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डेली न्यूज़

  • 21 Jul, 2021
  • 86 min read
भारतीय अर्थव्यवस्था

एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट

प्रिलिम्स के लिये

 भारतीय रिज़र्व बैंक, मौद्रिक नीति संचरण

मेन्स के लिये

एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट एवं  इंटरनल बेंचमार्क लेंडिंग रेट की अवधारणा एवं इससे जुड़े लाभ  

चर्चा में क्यों?

'भारत में मौद्रिक संचरण' पर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की नवीनतम  रिपोर्ट के अनुसार, एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR - रेपो दर की तरह) से जुड़े बकाया ऋणों की हिस्सेदारी सितंबर 2019 के दौरान 2.4% से बढ़कर मार्च 2021 के दौरान 28.5% हो गई।

  • EBLR से जुड़े ऋण में यह वृद्धि मौद्रिक नीति संचरण में महत्त्वपूर्ण सुधार में योगदान करेगी।
  • हालाँकि अभी भी बकाया ऋणों का 71.5% इंटरनल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (IBLR- जैसे आधार दर और MCLR) से जुड़े ऋण हैं, जो मौद्रिक नीति संचरण को प्रभावित करते हैं।

नोट:

  • मौद्रिक नीति का संचरण: मौद्रिक नीति के संचरण से तात्पर्य है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा नीति दर में किये गए परिवर्तन आर्थिक गतिविधि (जैसे ऋण) तथा मुद्रास्फीति के माध्यम से कैसे संचालित होते हैं।
  • रेपो दर: इसे बेंचमार्क ब्याज दर के रूप में भी जाना जाता है तथा यह वह दर है जिस पर RBI अल्पावधि के लिये बैंकों को ऋण देता है। यहाँ केंद्रीय बैंक प्रभूतियाँ खरीदता है।

प्रमुख बिंदु 

इंटरनल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (IBLR): 

  • इंटरनल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (IBLR) संदर्भित ऋण दरों का एक समूह है, जिसकी गणना बैंक के वर्तमान वित्तीय अवलोकन, जमा और गैर-निष्पादित संपत्ति (NPA) आदि जैसे कारकों पर विचार करने के बाद की जाती है। BPLR, आधार दर, MCLR इंटरनल बेंचमार्क लेंडिंग रेट के उदाहरण हैं।
  • बेंचमार्क प्राइम लेंडिंग रेट (BPLR): 
    • BPLR का उपयोग बैंकों द्वारा जून 2010 तक ऋण देने के लिये बेंचमार्क दर के रूप में किया जाता था।
    • इसके तहत बैंक ऋणों की दर फंड की वास्तविक लागत पर तय की गई थी।
    • हालाँकि BPLR को बदल दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप यह एक अपारदर्शी प्रणाली बन गई। थोक ऋण (कॉर्पोरेट ग्राहकों को ऋण) का अनुबंध उप-बीपीएल दरों पर किया गया था और इसमें सभी बैंक ऋण का लगभग 70% शामिल था।
    • इस प्रणाली के तहत बैंक खुदरा, छोटे एवं मध्यम उद्योग के ग्राहकों से उच्च ब्याज दर वसूल कर कॉर्पोरेट ऋणों को सब्सिडी दे रहे थे।
  • आधार दर: 
    • जून 2010 से अप्रैल 2016 के बीच बैंकों से लिया गया ऋण आधार दर (Base Rate) पर दिया जाता था।
    • इस अवधि के दौरान आधार दर न्यूनतम ब्याज दर थी जिस पर वाणिज्यिक बैंक ग्राहकों को ऋण दे सकते थे।
    • आधार दर की गणना तीन मापदंडों पर की जाती है - धन की लागत, संसाधनों की असंबद्ध लागत और निवल मूल्य पर वापसी।
    • इसलिये दर अलग-अलग बैंकों पर निर्भर करती थी और जब भी उनके फंड की लागत तथा अन्य मापदंडों में बदलाव होता था, वे इसमें परिवर्तन करते थे।
  • ऋण दर की सीमांत लागत (MCLR): 
    • यह अप्रैल 2016 में प्रभावी हुआ। यह फ्लोटिंग-रेट ऋणों के लिये एक बेंचमार्क ऋण दर है। यह न्यूनतम ब्याज दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक ग्राहकों को उधार दे सकते हैं।
    • यह दर चार घटकों- धन की सीमांत लागत (Marginal Cost Of Funds), नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio), परिचालन लागत (Operating Costs) और परिपक्वता अवधि (Tenor Premium) पर आधारित है।
    • MCLR वास्तविक जमा दरों से जुड़ा हुआ है। इसलिये जब जमा दरों में वृद्धि होती है, तो यह इंगित करता है कि बैंकों की ब्याज दर बढ़ने की संभावना है।

IBLR से जुड़े ऋणों से संबंधित मुद्दे: 

  • IBLR व्यवस्था के साथ समस्या यह थी कि जब RBI ने रेपो और रिवर्स रेपो दरों में कटौती की तो बैंकों ने उधारकर्त्ताओं को पूरा लाभ नहीं दिया।
  • IBLR लिंक्ड लोन के ब्याज दर में बैंक के प्रसार, उनके वर्तमान वित्तीय अवलोकन, जमा एवं गैर-निष्पादित संपत्ति (NPA) आदि सहित कई वेरिएबल होते हैं।
    • इसके कारण इस तरह के आंतरिक बेंचमार्क ने RBI रेपो दर नीति में बदलाव के अनुसार ब्याज दरों में तेज़ी से बदलाव की सुविधा के लिये कुछ कार्य किये हैं।
    • आंतरिक बेंचमार्क व्यवस्था के तहत ब्याज दर निर्धारण प्रक्रियाओं में अस्पष्टता उधार दरों के संचरण में बाधा उत्पन्न करती है।

EBLR और इसके लाभ:

परिचय:

  • पूर्ण पारदर्शिता और मानकीकरण सुनिश्चित करने के लिये RBI ने बैंकों को 1 अक्तूबर, 2019 से प्रभावी ऋण श्रेणी के भीतर एक समान बाहरी बेंचमार्क अपनाने का आदेश दिया।
  • MCLR के विपरीत प्रत्येक बैंक के लिये आंतरिक प्रणाली थी, RBI ने बैंकों को 4 बाहरी बेंचमार्किंग तंत्रों में से चुनने का विकल्प दिया है:
    • RBI रेपो रेट
    • 91 दिवसीय टी-बिल यील्ड
    • 182 दिवसीय टी-बिल यील्ड
    • वित्तीय बेंचमार्क इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विकसित कोई अन्य बेंचमार्क बाज़ार ब्याज दर।
      • T-Bill या ट्रेज़री बिल भारत सरकार द्वारा बाद की तारीख में गारंटीकृत पुनर्भुगतान के साथ एक वचन पत्र के रूप में जारी किये गए मुद्रा बाज़ार के साधन हैं। 
      • वित्तीय बेंचमार्क इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा 2 जुलाई, 2015 को एक स्वतंत्र बेंचमार्क प्रशासक के रूप में मान्यता दी गई थी।

लाभ:

  • बैंक, बाहरी बेंचमार्क पर विस्तार तय करने के लिये स्वतंत्र हैं।
    • हालाँकि ब्याज दर को हर तीन महीने में कम-से-कम एक बार बाहरी बेंचमार्क के अनुसार रीसेट किया जाना चाहिये।
  • बाहरी प्रणाली होने के नाते अर्थात् कोई भी नीतिगत दर में कटौती का प्रभाव उधारकर्त्ताओं पर तेज़ी से पड़ेगा।
  • बाहरी बेंचमार्किंग को अपनाने से ब्याज दरें पारदर्शी होंगी।
    • उधारकर्त्ता को निश्चित ब्याज दर पर प्रत्येक बैंक के लिये प्रसार या लाभ मार्जिन का भी पता चल जाएगा, जिससे ऋण की तुलना आसान और अधिक पारदर्शी हो जाएगी।

Repo-Linked-Loan

आगे की राह:

  • छोटी बचत योजनाओं और ऋण म्यूचुअल फंड योजनाओं जैसे प्रतिस्पर्द्धी बचत साधनों द्वारा दी जाने वाली उच्च ब्याज दरों ने विशेष रूप से ईजिंग साइकिल (Easing Cycle) के दौरान संचरण को बाधित किया है।
  • इस प्रकार सरकार को दीर्घावधि में राजकोषीय नीति को मौद्रिक नीति के साथ सिंक्रनाइज़ करना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय राजनीति

लोकपाल के लिये जाँच निदेशक

प्रिलिम्स के लिये:

लोकपाल, लोकायुक्त, सूचना का अधिकार

मेन्स के लिये:

लोकपाल से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सूचना का अधिकार (RTI) के अंतर्गत मांगे गए उत्तर के जवाब से पता चला है कि लोकपाल (Lokpal) के अस्तित्व में आने के दो वर्ष से अधिक समय के बाद भी केंद्र ने अब तक जाँच निदेशक (Director of Inquiry) की नियुक्ति नहीं की है।

प्रमुख बिंदु

जाँच निदेशक के विषय में:

  • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अनुसार, एक जाँच निदेशक होगा, जो केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव के पद से नीचे का नहीं होगा।
  • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 20 (1) (बी) के तहत निहित प्रावधानों के अनुसार, लोक सेवकों के संबंध में शिकायतों को लोकपाल द्वारा प्रारंभिक जाँच के लिये केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission) को भेजा जाता है।
  • जाँच निदेशक की नियुक्ति न करना भारत में मज़बूत लोकपाल के लिये राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है।

लोकपाल के विषय में:

  • लोकपाल एक भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकरण है जो जनहित का प्रतिनिधित्व करता है।
    • भारत भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का एक हस्ताक्षरकर्त्ता है।
  • भारत में लोकपाल की अवधारणा स्वीडन से ली गई है।
  • लोकपाल (सार्वजनिक पदाधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जाँच करने वाली सर्वोच्च संस्था) मार्च 2019 में अपने अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के साथ अस्तित्व में आया।
  • भारत के पहले प्रशासनिक सुधार आयोग (1966- 1970) ने नागरिकों की शिकायतों के निवारण के लिये 'लोकपाल' और 'लोकायुक्त' के रूप में नामित दो विशेष प्राधिकरणों की स्थापना की सिफारिश की थी।
    • भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर लोकपाल, जबकि राज्य स्तर पर लोकायुक्त अधिकृत है।
  • भ्रष्टाचार के मामलों में लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में सभी संसद सदस्य और केंद्र सरकार के कर्मचारी आते हैं।
  • इसके अलावा लोकपाल केंद्र सरकार द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से वित्तपोषित या उसके द्वारा नियंत्रित संस्था के किसी भी सदस्य के संबंध में भ्रष्टाचार विरोधी शिकायतों की भी जाँच कर सकता है।
  • वर्तमान में न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष (Justice Pinaki Chandra Ghose) लोकपाल के अध्यक्ष हैं।
  • लोकपाल एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमें एक अध्यक्ष और अधिकतम 8 सदस्य होते हैं।

लोकपाल से संबंधित मुद्दे:

  • लोकपाल राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं है क्योंकि लोकपाल की नियुक्ति समिति में भी राजनीतिक दलों के सदस्य शामिल होते हैं।
    • लोकपाल की नियुक्ति हेतु चयन समिति प्रधानमंत्री से मिलकर बनी होती है जो कि समिति का अध्यक्ष होता है इसके अलावा इस समिति में लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष का नेता, भारत का मुख्य न्यायाधीश या उसके द्वारा नामित एक न्यायाधीश तथा एक प्रख्यात न्यायविद शामिल होते हैं ।
  • लोकपाल की नियुक्ति में हेरफेर की संभावना बनी रहती है क्योंकि नियुक्ति हेतु 'प्रतिष्ठित न्यायविद' या 'ईमानदार व्यक्ति'के लिये कोई निश्चित मानदंड निर्धारित नहीं है।
  • सबसे बड़ी कमी न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना है।
  • लोकपाल को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान नहीं है तथा लोकपाल के खिलाफ अपील करने हेतु पर्याप्त प्रावधान भी नहीं हैं।
  • भ्रष्टाचार के खिलाफ उल्लेखित अपराध का आरोप लगाने के दिन से सात वर्ष की अवधि के बाद शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती है।

आगे की राह:

  • भ्रष्टाचार की समस्या से निपटने हेतु लोकपाल संस्था को कार्यात्मक स्वायत्तता और जनशक्ति की उपलब्धता दोनों के संदर्भ में मज़बूत किया जाना चाहिये।
  • इसके अलावा लोकपाल और लोकायुक्त को वित्तीय, प्रशासनिक एवं कानूनी रूप से उन लोगों से स्वतंत्र किया जाना चाहिये जिनके खिलाफ उन्हें जांँच और मुकदमा चलाने का अधिकार होता है।
  • किसी एक संस्था या प्राधिकरण में बहुत अधिक शक्ति के संकेंद्रण से बचने हेतु उचित जवाबदेही तंत्र के साथ विकेंद्रीकृत संस्थानों की बहुलता की आवश्यकता है।
  • अधिक पारदर्शिता, सूचना का अधिकार अधिनियम को सशक्त बनाना, मज़बूत व्हिसलब्लोअर (Whistleblower) संरक्षण व्यवस्था के साथ-साथ एक नैतिक रूप से मज़बूत नेतृत्व की आवश्यकता है जो स्वयं को भी सार्वजनिक जाँच के दायरे में लाने हेतु तैयार हो।

स्रोत: द हिंदू


जैवविविधता और पर्यावरण

चरम जलवायु घटनाएँ

प्रिलिम्स के लिये

हीट वेव, चरम जलवायु घटनाएँ

मेन्स के लिये

चरम जलवायु घटनाओं का कारण और उनसे संबंधित चिंताएँ 

चर्चा में क्यों?

दुनिया भर के लोग कोविड-19 महामारी और चरम जलवायु घटनाओं की दोहरी मार झेल रहे हैं। विशेषज्ञों का मत है कि चरम जलवायु संबंधी ये घटनाएँ जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं।

प्रमुख बिंदु

हालिया चरम जलवायु घटनाएँ

  • एक हालिया हीट वेव(Heatwave) ने संपूर्ण कनाडा और अमेरिका के कुछ हिस्सों में तापमान को रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुँचा दिया है तथा इसके कारण 25 से 30 जून के बीच सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुई है।
  • जर्मनी में हाल ही में आई बाढ़ ने 180 से अधिक लोगों की जान ले ली।
    • चीन, भारत और इंडोनेशिया समेत कई एशियाई देशों में भी बाढ़ की घटनाएँ देखी गई हैं।
  • हाल ही में चक्रवात ‘ताउते’ और ‘यास’ क्रमशः भारत के पश्चिमी और पूर्वी तटों से टकराए हैं।

चरम जलवायु घटनाओं का कारण:

  • अत्यधिक तापमान:
    • पृथ्वी का तापमान प्रतिवर्ष बढ़ रहा है, ऐसे में अत्यधिक धूप के कारण ‘निम्न दबाव वाला सिस्टम बनता है।
    • जिसके कारण हरिकेन और अन्य उष्णकटिबंधीय तूफानों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही हैं।
  • उच्च वायुमंडलीय हवाएँ:
    • जेट स्ट्रीम ऐसे स्थान पर पाई जाती है, जहाँ ध्रुवीय क्षेत्रों से आने वाली ठंडी हवा उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की गर्म हवा से मिलती है।
    • ये हवाएँ उत्तरी गोलार्द्ध में पश्चिम से पूर्व की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में पूर्व से पश्चिम तक मौसम प्रणाली को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
    • कभी-कभी ये हवाएँ चरम जलवायु स्थिति को बढ़ावा देती हैं जिससे टोर्नेडो का निर्माण हो सकता है।
  • जब दो दबाव प्रणाली आपस में मिलती है:
    • जब बहुत ठंडी उच्च दबाव वाली प्रणाली बहुत गर्म कम दबाव वाली प्रणाली से मिलती है, तो समुद्र की सतह पर अत्यधिक ऊँची लहरों की संभावना बढ़ जाती है।
    • अत्यधिक ठंडी उच्च दाब प्रणालियाँ उप-ध्रुवीय क्षेत्रों से उत्पन्न होती हैं, जबकि अत्यधिक गर्म निम्न दाब प्रणालियाँ समशीतोष्ण समुद्रों से उत्पन्न होती हैं।
  • अनुचित मौसम प्रणाली:
    • मौसम प्रणालियाँ जैसे- वायु द्रव्यमान, अग्रभाग आदि उचित तरीके से चलती रहती हैं जो मौसम की स्थिति को सुचारु रूप से बनाए रखने में मदद करती हैं।
    • जब मौसम की स्थिति के बीच में कोई गड़बड़ी आती है तो यह आपदाओं को जन्म देती है।
  • जलवायु परिवर्तन:
    • पिछले कुछ दशकों में वैश्विक तापमान बहुत अधिक बढ़ गया है यहाँ तक कि इसमें साल-दर-साल परिवर्तन भी जारी है।
    • पृथ्वी के तामपान में वृद्धि का एक प्रमुख कारण कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर है।
    • जैसे-जैसे वातावरण में CO2 का स्तर बढ़ रहा है, उसके साथ ही पृथ्वी का तापमान भी बढ़ रहा है।
  • ग्लोबल वार्मिंग:
    • ग्लोबल वार्मिंग के कारण जैसे-जैसे विश्व का तापमान बढ़ रहा है, इसका प्रभाव भी बढ़ता जा रहा है।
    • ग्लोबल वार्मिंग हीट वेव की तीब्रता को बढ़ाने में योगदान दे रही है।
    • ग्लोबल वार्मिंग से वातावरण में जलवाष्प की मात्रा भी बढ़ जाती है जिससे भारी वर्षा, भारी हिमपात जैसे चरम मौसमीय घटनाएँ घटित हो सकती हैं।

चिंताएँ:

  • औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि मौसम के पैटर्न में व्यापक बदलाव से संबद्ध है।
    • बढ़ते औसत वैश्विक तापमान से भारी बारिश की संभावना में वृद्धि हुई है।
    • गर्म हवा में अधिक नमी होती है, जिसका अर्थ है कि अंततः इससे निर्मुक्त होने वाले जल की मात्रा भी अधिक होगी।
  • मानवजनित जलवायु परिवर्तन में वृद्धि के साथ ग्रीष्म लहर/हीट वेव और अत्यधिक वर्षा जैसी चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ने या इनके अधिक तीव्र होने की संभावना है।
    • मानवजनित जलवायु परिवर्तन या एंथ्रोपोजेनिक क्लाइमेट चेंज का सिद्धांत यह है कि जलवायु में हो रहे वर्तमान परिवर्तनों में से अधिकांश के लिये मनुष्यों द्वारा किया जा रहा कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन का दहन उत्तरदायी है।
  • पृथ्वी के ध्रुवों पर तापमान भूमध्य रेखा की तुलना में दो से तीन गुना अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है।
    • यह यूरोप के ऊपर स्थित मध्य अक्षांशों की जेट धाराओं/जेट स्ट्रीम को कमज़ोर करता है।
    • ग्रीष्म और शरद ऋतु के दौरान जेट स्ट्रीम के कमज़ोर होने के परिणामस्वरूप धीमी गति से चलने वाले तूफान आते हैं।
    • यह अधिक भयानक और लंबे समय तक चलने वाले तूफानों की उत्पत्ति का कारण बन सकता है।
  • इसके अलावा एक अध्ययन के अनुसार, मानव-प्रेरित ग्लोबल वार्मिंग ने अरब सागर के ऊपर चक्रवाती तूफानों की आवृत्ति और तीव्रता को बढ़ाने में भी योगदान दिया है।

संबंधित पहलें:

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय राजनीति

कापू समुदाय को आरक्षण

प्रिलिम्स के लिये:

अन्य पिछड़ा वर्ग,अनुच्छेद 15,अनुच्छेद 16, संविधान (103वाँ संशोधन) अधिनियम

मेन्स के लिये: 

संविधान (103वाँ संशोधन) अधिनियम, 2019 के प्रमुख प्रावधान,आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के हितों को संरक्षित करने हेतु संवैधानिक प्रावधान

चर्चा में क्यों?

हाल ही में आंध्र प्रदेश सरकार ने राज्य सरकार में आंतरिक पदों और सेवाओं में नियुक्तियों हेतु कापू समुदाय तथा अन्य आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) के लिये 10% आरक्षण की घोषणा की है।

  • यह आरक्षण संविधान (103वाँ संशोधन) अधिनियम, 2019 के अनुसार बढ़ाया गया है।

प्रमुख बिंदु

कापू समुदाय के बारे में:

  • कापू मुख्य रूप से आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र का एक कृषि प्रधान समुदाय है। 
  • ऐसा माना जाता है कि इन्होंने हज़ारों साल पहले गंगा के मैदानी इलाकों संभवतः काम्पिल्य (अयोध्या के पास) से प्रवास किया था।
  • उन्होंने वर्तमान तेलंगाना में प्रवेश किया और गोदावरी के किनारे के जंगलों को साफ कर वहीं बस  गए तथा खेती करना शुरू किया।
  • कापू समुदाय स्वयं को 'पिछड़ी जातियों' की श्रेणी में शामिल करने की मांग कर रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत की स्वतंत्रता से पहले वे पिछड़ी जाति में ही शामिल थे।
  • कापू समुदाय को पिछड़ी जातियों में शामिल करने के लिये पहला व्यापक विरोध वर्ष 1993 में हुआ था।
    • तब उन्हें 'पिछड़ी जातियों' में शामिल करने के लिये एक सरकारी आदेश जारी किया गया था। हालाँकि इस आदेश का पालन नहीं किया गया।

अन्य पिछड़ा वर्ग

  • अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes- OBC) भारत सरकार द्वारा उन जातियों को वर्गीकृत करने के लिये  इस्तेमाल किया जाने वाला एक सामूहिक शब्द है जो शैक्षिक या सामाजिक रूप से वंचित हैं।
  • यह सामान्य वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC तथा ST) के साथ-साथ भारत की जनसंख्या के विभिन्न आधिकारिक वर्गीकरणों में से एक है। 
  • वर्ष 1980  की मंडल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या में OBC वर्ग की आबादी 52%  थी तथा वर्ष 2006  में जब राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन हुआ था, तब इस वर्ग की कुल आबादी 41% निर्धारित की गई।
  • संविधान के अनुच्छेद 338B के तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत एक संवैधानिक निकाय है।

EWS आरक्षण के लिये दिशानिर्देश:

  • ऐसे व्यक्ति जिन्हें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिये आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के तहत कवर नहीं किया गया है और जिनकी सकल वार्षिक पारिवारिक आय 8 लाख रुपए से कम है उन्हें आरक्षण का लाभ प्रदान करने के उद्देश से ‘आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग’ (EWS)  के रूप में पहचाना गया है।
  • सकल वार्षिक आय में आवेदन के वर्ष से पहले के वित्तीय वर्ष में सभी स्रोतों यानी वेतन, कृषि, व्यवसाय, पेशे आदि से प्राप्त आय शामिल है।
  • इस उद्देश्य के लिये परिवार के तहत आरक्षण का लाभ प्राप्त करने वाला व्यक्ति, उसके माता-पिता, 18 वर्ष से कम उम्र के भाई-बहन तथा उसके पति या पत्नी और 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे शामिल होंगे।

संविधान (103वाँ) संशोधन अधिनियम:

  • इसने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में संशोधन करते हुए आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) के लिये शिक्षा संस्थानों में प्रवेश तथा नौकरियों में आर्थिक आरक्षण (10% कोटा) की शुरुआत की। 
    • इसके माध्यम से संविधान में अनुच्छेद 15 (6) और अनुच्छेद 16 (6) को सम्मिलित किया गया था।
  • यह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के लिये उपलब्ध 50% आरक्षण नीति द्वारा कवर नहीं किये गए गरीबों के कल्याण को बढ़ावा देने हेतु अधिनियमित किया गया था।
  • यह केंद्र और राज्यों दोनों को समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों को आरक्षण प्रदान करने में सक्षम बनाता है।

EWS आरक्षण की स्थिति:

  • 10% EWS आरक्षण केंद्र सरकार द्वारा रोज़गार के अवसरों (इंद्रा साहनी वाद 1992 द्वारा निर्धारित) में आरक्षण की 50% सीमा का उल्लंघन करता है।
  • सरकार का मानना यह है कि यद्यपि सामान्यतया 50% आरक्षण का नियम है, लेकिन वह आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के समाज के सदस्यों के उत्थान के लिये मौजूदा विशेष परिस्थितियों को देखते हुए संविधान के संशोधन को नहीं रोकेगा।
  • वर्तमान में मामला सर्वोच्च न्यायालय में है जहाँ उसने हाल ही में 103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को यह कहते हुए संदर्भित किया कि इसमें 'कानून के पर्याप्त प्रश्न' शामिल हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 145(3) के अनुसार, कम-से-कम पाँच न्यायाधीशों को ऐसे मामलों की सुनवाई करने की आवश्यकता होती है जिनमें संविधान की 'व्याख्या के रूप में कानून का एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न' या अनुच्छेद 143 के तहत कोई संदर्भ शामिल है, जो की शक्ति से संबंधित है। भारत के राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय से परामर्श करेंगे।
  • सर्वोच्च न्यायालय की कम-से-कम पाँच जजों वाली न्यायपीठ (Bench) को संविधान पीठ कहा जाता है।

स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

97वें संशोधन के प्रावधान रद्द

प्रिलिम्स के लिये:

सहकारिता

मेन्स के लिये:

भारत में सहकारिता से संबंधित प्रावधान और इसकी आवश्यकता 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने गुजरात उच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के फैसले को बरकरार रखते हुए  संविधान (97वाँ संशोधन) अधिनियम, 2011 के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया है।

  •  न्यायालय का यह फैसला संघवाद को बढ़ावा देता है क्योंकि 97वें संशोधन ने सहकारी समितियों (एक ऐसा क्षेत्र जिसे अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर योगदानकर्त्ता माना जाता है) पर राज्यों के अनन्य अधिकार को सीमित कर दिया है।

सहकारी समितियाँ:

  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organisation- ILO) के अनुसार, सहकारिता व्यक्तियों का एक स्वायत्त संघ है जो संयुक्त स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित उद्यम के माध्यम से अपनी सामान्य आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं को पूरा करने हेतु स्वेच्छा से एकजुट होते हैं।
  • सहकारी समितियाँ कई प्रकार की होती हैं जैसे- उपभोक्ता सहकारी समिति (Consumer Cooperative Society), उत्पादक सहकारी समिति (Producer Cooperative Society), ऋण सहकारी समिति (Credit Cooperative Society), आवास सहकारी समिति (Housing Cooperative Society) और विपणन सहकारी समिति (Marketing Cooperative Society)।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) द्वारा वर्ष 2012 को सहकारिता का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष (International Year of Cooperatives) घोषित किया गया था।
  • भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसने विश्व के सबसे बड़े सहकारी आंदोलन की नींव रखी।
    • हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा 'सहकार से समृद्धि' (सहकारिता के माध्यम से समृद्धि) के दृष्टिकोण को साकार करने और सहकारिता आंदोलन को नई दिशा प्रदान करने के उद्देश्य से एक अलग 'सहकारिता मंत्रालय' का निर्माण किया गया है।

प्रमुख बिंदु:

मुद्दे:

  • 97वें संशोधन के माध्यम से संविधान में प्रस्तुत किया गया भाग IXB, सहकारी समितियों के क्रियान्वयन हेतु शर्तों को निर्धारित करता है।
  • संशोधन में प्रावधान, संविधान द्वारा आवश्यक राज्य विधानसभाओं द्वारा उनकी पुष्टि किये बिना संसद द्वारा पारित किये गए।
  • यह एक सहकारिता के निदेशकों की संख्या या उनके कार्यकाल की अवधि और यहाँ तक कि उसका सदस्य बनने के लिये आवश्यक विशेषज्ञता का निर्धारण करने की सीमा तक विस्तारित है।

97वें संशोधन के अन्य प्रमुख प्रावधान

  • संविधान (97वाँ संशोधन) अधिनियम, 2011 ने भारत में काम कर रही सहकारी समितियों के संबंध में भाग IXA (नगर पालिका) के ठीक बाद एक नया भाग IXB जोड़ा है।
  • संविधान के भाग-III के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1)(c) में "यूनियन (Union) और  एसोसिएशन (Association)" के बाद "सहकारिता" (Cooperative) शब्द जोड़ा गया था। यह सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान कर सहकारी समितियाँ बनाने में सक्षम बनाता है।
  • राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों (Directive Principles of State Policy-भाग IV) में "सहकारी समितियों के प्रचार" के संबंध में एक नया अनुच्छेद 43B जोड़ा गया था।

केंद्र सरकार का तर्क:

  • इसने सहकारिता के कामकाज में 'व्यावसायिकता' और स्वायत्तता को प्रेरित करने के सरकार के प्रयास को उचित ठहराया।
  • सदस्यों की जवाबदेही की कमी के कारण सेवाओं की खराब गुणवत्ता और उत्पादकता में गिरावट देखी गई है।
  • यहाँ तक कि इनके चुनाव भी समय पर नहीं होते हैं। सहकारी समितियों को सुस्थापित लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर चलने की ज़रूरत है।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला:

  • राज्यों का विशेष विधान:
    • जहाँ तक विधायी शक्तियों का संबंध है, संविधान को अर्द्ध-संघीय के रूप में वर्णित किया गया है, हालाँकि संघीय सर्वोच्चता सिद्धांत के मद्देनज़र राज्यों की तुलना में केंद्र के पक्ष में झुकाव है।
      • अर्द्ध-संघवाद का अर्थ है एकात्मक राज्य और एक संघ के बीच राज्य का एक मध्यवर्ती रूप।
    • हालाँकि अपने स्वयं के क्षेत्र में राज्यों के पास विशेष रूप से उनके लिये आरक्षित विषयों पर कानून बनाने की विशेष शक्ति है।
    • भाग IX B, जिसमें अनुच्छेद 243ZH से 243ZT शामिल हैं, ने राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के तहत सहकारी क्षेत्र पर राज्य विधानसभाओं की “अनन्य विधायी शक्ति” को “महत्त्वपूर्ण और पर्याप्त रूप से प्रभावित” किया है। 
    • वास्तव में अदालत ने स्पष्ट किया कि कैसे अनुच्छेद 243ZI यह उपबंध करता है कि एक राज्य केवल 97वें संवैधानिक संशोधन के भाग IXB के प्रावधानों के अधीन किसी समाज के निगमन, विनियमन और समापन को लेकर कानून बना सकता है।
  • राज्यों द्वारा अनुमोदित नहीं:
    • यह माना गया कि 97वें संविधान संशोधन के लिये संविधान के अनुच्छेद 368(2) के अनुसार कम-से-कम आधे राज्य विधानसभाओं के अनुसमर्थन की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक ऐसी प्रविष्टि से संबंधित है जो एक विशेष राज्य के विषय (सहकारी समितियाँ) रूप में थी।
      • अनुच्छेद 368(2) के तहत संसद विशेष बहुमत से विधेयक पारित कर संविधान में संशोधन कर सकती है।
    • चूँकि 97वें संशोधन के मामले में ऐसा अनुसमर्थन नहीं किया गया था, इसलिये इसे रद्द किया जा सकता था।
  • बहुराज्य सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधानों की वैधता बरकरार:
    • इसने अनुसमर्थन की कमी के कारण 'बहु-राज्य सहकारी समितियों (MSCS)' से संबंधित संशोधन के भाग IXB के कुछ हिस्सों पर प्रहार नहीं किया।
    • जब MSCS पर विचार किया जाता है तब इसका उद्देश्य एक राज्य तक सीमित नहीं होता है, बल्कि ये विधायी शक्तियाँ भारत संघ की होंगी जो प्रविष्टि 44 सूची I (संघ सूची) में निहित हैं।
    • यह घोषित किया गया है कि संविधान का भाग IXB केवल तभी तक प्रभावी होगा जब तक यह विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बहु-राज्य सहकारी समितियों से संबंधित है।

विधायी शक्तियों में अंतर करने के लिये सूचियाँ

  • तीन ऐसी सूचियाँ हैं जो संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत विधायी शक्तियों के वितरण का प्रावधान करती हैं :
    • संघ सूची (सूची I)- इसमें 98 विषय (मूल रूप से 97) शामिल हैं और इसमें वे विषय शामिल होते हैं जो राष्ट्रीय महत्त्व के हैं तथा जिनके लिये पूरे देश में समान कानून है।
      • इन मामलों के संबंध में केवल केंद्रीय संसद ही कानून बना सकती है, उदाहरण के लिये रक्षा, विदेश मामले, बैंकिंग, मुद्रा, संघ कर आदि।
    • राज्य सूची (सूची II)- इसमें 59 विषय (मूल रूप से 66) हैं और इसमें स्थानीय या राज्य हित के विषय शामिल हैं।
      • ये विषय राज्य विधानमंडलों की विधायी क्षमता के अंतर्गत आते हैं। जैसे- लोक व्यवस्था, पुलिस, स्वास्थ्य, कृषि और वन आदि।
    • समवर्ती सूची (सूची-III)- इसमें 52 (मूल रूप से 47) विषय हैं जिनके संबंध में केंद्रीय संसद और राज्य विधानमंडल दोनों के पास कानून बनाने की शक्ति है। समवर्ती सूची का उद्देश्य अत्यधिक कठोरता से बचने के लिये विषयों को केंद्र एवं राज्य दोनों को एक उपकरण के रूप में प्रदान करना था।
    • यह एक 'ट्विलाइट ज़ोन' है, क्योंकि महत्त्वपूर्ण मामलों के लिये राज्य पहल नहीं कर सकते हैं, जबकि संसद ऐसा कर सकती है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


सामाजिक न्याय

इंडिया इनइक्क्वेलिटी रिपोर्ट 2021: ऑक्सफैम

प्रिलिम्स के लिये

इंडिया इनइक्क्वेलिटी रिपोर्ट 2021, ऑक्सफैम, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, सकल घरेलू उत्पाद, शिशु मृत्यु दर

मेन्स के लिये

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की अवश्यकता और चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ऑक्सफैम इंडिया (Oxfam India) द्वारा जारी "इंडिया इनइक्क्वेलिटी रिपोर्ट 2021: इंडियाज़ अनइक्वल हेल्थकेयर स्टोरी" (India Inequality Report 2021: India’s Unequal Healthcare Story) शीर्षक वाली रिपोर्ट से पता चलता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ व्याप्त हैं और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage) की अनुपस्थिति के कारण हाशिये पर रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

  • इस रिपोर्ट के अनुसार, जो राज्य मौजूदा असमानताओं को कम करने का प्रयास कर रहे हैं और स्वास्थ्य पर अधिक खर्च कर रहे हैं, उन राज्यों में कोविड-19 के कम मामले दर्ज किये गए।

प्रमुख बिंदु

रिपोर्ट के विषय में:

  • यह रिपोर्ट देश में स्वास्थ्य असमानता के स्तर को मापने के लिये विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूहों में स्वास्थ्य परिणामों का व्यापक विश्लेषण प्रदान करती है।
  • इसके निष्कर्ष मुख्य रूप से राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family Health Survey) के तीसरे और चौथे दौर के माध्यमिक विश्लेषण तथा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (National Sample Survey) के विभिन्न दौरों पर आधारित हैं।

रिपोर्ट के निष्कर्ष:

  • विभिन्न समूहों का प्रदर्शन: सामान्य वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तुलना में; हिंदू, मुसलमानों से; अमीर का प्रदर्शन गरीबों की तुलना में; पुरुष, महिलाओं की तुलना में तथा शहरी आबादी, ग्रामीण आबादी की तुलना में विभिन्न स्वास्थ्य संकेतकों पर बेहतर है।
    • कोविड-19 महामारी ने इन असमानताओं को और बढ़ा दिया है।
  • राज्यों का प्रदर्शन: जो राज्य (तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश एवं राजस्थान) पिछले कुछ वर्षों से सामान्य वर्ग और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच जैसी असमानताओं को कम कर रहे हैं, उनमें कोविड के कम मामले देखे गए।
    • दूसरी ओर जिन राज्यों (असम, बिहार और गोवा) में स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का खर्च अधिक है, उनमें कोविड मामलों की रिकवरी दर अधिक है।
    • केरल ने बहुस्तरीय स्वास्थ्य प्रणाली बनाने के लिये  बुनियादी ढाँचे में निवेश किया है, जिसे सामुदायिक स्तर पर बुनियादी सेवाओं हेतु प्रथम संपर्क पहुँच प्रदान करने के खातिर डिज़ाइन किया गया है और साथ ही इसने निवारक तथा उपचारात्मक सेवाओं की एक शृंखला तक पहुँच प्राप्त करने के लिये प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल कवरेज का विस्तार किया है।
  • ग्रामीण-शहरी विभाजन: कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान ‘ग्रामीण-शहरी विभाजन’ और अधिक गंभीर रूप से सामने आया, जब ग्रामीण क्षेत्रों में परीक्षण, ऑक्सीजन और अस्पताल में बिस्तरों की भारी कमी देखी गई थी।
  • डॉक्टर- रोगी अनुपात: वर्ष 2017 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल के तहत प्रत्येक 10,189 लोगों के लिये एक सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर और प्रत्येक 90,343 लोगों के लिये एक सरकारी अस्पताल रिकॉर्ड किया गया था।
  • अस्पताल के बिस्तरों की कमी: सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी अवसंरचना में निवेश की कमी के कारण बीते कुछ वर्षों में देश के अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या वास्तव में कम हो गई है, उदाहरण के लिये वर्ष 2010 की मानव विकास रिपोर्ट में प्रति 10,000 व्यक्तियों पर 9 बिस्तर मौजूद थे, जबकि वर्तमान में प्रति 10,000 व्यक्तियों पर केवल 5 बिस्तर ही मौजूद हैं।
    • भारत ब्रिक्स देशों में प्रति हज़ार जनसंख्या पर अस्पताल के बिस्तरों की संख्या ( 0.5) के मामले में सबसे निचले स्थान पर है। भारत में यह संख्या बांग्लादेश (0.87), चिली (2.11) और मैक्सिको (0.98) जैसे अल्प-विकसित देशों से भी कम है।
  • महिला साक्षरता: यद्यपि पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न सामाजिक समूहों में महिला साक्षरता में सुधार हुआ है, किंतु इस मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से संबंधित महिलाएँ सामान्य वर्ग से क्रमश: 18.6% और 27.9% पीछे हैं।
    • वर्ष 2015-16 में शीर्ष 20 प्रतिशत आबादी और निम्न 20 प्रतिशत आबादी के बीच 55.1% का अंतर मौजूद था।

    • हालाँकि मुस्लिमों महिलाओं के बीच साक्षरता दर (64.3%) सभी धार्मिक समूहों की तुलना में सबसे कम है, किंतु समय के साथ असमानता में कमी देखी गई है।

  • स्वच्छता: जहाँ तक स्वच्छता का प्रश्न है तो सामान्य श्रेणी में 65.7% घरों में बेहतर स्वच्छता सुविधाओं तक पहुँच उपलब्ध है, जबकि अनुसूचित जाति के परिवार इस मामले में 28.5% और अनुसूचित जनजाति के परिवार 39.8% पीछे हैं।. 
    • जहाँ एक ओर देश के शीर्ष 20% घरों में से 93.4% घरों में बेहतर स्वच्छता सुविधाएँ हैं, वहीं केवल निम्न 20% घरों में से केवल 6% घरों में ही बेहतर स्वच्छता सुविधाएँ मौजूद हैं, इस तरह दोनों के बीच कुल 87.4% का अंतर है।
  • टीकाकरण: एसटी परिवारों में 55.8% टीकाकरण अभी भी राष्ट्रीय औसत से 6.2% कम है और मुस्लिम वर्ग में  टीकाकरण की दर सभी सामाजिक-धार्मिक समूहों में सबसे कम यानी 55.4% ही है।
    • बालिकाओं में टीकाकरण की दर बालकों की तुलना में कम है।
    • देश में 50% से अधिक बच्चों को अभी भी पूरक आहार (Supplements Food) नहीं मिलता है।
  • जीवन प्रत्याशा: 20% परिवारों में धन/संपत्ति के आधार पर जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) 65.1 वर्ष से कम है, जबकि शीर्ष 20% हेतु जीवन प्रत्याशा 72.7 वर्ष है।
  • प्रसवपूर्व देखभाल: प्रसवपूर्व देखभाल सुविधा प्राप्त करने वाली माताओं का प्रतिशत वर्ष 2005-06 में 35% था जो  वर्ष 2015-16 में घटकर 21 % हो गया।
    • भारत में संस्थागत प्रसव की हिस्सेदारी 2005-06 के 38.7% से बढ़कर 2015-16 में 78.9% हो गई है।
  • शिशु मृत्यु दर: शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate- IMR) में समग्र सुधार सभी सामाजिक समूहों में एक समान नहीं है। सामान्य वर्ग की तुलना में दलितों, आदिवासियों और ओबीसी का IMR का प्रतिशत अधिक है।
    • आदिवासी समुदायों में IMR 44.4% है जो सामान्य वर्ग से 40% अधिक तथा राष्ट्रीय औसत से 10% अधिक है।

सुझाव

  • स्वास्थ्य के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में अधिनियमित किया जाना चाहिये जो सरकार के लिये उचित गुणवत्ता के साथ समय पर, स्वीकार्य और सस्ती स्वास्थ्य देखभाल की समान पहुँच सुनिश्चित करने के उद्देश्य को अनिवार्य बनाता है तथा स्वास्थ्य के अंतर्निहित निर्धारकों को संबोधित करता है ताकि अमीर और गरीब के बीच स्वास्थ्य परिणामों में अंतर को समाप्त' किया जा सके। 
  • नि:शुल्क वैक्सीन नीति के लिये एक समावेशी मॉडल को अपनाना चाहिये ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रत्येक व्यक्ति, चाहे उसका लिंग, जाति, धर्म या स्थान कुछ भी हो, साथ ही दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बिना किसी देरी के टीका मिल जाए।
  • देश में अधिक न्यायसंगत स्वास्थ्य प्रणाली सुनिश्चित करने हेतु स्वास्थ्य व्यय को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाना तथा यह सुनिश्चित करना  कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये स्वास्थ्य हेतु केंद्रीय बजटीय आवंटन उनकी जनसंख्या के अनुपात में हो।
  • कमज़ोर/हाशिये की आबादी वाले क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिये और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (IPHS) के अनुसार स्थापित, सुसज्जित और पूरी तरह कार्यात्मक बनाया जाना चाहिये।
  • बाह्य रोगी देखभाल को शामिल करने हेतु बीमा योजनाओं के दायरे का विस्तार करना। स्वास्थ्य पर प्रमुख व्यय बाह्य रोगी लागतों के माध्यम से होता है जैसे- परामर्श, नैदानिक परीक्षण, दवाएंँ इत्यादि।
  •  एक केंद्र प्रायोजित योजना को संस्थागत बनाना जो सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिये मुफ्त आवश्यक दवाओं और निदान के प्रावधान हेतु धन आवंटित करे।
  •  यह सुनिश्चित करना कि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र को विनियमित कैसे किया जाए ताकि सभी राज्य सरकारें नैदानिक प्रतिष्ठान अधिनियम या समकक्ष राज्य कानून को अपनाएँ और उसे प्रभावी ढंग से लागू करें।
  • कोविड -19 महामारी के दौरान शुरू की गई मूल्य निर्धारण नीति का विस्तार करें ताकि निदान तथा  गैर-कोविड उपचार को शामिल किया जा सके और निजी अस्पतालों द्वारा लगाए जाने वाले अत्यधिक शुल्क को रोका जा सके और स्वास्थ्य पर होने वाले व्यापक व्यय को कम किया जा सके। 
  •  महिला फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं की सेवाओं को नियमित करके स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में मानव संसाधन और बुनियादी ढाँचे को बढ़ाना तथा मज़बूत करना।
  • महामारी की दूसरी लहर जैसी परिस्थितियों के लिये आकस्मिक योजनाएँ स्थापित करना। 
  •  सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये अंतर-क्षेत्रीय समन्वय को बढ़ावा दिया जाना चाहिये ताकि पानी और स्वच्छता, साक्षरता आदि मुद्दों का समाधान किया जा सके जो स्वास्थ्य की स्थिति में योगदान करते हैं।

निष्कर्ष

  •  इस असमानता को दूर करने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का मज़बूती से समर्थन किया जाना चाहिये।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, विशेष रूप से प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल और भारत में अपर्याप्त स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे के लगातार कम वित्तपोषण को दूसरी लहर के विनाशकारी प्रभाव के पश्चात् भी सरकार द्वारा समाधान किया जाना शेष है। अन्यथा स्वास्थ्य आपात स्थिति केवल मौजूदा असमानताओं को बढ़ाएगी और गरीब एवं हाशिये पर स्थित व कमज़ोर वर्ग के लोगों को इससे नुकसान ही होगा।

स्रोत : द हिंदू


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

सौर ऊर्जा में घरेलू विनिर्माण

प्रिलिम्स के लिये:

मॉडल तथा निर्माताओं की स्वीकृत सूची 

मेन्स के लिये:

सौर ऊर्जा क्षेत्र में भारत की स्थिति, मॉडल तथा निर्माताओं की स्वीकृत सूची संबंधी चिंताएँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने भारत में फोटोवोल्टिक मॉड्यूल निर्माताओं की पहली सूची जारी की है।

  • MNRE ने सौर सेल और मॉड्यूल निर्माताओं के लिये मॉडल तथा निर्माताओं की स्वीकृत सूची (Approved List of Models and Manufacturers- ALMM) के तहत पंजीकरण करना अनिवार्य कर दिया है, जो सौर आयात और आत्मनिर्भरता को लेकर भारत की निर्भरता को कम करने की दिशा में एक प्रारंभिक कदम है।
  • हालाँकि घरेलू निर्माताओं की क्षमता की कमी को देखते हुए ALMM आयातित फोटोवोल्टिक मॉड्यूल की खरीद की योजना बनाने में भारतीय डेवलपर्स को निकट अवधि में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

सौर प्रौद्योगिकी

  • सोलर फोटोवोल्टिक (Solar Photovoltaic- SPV): SPV सेल्स,  सौर विकिरण (सूर्य के प्रकाश) को विद्युत में परिवर्तित करते हैं। एक सोलर सेल, सिलिकॉन (Silicon) या अन्य सामग्रियों से बना एक अर्द्धचालक उपकरण (Semiconducting Device) होता है, जो सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आने पर विद्युत ऊर्जा  उत्पन्न करता है।
  • सोलर थर्मल (Solar Thermal): सोलर थर्मल पावर सिस्टम (Solar Thermal Power Systems), जिसे कंसंट्रेटिंग सोलर पावर सिस्टम (Concentrating Solar Power Systems) के रूप में भी जाना जाता है, विद्युत उत्पादन हेतु थर्मल रूट का उपयोग कर उच्च तापमान ऊर्जा स्रोत के रूप में संकेंद्रित सौर विकिरण (Concentrated Solar Radiation) का उपयोग करता है।

प्रमुख बिंदु:

ALMM के संदर्भ में: 

  • ALMM, भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards- BIS) प्रमाणन का अनुपालन करने वाले सौर सेल और मॉड्यूल के पात्र मॉडल तथा निर्माताओं को सूचीबद्ध करता है।
    • इसकी घोषणा वर्ष 2019 में  की गई थी।
  • इसका उद्देश्य मॉड्यूल के लिये एक गुणवत्तापूर्ण बेंचमार्क प्रदान करना और निम्न गुणवत्ता वाले चीनी निर्माताओं को भारत में अपने उत्पादों को डंप करने से रोकना है।
  • सरकारी स्वामित्व वाली सौर परियोजनाओं की आपूर्ति करने वाले निर्माताओं के लिये ALMM में सूचीबद्ध होना अनिवार्य है।
    • इस सूची में शामिल मॉडल और निर्माता ही देश में स्थापित सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के तहत परियोजनाओं में उपयोग के लिये पात्र होंगे।
  • इसके अलावा "सरकार" शब्द में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम, राज्य सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम और केंद्रीय एवं राज्य संगठन/स्वायत्त निकाय शामिल हैं।

ALMM से संबंधित मुद्दे:

  • सौर परियोजनाओं की मौद्रिक क्षमता पर प्रभाव: ALMM के विषय में स्पष्टता का सीधा सा अर्थ है आपूर्ति अनिश्चितता, सीमित मॉड्यूल विकल्प, नई प्रौद्योगिकियों तक पहुँच में कमी और बड़े पैमाने पर परियोजना डेवलपर्स हेतु लागत में वृद्धि तथा ये सभी मिलकर सौर परियोजनाओं की मौद्रिक क्षमता को प्रभावित करेंगे।
    • इसके परिणामस्वरूप सौर ऊर्जा शुल्क की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जो कि अंततः सौर ऊर्जा के प्रयोग की संभावनाओं को कमज़ोर करेगा।
  • BIS और ALMM के बीच ओवरलैप: ALMM को सौर उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिये स्थापित  किया गया था, किंतु यह कई पहलुओं में मौजूदा भारतीय मानक ब्यूरो (BSI) प्रमाणन के साथ ओवरलैप करता है।
    • ‘भारतीय मानक ब्यूरो’ उत्पाद प्रमाणन से जुड़ा हुआ है, जबकि ALMM मूल रूप से एक प्रक्रिया और निर्माण सुविधा/मूल उपकरण निर्माता के प्रमाणीकरण से संबंधित है।
    • इससे घरेलू विनिर्माताओं पर अनुपालन बोझ पड़ता है।
  • आपूर्ति-पक्ष संबंधी बाधाएँ: कई निर्माताओं का मानना है कि ALMM के कार्यान्वयन से विदेशी कंपनियों को भारतीय बाज़ार में आपूर्ति करने से रोक दिया जाएगा।
    • चूँकि भारतीय घरेलू बाज़ार अभी भी पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हुआ है, ऐसे में परियोजना निर्माताओं को निकट भविष्य में आपूर्ति में बाधा उत्पन्न होने का डर है।

भारत में सौर ऊर्जा की घरेलू क्षमता:

  • वर्ष 2014 के बाद से सौर क्षमता वृद्धि में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और भारत उत्तरोत्तर दुनिया के तीसरे सबसे बड़े सौर बाज़ार के रूप में उभर रहा है।
    • हालाँकि भारत का सौर ऊर्जा बाज़ार काफी हद तक आयातित उत्पादों पर निर्भर है।
    • भारत का घरेलू सौर उपकरण निर्माण उद्योग इस अवसर को भुनाने में काफी हद तक विफल रहा है।
    • लगभग 80% सौर उपकरण और घटक चीन से आयात किये जाते हैं।
  • इसका कारण यह है कि सोलर सेल का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जो प्रौद्योगिकी एवं पूंजी गहन है, साथ ही प्रत्येक 8-10 महीने में यह अपग्रेड भी होते हैं।
    • इसके अलावा सोलर वेफर और इनगॉट निर्माण के वैश्विक बाज़ार में चीन का दबदबा है, जो भारत में सस्ते सौर उपकरणों को पहुँचाने के लिये प्रतिस्पर्द्धा-रोधी उपायों का उपयोग करता है।

सौर ऊर्जा और भारत

  • वर्ष 2015 में पेरिस जलवायु शिखर सम्मेलन (Paris Climate Summit) से ठीक पहले भारत सरकार ने कहा कि वह वर्ष 2022 तक 175 GW अक्षय ऊर्जा स्थापित करने के लक्ष्य को प्राप्त करेगा, जिसमें 100 GW सौर ऊर्जा भी शामिल है।
    • इस संदर्भ में राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission) भारत की ऊर्जा सुरक्षा चुनौती को संबोधित करते हुए पारिस्थितिक रूप से सतत् विकास को बढ़ावा देने हेतु भारत सरकार और राज्य सरकारों की एक प्रमुख पहल है।
    • इसके अलावा पेरिस जलवायु समझौते में INDC के हिस्से के रूप में भारत की प्रतिबद्धता वर्ष 2005 के स्तर से वर्ष 2030 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 33 से 35% तक कम करने की है।
  • ‘भारत में सौर रूपांतरण के लिये सतत् रूफटॉप कार्यान्वयन (सृष्टि) पर रूफटॉप सौर ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देने की परिकल्पना की गई है।
  • कुसुम योजना (KUSUM Scheme) किसानों को अपनी बंजर भूमि पर स्थापित सौर ऊर्जा परियोजनाओं के माध्यम से ग्रिड को बिजली बेचने का विकल्प प्रदान करते हुए अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर प्रदान करेगी।
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन ( International Solar Alliance- ISA) की स्थापना के माध्यम से भारत 122 से अधिक देशों की सौर ऊर्जा क्षमता का लाभ उठाने हेतु एक ऐसे विश्व की परिकल्पना करता है जो सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये  कर्क रेखा और मकर रेखा के मध्य पूर्ण या आंशिक रूप से स्थित है। 

आगे की राह

  • ALMM और BIS प्रमाणन, इन दो उद्देश्यों को मिलाकर और इसे एकल-विंडो प्रक्रिया बनाकर बेहतर ढंग से प्रबंधित किया जा सकता था।
  • सौर परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिये मज़बूत वित्तीय उपायों की आवश्यकता है, ग्रीन बॉण्ड, संस्थागत ऋण और स्वच्छ ऊर्जा कोष जैसे नवीन कदम,महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र, विशेष रूप से भंडारण प्रौद्योगिकी में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना भी इस दिशा में एक उचित कदम हो सकता है।
  • चीन द्वारा की जाने वाली सौर उपकरणों की डंपिंग से निपटने के लिये उचित तंत्र प्रदान किया जाना चाहिये।
  • नीति निर्णयन और कार्यान्वयन में अनावश्यक देरी से बचने के लिये एक आवश्यक ढाँचा अपनाया जाना चाहिये। भारत को सौर अपशिष्ट प्रबंधन और विनिर्माण मानक नीति की भी आवश्यकता है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


शासन व्यवस्था

भारत की अपतटीय पवन ऊर्जा के लिये रोडमैप

प्रिलिम्स के लिये

अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजना 

मेन्स के लिये 

अपतटीय पवन ऊर्जा की संभावनाएँ एवं लाभ,  पवन ऊर्जा से संबंधित चुनौतियाँ एवं नीतियाँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने वर्ष 2022 तक 5 गीगावाट का मध्‍यकालिक लक्ष्‍य और वर्ष 2030 तक 30 गीगावाट का दीर्घकालिक लक्ष्‍य घोषित किया गया है। 

  • भारत की तटरेखा 7,600 किमी. है जिसके माध्यम से 127 गीगावाट अपतटीय पवन ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है।

प्रमुख बिंदु 

अपतटीय पवन ऊर्जा के बारे में:

  • वर्तमान में पवन ऊर्जा के सामान्यत: दो प्रकार है : तटवर्ती पवन फार्म जो भूमि पर स्थित पवन टर्बाइनों के व्यापक रूप में स्थापित हैं और अपतटीय पवन फार्म जो जल निकायों में स्थित प्रतिष्ठान हैं।
  • अपतटीय पवन ऊर्जा का तात्पर्य जल निकायों के अंदर पवन फार्मों की स्थापना से है। वे बिजली उत्पन्न करने के लिये समुद्री हवाओं का उपयोग करते हैं। ये पवन फार्म या तो फिक्स्ड-फाउंडेशन टर्बाइन (Fixed-Foundation Turbines) या फ्लोटिंग विंड टर्बाइन (Floating wind Turbines) का उपयोग करते हैं।
    • एक फिक्स्ड-फाउंडेशन टर्बाइन उथले जल में निर्मित होता है, जबकि एक फ्लोटिंग विंड टर्बाइन गहरे जल में निर्मित होता है जहाँ इसकी नींव समुद्र तल से लगी होती है। फ्लोटिंग विंड फार्म अभी भी अपनी प्रारंभिक अवस्था में हैं।
  • अपतटीय पवन फार्म को तट से कम-से-कम 200 समुद्री मील और समुद्र में 50 फीट गहरा होना चाहिये।
  •  अपतटीय पवन टर्बाइन बिजली उत्पादन करते हैं जो समुद्र तल में दबे केबलों के माध्यम से तट पर वापस आ जाती है।

भारत में पवन ऊर्जा की स्थिति:

  • मार्च 2021 में एक वर्ष में भारत की पवन बिजली उत्पादन क्षमता 39.2 गीगावाट (GW) तक पहुँच गई है। अगले पांँच वर्षों में और 20 गीगावाट अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त होने की उम्मीद है।
  • वर्ष 2010 और 2020 के बीच पवन उत्पादन की कुल वार्षिक वृद्धि दर 11.39% रही है, जबकि स्थापित क्षमता के मामले में यह दर 8.78% रही है।
  • व्यावसायिक रूप से दोहन योग्य 95% से अधिक संसाधन सात राज्यों में स्थित हैं: आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और तमिलनाडु।

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लाभ:

  • जल निकायों पर हवा की गति अधिक और दिशा सुसंगत होती है, जिसके परिणामस्वरूप अपतटीय पवन फार्म मानक स्थापित क्षमता से अधिक बिजली उत्पन्न करते हैं।
  • तटवर्ती टर्बाइनों की तुलना में ऊर्जा की समान क्षमता का उत्पादन करने के लिये कम अपतटीय टर्बाइनों की आवश्यकता होती है।
  • अपतटीय पवन फार्म में तटवर्ती पवन फार्म की तुलना में अधिक उपयोग क्षमता (CUF) होती है। इसलिये अपतटीय पवन ऊर्जा लंबे समय तक संचालन की अनुमति देती है। 
    • एक विंड टर्बाइन CUF औसत आउटपुट ऊर्जा के लिये अधिकतम ऊर्जा क्षमताओं के विभाजन के समान है।
  • बड़ी और ऊँची अपतटीय पवन चक्कियों का निर्माण संभव है, जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि होती है।
  • इसके अतिरिक्त पवन का प्रवाह पहाड़ियों या इमारतों द्वारा बाधित नहीं होता है।

चुनौतियाँ:

  • अत्यधिक स्थापना लागत:
    • भारत में स्थानीय सबस्ट्रक्चर निर्माताओं, इनस्टॉलेशन जहाज़ों और प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी है। अपतटीय पवन टर्बाइनों को तटवर्ती पवन फार्मों की तुलना में मज़बूत संरचनाओं की आवश्यकता होती है। यह उच्च स्थापना लागत का कारण बन सकता है।
  • अत्यधिक रखरखाव लागत:
    • समुद्री लहरों और तेज़ हवाओं के कारण, विशेष रूप से तूफान के दौरान पवन टर्बाइनों को नुकसान हो सकता है, जिसके कारण अपतटीय पवन फार्मों को रखरखाव की आवश्यकता होती है, जो कि अधिक महँगा हो सकता है।

पवन ऊर्जा से संबंधित नीतियाँ:

  • राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति: राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति, 2018 का मुख्य उद्देश्य पवन और सौर संसाधनों, ट्रांसमिशन बुनियादी अवसंरचना तथा भूमि के इष्टतम एवं कुशल उपयोग के लिये बड़े ग्रिड से जुड़े पवन-सौर फोटोवोल्टिक हाइब्रिड सिस्टम को बढ़ावा देने हेतु एक अवसंरचना का निर्माण करना है।
  • राष्‍ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति: राष्ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति को अक्तूबर 2015 में भारतीय विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में 7600 किलोमीटर की भारतीय तटरेखा के साथ अपतटीय पवन ऊर्जा विकसित करने के उद्देश्य से अधिसूचित किया गया था।

आगे की राह

  • अक्षय खरीद दायित्व: इसके माध्यम से बिजली वितरण कंपनियाँ, खुली पहुँच वाले उपभोक्ता और कैप्टिव उपयोगकर्त्ता अपनी कुल बिजली खपत के हिस्से के रूप में स्वच्छ ऊर्जा खरीद सकते हैं।
  • कम कर: भारत में जीएसटी कानून, बिजली और इसकी बिक्री को जीएसटी से छूट देता है। इसके विपरीत पवन ऊर्जा उत्पादन कंपनियाँ परियोजना की स्थापना के लिये वस्तुओं और/या सेवाओं की खरीद हेतु जीएसटी का भुगतान करते समय इनपुट टैक्स क्रेडिट (Input Tax Credit) का दावा नहीं कर सकती हैं।
  • फीड-इन टैरिफ: डिस्कॉम फीड-इन टैरिफ (Feed-in Tariff- FiT) नियमों को अपना सकते हैं और अपतटीय पवन ऊर्जा खरीद को अनिवार्य बना सकते हैं। एफआईटी को प्रत्येक अपतटीय पवन परियोजना के अनुरूप बनाया जा सकता है। एफआईटी का उपयोग विकास के शुरुआती चरणों में अपतटीय पवन ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये किया जा सकता है जब तक कि यह आर्थिक रूप से व्यवहार्य न हो जाए।
  • डीम्ड जनरेशन प्रोविन: राज्य लोड डिस्पैच सेंटर (State Load Dispatch Centre) की बड़ी मात्रा में बिजली को अवशोषित करने में असमर्थता के कारण अपतटीय पवन परियोजनाओं को कटौती की चिंताओं के खिलाफ संरक्षित करने की आवश्यकता है। इसके लिये अपतटीय पवन को "डीम्ड जेनरेशन प्रोविन" (Deemed Generation Provision) किया जा सकता है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


सामाजिक न्याय

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन

मेन्स के लिये:

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत की गई प्रमुख पहलें और उपलब्धियाँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री ने राज्यसभा को सूचित किया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) समर्थित स्वास्थ्य प्रणाली में सुधारों के परिणामस्वरूप लचीली स्वास्थ्य प्रणालियों का विकास हुआ है।

संदर्भ:

  • NHM को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2013 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (वर्ष 2005 में शुरू) और राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (वर्ष 2013 में शुरू) को मिलाकर शुरू किया गया था।
  • मुख्य कार्यक्रम संबंधी घटकों में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रजनन-मातृ-नवजात-बाल और किशोर स्वास्थ्य (RMNCH+A) तथा संचारी एवं गैर-संचारी रोगों के लिये स्वास्थ्य प्रणाली को मज़बूत करना शामिल है।
  • NHM न्यायसंगत, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुँच की परिकल्पना करता है जो लोगों की ज़रूरतों के प्रति जवाबदेह और उत्तरदायी है।

National-Health-Mission

राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों (UT) को सहायता:

  • स्वास्थ्य सुविधाएंँ:
    • NHM के तहत राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को मानदंडों के अनुसार नई सुविधाओं और मौजूदा सुविधाओं के उन्नयन हेतु उनकी आवश्यकता के आधार पर बुनियादी ढाँचे के अंतराल को कम करने हेतु सहायता प्रदान की जाती है।
  • स्वास्थ्य सेवाएंँ:
    • NHM सहायता में मातृ स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य, किशोर स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम और तपेदिक जैसी प्रमुख बीमारियों तथा वेक्टर जनित बीमारियों जैसे- मलेरिया, डेंगू , काला आजार एवं कुष्ठ रोगआदि से संबंधित मुफ्त सेवाओं का प्रावधान है।  

NHM के तहत प्रमुख पहलें:

एनएचएम की उपलब्धियाँ

स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार:

  • एनएचएम ने कार्यान्वयन के 15 वर्षों में स्वास्थ्य के लिये सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (Millennium Development Goal) की उपलब्धि को सक्षम किया है।
  • इससे मातृ, नवजात और बाल स्वास्थ्य संकेतकों, विशेष रूप से मातृ-मृत्यु अनुपात, शिशु मृत्यु दर आदि में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिसमें भारत में गिरावट की दर वैश्विक औसत से काफी अधिक है तथा एनएचएम के कार्यान्वयन की अवधि के दौरान इन गिरावटों में तेज़ी आई है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में वृद्धि:

  • एनएचएम एक स्वास्थ्य प्रणाली दृष्टिकोण अपनाता है और नागरिकों को व्यापक प्राथमिक तथा माध्यमिक देखभाल सेवाएँ प्रदान करने के लिये ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों व ज़िला अस्पतालों के साथ मज़बूत रेफरल लिंकेज सहित सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं हेतु एक नेटवर्क बनाने का लक्ष्य रखता है।
  • एनएचएम ने न केवल सेवा वितरण के लिये संस्थागत क्षमताओं में वृद्धि करने में योगदान दिया है बल्कि एनएचएम के अंतर्गत विभिन्न राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लक्षित हस्तक्षेप हेतु क्षमताओं का विकास भी किया गया है।

समान विकास: 

  • इसके तहत वामपंथी उग्रवाद वाले क्षेत्रों में रहने वाली आदिवासी आबादी और शहरी गरीबों के स्वास्थ्य पर भी निरंतर ध्यान दिया गया था।
  • पहुँच एवं उपयोग में समानता सुनिश्चित करने का एक और हालिया प्रयास, ‘आकांक्षी ज़िला’ कार्यक्रम है, जिसमें अतिरिक्त संसाधनों के आवंटन तथा क्षमता वृद्धि के लिये कमज़ोर सामाजिक और मानव विकास संकेतक वाले 28 राज्यों के 115 ज़िलों की पहचान की गई है, ताकि उन्हें अधिक प्रगतिशील राज्यों के स्तर पर पहुँचाया जा सके।

राष्ट्रीय एंबुलेंस सेवाएँ:

  • राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (वर्ष 2005) के शुभारंभ के समय देश में एंबुलेंस नेटवर्क न के बराबर था।
  • ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ के तहत अब तक 20,990 आपातकालीन प्रतिक्रिया सेवा वाहन चालू किये गए हैं।
  • इसके अलावा 5,499 रोगी परिवहन वाहन भी तैनात किये गए हैं, विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं और बीमार शिशुओं को ‘मुफ्त पिकअप और ड्रॉप’ सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से।

मानव संसाधन में वृद्धि: 

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) सेवा वितरण हेतु डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं  जैसे मानव संसाधन को शामिल करने के लिये राज्यों का समर्थन करता है तथा मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं (आशा) के माध्यम से दुनिया के सबसे बड़े सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवक कार्यक्रम को भी लागू करता है।
    • NHM के तहत 10 लाख से अधिक आशा और आशा फैसिलिटेटर जुड़े हुए हैं।
  • NHM ने राज्यों को सार्वजनिक स्वास्थ्य, वित्त, योजना तथा प्रबंधन में कौशल प्राप्त करने से संबंधित योजना बनाने एवं हस्तक्षेप करने के साथ ही नैदानिक कर्मचारियों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने समर्थन किया है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार: 

  •  NHM ने विशेष रूप से शासन, खरीदारी और प्रौद्योगिकी से संबंधित सुधारों के डिज़ाइन और कार्यान्वयन को सक्षम बनाया है।

 उच्च आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय (OOPE) का समाधान करना: 

  •  OOPE के वर्तमान उच्च स्तर को कम करने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए यह कहा गया कि OOPE का लगभग 70% हिस्सा दवाओं और निदान के कारण है, NHM के तहत मुफ्त दवाएँ और नि:शुल्क नैदानिक सेवा संबंधी पहल लागू की गई है। 
  • राष्ट्रीय आवश्यक निदान सूची (NEDL) और आवश्यक निदान सूची (EDL) को अधिसूचित किया गया है तथा नई पहल के आधार पर अधिक आवश्यक दवाओं को शामिल करने के लिये समय-समय पर इन्हें अद्यतन किया जाता है।

स्रोत : पी.आई.बी.


सामाजिक न्याय

स्माइल (SMILE) योजना

प्रिलिम्स के लिये:

स्माइल योजना, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम, राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान

मेन्स के लिये:

स्माइल योजना के प्रावधान

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने "स्माइल- आजीविका और उद्यम के लिये सीमांत व्यक्तियों हेतु समर्थन" (Support for Marginalized Individuals for Livelihood and Enterprise-SMILE) नामक योजना तैयार की है।

  • इसमें केंद्रीय क्षेत्र की 'भिखारियों के व्यापक पुनर्वास के लिये योजना' नामक एक उपयोजना भी शामिल है।

प्रमुख बिंदु:

संदर्भ:

  • भिखारियों और ट्रांसजेंडरों के लिये मौजूदा योजनाओं के विलय के बाद यह एक नई योजना है।
  • यह योजना राज्य/संघ राज्य क्षेत्र सरकारों और शहरी स्थानीय निकायों के पास उपलब्ध मौजूदा आश्रय गृहों के उपयोग के लिये भिक्षावृत्ति में लगे व्यक्तियों के लिये पुनर्वास सुनिश्चित करती है।
    • मौजूदा आश्रय गृहों की अनुपलब्धता के मामले में कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा नए समर्पित आश्रय गृह स्थापित किये जाएंगे।

मुख्य केंद्र:

  • इस योजना के केंद्र में बड़े पैमाने पर पुनर्वास, चिकित्सा सुविधाओं का प्रावधान, परामर्श, बुनियादी दस्तावेज़, शिक्षा, कौशल विकास आदि हैं।
  • अनुमान है कि इस योजना के तहत लगभग 60,000 सबसे गरीब व्यक्तियों को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिये लाभान्वित किया जाएगा।

कार्यान्वयन:

  • इसे राज्य/संघ राज्य क्षेत्र की सरकारों/स्थानीय शहरी निकायों, स्वैच्छिक संगठनों, समुदाय आधारित संगठनों (CBOs), संस्थानों और अन्य के सहयोग से लागू किया जाएगा।

भिखारियों के व्यापक पुनर्वास के लिये योजना:

  • भिक्षावृत्ति में लगे व्यक्तियों के लिये यह एक व्यापक योजना होगी।
  • इस योजना को चुनिंदा शहरों में पायलट आधार पर लागू किया गया है जहाँ भिखारी समुदाय की संख्या अधिक है।
  • वर्ष 2019-20 के दौरान मंत्रालय ने भिखारियों के कौशल विकास कार्यक्रमों हेतु राष्ट्रीय सामाजिक रक्षा संस्थान (NISD) को 1 करोड़ रुपए और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम (NBCFDC) को 70 लाख रुपए की राशि जारी की।

भारत में भिक्षावृत्ति की स्थिति:

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में भिखारियों की कुल संख्या 4,13,670 (2,21,673 पुरुषों और 1,91,997 महिलाओं सहित) है और पिछली जनगणना के बाद से इस संख्या में वृद्धि हुई है।
  • पश्चिम बंगाल इस सूची में सबसे ऊपर है, उसके बाद क्रमश: दूसरे और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश और बिहार का स्थान आता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, लक्षद्वीप में भिखारियों की संख्या मुश्किल से केवल दो है।
  • केंद्रशासित प्रदेशों में नई दिल्ली में सबसे अधिक 2,187 भिखारी थे, उसके बाद चंडीगढ़ में इनकी संख्या 121 थी।
  • पूर्वोत्तर राज्यों में असम 22,116 भिखारियों के साथ सूची में सबसे ऊपर है, जबकि मिज़ोरम 53 भिखारियों के साथ निचले स्थान पर है।
  • हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय भिक्षावृत्ति रोकथाम अधिनियम के तहत विभिन्न राज्यों में भिक्षावृत्ति को अपराध की श्रेणी से हटाने के लिये एक याचिका पर विचार करने हेतु सहमत हुआ है।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम

(National Backward Classes Finance & Development Corporation- NBCFDC)

  • NBCFDC सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तत्त्वावधान में भारत सरकार का उपक्रम है।
  • इसे कंपनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के तहत 13 जनवरी, 1992 को एक गैर-लाभकारी कंपनी के रूप में शामिल किया गया था।
  • इसका उद्देश्य पिछड़े वर्गों को लाभ पहुँचाने हेतु आर्थिक एवं विकासात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना तथा कौशल विकास व स्वरोज़गार उपक्रमों में इन वर्गों के गरीबों की सहायता करना है।

राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान (NISD)

  • NISD एक स्वायत्त निकाय है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी), दिल्ली सरकार के साथ 1860 के सोसायटी अधिनियम XXI के तहत पंजीकृत है।
  • यह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय हेतु एक केंद्रीय सलाहकार निकाय है।
  • यह सामाजिक रक्षा के क्षेत्र में नोडल प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान है।
  • संस्थान वर्तमान में नशीली दवाओं के दुरुपयोग की रोकथाम, वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण, भिक्षावृत्ति रोकथाम, ट्रांसजेंडर और अन्य सामाजिक रक्षा संबंधी मुद्दों के क्षेत्र में मानव संसाधन विकास पर केंद्रित है।
  • संस्थान का अधिदेश प्रशिक्षण, अनुसंधान और प्रलेखन के माध्यम से भारत सरकार के सामाजिक रक्षा कार्यक्रमों हेतु जानकारी प्रदान करना है।

स्रोत: पी.आई.बी


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