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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत की इथेनॉल रणनीति

यह लेख 14/04/2026 को द हिंदू में प्रकाशित ‘A strategic ethanol shift amid West Asia tensions’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के इथेनॉल सम्मिश्रण रोडमैप के बहुआयामी प्रभावों का विश्लेषण करते हुए, तेल आयात निर्भरता में कमी लाने में इसकी भूमिका का आकलन करता है, साथ ही जल संकट एवं खाद्य सुरक्षा जैसी संरचनात्मक चुनौतियों का सम्यक परीक्षण करता है। इसके अतिरिक्त यह एक अनुकूलित, आत्मनिर्भर एवं जलवायु-संवेदी ऊर्जा ढाँचा विकसित करने हेतु उन्नत 2G/3G जैव ईंधन तथा कार्बन कैप्चर एकीकरण की दिशा में संक्रमण का प्रस्ताव करता है।

प्रिलिम्स के लिये: E20 ईंधन, जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति, वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन, पायरोलिसिस

मेन्स के लिये: भारत के लिये इथेनॉल सम्मिश्रण का महत्त्व, भारत में इथेनॉल सम्मिश्रण संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ। 

पश्चिम एशियाई भू-राजनीतिक अस्थिरताओं से उत्पन्न निरंतर व्यवधानों के परिप्रेक्ष्य में कच्चे तेल के आयात पर भारत की लगभग 85% निर्भरता ने वैकल्पिक ईंधनों की आवश्यकता को और अधिक तीव्र बना दिया है। इस संदर्भ में, इथेनॉल सम्मिश्रण वर्ष 2013 के 1.5% से बढ़कर वर्ष 2024 में लगभग 18% तक पहुँच गया है, जो एक निर्णायक नीतिगत परिवर्तन को परिलक्षित करता है। इस परिवर्तन से प्रतिवर्ष 30,000 करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत होने और लगभग 1 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आने का अनुमान है। साथ ही इस पहल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 90,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश को प्रोत्साहित किया है, जिसके फलस्वरूप इथेनॉल ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु लक्ष्यों एवं कृषि स्थिरता के मध्य एक रणनीतिक सेतु के रूप में उभरकर सामने आया है।

इथेनॉल सम्मिश्रण क्या है?

  • परिचय : इथेनॉल सम्मिश्रण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एथिल अल्कोहल (इथेनॉल) को गैसोलीन (पेट्रोल) के साथ मिलाकर मिश्रित मोटर ईंधन बनाया जाता है। इस मिश्रण का उपयोग सामान्य आंतरिक दहन इंजनों या विशेष फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को चलाने के लिये किया जाता है।
    • भारत में मिश्रण को प्रायः ‘E10’ या ‘E20’ के रूप में व्यक्त किया जाता है, जहाँ संख्या मिश्रण में इथेनॉल के प्रतिशत को दर्शाती है।
  • इथेनॉल निर्माण की प्रक्रिया : इथेनॉल एक जैव ईंधन है, जो मुख्य रूप से शर्करा या स्टार्च आधारित कच्चे माल के किण्वन से प्राप्त होता है। स्रोत सामग्री के आधार पर इसे विभिन्न ‘पीढ़ियों’ में वर्गीकृत किया जाता है:
    • 1G (प्रथम पीढ़ी): गन्ने के रस, शीरा, मक्का और क्षतिग्रस्त खाद्यान्न (चावल या मक्का) जैसे खाद्य स्रोतों से बनाया जाता है।
    • 2G (दूसरी पीढ़ी): यह कृषि अपशिष्ट और अवशेषों से बनाया जाता है, जैसे कि  धान की पराली, गेहूँ का भूसा तथा मक्का के भुट्टे (लिग्नोसेलुलोसिक बायोमास)।
    • 3G (तृतीय पीढ़ी): विभिन्न जल स्रोतों में उगाई गई शैवाल (Algae) से प्राप्त।
    • 4G (चतुर्थ पीढ़ी): यह एक उन्नत जैव ईंधन है, जिसे औद्योगिक उत्सर्जन और हरित हाइड्रोजन को उन्नत सूक्ष्मजीव किण्वन प्रक्रिया द्वारा ईंधन में परिवर्तित करके बनाया जाता है। यह खाद्य फसलों पर निर्भरता को समाप्त करते हुए एक सतत, गैर-खाद्य आधारित समाधान प्रदान करता है।
  • भारत में इथेनॉल सम्मिश्रण के लिये नीतिगत ढाँचा: भारत में इथेनॉल सम्मिश्रण मुख्य रूप से जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति के अंतर्गत आता है, जो जैव ईंधन को बढ़ावा देने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने के लिये एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।
    • जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति, 2018 (वर्ष 2022 में संशोधित) के अंतर्गत पेट्रोल में 20% इथेनॉल सम्मिश्रण (E20) का लक्ष्य, पूर्व निर्धारित वर्ष 2030 की समय-सीमा से बढ़ाकर इथेनॉल आपूर्ति वर्ष (ESY) 2025-26 तक प्राप्त करने का प्रावधान किया गया है।
    • सरकार द्वारा इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम क्रियान्वित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत तेल एवं गैस कंपनियाँ अधिकतम 20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का विपणन करती हैं।
      • इसके अतिरिक्त, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) के प्रोत्साहन हेतु इथेनॉल पर GST की दर को घटाकर 5% कर दिया गया है, जिससे इस क्षेत्र की आर्थिक व्यवहार्यता को सुदृढ़ किया जा सके।

भारत के लिये इथेनॉल सम्मिश्रण का क्या महत्त्व है? 

  • रणनीतिक ऊर्जा स्वायत्तता का सुदृढ़ीकरण: इथेनॉल सम्मिश्रण पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के विरुद्ध एक प्रभावी रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, जिससे वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव सीमित रहता है।
    • ईंधन आपूर्ति के एक हिस्से का स्थानीयकरण करते हुए, भारत आयातित कच्चे तेल पर अपनी संरचनात्मक निर्भरता को कम करता है। 
    • वर्ष 2026 के प्रारंभ में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के दौरान, भारत के 20% इथेनॉल सम्मिश्रण (E20) ने एक घरेलू बफर के रूप में कार्य किया, जिसने दिल्ली में ईंधन मूल्यों को वर्ष 2021 के स्तर से नीचे बनाए रखने में योगदान दिया।
    • साथ ही वित्तीय वर्ष 2025 के अंत तक लगभग 20% मिश्रण प्राप्त होने से 19.3 बिलियन डॉलर की अनुमानित विदेशी मुद्रा बचत संभव हुई।
    • इसके अतिरिक्त, सरकार द्वारा पेट्रोल में इथेनॉल सम्मिश्रण को 20% से बढ़ाकर 21% करने की संभावना व्यक्त की गई है, जिससे ऊर्जा आयात निर्भरता में और कमी लाई जा सके।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था का परिवर्तन: इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम ने ‘खाद्य अधिशेष’ को एक रणनीतिक ‘ईंधन संसाधन’ में बदल दिया है, जिससे किसानों को पारंपरिक खाद्य खरीद से परे एक गारंटीकृत और लाभकारी बाज़ार उपलब्ध हो गया है। 
    • इथेनॉल का मिश्रण किसानों को अन्नदाता और ऊर्जादाता दोनों के रूप में सशक्त बनाता है, जिससे कृषि को ऊर्जा उत्पादन से जोड़ा जा सकता है।
    • खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) के अनुसार, इथेनॉल बिक्री से चीनी मिलों के नकदी प्रवाह में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप गन्ना किसानों को समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित हो पाया है। 
      • वर्ष 2014-15 से 2023-24 के मध्य, चीनी मिलों ने इथेनॉल बिक्री से 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व अर्जित किया, जिससे उनकी वित्तीय स्थिरता सुदृढ़ हुई।
      • इसके अतिरिक्त, वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच मक्का-आधारित इथेनॉल की प्रशासित कीमतों में लगभग 11.7% की CAGR से वृद्धि दर्ज की गई, जो पारंपरिक अनाज मूल्यों की वृद्धि दर से उल्लेखनीय रूप से अधिक है।
  • कार्बन उत्सर्जन में कमी और जलवायु नेतृत्व: इथेनॉल एक स्वच्छ रूप से जलने वाला ऑक्सीजन युक्त ईंधन है जो परिवहन क्षेत्र के कार्बन फुटप्रिंट को काफी कम करता है, जिससे भारत को पेरिस समझौते के तहत अपने राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों को पूरा करने में मदद मिलती है। 
    • यह वाहनों के पूर्ण विद्युतीकरण की प्रतीक्षा किये बिना टेलपाइप उत्सर्जन में कमी लाने का एक तत्काल एवं व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। 
    • नीति आयोग के अध्ययनों के अनुसार, गन्ना-आधारित इथेनॉल से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 65% तथा मक्का-आधारित इथेनॉल से लगभग 50% की कमी आती है। 
  • चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था में अग्रणी: द्वितीय पीढ़ी (2G) इथेनॉल संयंत्रों की स्थापना के माध्यम से कृषि अपशिष्ट (जैसे पुआल एवं भूसी) का उपयोग कर पर्यावरणीय प्रदूषण एवं ऊर्जा उत्पादन की दोहरी समस्या का समाधान किया जाता है।
    • इससे एक सतत मूल्य शृंखला का निर्माण होता है, जिसमें फसल अवशेष, जो पूर्व में जलाए जाते थे, अब लाभकारी औद्योगिक कच्चे माल में परिवर्तित हो रहे हैं।
    • मार्च 2026 में BPCL द्वारा ओडिशा के बरगढ़ में स्थापित वाणिज्यिक स्तर की 2G रिफाइनरी प्रतिदिन लगभग 100 किलोलीटर इथेनॉल का उत्पादन करती है। 
      • इस प्रकार की अवसंरचना पराली जलाने की समस्या को कम करने में सहायक हो सकती है, जो उत्तरी भारत में शीतकालीन स्मॉग का एक प्रमुख स्रोत है।
  • ऑटोमोटिव तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहन: E20 एवं फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFV) की ओर संक्रमण ने भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग में त्वरित तकनीकी उन्नयन को प्रेरित किया है, जिससे भारतीय निर्मित वाहन वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्द्धी बन रहे हैं। 
    • निर्माता अब उच्च इथेनॉल संक्षारण क्षमता को सहन करने हेतु इंजन डिज़ाइन में परिवर्तन कर रहे हैं, जिससे विशिष्ट ऑटो-घटक पारिस्थितिकी तंत्र का विकास हो रहा है। 
    • E20 अब देशव्यापी मानक खुदरा पेट्रोल के रूप में स्थापित हो चुका है, जिसके परिणामस्वरूप मारुति सुज़ुकी एवं टाटा मोटर्स जैसी प्रमुख कंपनियों ने अपने पोर्टफोलियो में E20-अनुरूप मॉडल लॉन्च किये हैं। 
      • इसके अतिरिक्त, E21 एवं E27 मिश्रणों के परीक्षण भी जारी हैं, जो भविष्य के उच्च-इथेनॉल मिश्रण के लिये आधार तैयार कर रहे हैं।
  • राजकोषीय स्थिरता एवं व्यापक आर्थिक सुदृढ़ता: इथेनॉल सम्मिश्रण के माध्यम से तेल आयात बिल में उल्लेखनीय कमी लाकर चालू खाता घाटे (CAD) के प्रभावी प्रबंधन तथा भारतीय रुपये की स्थिरता को सुदृढ़ किया जा रहा है। 
    • इस प्रकार उत्पन्न राजकोषीय गुंजाइश सरकार को ऊर्जा आयात पर होने वाले व्यय को घरेलू अवसंरचना एवं सामाजिक कल्याण योजनाओं की ओर पुनर्निर्देशित करने में सक्षम बनाती है।
    • 20% इथेनॉल सम्मिश्रण के परिणामस्वरूप 19.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा बचत का अनुमान इस दिशा में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि को दर्शाता है, विशेषकर उस परिप्रेक्ष्य में जब वर्ष 2050 तक वैश्विक ऊर्जा मांग में भारत की हिस्सेदारी लगभग 10% तक पहुँचने की संभावना है।
  • वैश्विक नेतृत्व का संवर्द्धन: ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (GBA) के माध्यम से भारत ने जैव ईंधन नीति के क्षेत्र में स्वयं को एक वैश्विक अग्रणी के रूप में स्थापित किया है तथा अपने ‘इंडिया मॉडल’ को अन्य विकासशील देशों में प्रसारित कर रहा है। 
    • यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग न केवल भारत की सॉफ्ट पावर को सुदृढ़ करता है, बल्कि भारतीय इथेनॉल प्रौद्योगिकी एवं इंजीनियरिंग सेवाओं के लिये नए निर्यात अवसरों का सृजन भी करता है। 
    • वर्ष 2026 में आयोजित ‘इंडिया एनर्जी वीक के दौरान, भारत ने 2013 के 1.5% मिश्रण से बढ़कर 2025 में 20% मिश्रण तक की अपनी तीव्र प्रगति का प्रदर्शन किया। 
    • यह ‘त्वरित प्रगति मॉडल’ अब GBA ढाँचे के अंतर्गत ब्राज़ील एवं विभिन्न अफ्रीकी देशों में जैव ईंधन अपनाने के लिये एक मानक रूपरेखा के रूप में उभर रहा है।

भारत में इथेनॉल सम्मिश्रण से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • खाद्य सुरक्षा बनाम ईंधन हेतु कच्चे माल की प्रतिस्पर्द्धा: इथेनॉल उत्पादन के लिये कच्चे माल, विशेषकर मक्का की बढ़ती मांग ने कृषि प्राथमिकताओं को विकृत करने की प्रवृत्ति उत्पन्न की है, जिससे पोषण सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। 
    • अनुकूल मूल्य निर्धारण नीतियों के परिणामस्वरूप किसान आवश्यक खाद्य फसलों से हटकर अधिक लाभकारी इथेनॉल-आधारित खाद्यान्नों की ओर उन्मुख हो रहे हैं। 
    • आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के अनुसार, जहाँ वित्त वर्ष 2016 के पश्चात मक्का उत्पादन में लगभग 48% वृद्धि दर्ज की गई है, वहीं दालों एवं तिलहनों जैसी महत्त्वपूर्ण फसलों के कृषि क्षेत्रफल में कमी देखी गई है। 
      • यह प्रवृत्ति खाद्य तेल आयात निर्भरता को और बढ़ा सकती है तथा घरेलू खाद्य मूल्यों में अस्थिरता को प्रोत्साहित कर सकती है।
  • 2G प्रौद्योगिकी की संरचनात्मक बाधाएँ: द्वितीय पीढ़ी (2G) इथेनॉल संयंत्र, जो कृषि अवशेषों के उपयोग पर आधारित हैं, तकनीकी सीमाओं के कारण अपेक्षित उत्पादन स्तर प्राप्त करने में विफल रहे हैं। 
    • कृषि अपशिष्ट की परिवर्तनशील गुणवत्ता प्रसंस्करण संयंत्रों की मशीनरी पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, जिससे परिचालन अक्षमताएँ उत्पन्न होती हैं। 
    • उदाहरण के लिये, IOCL द्वारा पानीपत में स्थापित 2G इथेनॉल संयंत्र अपने आरंभ से ही 100 किलोलीटर प्रतिदिन की निर्धारित क्षमता से नीचे संचालित हो रहा है, जो इस क्षेत्र में विद्यमान प्रौद्योगिकीय चुनौतियों को रेखांकित करता है।
  • ऑटोमोटिव कराधान एवं फ्लेक्स-फ्यूल की व्यवहार्यता: यद्यपि ऑटोमोबाइल उद्योग ने फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFV) के ऐसे प्रोटोटाइप विकसित किये हैं जो उच्च इथेनॉल मिश्रण के उपयोग में सक्षम हैं, तथापि कठोर कराधान नीतियाँ इनके बाज़ार प्रसार में प्रमुख बाधा बनी हुई हैं। 
    • समान अवसरों के अभाव के कारण, अन्य हरित प्रौद्योगिकियों की तुलना में यह सतत विकल्प सामान्य उपभोक्ता के लिये आर्थिक रूप से कम आकर्षक सिद्ध हो रहे हैं। 
    • अप्रैल 2026 तक, FFV पर वस्तु एवं सेवा कर (GST) की दर 18% से 40% के मध्य निर्धारित है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों पर लागू 5% कर दर की तुलना में अत्यधिक है। 
    • परिणामस्वरूप, मारुती सुज़ुकी एवं बजाज जैसी प्रमुख कंपनियाँ तब तक वृहद उत्पादन को स्थगित कर रही हैं, जब तक कि सरकार द्वारा कर संरचना का युक्तिसंगत पुनर्संतुलन नहीं किया जाता।
  • भूजल क्षरण का गंभीर संकट: प्रथम पीढ़ी (1G) कच्चे माल, विशेषकर गन्ना पर अत्यधिक निर्भरता भारत के सीमित भूजल भंडारों पर असंतुलित दबाव उत्पन्न कर रही है। 
    • अर्द्ध-शुष्क एवं शुष्क क्षेत्रों में जल-गहन फसलों का विस्तार जैव ईंधन संक्रमण के पारिस्थितिक आधार को कमज़ोर करता है। 
    • गन्ना उत्पादन में अत्यधिक जल खपत के कारण महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में जल संकट और अधिक गहरा रहा है। 
    • यद्यपि नीतिगत स्तर पर धान जैसी जल-गहन फसलों से कम जल-आवश्यकता वाली फसलों की ओर स्थानांतरण का प्रयास किया गया है, तथापि यह परिवर्तन अपेक्षित रूप से प्रभावी नहीं हो पाया है, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय जलभंडारों का क्षरण निरंतर तीव्र हो रहा है।
  • डिस्टिलरी की अधिक क्षमता एवं बाज़ार असंतुलन: डिस्टिलरी उत्पादन क्षमता और तेल विपणन कंपनियों (OMC) द्वारा की जा रही वास्तविक खरीद के मध्य विद्यमान व्यापक अंतर ने एक गंभीर संरचनात्मक अधिशेष को जन्म दिया है। 
    • इस परिणामी अति-आपूर्ति की स्थिति जैव ईंधन विनिर्माण क्षेत्र की वित्तीय व्यवहार्यता को प्रभावित कर रही है, जिससे परिसंपत्तियों का अल्प उपयोग एवं लाभ मार्जिन में संकुचन देखने को मिल रहा है। 
    • अप्रैल 2026 तक उद्योग को लगभग 20 अरब लीटर इथेनॉल अधिशेष का सामना करना पड़ा, जबकि OMC के अनुबंध मात्र लगभग 11 अरब लीटर तक सीमित रहे, जो इस मांग-आपूर्ति असंतुलन की तीव्रता को दर्शाता है।
  • इंजन क्षरण एवं उपभोक्ता संकोच: इथेनॉल के रासायनिक गुण, विशेषकर इसकी उच्च आर्द्रता-अवशोषण क्षमता, उन पारंपरिक वाहनों के लिये गंभीर यांत्रिक जोखिम उत्पन्न करती है जो E20 मानक के अनुरूप अनुकूलित नहीं हैं। 
    • ऐसे वाहनों में दीर्घकालिक उपयोग से आंतरिक नमी संचय बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप जंग लगना, सीलों का क्षरण तथा महत्त्वपूर्ण यांत्रिक अवयवों की विफलता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। 
    • उपभोक्ताओं द्वारा ईंधन इंजेक्टर के अवरोध एवं रबर सीलों के क्षय जैसी महॅंगी मरम्मत समस्याओं की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से E20 ईंधन के दीर्घकालिक उपयोग से संबद्ध पाई गई हैं।
  • ऊर्जा-गहन आसवन जीवनचक्र की चुनौती: बायो-इथेनॉल उत्पादन की औद्योगिक आसवन एवं पूर्व-उपचार प्रक्रियाएँ अत्यधिक ऊर्जा-गहन होती हैं, जिसके कारण इसके शुद्ध पर्यावरणीय लाभ आंशिक रूप से निष्प्रभावी हो जाते हैं। 
    • जीवनचक्र विश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में विनिर्माण चरणों से उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन प्रस्तावित टेलपाइप उत्सर्जन में कमी को काफी हद तक संतुलित कर देता है। 
    • हालिया आकलनों के अनुसार, लिग्नोसेलुलोसिक बायोमास से इथेनॉल उत्पादन में प्रति किलोग्राम इथेनॉल पर लगभग 25 से 130 किलोवाट-घंटे ऊर्जा की खपत होती है। 
      • चूँकि वर्तमान नीतिगत ढाँचा कार्बन तीव्रता के बजाय कुल ईंधन मात्रा को प्राथमिकता देता है, अतः वास्तविक डीकार्बोनाइजेशन प्रभाव संदिग्ध बना हुआ है।
  • रसद संबंधी बाधाएँ एवं स्थानिक असमानताएँ: उच्च प्रतिशत इथेनॉल सम्मिश्रण के सफल राष्ट्रव्यापी क्रियान्वयन में उत्पादन की अत्यधिक असमान भौगोलिक वितरण तथा अपर्याप्त आपूर्ति शृंखला लॉजिस्टिक्स संबंधी गंभीर बाधाएँ उत्पन्न कर रही हैं।
    • इथेनॉल की आर्द्रता-अवशोषण प्रकृति के कारण इसे पारंपरिक पेट्रोलियम पाइपलाइनों के माध्यम से परिवहन करना संभव नहीं होता, जिससे स्थानीय वितरण बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।
    • उत्पादन का भौगोलिक केंद्रीकरण मुख्यतः महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश जैसे गन्ना-समृद्ध राज्यों तक सीमित है, जिसके परिणामस्वरूप पूर्वोत्तर भारत जैसे क्षेत्रों में ईंधन आपूर्ति हेतु गंभीर लॉजिस्टिक चुनौतियाँ सामने आती हैं। 
    • यह क्षेत्रीय असंतुलन पूरे देश में E20 कार्यक्रम के समान क्रियान्वयन के लिये विशेष भंडारण अवसंरचना एवं सड़क परिवहन नेटवर्क में व्यापक वित्तीय निवेश की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

भारत में इथेनॉल सम्मिश्रण को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • डीपटेक-संचालित आपूर्ति शृंखला समन्वय: डीपटेक, भविष्यसूचक मॉडलिंग एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करते हुए एक एकीकृत फीडस्टॉक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिये, जिससे अधिशेष कृषि क्षेत्रों और कमी वाले शोधन केंद्रों के मध्य विद्यमान स्थानिक असमानताओं का प्रभावी समाधान संभव हो सके। 
    • यह डिजिटल अवसंरचना फसल उत्पादकता, बायोमास उपलब्धता एवं डिस्टिलरी क्षमताओं की रियल-टाइम निगरानी सुनिश्चित करे, ताकि संरचनात्मक अधिशेष की स्थिति को पूर्व में ही नियंत्रित किया जा सके। 
    • क्रय एल्गोरिदम के डिजिटलीकरण के माध्यम से तेल विपणन कंपनियाँ (OMC) विकेंद्रीकृत अवशेष संग्रह को रिफाइनरी की निरंतर मांग के साथ समन्वित कर सकती हैं, जिससे निर्बाध प्रसंस्करण सुनिश्चित होने के साथ-साथ परिवहन-जनित कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी।
  • जल-प्रतिरोधी प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण: इथेनॉल उत्पादन को जल-गहन फसलों से पृथक करने हेतु कृषि प्रोत्साहनों को जलवायु-प्रतिरोधी मोटे अनाजों तथा सतत प्राकृतिक खेती मॉडल की ओर पुनर्निर्देशित करना आवश्यक है। 
    • डिस्टिलरी लाइसेंस के प्रदान एवं नवीनीकरण के लिये ग्राम-स्तरीय जल लेखापरीक्षा एवं जलभंडार स्वास्थ्य आकलन को एक अनिवार्य शर्त बनाया जाना चाहिये। 
    • यह पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण न केवल आर्द्रभूमियों एवं स्थानीय पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि जैव ईंधन कच्चे माल का उत्पादन दीर्घकालिक मृदा उर्वरता से समझौता किये बिना हो। 
    • इस प्रकार, यह पहल ऊर्जा संक्रमण को जल सुरक्षा एवं कृषि जैव विविधता संरक्षण के साथ संरचनात्मक रूप से समन्वित करती है।
  • राजकोषीय युक्तिकरण और हरित कराधान समानता: फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिये जीएसटी संरचना को इलेक्ट्रिक वाहनों के समान अधिक प्रतिस्पर्द्धी बनाने हेतु एक लक्षित राजकोषीय समेकन नीति लागू की जाए। 
    • साथ ही ऑटोमोबाइल निर्माताओं को रणनीतिक अनुदान तथा उत्पादन-आधारित हरित ऋण उपलब्ध कराकर तकनीकी रूपांतरण को तीव्र किया जाए और उपभोक्ताओं की प्रारंभिक क्रय लागत को कम किया जाए। 
    • इस प्रकार की कर समानता उच्च इथेनॉल सम्मिश्रण-सक्षम वाहनों के व्यापक प्रसार में विद्यमान वित्तीय बाधाओं को दूर करती है
    • परिणामस्वरूप, सतत परिवहन अपनाने का आर्थिक बोझ व्यवस्थित रूप से अंतिम उपभोक्ता से हटकर अन्यत्र स्थानांतरित हो जाएगा, जिससे स्वाभाविक बाजार मांग को बढ़ावा मिलेगा।
  • कार्बन कैप्चर एकीकरण (CCUS) को अनिवार्य बनाना: डिस्टिलेशन इकाइयों में कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) अवसंरचना को एकीकृत करते हुए मौजूदा वॉल्यूम-आधारित मिश्रण लक्ष्यों को कठोर कार्बन-तीव्रता मानकों में परिवर्तित किया जाए। 
    • किण्वन प्रक्रिया से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करने से इथेनॉल संयंत्रों को कार्बन-तटस्थ से आगे बढ़ाकर संभावित रूप से कार्बन-ऋणात्मक इकाइयों में रूपांतरित किया जा सकता है। 
    • राष्ट्रीय जलवायु अवसंरचना के लिये किये गए बजटीय आवंटनों का उपयोग इन आवश्यक तकनीकी उन्नयनों को बड़े पैमाने पर वित्तपोषित करने के लिये किया जा सकता है।
    • यह एकीकरण यह सुनिश्चित करता है कि जैव-ईंधन क्षेत्र केवल टेलपाइप उत्सर्जन को प्रतिस्थापित न करे, बल्कि औद्योगिक उत्पादन प्रक्रिया से उत्पन्न उत्सर्जन को भी सक्रिय रूप से अवशोषित करे।
  • विकेंद्रीकृत 2G बायो-रिफाइनरी पारिस्थितिकी तंत्र: कृषि अवशेषों के दीर्घ दूरी परिवहन से उत्पन्न लॉजिस्टिक बाधाओं को कम करने हेतु ज़िला स्तर पर सूक्ष्म, दूसरी पीढ़ी (2G) बायो-रिफाइनरियों की स्थापना के माध्यम से जैव ईंधन उत्पादन को विकेंद्रीकृत किया जाए। 
    • यह स्थानीय स्तर पर लागू की गई व्यवस्था, किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिये सुलभ और आर्थिक रूप से लाभकारी विकल्प प्रदान करता है, जिससे पराली जलाने की समस्या का संरचनात्मक समाधान संभव होता है।
    • इस प्रकार की स्थानीय चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था ग्रामीण संस्थानों को सशक्त बनाती है, क्षेत्रीय स्तर पर आत्मनिर्भर आपूर्ति शृंखलाओं को मज़बूत करती है तथा कृषि अपशिष्ट को मूल्यवान ऊर्जा संसाधन में परिवर्तित करती है।
    • अंततः यह राष्ट्रीय ऊर्जा ग्रिड को केंद्रीकृत, एकल-बिंदु आपूर्ति शृंखला की विफलता से जुड़ी व्यापक आर्थिक कमज़ोरियों से सुरक्षित रखता है।

निष्कर्ष: 

भारत के लिये एक सुदृढ़ ऊर्जा ढाँचा विकसित करने हेतु संसाधन-केंद्रित प्रथम पीढ़ी के ईंधनों से आगे बढ़ते हुए उन्नत, अपशिष्ट-आधारित जैव ईंधनों तथा कार्बन-नकारात्मक अवसंरचना की ओर संक्रमण अनिवार्य है। कृषि उत्पादकता को तकनीकी नवाचार एवं अनुकूलित ईंधन पारिस्थितिकी तंत्रों के साथ राजकोषीय संतुलन में समन्वित करके, भारत अपनी आर्थिक वृद्धि को वैश्विक तेल अस्थिरता से प्रभावी रूप से पृथक कर सकता है। अंततः इथेनॉल रोडमैप की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों तथा पारिस्थितिकी अखंडता से समझौता किये बिना दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने में किस सीमा तक सक्षम है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

भारत में इथेनॉल सम्मिश्रण की ओर उन्मुख प्रवृत्ति एक दोधारी तलवार है, जो ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य एवं जल सुरक्षा के संभावित खतरों के बीच संतुलन स्थापित करती है। हालिया नीतिगत घटनाक्रमों के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भारत का वर्तमान इथेनॉल सम्मिश्रण लक्ष्य क्या है?
भारत का लक्ष्य वर्ष 2025–26 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल सम्मिश्रण (E20) प्राप्त करना है।

2. 2G इथेनॉल 1G इथेनॉल से किस प्रकार भिन्न है?
1G इथेनॉल खाद्य फसलों जैसे गन्ना एवं मक्का से निर्मित होता है, जबकि 2G इथेनॉल गैर-खाद्य कृषि अवशेषों जैसे धान की पराली एवं मक्का के भुट्टों से निर्मित होता है।

3.  फ्लेक्स-फ्यूल वाहन (FFV) क्या है?
यह ऐसा वाहन है, जिसमें आंतरिक दहन इंजन होता है और जो पेट्रोल एवं इथेनॉल के किसी भी अनुपात पर संचालित हो सकता है।

4. इथेनॉल को ‘ऑक्सीजनयुक्त’ क्यों माना जाता है?
इथेनॉल की रासायनिक संरचना में ऑक्सीजन उपस्थित होती है, जिससे ईंधन का दहन अधिक पूर्ण होता है तथा हानिकारक उत्सर्जन में कमी आती है।

5. उत्पादन में मॉलिक्यूलर सिव्स की क्या भूमिका है?
इनका उपयोग अंतिम निर्जलीकरण चरण में शेष जल को हटाने हेतु किया जाता है, जिससे ईंधन मिश्रण के लिये आवश्यक 99.6% शुद्धता प्राप्त होती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. जैव ईंधन पर भारत की राष्ट्रीय नीति के अनुसार, जैव ईंधन के उत्पादन के लिये निम्नलिखित में से किसका उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जा सकता है? (2020)

  1.  कसावा
  2.    क्षतिग्रस्त गेहूंँ के दाने
  3.    मूंँगफली के बीज
  4.    चने की दाल
  5.    सड़े हुए आलू
  6.    मीठे चुकंदर

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2, 5 और 6
(b) केवल 1, 3, 4 और 6
(c) केवल 2, 3, 4 और 5
(d) 1, 2, 3, 4, 5 और 6

उत्तर: (a)


प्रश्न. चार ऊर्जा फसलों के नाम नीचे दिये गए हैं। इनमें से किसकी खेती इथेनॉल के लिये की जा सकती है? (2010)

(a) जट्रोफा
(b) मक्का
(c) पोंगामिया
(d) सूरजमुखी

उत्तर: (b)


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