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एडिटोरियल

  • 22 Apr, 2021
  • 7 min read
शासन व्यवस्था

कोविड-19: टीकाकरण की स्थिति

यह एडिटोरियल दिनांक 21/04/2021 को द हिंदू में प्रकाशित लेख “Managing an upheaval: On universal vaccination” पर आधारित है। इसमें कोविड-19 के टीके की त्वरित उपलब्धता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई है।

आठ महीने पूर्व जब भारत में कोविड-19 से संक्रमित मरीजों की औसत दैनिक संख्या में गिरावट होनी शुरू हुई तो विशेषज्ञों का मानना था कि भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर नहीं दिखाई देगी। जबकि, कोविड की दूसरी लहर ने यहाॅं की स्वास्थ्य संबंधी आधारभूत संरचना की सभी कमियों को उजागर कर दिया है। 

इसके अलावा भारत में कोविड-19 संक्रमण के विस्तार को रोकना कठिन हो रहा है क्योंकि यहाॅं पुनः लॉकडाउन लगाना देश को आर्थिक रूप से संवेदनशील स्थिति में पहुॅंचा सकता है। लोगों में कोविड के प्रति डर, सार्वजनिक दवाब एवं इस संक्रमण की भयावहता को देखते हुए केंद्र सरकार ने 18 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों को टीकाकरण के लिए पंजीकृत कराने हेतु अधिकृत किया है। साथ ही, राज्यों को खरीद पर अधिक नियंत्रण करने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश की है।

हालाॅंकि ये कुछ सकारात्मक कदम हैं, इसके बावजूद इस बात की संभावना कम है कि इन उपायों से टीके के सार्वभौमीकरण में या यहाॅं तक कि टीके की उपलब्धता में तेज़ी आएगी। 

टीके की त्वरित उपलब्धता से जुड़े कई मुद्दे निम्नलिखित हैं:

  • टीके की कमी: यदि तीन मिलियन प्रतिदिन की दर से टीकों का वितरण किया जाए तब भी भारत के प्रत्येक व्यस्क को टीके की कम-से-कम एक खुराक मिलने में 260 दिनों का समय लगेगा।
  • वित्त की कमी: भारत में राज्यों के लिए इसकी संभावना कम है कि वो नीतिगत रूप से टीकों की आपूर्ति, खरीद एवं स्टॉक हेतु वित्त की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित कर पाएॅंगे। 
  • कच्चे माल की कमी: टीकों के निर्माण हेतु संयुक्त राज्य अमेरिका से आवश्यक कच्चे माल, बैग, शीशियाॅं, सेल कल्चर मीडिया, एकल-उपयोग टयूबिंग, विशेष रसायनों, इत्यादि की आपूर्ति में रुकावट के कारण भी टीकों की उपलब्धता बाधित कर हो रही है। ज्ञातव्य है कि अब इन कच्चे माल को दूसरे देशों में निर्यात के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है।
  • वैश्विक प्रतिबद्धताएँ : एक अन्य मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों से संबंधित है। वैश्विक गठबंधन कार्यक्रम कोवैक्स ने अब तक 84 देशों में 38 मिलियन खुराक वितरित किया है, जिसमें 28 मिलियन भारत द्वारा प्रदत्त है।
    • इसके अलावा, वैक्सीन कूटनीति पहल के तहत भारत ने 60 मिलियन खुराक वितरित किया है, जिसमें आधा वाणिज्यिक शर्तों पर एवं 10 मिलियन का निर्यात अनुदान के रूप में दिया गया। भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्व का पालन करना पड़ सकता है क्योंकि जिन्हें टीके की पहली खुराक दी उन्हें दूसरी खुराक की आवश्यकता होगी।

आगे की राह

  • मल्टीमीडिया अभियान की सहायता से जागरूकता: यदि पुनः लॉकडाउन से बचना है तो मल्टीमीडिया अभियान की सहायता से आम जनता को बड़े पैमाने पर कोविड-19 से जुड़ी सूचनाएॅं देने, शिक्षित करने एवं मास्क का उपयोग करने के लिए जागरूक करना होगा, जैसा कि पोलियो एवं एचआईवी के बारे में सूचना देने के लिए किया जाता रहा है।
  • घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना: घरेलू स्तर पर टीकों के निर्माण से जुड़े मुद्दे, जैसे- वित्त की समस्या, प्रोजेक्ट को त्वरित सहमति इत्यादि, को समझकर उसका तीव्र गति से निराकरण सरकार की प्राथमिकता सूची में होनी चाहिये।
    • आगे जैसे-जैसे आपूर्ति व्यवस्था बेहतर होगी वैसे-वैसे कार्यान्वयन के निर्णयों को बेहतर बनाने तथा दक्षता हासिल करने के लिए टीकाकरण की व्यवस्था को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिये एवं कम-से-कम पाॅंच महीने का स्टॉक रखकर ही निर्यात किया जाना चाहिये। इसके अलावा, टीका अपव्यय को कम करने की आवश्यकता है।
  • टीका आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना: इलेक्ट्रॉनिक वैक्सीन इंटेलिजेंस नेटवर्क (ईवीआईएन) प्रणाली को मजबूत बनाने से देश के सभी कोल्ड चेन पॉइंट्स पर वैक्सीन स्टॉक एवं स्टोरेज तापमान की जानकारी वास्तविक समय में मिलेगी।

निष्कर्ष

भारत का कोविड-19 वैक्सीन अभियान एक ऐतिहासिक अभियान है। इसमें न केवल भारत का अपनी आबादी का टीकाकरण शामिल है बल्कि, विश्व के बड़े टीका उत्पादकों में से एक होना भी शामिल है। टीकों के विकास और वितरण से जुड़े मुद्दों को संबोधित करते हुए कम-से-कम समय में बड़ी आबादी तक कुशलतापूर्वक टीकों की पहुॅंच सुनिश्चित करनी चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: भारत में कोविड-19 टीके की सर्वभौमिकरण के समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिये।


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