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  • 17 Oct, 2020
  • 16 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

तालिबान शासन में महिला अधिकारों का भविष्य

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी और इसके कारण अफगानिस्तान में महिलाओं की स्वतंत्रता पर उठने वाले खतरे तथा इससे संबंधित अन्य महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

हाल ही में अफगानिस्तान के हेलमंद प्रांत में तालिबानी लड़ाकों और सरकारी सैन्यबलों के  बीच शुरू हुई भीषण लड़ाई के कारण क्षेत्र के हज़ारों परिवारों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा है। गौरतलब है कि फरवरी 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते के बाद पिछले माह अफगानिस्तान सरकार तथा तालिबान के बीच वार्ता शुरू हुई थी। अमेरिका के साथ हुए समझौते के बाद से यह पहला मौका नहीं है जब तालिबान द्वारा शांति समझौते का उल्लंघन किया गया है। अफगानिस्तान में लगभग दो दशकों के गैर-निर्णायक संघर्ष के बाद जैसे-जैसे अमेरिकी सेना पीछे हट रही है, देश में एक बार फिर अस्थिरता और अशांति का खतरा उत्पन्न हो गया है। अफगानिस्तान में तालिबान के साथ इस्लामी कट्टरपंथ की वापसी की आशंकाओं के बीच समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग के लोगों विशेषकर महिलाओं की स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर भी चिंताएँ उठने लगी हैं।       

पृष्ठभूमि:  

  • वर्ष 1990 के दशक में अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं की वापसी के साथ उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान का उदय हुआ। 
  • अफगानिस्तान से सोवियत सेना के जाने के कारण तालिबान ने अफगानिस्तान पर अपनी पकड़ मज़बूत की और अफगानिस्तान पर इस्लामी शासन लागू किया। 
  • तालिबान के शासन (वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2001 तक) के दौरान जनता (विशेषकर महिलाओं) को बड़े पैमाने पर प्रताड़ित किया गया। 
  • वर्ष 2001 में अमेरिका में हुए 9/11 आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया और तालिबान को अफगानिस्तान की सत्ता से हटा दिया। 
  • दिसंबर 2001 में अमेरिका के सहयोग से हामिद करज़ई को अफगानिस्तान के अंतरिम प्रशासनिक प्रमुख  के रूप में नियुक्त गया।

तालिबानी अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति:

  • अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के दौरान महिलाओं को बगैर किसी पुरुष को साथ लिये घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी।
  • इस दौरान महिलाओं की शिक्षा को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया।  
  • तालिबान द्वारा महिलाओं को नौकरी करने से रोक दिया गया था, हालाँकि कुछ महिलाओं को खेतों (विशेषकर अफीम की खेती जो तालिबान की आय का प्रमुख स्रोत था) में कार्य करने की अनुमति दी गई।
  • महिलाओं को राजनीति में हिस्सा लेने और सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने की अनुमति नहीं थी। 
  • तालिबान के शासन के दौरान महिलाओं को पुरुष डॉक्टरों से इलाज की अनुमति नहीं थी, महिलाओं की शिक्षा और रोज़गार पर प्रतिबंध होने के कारण महिलाओं के लिये स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन गई थी। 

महिलाओं की स्थिति में सुधार के प्रयास:   

  • वर्ष 2001 में तालिबान के शासन के अंत के बाद वर्ष 2004 के संविधान में महिलाओं की समाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के लिये उनके सभी अधिकारों को पुनः स्थापित किया गया। 
  • वर्ष 2018 तक अफगानिस्तान में 3,135 स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना कर उनका संचालन शुरू किया। अफगान सरकार के अनुसार, इन स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से देश की 87% आबादी के लिये उनके घर से 2 घंटे की दूरी के अंदर चिकित्सा सुविधाओं की पहुँच सुनिश्चित की जा सकी है। 
  • वर्ष 2003 में अफगानिस्तान के प्राथमिक विद्यालयों में नामांकित लड़कियों की संख्या 10% से भी कम थी, हालाँकि सरकार के प्रयासों के बाद वर्ष 2017 तक यह संख्या बढ़कर 33% तक पहुँच गई।
  • इसी प्रकार वर्ष 2003 में माध्यमिक शिक्षा केंद्रों में महिलाओं का नामांकन मात्र 6% ही था, जो वर्ष 2017 तक बढ़कर 39% तक पहुँच गया।
  • सरकार द्वारा वर्ष 2017 में स्कूली शिक्षा में 35 लाख लड़कियों और विश्वविद्यालयों में लगभग 1 लाख लड़कियों के नामांकन के साथ महिलाओं के लिये शिक्षा की पहुँच को बढ़ाने का प्रयास किया गया।
  • वर्ष 2009 में अफगानिस्तान में ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन’ (Elimination of Violence Against Women- EVAW) कानून को अपनाया गया। 

हालिया घटनाक्रम:    

  • अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना और तालिबान लड़ाकों के बीच लगभग दो दशकों तक चले संघर्ष के बाद फरवरी 2020 में दोनों पक्षों ने एक शांति समझौते की घोषणा की।
  • इस समझौते के तहत अमेरिका ने अगले 14 माह के अंदर अफगानिस्तान से अपने सभी सैनिकों को वापस बुलाने पर सहमति व्यक्त की।
  • इस समझौते के तहत अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच कैदियों की रिहाई के संदर्भ में भी एक समझौते पर हस्ताक्षर किये गए।
    • इसके तहत अफगानिस्तान सरकार द्वारा देश की जेलों में बंद लगभग 5,000 तालिबानी कैदियों और तालिबान द्वारा पकड़े गए लगभग 1000 सरकारी कर्मचारियों तथा सैन्य कर्मियों को ‘अंतर-अफगान वार्ता’ (Intra-Afghan Negotiations) के पहले रिहा करने पर सहमति व्यक्त की गई थी।
  • इसके साथ ही इस समझौते के तहत अमेरिका द्वारा तालिबानी नेताओं पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की बात भी कही गई।

तालिबान शासन में महिलाओं का भविष्य :         

  • अफगानिस्तान की 75% महिलाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में रहती हैं, जहाँ तालिबान की पकड़ हमेशा ही बनी रही है और अमेरिका-तालिबान शांति वार्ताओं के दौरान भी इन क्षेत्रों में तालिबान तथा अफगान सैनिकों के बीच संघर्ष नहीं रुका है।
  • हाल के वर्षों में अफगानिस्तान के कई क्षेत्रों में तालिबान एक बार पुनः मज़बूत हुआ है, गौरतलब है कि वर्ष 2011 में किये गए एक अध्ययन में अफगानिस्तान को ‘महिलाओं के लिये सबसे असुरक्षित देश’ के रूप में चिह्नित किया गया था।  
  • वर्तमान में मध्यपूर्व में इस्लामिक स्टेट की पकड़ कमज़ोर होने के बाद  तालिबान शासित अफगानिस्तान में कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों को एक नया मंच मिल सकता है, जिसके कारण अफगानिस्तान में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न में भारी वृद्धि होगी।
  • पिछले कुछ महीनों में अफगानिस्तान में लोकतंत्र समर्थक राजनीतिक दलों के बीच आपसी विवाद के बढ़ने और कई दलों द्वारा तलिबान से सत्ता साझा करने पर वार्ता के लिये सहमति देने से तालिबान की स्थिति और अधिक मज़बूत हुई है।  
  • अमेरिका के साथ शांति वार्ताओं के दौरान तालिबान द्वारा शरिया कानून के तहत महिला अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है परंतु तालिबान द्वारा इस मुद्दे पर कोई अधिक जानकारी नहीं दी गई है, जिससे इस मुद्दे पर तालिबान के विचारों पर अस्पष्टता बनी हुई है।    

पाकिस्तान की भूमिका:

  • धार्मिक कट्टरपंथ: 
    • हाल के दिनों में पाकिस्तान में शिया मुस्लिमों के खिलाफ दबाव में वृद्धि देखने को मिली है।
    • गौरतलब है कि हाल ही में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ‘पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ’ (PTI) के नेताओं द्वारा विधानसभा में एक विधेयक पेश किया, जिसके तहत उन सुन्नी धर्म गुरुओं के प्रति श्रद्धा को अनिवार्य बताया गया जिनका शिया मुस्लिमों द्वारा परंपरागत रूप से विरोध देखने को मिला है। 
    • पाकिस्तान में शिया समुदाय का उत्पीड़न तालिबान शासित अफगानिस्तान में शिया समुदाय (विशेषकर हज़ारा लोगों) के शोषण के लिये तालिबान के साहस को बढ़ाएगा। 
    • एक रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट शासन के अत्याचार से बचने के लिये लगभग 4 लाख लोगों को पाकिस्तान में शरण लेनी पड़ी और वर्ष 1980 के अंत तक पाकिस्तान में रह रहे अफगान प्रवासियों की संख्या 40 लाख तक पहुँच गई थी।
    • अफगानिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथ और शिया विरोधी गतिविधियों की वृद्धि से एक बार पुनः अल्पसंख्यकों के पलायन (जिसमें बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की होगी) का खतरा उत्पन्न हो सकता है।  
  • राजनीतिक हस्तक्षेप: 
    •  अमेरिका-तालिबान शांति वार्ता की शुरुआत के बाद से ही पाकिस्तान अपने पड़ोसी देश के राजनीतिक बदलाव में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय रहा है।  
    • पाकिस्तान इस मौके का लाभ उठाकर क्षेत्र में अपनी पकड़ को मज़बूत करने का प्रयास करना चाहेगा।   

भारत का योगदान:

  • भारत हमेशा से ही एक लोकतांत्रिक और स्व-शासित अफगानिस्तान का समर्थक रहा है।
  • वर्ष 2001 के बाद से ही भारत सरकार और देश के कई गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा अफगानिस्तान में स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों के साथ महिला सशक्तीकरण में भी अपना योगदान दिया गया है, इसके साथ ही वर्ष 2017 में भारत द्वारा कुछ अफगान महिला सैनिकों को प्रशिक्षण भी प्रदान किया गया है।
  • अफगानिस्तान में भारतीय NGOs के कार्यों के लिये उन्हें ‘यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ (U.S. Agency for International Development-USAID) जैसी कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है।

क्षेत्रीय शांति और भारत के हितों पर प्रभाव:   

  • अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के पीछे हटने से क्षेत्र की शांति के लिये एक बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी सैनिकों की अनुपस्थिति में अफगानिस्तान की अस्थिरता का लाभ उठाकर पाकिस्तान द्वारा भारत में आतंकवादी घटनाओं को संचालित करने के लिये अफगानिस्तान का प्रयोग किया जा सकता है। 
  • वर्तमान अफगान सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मंचों के अधिकांश मुद्दों पर भारत का समर्थन किया है, परंतु तालिबान पाकिस्तान के अधिक नज़दीक है।
  • मध्य एशिया के बाज़ारों में भारत की पकड़ मज़बूत करने में अफगानिस्तान की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, ऐसे में यदि अफगानिस्तान में तालिबान पुनः सत्ता में वापस आता है तो इससे भारतीय परियोजनाओं को भारी क्षति होगी।

आगे की राह: 

  • हाल के दिनों में अफगानिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में तालिबान लड़ाकों के हमलों में हो रही वृद्धि के बीच इस क्षेत्र से अमेरिकी सेना को पूरी तरह से हटाए जाने के बाद क्षेत्र में भारी अशांति फैल सकती है।
  • तालिबान से शांति वार्ता के दौरान भविष्य के अफगानिस्तान में महिलाओं की भूमिका के मुद्दों और महिला अधिकारों (शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक,सामाजिक आदि) के संदर्भ में एक न्यूनतम मानक का निर्धारण किया जाना चाहिये।
  • अफगानिस्तान से अमेरिका की सेना के हटने के बाद भी अफगान राजनीति में आर्थिक सहायता के माध्यम से अमेरिका की पकड़ बनी रहेगी ऐसे में यदि अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी होती है, तब भी अमेरिका अफगानिस्तान में महिला अधिकारों की रक्षा हेतु आर्थिक प्रतिबंधों को दबाव बनाने के हथियार के रूप में प्रयोग कर सकेगा।
  • अफगानिस्तान के बदलते राजनीतिक परिवेश में भारत को  तालिबान से वार्ता करने पर विचार करना चाहिये, हालाँकि यह वार्ता अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार के सामंजस्य के साथ ही होनी चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: अफगानिस्तान से अमेरिकी सैन्य बलों की वापसी के बाद क्षेत्र की शांति और तालिबान शासित अफगानिस्तान में महिला अधिकारों के भविष्य पर चर्चा कीजिये।


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