हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

एडिटोरियल

  • 16 Oct, 2020
  • 17 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

बहुपक्षवाद: चुनौतियाँ और संभावनाएँ

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में COVID-19 की चुनौती के बीच समकालीन वैश्विक व्यवस्था में बहुपक्षवाद के महत्त्व और इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Program- WFP) को वर्ष 2020 के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। गौरतलब है कि WFP को यह सम्मान ऐसे समय में प्राप्त हुआ है जब वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने के लिये साझा सहयोग में भारी कमी देखी गई है। COVID-19 महामारी के कारण देशों की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट के साथ वैश्विक स्तर पर गरीबी और भुखमरी के मामलों में भारी वृद्धि का अनुमान है। COVID-19 महामारी के दौरान जब वैश्विक सहयोग की आवश्यकता सबसे अधिक है तब भी वर्तमान में साझा सहयोग के बजाय विश्व के कई देशों द्वारा समानांतर और प्रतिस्पर्द्धी प्रयासों के रूप में भारी मतभेद देखने को मिले हैं। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर देशों के बीच सहयोग की कमी और संरक्षणवादी विचारधारा में वृद्धि के बाद संयुक्त राष्ट्र (United Nations- UN) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation- WHO) जैसी कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका पर प्रश्न उठने लगे हैं।

COVID-19 और खाद्य संकट:

  • COVID-19 महामारी के कारण वैश्विक स्तर पर गरीबी और भुखमरी के फैलने का संकट उत्पन्न हो गया है।
  • WFP के अनुसार, इस महामारी के कारण दुनिया में कुपोषण से पीड़ित लोगों के मामलों में 135 मिलियन तक की वृद्धि देखी जा सकती है।
  • इस महामारी के कारण वर्तमान में वैश्विक स्तर पर भोजन की उपलब्धता के संकट से जूझ रहे 690 लोगों में लगभग 100 मिलियन की वृद्धि हो सकती है।
  • वर्तमान में यदि इस संकट के दौरान विश्व के सभी देश एकजुट नहीं होते हैं तो यह एक बड़ी आपदा का रूप ले सकता है।         

नोबेल शांति पुरस्कार-2020 और इसका महत्त्व :        

  • ‘विश्व खाद्य कार्यक्रम’ (WFP) को यह सम्मान विकासशील देशों में भूख और कुपोषण का मुकाबला करने में इसकी भूमिका के लिये प्रदान किया गया है।
  • वर्ष 1961 में इसकी स्थापना के बाद से वैश्विक स्तर पर भुखमरी की समस्या से लड़ने और खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने में WFP ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • हालाँकि इसके अथक प्रयासों के बावजूद भी वैश्विक खाद्य संकट से निपटने में WFP की उपलब्धियाँ बहुत सामान्य ही रहीं है।
  • इसका सबसे बड़ा कारण WFP के प्रयासों में वैश्विक सहयोग और वित्त पोषण की भारी कमी रही है।
  • WEP को वर्ष 2020 को नोबेल शांति पुरस्कार दिया जाना वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता और बहुपक्षवाद को बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

बहुपक्षवाद के मार्ग में बाधाएँ :

  • संरक्षणवाद: 
    • वर्ष 2007-08 की आर्थिक मंदी के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देशों के बीच संरक्षणवाद की विचारधारा में वृद्धि देखने को मिली, जो इस मंदी के बाद भी किसी न किसी रूप में जारी रही। COVID-19 महामारी के कारण अंतर्राष्ट्रीय पटल पर यह संरक्षणवाद पुनः प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है।  
  • द्विपक्षीय तनाव:  
    • वर्तमान में कई वैश्विक संस्थान सदस्य देशों के बीच प्रतिवाद का केंद्र बन गए हैं।  
    • उदाहरण के लिये- शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और रूस के तनाव के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council-UNSC) में भारी गतिरोध देखने को मिला तथा वर्तमान में अमेरिका और चीन का तनाव वैश्विक संगठनों के लिये एक नई चुनौती बन गया है।  
  • व्यावसायिक दृष्टिकोण:    
    • अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सदस्य देशों के बीच सहयोग के प्रति उत्साह की बजाय इसे एक मज़बूरी के रूप में देखा जाता है।
    • ज़्यादातर देश अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कम-से-कम योगदान देकर अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, यह दृष्टिकोण व्यापार और रक्षा सौदों के लिये उपयुक्त हो सकता है परंतु वैश्विक जलवायु संकट या वर्तमान महामारी के लिये नहीं।
      • ‘विश्व खाद्य कार्यक्रम’ (WFP) जैसी पहल के लिये वित्तपोषण की चुनौती वैश्विक सहयोग के प्रति समर्थ देशों की कमज़ोर इच्छाशक्ति को दर्शाता है।  
  • नेतृत्त्व की विफलता: 
    • COVID-19 महामारी ने प्रमुख बहुपक्षीय संस्थाओं के नेतृत्त्व की भारी कमियों को रेखांकित किया है।
    • इस महामारी के दौरान ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (WHO) न सिर्फ COVID-19 की विभीषिका के संदर्भ में विश्व को आगाह करने में विफल रहा बल्कि WHO इस चुनौती से निपटने के लिये सदस्य देशों को एकजुट करने में संघर्ष करता दिखाई दिया।
    • उदाहरण के लिये- अमेरिका COVID-19 के लिये चीन को उत्तरदायी बताते हुए WHO से अलग हो गया। 
    • साथ ही वर्तमान में WHO द्वारा COVID-19 वैक्सीन निर्माण के लिये कोवैक्स (COVAX) जैसी पहल के बावजूद कई देशों द्वारा COVID-19 वैक्सीन के निर्माण हेतु समानांतर और व्यक्तिगत प्रयास देखने को मिले हैं।          
  • प्रतिनिधित्त्व का अभाव:  
    • अपनी स्थापना के 75 वर्ष पूरे करने बाद आज भी संयुक्त राष्ट्र बहुपक्षीय संस्थानों और साझा प्रयासों का केंद्र बना हुआ है, हालाँकि वर्तमान में यह संस्थान अपने प्रारंभिक दृष्टिकोण की एक छाया बन कर रह गया है। 
    • वर्तमान में यदि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक चुनौतियों के लिये अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया जुटाने में सक्रियता की कमी देखने को मिली है तो इसके लिये इस संगठन के सबसे शक्तिशाली देश ही उत्तरदायी हैं। 
    • इन शक्तिशाली सदस्यों ने न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र को महत्त्वपूर्ण संसाधनों से वंचित रखा है बल्कि पिछले 75 वर्षों के दौरान इस संगठन में काफी समय से लंबित सुधार के प्रयासों का भी विरोध किया है। 
    •  पिछले 75 वर्षों के दौरान वैश्विक राजनीति में हुए भारी बदलावों के बाद वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र आज की वैश्विक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।
    • वर्तमान में लगभग 1.3 बिलियन की आबादी, लोकतंत्र समर्थक, वैश्विक शांति में प्रमुख भूमिका निभाने और विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के बावजूद भी भारत जैसे देश को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से वंचित रखा जाना संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

वैश्वीकरण का भविष्य और साझा सहयोग का महत्त्व:

  • हाल के वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भले ही अधिकांश देशों के बीच संरक्षणवादी विचारों में वृद्धि देखने को मिली है परंतु वैश्वीकरण किसी-न-किसी रूप में हमेशा ही सक्रिय रहता है।  
  • COVID-19 महामारी के कारण डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में वैश्वीकरण में तेज़ प्रगति देखने को मिली है। 
  • वर्तमान में वैश्वीकरण प्रौद्योगिकी विकास से जुड़ा हुआ है, ऐसे में जब तक प्रौद्योगिकी आर्थिक विकास का एक प्रमुख प्रेरक बनी रहती है, वैश्वीकरण भी बना रहेगा।     
  • COVID-19 की ही तरह वैश्विक स्तर पर आने वाली अन्य चुनौतियों की व्यापकता और गंभीरता के साथ इसके लिये तात्कालिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की भूमिका और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
  • यदि ऐसे संस्थानों में शामिल सभी सदस्य अपनी क्षमता के अनुरूप सहयोग की भावना के साथ आए तो समस्याओं के समाधान हेतु प्रयासों की गतिशीलता और उनके परिणामों में भारी सुधार देखने को मिलेगा।
  • वर्तमान में UN जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है क्योंकि वैश्विक मुद्दों/समस्याओं के महत्त्व के विस्तार के साथ इसके समाधान के लिये बहुपक्षीय दृष्टिकोण की आवश्यकता बहुत बढ़ी है।   
  • भारत हमेशा से ही बहुपक्षवाद का समर्थक रहा है, हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री ने वैश्विक स्तर पर स्थायी शांति और समृद्धि के लिये बहुपक्षवाद के मार्ग को अपनाने के संदर्भ में भारत के समर्थन को दोहराते हुए साझा चुनौतियों के समाधान हेतु मिलकर कार्य करने का आह्वान किया था।   

स्थानीय और वैश्विक चुनौतियों का एकीकरण:  

  • समकालीन विश्व में स्थानीय और बाहरी मुद्दों का अंतर तेज़ी से समाप्त हुआ है, बहुत से  मामलों में घरेलू चुनौतियों से निपटने के दौरान बाहरी सहयोग लगभग अनिवार्य हो गया है
  • उदाहरण के लिये, जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं के लिये यह तथ्य पूर्णतया सही है, क्योंकि आने वाले दिनों में भारत भले ही अपने कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने में सफल हो जाए परंतु हम जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से तब तक प्रभावित होते रहेंगे जब तक सभी देश अपना उत्सर्जन कम नहीं करते हैं।
  • COVID-19 चीन से शुरू होकर उन देशों तक भी पहुँच गया जिनका इस दौरान चीन से कोई सीधा संपर्क नहीं था ऐसे में यदि वैश्विक स्तर पर पहले से एक मज़बूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली होती तो इस महामारी की क्षति को कम किया जा सकता था।
  • इसी प्रकार ऊर्जा, जल और खाद्य सुरक्षा की चुनतियाँ भी एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने के प्रयासों के दौरान जल तथा ऊर्जा सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न हो सकती है, साथ ही स्वास्थ्य पर भी इसका संपार्श्विक प्रभाव देखने को मिल सकता है।            

आगे की राह:

  • समकालीन विश्व में अधिकांश समस्याओं के समाधान में व्यापक वैश्विक सहयोग की आवश्यकता को देखते हुए ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा सतत् विकास लक्ष्यों (Sustainable development Goals- SDGs) पर सहमति व्यक्त की गई थी।  
  • COVID-19 महामारी से यह स्पष्ट हुआ है कि विश्व के किसी भी कोने में एक नई महामारी उठकर पूरे विश्व में फैल सकती है, साथ ही ऐसी किसी समस्या का समाधान बल प्रयोग के माध्यम से नहीं बल्कि सामूहिक सहयोग से किया जा सकता है और यह केवल एक बहुपक्षवादी वैश्विक व्यवस्था में ही संभव है।            
  • इस महामारी के बाद विश्व के देशों को राजनीतिक अवसरवादिता और राष्ट्रवादी विचारों को पीछे रखते हुए वैश्विक सहयोग को बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना होगा।  
  • COVID-19 महामारी से सीख लेते हुए WHO और UN जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार किये जाने चाहिये। 
  • संयुक्त राष्ट्र में सुधार के लिये इसकी प्रमुख इकाइयों जैसे UNSC में व्यापक वैश्विक प्रतिनिधित्त्व का होना बहुत ही आवश्यक है।
  • भारत को UNSC में अपनी अस्थाई सदस्यता के अगले दो वर्षों के कार्यकाल के दौरान अपनी स्थायी सदस्यता के साथ UN की कार्यप्रणाली में अन्य आवश्यक सुधारों को बढ़ावा देने का प्रयास करना चाहिये।

निष्कर्ष: 

वैश्विक स्थिरता और समृद्धि के लिये वर्तमान में एक ऐसे अंतर्राष्ट्रीय तंत्र की आवश्यकता है जो लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हो और पारदर्शी कार्यप्रणाली के साथ साझा उत्तरदायित्व एवं समान प्रतिनिधित्व का समर्थन करता हो। COVID-19 महामारी ने विश्व को बहुपक्षवाद के महत्त्व और इसे संरक्षित करने की आवश्यकता को याद दिलाने के लिये महत्त्वपूर्ण संकेत का काम किया है। अतः विश्व के सभी देशों को मिलकर अपने साझा हितों की रक्षा हेतु सहयोग को बढ़ावा देना चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: COVID-19 महामारी ने समकालीन वैश्विक व्यवस्था में बहुपक्षवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया है। वर्तमान समय में बहुपक्षवाद के मार्ग की प्रमुख चुनौतियों के  साथ इसके समाधान के विकल्पों पर चर्चा कीजिये।


एसएमएस अलर्ट
 

नोट्स देखने या बनाने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

नोट्स देखने या बनाने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close

प्रोग्रेस सूची देखने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close

आर्टिकल्स को बुकमार्क करने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close