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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत में खाद्य अपशिष्ट की दुविधा

  • 16 Apr 2026
  • 112 min read

प्रिलिम्स के लिये: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, फूड वेस्ट इंडेक्स, ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI), भारतीय खाद्य निगम, सतत विकास लक्ष्य (SDG) 2

मेन्स के लिये: भारत में खाद्य सुरक्षा और भूख, कृषि आपूर्ति शृंखला की अक्षमताएँ, फसल कटाई के बाद हानि और कोल्ड चेन अवसंरचना, अपशिष्ट कम करने में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की भूमिका

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

अंतर्राष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस (30 मार्च) के उपलक्ष्य में, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के फूड वेस्ट इंडेक्स 2024 ने यह उजागर किया है कि भारत प्रतिवर्ष 78-80 मिलियन टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी करता है, जो व्यापक क्षुधा और भारी खाद्य अपशिष्ट के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास को दर्शाता है।

  • अंतर्राष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन और सतत उपभोग की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसे वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित किया गया था और इसका संचालन संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) तथा संयुक्त राष्ट्र मानव बस्तियाँ कार्यक्रम द्वारा किया जाता है।
  • वर्ष 2026 का अंतर्राष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस खाद्य अपशिष्ट पर केंद्रित है, जो पर्यावरणीय क्षति का एक प्रमुख, किंतु रोके जाने योग्य कारण है।

सारांश

  • भारत में प्रतिवर्ष 78-80 मिलियन टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है (लगभग ₹1.55 लाख करोड़), जबकि लगभग 194 मिलियन लोग अभी भी कुपोषित हैं, जो खाद्य वितरण में गंभीर असमानता को दर्शाता है।
  • यह संकट कमज़ोर फसल-उपरांत अवसंरचना, कमज़ोर आपूर्ति शृंखला और उपभोक्ता व्यवहार से उत्पन्न होता है, जिसके समाधान हेतु भंडारण, प्रसंस्करण, पुनर्वितरण और जागरूकता में सुधार आवश्यक है, ताकि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

भारत में खाद्य अपशिष्ट का पैमाना क्या है?

  • भारत की वैश्विक स्थिति: विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 1.05 अरब टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है। इसमें से 60% बर्बादी घरों में, 28% खाद्य सेवा क्षेत्र में और 12% खुदरा क्षेत्र में होती है।
  • भारत खाद्य अपशिष्ट में वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर है (जहाँ प्रतिवर्ष 78-80 मिलियन टन फसल-उपरांत एवं खाद्य सामग्री, जिसकी कीमत लगभग ₹1.55 लाख करोड़ है, बर्बाद होती है) और यह केवल चीन (108 मिलियन टन प्रति वर्ष) से पीछे है।
    • तुलनात्मक रूप से, अमेरिका 24.7 मिलियन टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी करता है, जबकि जापान, अपनी शून्य-अपशिष्ट ‘मोट्टाइनाई’ संस्कृति के मार्गदर्शन में, केवल 5.2 मिलियन टन खाद्य अपशिष्ट करता है।
  • प्रति व्यक्ति अपशिष्ट: भारत में प्रति व्यक्ति घरेलू खाद्य अपशिष्ट प्रतिवर्ष 55 किलोग्राम है, जो अमेरिका (73 किलोग्राम) और जर्मनी (75 किलोग्राम) की तुलना में कम है, लेकिन भारत में घरेलू भूख संकट को देखते हुए यह अत्यंत चिंताजनक है।
  • आर्थिक मूल्य: इस बर्बाद खाद्य पदार्थ का आर्थिक मूल्य लगभग ₹1.55 लाख करोड़ आँका गया है, जो संसाधनों की भारी क्षति करता है और किसानों की आय को प्रभावित करता है।
  • द्वैध संकट: भारत हर वर्ष लाखों टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी करता है, फिर भी लगभग 194 मिलियन लोग कुपोषित हैं, जो खाद्य उत्पादन और समान वितरण के बीच गहरे संरचनात्मक अंतर को उजागर करता है।
    • खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण पर स्थायी समिति (2020-21) ने रिपोर्ट किया कि पिछले चार वर्षों में परिवहन के दौरान नष्ट हुए गेहूँ और चावल से 82.30 मिलियन लोगों को एक महीने तक भोजन कराया जा सकता था।
    • यह स्थिति ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) 2023 में भारत की 125 देशों में 111वीं रैंकिंग में परिलक्षित होती है, जो व्यापक खाद्य असुरक्षा को दर्शाती है।
  • भोजन की बर्बादी के मुख्य कारण:
    • अपर्याप्त कोल्ड चेन अवसंरचना: मज़बूत कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं की कमी के कारण अत्यधिक नाशवान वस्तुएँ (जैसे– फल, सब्ज़ियाँ, डेयरी उत्पाद और माँस) कटाई के बाद 30–40% तक नुकसान झेलती हैं।
      • नीति आयोग ने प्रमुख बाधाओं की पहचान की है, जिनमें कोल्ड चेन अवसंरचना में अपर्याप्त निवेश, ढँके हुए भंडारण की कमी, समय पर मशीनीकरण का अभाव और वैज्ञानिक पैकेजिंग की कमी शामिल हैं।
    • कमज़ोर लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति शृंखला का विखंडन: बिखरे हुए परिवहन नेटवर्क, रेफ्रिजरेटेड वाहनों (रीफर्स) की कमी तथा परिवहन में देरी के कारण कृषि उत्पाद शहरी बाज़ारों तक पहुँचने से पहले ही तेज़ी से खराब हो जाते हैं।
    • भंडारण में अक्षमताएँ: पारंपरिक गोदाम [जैसे– भारतीय खाद्य निगम (FCI) का भंडारण] अक्सर वैज्ञानिक संरक्षण विधियों की कमी से जूझते हैं।
      • खुले में भंडारण और अपर्याप्त पैकेजिंग (जैसे– छिद्रयुक्त जूट की बोरियों का उपयोग) के कारण अनाज नमी और कृंतकों (चूहों) से होने वाले नुकसान के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।
      • वर्ष 2019 से 2024 के बीच केवल पंजाब में ही भारतीय खाद्य निगम (FCI) की भंडारण सुविधाओं में 8,200 टन से अधिक खाद्यान्न खराब हो गया।
    • अपर्याप्त रूप से उपयोग किया गया खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र: भारत अपने कृषि उत्पादों का लगभग 8–10% ही प्रसंस्करण करता है, जबकि अमेरिका में यह लगभग 65% और चीन में 23% है। मूल्य संवर्द्धन की कमी के कारण स्थानीय बाज़ारों में अतिरिक्त उत्पादन सड़ने लगता है।
    • उपभोक्ता और घरेलू व्यवहार: बढ़ती शहरी आय, बदलती जीवनशैली और भव्य शादियों व भोजों की संस्कृति अंतिम उपभोक्ता स्तर पर खाद्य अपव्यय में काफी योगदान देती है।
    • मौसमी संवेदनशीलता: अत्यधिक मौसमीय घटनाएँ उत्पादन और भंडारण से जुड़ी कमज़ोरियों को और बढ़ा देती हैं, जिससे खराब होने की दर में वृद्धि होती है।
    • भ्रष्टाचार: भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) ने बताया कि वर्ष 2011–16 के बीच पंजाब में भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा खराब भंडारण के कारण 700 करोड़ रुपये मूल्य का गेहूँ नष्ट हो गया, जो अक्षमता, भ्रष्टाचार और खराब खाद्यान्न के दुरुपयोग जैसी समस्याओं को उजागर करता है।

खाद्य हानि, खाद्य अपशिष्ट और खाद्य अपव्यय

  • खाद्य हानि: यह मानव उपभोग के लिये निर्धारित खाद्य पदार्थों के द्रव्यमान (सूखी मात्रा) या पोषण मूल्य (गुणवत्ता) में कमी को दर्शाता है।
    • यह मुख्यतः खाद्य आपूर्ति शृंखला में मौजूद अक्षमताओं के कारण होता है, जिनमें कमज़ोर अवसंरचना, अपर्याप्त लॉजिस्टिक्स, तकनीक की कमी तथा कौशल और प्रबंधन की अपर्याप्तता शामिल हैं। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक आपदाएँ भी इन हानियों में योगदान देती हैं।
  • खाद्य अपशिष्ट: यह उन खाद्य पदार्थों को संदर्भित करता है जो मानव उपभोग के लिये उपयुक्त होते हैं, लेकिन खराब होने या उनकी समाप्ति तिथि पार होने के कारण फेंक दिये जाते हैं।
    • यह अपशिष्ट बाज़ार में अधिक आपूर्ति या व्यक्तिगत उपभोक्ताओं की खरीदारी और खान-पान की आदतों जैसे कारकों के कारण उत्पन्न हो सकता है।
  • खाद्य अपव्यय: यह किसी भी ऐसे खाद्य को संदर्भित करता है जो खराब होने या बर्बाद होने के कारण नष्ट हो जाता है। इस प्रकार “अपव्यय” शब्द में खाद्य हानि और खाद्य अपशिष्ट दोनों शामिल होते हैं। 

खाद्य अपशिष्ट के क्या प्रभाव हैं?

  • आर्थिक क्षति: प्रतिवर्ष 1.55 लाख करोड़ रुपये का नुकसान सीधे कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। यह किसानों को उनके उत्पाद का वास्तविक बाज़ार मूल्य प्राप्त करने से रोकता है और उपभोक्ताओं के लिये खाद्य कीमतों पर मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ाता है।
  • महत्त्वपूर्ण संसाधनों के अपशिष्ट: खाद्य अपशिष्ट से तात्पर्य उसके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों के खराब होने से है।
    • उदाहरणस्वरूप 1 किलोग्राम चावल उगाने के लिये लगभग 5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। जब यह चावल व्यर्थ जाता है, तो जल-संकट झेल रहे क्षेत्रों (जैसे– पंजाब और हरियाणा) से निकाला गया भूजल भी बेकार हो जाता है।
  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: खाद्य हानि और अपशिष्ट वैश्विक वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 8–10% हिस्सा बनाते हैं।
    • यदि खाद्य अपशिष्ट को एक देश माना जाए, तो यह वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक होता।
  • मीथेन उत्सर्जन: लैंडफिल में सड़ने वाला भोजन मीथेन उत्पन्न करता है, जो वायुमंडलीय ताप बढ़ाने की दृष्टि से CO₂ की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
  • सामाजिक एवं मानवीय संकट: इतने बड़े पैमाने पर खाद्य का नुकसान सीधे सतत विकास लक्ष्य (SDG 2: शून्य भुखमरी) को प्रभावित करता है, जिससे कमज़ोर और वंचित वर्गों में कुपोषण, स्टनिंग और वेस्टिंग जैसी समस्याएँ और गंभीर हो जाती हैं।

भोजन की बर्बादी रोकने के लिये सरकारी पहल

  • प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY): इसका उद्देश्य खेत से लेकर खुदरा बिक्री तक कुशल आपूर्ति शृंखला प्रबंधन के साथ आधुनिक अवसंरचना का निर्माण करना है, विशेष रूप से मेगा फूड पार्कों और कोल्ड चेन अवसंरचना पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
  • प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण (PMFME): यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत एक योजना है, जिसका उद्देश्य सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को वित्तीय, तकनीकी और व्यावसायिक सहायता प्रदान करना है ताकि स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्द्धन को बढ़ाया जा सके।
  • कृषि अवसंरचना निधि (AIF): यह एक मध्यम से दीर्घकालिक ऋण वित्तपोषण सुविधा है, जिसका उद्देश्य फसल-उपरांत प्रबंधन अवसंरचना और सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के लिये व्यवहार्य परियोजनाओं में निवेश को बढ़ावा देना है।
  • भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की पहल: “सेव फूड, शेयर फूड, शेयर जॉय” जैसी पहलों के माध्यम से अतिरिक्त खाद्य को ज़रूरतमंदों तक पुनर्वितरित करने को प्रोत्साहित किया जाता है।
  • ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाज़ार): एक डिजिटल प्लेटफॉर्म जो मंडियों को एकीकृत करता है और मूल्य खोज में सुधार करता है, जिससे विलंबित बिक्री के कारण होने वाली बर्बादी कम होती है।
  • PACS (प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ): भंडारण, एकत्रीकरण और वितरण के लिये बहु-सेवा केंद्रों के रूप में कार्य करने के लिये मज़बूत किया गया, जिससे ज़मीनी स्तर पर नुकसान को कम करने में मदद मिलती है।
  • मिशन लाइफ: "उपयोग करो और फेंको" की आदतों पर टिकाऊ उपभोग को बढ़ावा देता है। प्रमुख कार्यों में खाद्य अपशिष्ट को कम करना, खाद बनाना और बायोगैस में योगदान शामिल है। इसका उद्देश्य स्थिरता को एक वैश्विक सांस्कृतिक मानदंड बनाने के लिये एक "प्रो-प्लैनेट पीपल" (P3) जन आंदोलन को बढ़ावा देना है।

भारत खाद्य बर्बादी से प्रभावी ढंग से कैसे निपट सकता है और उसे समाप्त कर सकता है?

  • कोल्ड चेन का निर्माण: विशेष रूप से कृषि-प्रधान राज्यों में कोल्ड चेन के विकास को आवश्यक खाद्य सुरक्षा बुनियादी ढाँचे के रूप में मानना नुकसान की शृंखला को तोड़ने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
    • पंचायत या कृषक उत्पादक संगठन (FPO) स्तर पर सौर-ऊर्जा संचालित, विकेंद्रीकृत कोल्ड स्टोरेज इकाइयों को बढ़ावा देना संकटग्रस्त बिक्री और कटाई के बाद के नुकसान को काफी कम कर सकता है।
  • खाद्य साझाकरण के लिये कानून बनाना: भारत को अधिशेष भोजन के पुनर्वितरण के लिये एक राष्ट्रीय कानून की आवश्यकता है। यूरोपीय देशों से मिले संकेतों के अनुसार, सुपरमार्केट और संस्थानों को कानूनी रूप से बिना बिके खाद्य दान करने के लिये बाध्य किया जाना चाहिये, जिसे कर संबंधी प्रोत्साहनों द्वारा समर्थित किया जाए।
  • फार्म गेट को सशक्त बनाना: कृषक-उत्पादक संगठनों को मशीनीकृत सुखाने और मोबाइल कोल्ड यूनिट से लैस करके प्रारंभिक चरण के भंडारण को आधुनिक बनाना।
  • अपशिष्ट को ट्रैक करना और मापना: UNEP की पद्धति पर आधारित एक समेकित राष्ट्रीय डेटाबेस स्थापित करना, जिसके लिये बड़े खाद्य व्यवसायों, खानपान करने वालों और संस्थागत रसोई को अपने खाद्य अपशिष्ट को सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट करना आवश्यक हो।
  • प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देना: विशुद्ध रूप से 'उत्पादन-केंद्रित' दृष्टिकोण से 'प्रसंस्करण और संरक्षण-केंद्रित' दृष्टिकोण की ओर बदलाव। खाद्य प्रौद्योगिकी और पैकेजिंग में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करना महत्त्वपूर्ण है।
  • सांस्कृतिक नैतिकता को पुनरुज्जीवित करना: भोजन को पवित्र (अन्न ब्रह्मा) मानने के पारंपरिक दर्शन को पुनः जाग्रत् करना। स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों को खाद्य संरक्षण को केवल एक जागरूकता अभियान के रूप में नहीं, बल्कि एक मौलिक नागरिक ज़िम्मेदारी के रूप में बढ़ावा देना चाहिये।
    • स्वच्छ भारत अभियान के समान एक राष्ट्रव्यापी व्यवहार परिवर्तन अभियान शुरू करना, जिसका उद्देश्य शहरी उपभोक्ताओं, रेस्तराँ और आयोजकों को भोजन भाग नियंत्रण और अधिशेष भोजन दान पर शिक्षित करना है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था: अनिवार्य खाद्य अपशिष्ट को SATAT योजना के तहत संपीड़ित बायोगैस (CBG) या कृषि के लिये जैविक खाद जैसे मूल्यवान उप-उत्पादों में परिवर्तित करने को प्रोत्साहित करना।
    • वर्ष 2030 तक वैश्विक खाद्य अपशिष्ट को आधा करना (SDG 12.3) एक महत्त्वपूर्ण जलवायु कार्रवाई है जो वैश्विक मीथेन उत्सर्जन को 7% तक कम कर सकती है।

खाद्य अपशिष्ट से निपटने वाले अंतर्राष्ट्रीय मॉडल

  • अमेरिका: PATH अधिनियम (2015) व्यवसायों को अधिशेष भोजन दान करने के लिये प्रोत्साहित करने हेतु कर प्रोत्साहन प्रदान करता है।
  • इटली: चैरिटी को दान को बढ़ावा देकर खाद्य अपशिष्ट को कम करने के लिये वित्तीय प्रोत्साहन (~10 मिलियन अमेरिकी डॉलर वार्षिक) प्रदान करता है।
  • संयुक्त राष्ट्र ढाँचा: खाद्य हानि और अपशिष्ट प्रोटोकॉल आपूर्ति शृंखलाओं में अपशिष्ट को मापने के लिये वैश्विक मानक निर्धारित करता है और SDG 12.3 लक्ष्यों का समर्थन करता है।

निष्कर्ष

भारत का खाद्य अपशिष्ट संकट व्यापक भूख के बीच गहन आपूर्ति शृंखला अक्षमताओं को दर्शाता है। इसे हल करने के लिये बेहतर कटाई-पश्चात प्रणालियों, खाद्य पुनर्वितरण और भोजन को महत्त्व देने के लिये एक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है, जो इसे शून्य भूख (SDG 2) के अनुरूप एक आर्थिक आवश्यकता और नैतिक कर्त्तव्य दोनों बनाता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  “भारत में भोजन की बर्बादी का संकट अभाव की समस्या नहीं, बल्कि वितरण और अक्षमता की समस्या है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. खाद्य हानि और खाद्य अपशिष्ट में क्या अंतर है?
खाद्य हानि उत्पादन और आपूर्ति शृंखलाओं के दौरान होती है, जबकि खाद्य अपशिष्ट खुदरा या उपभोक्ता स्तर पर खाद्य भोजन को त्यागने के कारण होता है।

2. UNEP खाद्य अपशिष्ट सूचकांक क्या है?
यह SDG 12.3 के लक्ष्यों को ट्रैक करने के लिये घरों, खुदरा और खाद्य सेवाओं में खाद्य अपशिष्ट को मापने वाली एक वैश्विक रिपोर्ट है।

3. खाद्य अपशिष्ट जलवायु चिंता का विषय क्यों है?
यह वैश्विक GHG उत्सर्जन का 8-10% योगदान देता है और मीथेन उत्सर्जित करता है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।

4. भारत में खाद्य बर्बादी को कौन-सी योजनाएँ संबोधित करती हैं?
PMKSY, PMFME, कृषि अवसंरचना कोष और FSSAI पहल, जैसे– "भोजन बचाना, भोजन साझा करना"।

5. भारत में खाद्य बर्बादी को कैसे कम किया जा सकता है?
कोल्ड चेन को मज़बूत करके, खाद्य पुनर्वितरण कानूनों को बढ़ावा देकर, प्रसंस्करण में सुधार करके और व्यावहारिक परिवर्तन को प्रोत्साहित करके।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा,  विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स

प्रश्न. देश में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की चुनौतियाँ एवं अवसर क्या हैं? खाद्य प्रसंस्करण को प्रोत्साहित कर कृषकों की आय में पर्याप्त वृद्धि कैसे की जा सकती है? (2020)

प्रश्न. खाद्य सुरक्षा बिल से भारत में भूख व कुपोषण के विलोपन की आशा है। उसके प्रभावी कार्यान्वयन में विभिन्न आशंकाओं की समालोचनात्मक विवेचना कीजिये। साथ ही यह भी बताएँ कि विश्व व्यापार संगठन (WTO) में इससे कौन-सी चिंताएँ उत्पन्न हो गई हैं? (2013)

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