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97वें संशोधन के प्रावधान रद्द

  • 21 Jul 2021
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

सहकारिता

मेन्स के लिये:

भारत में सहकारिता से संबंधित प्रावधान और इसकी आवश्यकता 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने गुजरात उच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के फैसले को बरकरार रखते हुए  संविधान (97वाँ संशोधन) अधिनियम, 2011 के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया है।

  •  न्यायालय का यह फैसला संघवाद को बढ़ावा देता है क्योंकि 97वें संशोधन ने सहकारी समितियों (एक ऐसा क्षेत्र जिसे अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर योगदानकर्त्ता माना जाता है) पर राज्यों के अनन्य अधिकार को सीमित कर दिया है।

सहकारी समितियाँ:

  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organisation- ILO) के अनुसार, सहकारिता व्यक्तियों का एक स्वायत्त संघ है जो संयुक्त स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित उद्यम के माध्यम से अपनी सामान्य आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं को पूरा करने हेतु स्वेच्छा से एकजुट होते हैं।
  • सहकारी समितियाँ कई प्रकार की होती हैं जैसे- उपभोक्ता सहकारी समिति (Consumer Cooperative Society), उत्पादक सहकारी समिति (Producer Cooperative Society), ऋण सहकारी समिति (Credit Cooperative Society), आवास सहकारी समिति (Housing Cooperative Society) और विपणन सहकारी समिति (Marketing Cooperative Society)।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) द्वारा वर्ष 2012 को सहकारिता का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष (International Year of Cooperatives) घोषित किया गया था।
  • भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसने विश्व के सबसे बड़े सहकारी आंदोलन की नींव रखी।
    • हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा 'सहकार से समृद्धि' (सहकारिता के माध्यम से समृद्धि) के दृष्टिकोण को साकार करने और सहकारिता आंदोलन को नई दिशा प्रदान करने के उद्देश्य से एक अलग 'सहकारिता मंत्रालय' का निर्माण किया गया है।

प्रमुख बिंदु:

मुद्दे:

  • 97वें संशोधन के माध्यम से संविधान में प्रस्तुत किया गया भाग IXB, सहकारी समितियों के क्रियान्वयन हेतु शर्तों को निर्धारित करता है।
  • संशोधन में प्रावधान, संविधान द्वारा आवश्यक राज्य विधानसभाओं द्वारा उनकी पुष्टि किये बिना संसद द्वारा पारित किये गए।
  • यह एक सहकारिता के निदेशकों की संख्या या उनके कार्यकाल की अवधि और यहाँ तक कि उसका सदस्य बनने के लिये आवश्यक विशेषज्ञता का निर्धारण करने की सीमा तक विस्तारित है।

97वें संशोधन के अन्य प्रमुख प्रावधान

  • संविधान (97वाँ संशोधन) अधिनियम, 2011 ने भारत में काम कर रही सहकारी समितियों के संबंध में भाग IXA (नगर पालिका) के ठीक बाद एक नया भाग IXB जोड़ा है।
  • संविधान के भाग-III के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1)(c) में "यूनियन (Union) और  एसोसिएशन (Association)" के बाद "सहकारिता" (Cooperative) शब्द जोड़ा गया था। यह सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान कर सहकारी समितियाँ बनाने में सक्षम बनाता है।
  • राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों (Directive Principles of State Policy-भाग IV) में "सहकारी समितियों के प्रचार" के संबंध में एक नया अनुच्छेद 43B जोड़ा गया था।

केंद्र सरकार का तर्क:

  • इसने सहकारिता के कामकाज में 'व्यावसायिकता' और स्वायत्तता को प्रेरित करने के सरकार के प्रयास को उचित ठहराया।
  • सदस्यों की जवाबदेही की कमी के कारण सेवाओं की खराब गुणवत्ता और उत्पादकता में गिरावट देखी गई है।
  • यहाँ तक कि इनके चुनाव भी समय पर नहीं होते हैं। सहकारी समितियों को सुस्थापित लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर चलने की ज़रूरत है।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला:

  • राज्यों का विशेष विधान:
    • जहाँ तक विधायी शक्तियों का संबंध है, संविधान को अर्द्ध-संघीय के रूप में वर्णित किया गया है, हालाँकि संघीय सर्वोच्चता सिद्धांत के मद्देनज़र राज्यों की तुलना में केंद्र के पक्ष में झुकाव है।
      • अर्द्ध-संघवाद का अर्थ है एकात्मक राज्य और एक संघ के बीच राज्य का एक मध्यवर्ती रूप।
    • हालाँकि अपने स्वयं के क्षेत्र में राज्यों के पास विशेष रूप से उनके लिये आरक्षित विषयों पर कानून बनाने की विशेष शक्ति है।
    • भाग IX B, जिसमें अनुच्छेद 243ZH से 243ZT शामिल हैं, ने राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के तहत सहकारी क्षेत्र पर राज्य विधानसभाओं की “अनन्य विधायी शक्ति” को “महत्त्वपूर्ण और पर्याप्त रूप से प्रभावित” किया है। 
    • वास्तव में अदालत ने स्पष्ट किया कि कैसे अनुच्छेद 243ZI यह उपबंध करता है कि एक राज्य केवल 97वें संवैधानिक संशोधन के भाग IXB के प्रावधानों के अधीन किसी समाज के निगमन, विनियमन और समापन को लेकर कानून बना सकता है।
  • राज्यों द्वारा अनुमोदित नहीं:
    • यह माना गया कि 97वें संविधान संशोधन के लिये संविधान के अनुच्छेद 368(2) के अनुसार कम-से-कम आधे राज्य विधानसभाओं के अनुसमर्थन की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक ऐसी प्रविष्टि से संबंधित है जो एक विशेष राज्य के विषय (सहकारी समितियाँ) रूप में थी।
      • अनुच्छेद 368(2) के तहत संसद विशेष बहुमत से विधेयक पारित कर संविधान में संशोधन कर सकती है।
    • चूँकि 97वें संशोधन के मामले में ऐसा अनुसमर्थन नहीं किया गया था, इसलिये इसे रद्द किया जा सकता था।
  • बहुराज्य सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधानों की वैधता बरकरार:
    • इसने अनुसमर्थन की कमी के कारण 'बहु-राज्य सहकारी समितियों (MSCS)' से संबंधित संशोधन के भाग IXB के कुछ हिस्सों पर प्रहार नहीं किया।
    • जब MSCS पर विचार किया जाता है तब इसका उद्देश्य एक राज्य तक सीमित नहीं होता है, बल्कि ये विधायी शक्तियाँ भारत संघ की होंगी जो प्रविष्टि 44 सूची I (संघ सूची) में निहित हैं।
    • यह घोषित किया गया है कि संविधान का भाग IXB केवल तभी तक प्रभावी होगा जब तक यह विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बहु-राज्य सहकारी समितियों से संबंधित है।

विधायी शक्तियों में अंतर करने के लिये सूचियाँ

  • तीन ऐसी सूचियाँ हैं जो संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत विधायी शक्तियों के वितरण का प्रावधान करती हैं :
    • संघ सूची (सूची I)- इसमें 98 विषय (मूल रूप से 97) शामिल हैं और इसमें वे विषय शामिल होते हैं जो राष्ट्रीय महत्त्व के हैं तथा जिनके लिये पूरे देश में समान कानून है।
      • इन मामलों के संबंध में केवल केंद्रीय संसद ही कानून बना सकती है, उदाहरण के लिये रक्षा, विदेश मामले, बैंकिंग, मुद्रा, संघ कर आदि।
    • राज्य सूची (सूची II)- इसमें 59 विषय (मूल रूप से 66) हैं और इसमें स्थानीय या राज्य हित के विषय शामिल हैं।
      • ये विषय राज्य विधानमंडलों की विधायी क्षमता के अंतर्गत आते हैं। जैसे- लोक व्यवस्था, पुलिस, स्वास्थ्य, कृषि और वन आदि।
    • समवर्ती सूची (सूची-III)- इसमें 52 (मूल रूप से 47) विषय हैं जिनके संबंध में केंद्रीय संसद और राज्य विधानमंडल दोनों के पास कानून बनाने की शक्ति है। समवर्ती सूची का उद्देश्य अत्यधिक कठोरता से बचने के लिये विषयों को केंद्र एवं राज्य दोनों को एक उपकरण के रूप में प्रदान करना था।
    • यह एक 'ट्विलाइट ज़ोन' है, क्योंकि महत्त्वपूर्ण मामलों के लिये राज्य पहल नहीं कर सकते हैं, जबकि संसद ऐसा कर सकती है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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