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प्रिलिम्स फैक्ट्स

  • 14 Jul, 2020
  • 12 min read
प्रारंभिक परीक्षा

प्रीलिम्स फैक्ट्स: 14 जुलाई, 2020

बाढ़ प्रतिरोधी धान

Flood Resistant Paddy

हाल ही में असम के गोलाघाट ज़िले के किसानों ने धान की खेती करने के लिये पारंपरिक किस्मों के बजाय नई बाढ़ प्रतिरोधी धान (Flood Resistant Paddy) की किस्मों का उपयोग करना शुरू किया।

प्रमुख बिंदु:

  • बाढ़ प्रतिरोधी धान की प्रजातियों [रंजित सब1 (Ranjit Sub1), स्वर्ण सब1 (Swarna Sub1) एवं बहादुर सब1 (Bahadur Sub1)] का उपयोग असम में ब्रह्मपुत्र नदी के पश्चिम क्षेत्र के लगभग 60% किसानों द्वारा किया गया है।
  • असम के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में किसान वर्ष 2009 से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research) और मनीला (फिलीपींस) स्थित अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (International Rice Research Institute) द्वारा विकसित जल प्रतिरोधी धान की प्रजाति स्वर्ण सब1 की कटाई कर रहे हैं।
    • किंतु किसानों द्वारा धान की पारंपरिक किस्मों के बजाय नई बाढ़ प्रतिरोधी धान की किस्मों को अपनाने की प्रक्रिया काफी धीमी रही है।
    • उल्लेखनीय है कि रंजित सब-1 (Ranjit Sub1) सहित अन्य बाढ़ प्रतिरोधी धान की किस्मों का प्रयोग वर्ष 2018 में फिर से शुरू किया गया था।

बाढ़ प्रतिरोधी धान की प्रजातियों के लाभ:

  • नई चावल की किस्मों में दो सप्ताह तक जलमग्नता के बावजूद पुनः पनपने की क्षमता होती है और ये भारी बाढ़ में भी क्षतिग्रस्त नहीं होती हैं जबकि पारंपरिक किस्में भारी बाढ़ में क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
  • इन प्रजातियों में औसतन पाँच टन प्रति हेक्टेयर तक की उपज की क्षमता होती हैं।
  • असम में लगभग 1500 किसान फसल-उपज वाले क्षेत्रों में लगभग 950 हेक्टेयर पर खेती करते हैं जो नियमित रूप से बाढ़ से प्रभावित रहते हैं। इसलिये चावल की ये किस्में बाढ़ से होने वाली फसल हानि को काफी हद तक कम कर सकती हैं।
  • ये किस्में बाढ़ से क्षतिग्रस्त होने पर पुनः जीवित हो सकती हैं इसलिये इनमें अधिकतम उत्पादकता की क्षमता होती है।

आरसीएफ सैफ्रोला

RCF SAFEROLA

COVID-19 से निपटने हेतु भारत सरकार की सहायता करने के उद्देश्य से ‘राष्ट्रीय रसायन एवं उर्वरक लिमिटेड’ (Rashtriya Chemicals & Fertilizers Limited- RCF) ने एक हाथ सफाई आइसोप्रोपिल अल्कोहल (IsoPropyl Alcohol) जेल ‘आरसीएफ सैफ्रोला’ (RCF SAFEROLA) लॉन्च किया।

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प्रमुख बिंदु:

  • RCF के अनुसार, यह हाथ साफ करने वाला जेल त्वचा के अनुकूल मॉइस्चराइज़र आधारित ‘हैण्ड सैनिटाइज़र’ है जिसमें आइसोप्रोपिल अल्कोहल (IsoPropyl Alcohol-IPA) एवं एलोवेरा का अर्क (रस) होता है। यह विटामिन-E से युक्त है और इसमें ताज़े नींबू की खुशबू भी है।

राष्ट्रीय रसायन एवं उर्वरक लिमिटेड

(Rashtriya Chemicals & Fertilizers Limited- RCF):

  • RCF देश में उर्वरकों एवं रसायनों की एक प्रमुख उत्पादक कंपनी है। भारत सरकार ने इसे मिनी रत्न का दर्जा दिया है।
  • यह यूरिया, जटिल उर्वरक, जैव-उर्वरक, सूक्ष्म पोषक तत्व, जल में घुलनशील उर्वरक, कंडीशनर रसायन एवं औद्योगिक रसायनों की एक विस्तृत श्रृंखला का उत्पादन करती है।
  • इसकी दो संचालन इकाइयाँ (मुंबई के ट्रॉम्बे और थाल (Thal) रायगढ़ ज़िला, महाराष्ट्र) हैं।
  • RCF ग्रामीण भारत में अपने दो प्रसिद्ध उत्पादों ‘उज्ज्वला’ (यूरिया) और ‘सुफला’ (कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइज़र्स) की आपूर्ति करती है।

इंडेक्स ऑफ कैंसर प्रिपेयर्डनेस

Index of Cancer Preparedness

‘इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ (Economist Intelligence Unit- EIU) की रिपोर्ट ‘कैंसर प्रिपेयर्डनेस इन एशिया-पैसिफिक: सार्वभौमिक कैंसर नियंत्रण के लिये प्रगति’ (Cancer preparedness in Asia-Pacific: Progress towards universal cancer control) में ‘इंडेक्स ऑफ कैंसर प्रिपेयर्डनेस’ (Index of Cancer Preparedness) से प्राप्त निष्कर्षों की जाँच की गई।

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प्रमुख बिंदु:

  • EIU की इस रिपोर्ट के अनुसार, यह इंडेक्स 10 एशिया-प्रशांत देशों- ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड एवं वियतनाम के सामने कैंसर की चुनौती की जटिलताओं का वर्णन करता है।
  • दवा कंपनी रोशे (Roche) द्वारा प्रायोजित यह रिपोर्ट 10 देशों में कैंसर से निपटने की तैयारी एवं इसकी जटिलताओं की जाँच करती है।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार, 10 एशिया-प्रशांत देशों में कैंसर से निपटने की तैयारी के आधार पर भारत को आठवीं रैंक दी गई है।
    • कैंसर से निपटने की तैयारी के आधार पर भारत को 100 में 51.6 अंक दिये गए है जो औसत क्षेत्रीय स्कोर (66.5) से काफी कम है जबकि ऑस्ट्रेलिया (92.4), दक्षिण कोरिया (83.4) एवं मलेशिया (80.3) इस क्षेत्र में शीर्ष स्थान पर हैं।
    • इस रिपोर्ट में भारत के बाद केवल वियतनाम (44.5) और फिलीपींस (42.6) को स्थान दिया गया है।
  • इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इंडेक्स में सभी तीन स्तंभों (नीति एवं नियोजन, देखभाल सेवाएँ एवं स्वास्थ्य प्रणाली, शासन) में भारत ने औसत से कम स्कोर को दर्ज किया है।
  • EIU की इस रिपोर्ट में पाया गया है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कैंसर स्वास्थ्य चिंता का विषय बना हुआ है और आगे चल कर इसमें लगभग 35% वृद्धि होने की संभावना है जिससे मृत्यु दर लगभग 40% तक बढ़ सकती है।
  • वर्ष 2018 में एशिया-प्रशांत में कैंसर रोगियों की संख्या लगभग 8.8 मिलियन तक पहुँच गई। यह इंडेक्स कैंसर चुनौती की विभिन्न प्रतिक्रियाओं तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इससे निपटने के लिये होने वाली तैयारियों का अवलोकन करता है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में ‘इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ (EIU) द्वारा जारी ‘इंडेक्स ऑफ कैंसर प्रिपेयर्डनेस’ (Index of Cancer Preparedness) के 28 वैश्विक देशों में से भारत का स्थान 19वाँ था।


तांगम

Tangam

हाल ही में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने एक पुस्तक जिसका शीर्षक तांगम्स: एन एथ्नोलिंग्विस्टिक स्टडीज़ ऑफ द क्रिटिकली इंडेंजर्ड ग्रुप ऑफ अरुणाचल प्रदेश (Tangams: An Ethnolinguistic Study Of The Critically Endangered Group of Arunachal Pradesh) जारी की।

प्रमुख बिंदु:

  • यह पुस्तक तांगम समुदाय की भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगी।
    • तांगम अरुणाचल प्रदेश के एक छोटे से गाँव में 253 वक्ताओं (तांगम भाषा का प्रयोग करने वाले) के रूप में केंद्रित एक समुदाय है।
  • भाषा की हानि ‘सांस्कृतिक क्षरण’ (Cultural Erosion) का कारण है। गौरतलब है कि तांगम समुदाय में सिर्फ 253 लोग ही हैं जो तांगम भाषा का प्रयोग करते हैं।

तांगम (Tangam):

  • तांगाम अरुणाचल प्रदेश की बड़ी आदि जनजाति (Adi tribe) के भीतर एक अल्पज्ञात समुदाय है।
  • ये अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सियांग ज़िले के पेनडेम सर्किल (Paindem Circle) में कुग्गिंग के आवास (Hamlet of Kugging) में रहते हैं।
    • कुग्गिंग (Kugging) शिमॉन्ग (Shimong), मिन्यांग्स (Minyongs) जैसे आदि उपसमूह (Adi Subgroups) के साथ-साथ खाम्बस (Khambas) के बौद्ध आदिवासी समुदाय द्वारा बसे कई गाँवों से घिरा हुआ है।

तांगम भाषा:

  • यूनेस्को के ‘वर्ल्ड एटलस ऑफ इंडेंजर्ड लैंग्वेज’ (2009) के अनुसार, ‘तांगम’ एक मौखिक भाषा है जो ‘तिब्बती-बर्मन भाषा परिवार’ (Tibeto-Burman Language Family) के तहत तानी समूह (Tani group) से संबंधित है।
  • इसे यूनेस्को के ‘वर्ल्ड एटलस ऑफ इंडेंजर्ड लैंग्वेज’ 'में गंभीर रूप से लुप्तप्राय' (Critically Endangered) श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।

तांगम भाषाई लोगों की संख्या कम होने का कारण:

  • वर्षों से अपने पड़ोसियों के साथ संवाद करने के कारण तांगम लोग बहुभाषी हो गए हैं ये न केवल तांगम भाषा बोलते हैं बल्कि शिमोंग, खंबा एवं हिंदी आदि भी बोलते हैं।
    • ये लोग अब शायद ही कभी अपनी भाषा बोलते हैं क्योंकि इनकी आबादी केवल एक गाँव तक ही सीमित है।

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अरुणाचल प्रदेश की भाषाएँ:

  • अरुणाचल प्रदेश की भाषाओं को चीनी-तिब्बती भाषाई परिवार (Sino-Tibetan language family) और विशेष रूप से भाषाओं के तिब्बती-बर्मन एवं ताई (Tai) समूह के तहत जैसे- लोलो-बर्मिश (Lolo-Burmish), बोधिक (Bodhic), साल (Sal), तानी (Tani), मिशमी (Mishmi), हरिश (Hruissh) और ताई (Tai) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

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