलेरिया जैसी बीमारियाँ नए क्षेत्रों में फैल रही हैं, साथ ही क्यासानूर फॉरेस्ट डिज़ीज़ (KFD) जैसी जंगली बीमारियाँ मानवीय बस्तियों तक पहुँच रही हैं।
- उच्च जैव विविधता एवं अंतःक्रिया: विश्व की केवल 2.4% भूमि होने के बावजूद भारत में 8% प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिससे मानव और वन्यजीवों के बीच अधिक संपर्क होता है तथा ज़ूनोटिक रोगों (जो पशुओं से मनुष्यों में फैलते हैं) का जोखिम बढ़ जाता है।
- नेशनल वन हेल्थ मिशन (NOHM): नेशनल वन हेल्थ मिशन एक अंतर-मंत्रालयी पहल है, जिसे 21वीं प्रधानमंत्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार सलाहकार परिषद द्वारा अनुमोदित किया गया है। यह भारत के एकीकृत जैव-सुरक्षा ढाँचे की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है।
- वर्ष 2026 तक यह मिशन नागपुर स्थित राष्ट्रीय वन हेल्थ संस्थान द्वारा संचालित है और इसे भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है। इसमें दो-स्तरीय शासन संरचना है, जिसमें एक कार्यकारी समिति (नीति-केंद्रित) और एक वैज्ञानिक संचालन समिति (तकनीकी-केंद्रित) शामिल हैं।
- नेशनल वन हेल्थ मिशन का उद्देश्य 13 से अधिक सरकारी विभागों को एकीकृत करके भारत में उच्च ज़ूनोटिक रोग बोझ (पशुजनित रोगों) का समाधान करना है।
- इसका परिचालन फोकस “रोग नियंत्रण के व्यापक दायरे” पर केंद्रित है, जिसमें रोगजनकों की शीघ्र पहचान के लिये AI-संचालित उपकरणों का उपयोग, टीकों व निदान हेतु अनुसंधान एवं विकास (R&D) को सुव्यवस्थित करना, तथा ‘स्पिलओवर’ जोखिमों की निगरानी हेतु राष्ट्रीय वन्यजीव स्वास्थ्य नीति की स्थापना शामिल है।
- अंततः यह मिशन 'प्रतिक्रियात्मक स्वास्थ्य सेवा' से आगे बढ़कर एक 'सक्रिय और समग्र मॉडल' की ओर ले जाता है, जो मनुष्यों, विश्व की सबसे बड़ी पशुधन आबादी तथा पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ सुरक्षित करता है।
भारत में 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण को लागू करने में क्या चुनौतियाँ हैं और इसे सुदृढ़ बनाने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
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चुनौतियाँ |
सुदृढ़ करने हेतु उपाय |
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पृथक् शासन: मानव, पशु और पर्यावरणीय क्षेत्र स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं जिसमें कमज़ोर समन्वय और सीमित डेटा साझाकरण होता है। |
समन्वय को संस्थागत बनाना: एकीकृत नीति-निर्माण सुनिश्चित करने के लिये प्रमुख मंत्रालयों के प्रतिनिधित्व वाला एक वैधानिक निकाय स्थापित करना। |
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संसाधन संबंधी बाधाएँ: पशु चिकित्सा और वन्यजीव स्वास्थ्य प्रणालियाँ अपर्याप्त वित्त पोषण, बुनियादी ढाँचे और कुशल जनशक्ति से ग्रस्त हैं। |
एकीकृत निगरानी: मनुष्यों, पशुओं और वन्यजीवों में बीमारियों की निगरानी के लिये एक एकीकृत, वास्तविक समय प्रणाली विकसित करना। |
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कम सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय: स्वास्थ्य व्यय (~GDP का 2.1%) राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य 2.5% से नीचे बना हुआ है, जो क्षमता को सीमित करता है। |
प्राथमिक देखभाल को सुदृढ़ करना: शीघ्र पहचान, रोकथाम और ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवा वितरण में सुधार के लिये आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को बढ़ाना। |
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पारिस्थितिक क्षरण: वनोन्मूलन और शहरीकरण मानव-वन्यजीव अंतःक्रिया को बढ़ाता है, जिससे ज़ूनोटिक रोगों का खतरा बढ़ जाता है। |
एंटीबायोटिक उपयोग को विनियमित करना: एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) से निपटने के लिये पशुधन और मुर्गीपालन में एंटीबायोटिक उपयोग पर सख्त नियंत्रण लागू करना। |
निष्कर्ष
भारत के लिये वन हेल्थ दृष्टिकोण महामारी, जलवायु परिवर्तन और दवा प्रतिरोध के "ट्रिपल थ्रेट" के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव है। किसान, गाय और वनों के स्वास्थ्य को एक ही प्रणाली के रूप में मानकर भारत "संकट प्रबंधन" से "रोकथाम" की ओर बढ़ सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “भारत में उभरते सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों से निपटने के लिये ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. वन हेल्थ दृष्टिकोण क्या है?
मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एकीकृत करने वाला एक ढाँचा ताकि रोग नियंत्रण और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में सुधार किया जा सके।
2. राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन (NOHM) क्या है?
एक क्रॉस-मिनिस्ट्रियल पहल जो 13 विभागों को एकीकृत करती है ताकि ज़ूनोटिक रोग नियंत्रण, निगरानी और महामारी की तैयारियों को सुदृढ़ किया जा सके।
3. वन हेल्थ भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उच्च जैव विविधता, बड़ी पशुधन आबादी और बढ़ते ज़ूनोटिक रोगों के कारण मानव-पशु इंटरफेस पर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं।
4. एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) क्या है?
एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग के कारण रोगाणुओं द्वारा विकसित प्रतिरोध, जिससे संक्रमणों का इलाज करना कठिन हो जाता है और मृत्यु दर का जोखिम बढ़ जाता है।
5. वन हेल्थ को लागू करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
पृथक् शासन, कम वित्तपोषण, कमज़ोर पशु चिकित्सा बुनियादी ढाँचा और पारिस्थितिकीय क्षरण जिससे ज़ूनोटिक रोगों का विस्तार होता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. "एक कल्याणकारी राज्य की नैतिक अनिवार्यता के अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना धारणीय विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है।" विश्लेषण कीजिये। (2021)
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