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भारतीय अर्थव्यवस्था

स्टेट फाइनेंस: ए स्टडी ऑफ बजट 2025-26

  • 30 Jan 2026
  • 115 min read

प्रिलिम्स के लिये: जनांकिकीय संक्रमण, राजकोषीय घाटा, GST, पूंजीगत व्यय, पूंजीगत निवेश हेतु राज्यों को विशेष सहायता (SASCI) योजना, कंसोलिडेटेड सिंकिंग फंड, गारंटी रिडेम्प्शन फंड, कुल प्रजनन दर (TFR), जनसांख्यिकीय शीत, कर उत्प्लावन, रजत अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS), सार्वजनिक निजी भागीदारी, हरित हाइड्रोजन

मुख्य परीक्षा के लिये: RBI की 'स्टेट फाइनेंस: ए स्टडी ऑफ बजट 2025-26' रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष भारत के जनांकिकीय संक्रमण का राज्य सरकारों पर राजकोषीय प्रभाव और जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने और बढ़ती उम्र की आबादी के जोखिमों को कम करने के लिये आगे की राह।

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की 'स्टेट फाइनेंस: ए स्टडी ऑफ बजट 2025-26' रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत एक महत्त्वपूर्ण जनसांख्यिकीय परिवर्तन से गुज़र रहा है, जहाँ युवा आबादी का लाभ उठाने के साथ-साथ बढ़ती उम्र की आबादी के लिये तैयार रहने की आवश्यकता है।

  • यह रिपोर्ट इस बात पर बल देती है कि सतत आर्थिक विकास के लिये जनांकिकीय संक्रमण के विभिन्न चरणों के अनुरूप तैयार की गई राज्य-स्तरीय राजकोषीय रणनीतियाँ आवश्यक हैं।

सारांश

  • भारत के राज्य विभिन्न जनसांख्यिकीय चरणों का सामना कर रहे हैं, जिसके लिये विभेदित राजकोषीय रणनीतियों की मांग है।
  • युवा आबादी वाले राज्यों को शिक्षा, कौशल और रोज़गार सृजन में निवेश की आवश्यकता है; वृद्ध होती जनसंख्या वाले राज्यों को स्वास्थ्य सेवा और पेंशन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
  • सतत विकास और ऋण प्रबंधन के लिये पूंजीगत व्यय, राजस्व एकत्रीकरण और राजकोषीय बफर महत्त्वपूर्ण हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की स्टेट फाइनेंस रिपोर्ट 2025-26 के प्रमुख बिंदु क्या हैं?

  • राज्यों में जनसांख्यिकीय विविधता: प्रौढ़ आयु (Median Age) बिहार में 23 वर्ष से लेकर केरल में 37 वर्ष तक भिन्न है, जबकि वृद्धावस्था आश्रित अनुपात 14.0 से 30.1 के बीच है, जिसके कारण राज्यों को युवा, प्रौढ़ और वृद्ध होती जनसंख्या वाले वर्गों में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें से प्रत्येक को अलग-अलग राजकोषीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसके लिये विभेदित राजकोषीय रणनीतियों की मांग की गई है।
    • युवा जनसंख्या वाले राज्यों को शिक्षा, कौशल विकास और रोज़गार सृजन पर अधिक व्यय की आवश्यकता है; मध्यवर्ती राज्यों को बुनियादी ढाँचे, शहरी सुधारों और महिला श्रमशक्ति भागीदारी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये; वृद्ध जनसंख्या वाले राज्यों को स्वास्थ्य सेवा, पेंशन और सामाजिक कल्याण की उच्च लागतों के लिये तैयारी करने की आवश्यकता है।
  • विस्तृत राजकोषीय घाटा: राज्यों का सकल राजकोषीय घाटा (GFD) वर्ष 2024-25 में बढ़कर 3.3% हो गया है (जो महामारी के बाद के न्यूनतम स्तर से अधिक है)। इसका प्रमुख कारण केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदानों में कमी है — विशेष रूप से GST मुआवज़े और राजस्व घाटा अनुदानों में गिरावट के कारण।
    • वर्ष 2025–26 के लिये 16 राज्यों ने अपने बजट में सकल राजकोषीय घाटा (GFD) को GSDP के 3% से अधिक दर्शाया है, जिनमें से 13 राज्यों का GFD 3.5% से भी अधिक है।
  • राजस्व वृद्धि के लिये राज्य स्तरीय सुधार: राज्यों का अपना कर आधार अत्यधिक केंद्रित है, जिसमें राज्य GST, बिक्री कर, उत्पाद शुल्क और स्टांप शुल्क कुल संग्रह का लगभग 90% हिस्सा हैं। राज्य खनिज कराधान और परिसंपत्ति मुद्रीकरण जैसे गैर-कर राजस्व स्रोतों की खोज कर रहे हैं।
  • पूंजी निवेश को बढ़ावा और सामाजिक क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना: केंद्र सरकार की राज्यों को पूंजी निवेश हेतु विशेष सहायता योजना (SASCI) के समर्थन से पूंजीगत व्यय में लगातार वृद्धि हुई है। वर्ष 2025-26 में इसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3.2% तक बढ़ने की उम्मीद है। वर्ष 2025-26 में राजस्व व्यय का प्रमुख कारक सामाजिक क्षेत्र व्यय है (GDP का 8.2%)।
  • ऋण और उधार: राज्यों का समेकित ऋण मार्च 2021 में 31% के उच्चतम स्तर से घटकर मार्च 2024 तक सकल घरेलू उत्पाद का 28.1% हो गया, लेकिन मार्च 2026 तक इसके बढ़कर 29.2% होने का अनुमान है।
    • बाज़ार से लिये गए ऋण अब GFD (2025-26) के लगभग 76% हिस्से को वित्तपोषित करते हैं, जो बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है।
    • केंद्र सरकार द्वारा दिये गए रियायती ऋणों की बदौलत ब्याज भुगतान का भार प्रबंधनीय बना हुआ है (ब्याज भुगतान-से-GDP अनुपात 1.5-1.9% पर स्थिर है)
    • राज्य सरकार प्रतिभूतियों (SGS) की परिपक्वता अवधि लंबी होती जा रही है और 10-15 वर्षों से अधिक की अवधि के लिये जारी की जाने वाली प्रतिभूतियों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
  • अन्य प्रमुख अवलोकन: राज्यों द्वारा अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर किया गया व्यय कम है (GSDP का लगभग 0.2-0.3%) और इसमें चिकित्सा और कृषि अनुसंधान का प्रभुत्व है।
    • राज्य कंसोलिडेटेड सिंकिंग फंड (CSF, 2.4 लाख करोड़ रुपये) और गारंटी रिडेम्प्शन फंड (GRF, 16,019 करोड़ रुपये) के माध्यम से राजकोषीय बफर का निर्माण कर रहे हैं।
    • SASCI अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है, जिसमें लगभग पूर्ण संवितरण (वर्ष 2024–25 में 1.49 लाख करोड़ रुपये) हुआ है तथा इसने सुधारों को गति प्रदान की है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण

  • परिचय: जनसांख्यिकीय संक्रमण किसी देश के विकास के दौरान उच्च जन्म और मृत्यु दर से निम्न जन्म और मृत्यु दर की ओर होने वाले ऐतिहासिक बदलाव को दर्शाता है । इसमें आमतौर पर कई चरण शामिल होते हैं।
    • चरण 1: उच्च जन्म और उच्च मृत्यु दर के कारण जनसंख्या स्थिर और कम रहती है।
    • चरण 2: बेहतर स्वास्थ्य सेवा और खाद्य सुरक्षा के कारण मृत्यु दर में गिरावट आती है, जबकि जन्म दर उच्च बनी रहती है, जिससे जनसंख्या में तेज़ी से वृद्धि होती है।
    • चरण 3: शहरीकरण, शिक्षा और परिवार नियोजन के कारण जन्म दर में गिरावट शुरू हो जाती है, जिससे जनसंख्या वृद्धि धीमी हो जाती है ।
    • चरण 4: जन्म और मृत्यु दर दोनों कम हैं, जिससे स्थिर या वृद्ध जनसंख्या की स्थिति उत्पन्न होती है।

Demographic_Transition

  • भारत की वर्तमान जनसांख्यिकीय स्थिति: 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत 'जनसांख्यिकीय संक्रमण मॉडल'  के तीसरे चरण में है।
    • कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 2.0 हो गई है (NFHS-5 के अनुसार), जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम है। इसका अर्थ यह है कि औसतन एक महिला उतने बच्चों को जन्म नहीं दे रही है, जितने बिना किसी प्रवासन के वर्तमान जनसंख्या स्तर को बनाए रखने के लिये आवश्यक होते हैं।
  • भविष्य का पूर्वानुमान: संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या दृष्टिकोण 2024 के अनुसार, भारत की जनसंख्या 2060 के शुरुआती दशक में लगभग 1.7 अरब पर चरम तक पहुँचने की संभावना है और फिर धीरे-धीरे घटने लगेगी, हालाँकि यह विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बना रहेगा।
  • जनसांख्यिकीय आपदा: एक जनसांख्यिकीय आपदा तब घटित होती है जब तेज़ी से बढ़ती कार्यशील आयु वाली आबादी (15-64 वर्ष) आर्थिक विकास को गति देने में असफल रहती है। इसके परिणामस्वरूप बेरोज़गारी, अल्प-रोज़गार, सामाजिक अशांति, उच्च निर्भरता और दीर्घकालिक आर्थिक ठहराव उत्पन्न होता है।
  • जनसांख्यिकीय शीत: जनसांख्यिकीय शीत का तात्पर्य निम्न जन्म दर (प्रति महिला लगभग 2.1 बच्चों से कम) के कारण जनसंख्या में होने वाली दीर्घकालिक गिरावट से है। इसकी वजह से कार्यबल संकुचित होने लगता है, बुज़ुर्गों पर निर्भरता बढ़ जाती है और सामाजिक व्यवस्थाओं पर दबाव पड़ता है। वर्ष 2025 में चीन की जनसंख्या में लगातार चौथे वर्ष गिरावट दर्ज की गई, जो इस प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

राज्य सरकारों के लिये भारत के जनसांख्यिकीय संक्रमण के वित्तीय प्रभाव क्या हैं?

क्षेत्र

युवा राज्य

मध्यवर्ती राज्य

वृद्धावस्था वाले राज्य

संभाव्य राजस्व

बढ़ती कार्यशील आबादी, बढ़ती आय, उपभोग और श्रम भागीदारी के कारण कर उछाल की उच्च क्षमता। जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्त करने के लिये उत्पादकता बढ़ाने वाले निवेश की आवश्यकता है (उदाहरण: बिहार, उत्तर प्रदेश)।

कार्यबल की हिस्सेदारी अपने उच्चतम स्तर पर पहुँचने के कारण यहाँ राजस्व वृद्धि स्थिर है, लेकिन इसकी गति धीमी है। ऐसे राज्यों में कुशल श्रम, सेवा क्षेत्र और सिल्वर इकॉनमी (वरिष्ठ नागरिकों की आवश्यकताओं पर केंद्रित अर्थव्यवस्था) को विकसित करने की अपार संभावनाएँ हैं (उदाहरण: तेलंगाना)।

कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या घटने के कारण कर आधार संकुचित या स्थिर रहना। आय और खपत में धीमी वृद्धि से स्व-उत्पन्न राजस्व सीमित होता है (उदाहरण: केरल, पंजाब)।

व्यय संरचना

युवाओं की अधिक संख्या को रोज़गार देने के लिये शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य और रोज़गार सृजन में उच्च विकासात्मक खर्च की आवश्यकता, प्रारंभ में वृद्धावस्था कल्याण का बोझ कम।

दोहरा व्यय दबाव — मानव संसाधन में निरंतर निवेश के साथ स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक सुरक्षा की बढ़ती मांग।

पेंशन, वृद्ध स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ते प्रतिबद्ध खर्च से बुनियादी ढाँचे तथा शिक्षा पर होने वाला व्यय कम होना।

ऋण स्थिरता और राजकोषीय स्थान

यदि विकास को बढ़ावा देने वाला खर्च भविष्य में राजस्व बढ़ाए, तो ऋण का परिदृश्य नियंत्रण योग्य रहेगा, लेकिन अगर युवा लाभांश का पूरा उपयोग न किया गया तो वित्तीय दबाव का खतरा।

कल्याण संबंधी दायित्वों में वृद्धि और राजस्व वृद्धि में मंदी के कारण वित्तीय क्षेत्र पर दबाव बढ़ता है इसलिये सावधान और प्रभावी ऋण प्रबंधन आवश्यक है।

वृद्धि करते कल्याण खर्च और उच्च ब्याज भुगतान के कारण ऋण स्थिरता पर बड़ा दबाव, वित्तीय घाटा GSDP के 3% से अधिक होने का जोखिम।

वित्तीय सुरक्षा भंडार, हस्तांतरण और उत्पादकता

प्रारंभिक राजकोषीय बफर बनाने और उत्पादक पूंजीगत व्यय में निवेश करने की आवश्यकता है; जनसंख्या के आकार पर आधारित वर्तमान वित्त आयोग के हस्तांतरण मानदंडों से इन्हें तुलनात्मक रूप से लाभ मिलता है।

भविष्य में जनसांख्यिकीय वृद्धावस्था के प्रभाव को कम करने के लिये व्यय की गुणवत्ता, अनुसंधान एवं विकास (R&D) और तकनीक पर रणनीतिक ध्यान, धीरे-धीरे वित्तीय सुरक्षा भंडार का निर्माण।

राजकोषीय बफर बनाने, आकस्मिक देनदारियों (पेंशन आदि) के विवेकपूर्ण प्रबंधन, अनुसंधान एवं विकास पर अधिक खर्च और उच्च वृद्ध-निर्भरता अनुपात को दर्शाने के लिये हस्तांतरण मानदंडों में सुधार की सख्त आवश्यकता है।

राज्य जनसांख्यिकीय लाभ का उपयोग कैसे कर सकते हैं और वृद्ध होती जनसंख्या के जोखिम को कैसे कम कर सकते हैं?

जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग करना

  • हाइपर-लोकल कौशल मिलान: AI-संचालित प्लेटफॉर्म का उपयोग करके स्थानीय उद्योग की मांग को वास्तविक समय में युवाओं के कौशल प्रोफाइल के साथ मिलान करें और इसके आधार पर ज़िला-स्तरीय गतिशील प्रशिक्षण और रोज़गार सुमेलित प्रणाली तैयार करें।
  • उभरते क्षेत्रों में 'अवसर गलियारे' बनाना: भविष्य के क्षेत्रों (जैसे– ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी) पर केंद्रित विशेष औद्योगिक/तकनीकी गलियारों की पहचान और विकास करना। इनमें निवेश और उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियों को आकर्षित करने के लिये पहले से स्वीकृत भूमि, 'प्लग-एंड-प्ले' बुनियादी ढाँचा और त्वरित मंज़ूरी की सुविधा प्रदान करना।
  • ‘लर्न-अर्न-पेंशन’ प्रणाली लागू करना: छात्र ऋण को सुनिश्चित इंटर्नशिप भत्तों के साथ जोड़ें और पहली नौकरी मिलने पर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) में स्वतः लघु-योगदान करने का विकल्प दें, ताकि कॅरियर की शुरुआत से ही दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
  • ज़िले को निर्यात हब (DEH) मॉडल के रूप में विकसित करना: उच्च युवा आबादी वाले ज़िलों को विशिष्ट उत्पादों (हस्तशिल्प, वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण) में विशेषज्ञता हासिल करने हेतु सशक्त बनाएँ। स्थानीय प्रतिभा को वैश्विक उद्यमियों में बदलने के लिये ब्रांडिंग, ई-कॉमर्स ऑनबोर्डिंग, लॉजिस्टिक्स तथा वैश्विक गुणवत्ता मानकों के पालन के लिये समग्र समर्थन प्रदान करना।

जनसंख्या वृद्धावस्था के जोखिम को कम करना

  • सिल्वर इकॉनमी क्लस्टर विकसित करना: निजी क्षेत्र को एकीकृत टाउनशिप या क्लस्टर विकसित करने के लिये प्रोत्साहित करना, जिनमें वृद्धावस्था के अनुकूल आवास, सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएँ, मनोरंजन केंद्र और जेरिएट्रिक केयर (वृद्धावस्था देखभाल) सेवाएँ मौजूद हों। इससे नए आर्थिक पारिस्थितिक तंत्र तैयार होंगे और सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे पर बोझ कम होगा।
  • वरिष्ठ उद्यमिता योजनाएँ: अनुभवी सेवानिवृत्त व्यक्तियों के लिये उद्योग के साथ साझेदारी करके लचीले, अंशकालिक और परामर्श आधारित कार्य अवसर डिज़ाइन करना। वरिष्ठ नागरिकों को सामाजिक उद्यम या ज्ञान-आधारित परामर्श शुरू करने हेतु प्रारंभिक अनुदान और इन्क्यूबेशन सहायता प्रदान करना।
  • उप-राष्ट्रीय दीर्घायु कोष: विशिष्ट राज्य-स्तरीय कोष बनाना, जो संभावित रूप से सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से हों। इनका उद्देश्य निवारक स्वास्थ्य देखभाल, टेलीमेडिसिन, सहायक प्रौद्योगिकियों और उम्र से संबंधित बीमारियों के लिये दवा अनुसंधान में निवेश करना और उन्हें सब्सिडी देना है।

निष्कर्ष

भारत का जनसांख्यिकीय संक्रमण राज्यों के वित्त के लिये अवसरों और चुनौतियों दोनों को उत्पन्न करता है। कौशल विकास, रोज़गार सृजन और नवाचार के माध्यम से युवा जनसंख्या की क्षमता का उपयोग राजस्व बढ़ा सकता है, जबकि बढ़ती वृद्ध संख्या के लिये राजकोषीय बफर, सामाजिक सुरक्षा तथा स्वास्थ्य अवसंरचना की तैयारी आवश्यक होगी। अतः सतत विकास और पीढ़ीगत समानता सुनिश्चित करने हेतु जनसांख्यिकीय चरणों के अनुरूप लक्षित तथा अनुकूलित वित्तीय रणनीतियाँ अपनाना अनिवार्य है।

दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न:

प्रश्न. भारत के जनसांख्यिकीय संक्रमण के राज्य सरकारों के वित्तीय निहितार्थों की जाँच कीजिये तथा सतत वित्त सुनिश्चित करने हेतु उपाय सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ):

1. 2025-26 में राज्यों के लिये सकल वित्तीय घाटे (GFD) का रुझान क्या है?
राज्यों ने GDP के 3.3% के सकल वित्तीय घाटे (GFD) का बजट तैयार किया है, जिसमें 16 राज्यों का घाटा 3% से अधिक और 13 राज्यों का घाटा GSDP के 3.5% से भी अधिक है।

2. 2024-25 में राज्यों के सकल वित्तीय घाटे (GFD) के बढ़ने का मुख्य कारण क्या था?
यह मुख्य रूप से केंद्र से मिलने वाली अनुदानों में तेज़ गिरावट के कारण था, जिसमें GST क्षतिपूर्ति और वितरणोत्तर राजस्व घाटा अनुदान शामिल हैं।

3. कौन-से राज्य युवा (Youthful), मध्यवर्ती (Intermediate) और वृद्ध (Ageing) श्रेणी में आते हैं?
युवा (Youthful): बिहार, उत्तर प्रदेश; मध्यवर्ती (Intermediate): तेलंगाना; वृद्ध Ageing): केरल, पंजाब, माध्य आयु और वृद्ध-आश्रितता अनुपात के आधार पर।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स 

प्रश्न. जनांकिकीय लाभांश के पूर्ण लाभ को प्राप्त करने के लिये भारत को क्या करना चाहिये? (2023)

(a) कुशलता विकास का प्रोत्साहन

(b) और अधिक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रारंभ 

(c) शिशु मृत्यु दर में कमी

(d) उच्च शिक्षा का निजीकरण

उत्तर: (a)


प्रश्न. आर्थिक विकास से जुड़े जनांकिकीय संक्रमण के निम्नलिखित विशिष्ट चरणों पर विचार कीजिये: (2012)

1. निम्न जन्म दर के साथ निम्न मृत्यु दर 

2. उच्च जन्म दर के साथ उच्च मृत्यु दर 

3. निम्न मृत्यु दर के साथ उच्च जन्म दर

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर उपर्युक्त चरणों का सही क्रम चुनिये:

(a) 1, 2, 3

(b) 2, 1, 3

(c) 2, 3, 1

(d) 3, 2, 1

उत्तर: (c)


मेन्स 

प्रश्न. ‘जनसांख्यिकीय शीत’ (डेमोग्राफिक विंटर) की अवधारणा क्या है? क्या यह दुनिया ऐसी स्थिति की ओर अग्रसर है? विस्तार से बताइये। (2024)

प्रश्न. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना करते हुए भारत में इन्हें प्राप्त करने के उपायों पर विस्तृत प्रकाश डालिये। (2021)

प्रश्न. ''महिलाओं को सशक्त बनाना जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने की कुंजी है।'' चर्चा कीजिये। (2019)

प्रश्न. भारत में वृद्ध जनसमूह पर वैश्वीकरण के प्रभाव का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2013) 

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