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2030 तक 30 गीगावाट अपतटीय पवन ऊर्जा का लक्ष्य

  • 20 Jun 2018
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of New and Renewable Energy - MNRE) ने भारत में अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजना के तहत मध्‍यम एवं दीर्घकालिक लक्ष्‍य घोषित किये हैं। वर्ष 2022 तक 5 गीगावाट का मध्‍यकालिक लक्ष्‍य और वर्ष 2030 तक 30 गीगावाट का दीर्घकालिक लक्ष्‍य घोषित किया गया है।

  • वैसे तो भारत में तय किये गए 60 गीगावाट के तटवर्ती पवन ऊर्जा लक्ष्‍य एवं 34 गीगावाट पवन ऊर्जा की प्राप्ति और वर्ष 2022 तक 100 गीगावाट के सौर ऊर्जा लक्ष्‍य की तुलना में उपर्युक्‍त लक्ष्‍य मामूली नज़र आता है, लेकिन खुले समुद्र में विशाल पवन ऊर्जा टर्बाइन लगाने में होने वाली भारी दिक्‍कतों को ध्‍यान में रखते हुए इस सामान्‍य लक्ष्‍य की प्राप्ति भी अत्‍यंत चुनौतीपूर्ण नज़र आती है।
  • उल्‍लेखनीय है कि तटवर्ती पवन ऊर्जा टर्बाइनों की तुलना में अपतटीय पवन ऊर्जा टर्बाइनों के आकार के साथ-साथ उनकी क्षमता भी बहुत ज़्यादा होती है।
  • अपतटीय पवन ऊर्जा की बदौलत देश में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्रों में पहले से ही मौजूद समूह में एक नया अवयव शामिल होगा।

राष्‍ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति 

  • प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 9 सितंबर, 2015 को राष्ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति को मंज़ूरी दी गई थी और अक्तूबर, 2015 में इसे अधिसूचित किया गया।
  • इसके बाद नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय को देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र के अंदर अपतटीय क्षेत्रों के उपयोग के लिये प्रमुख मंत्रालय के रूप में अधिकृत किया गया।
  • यह योजना देश भर में मान्य होगी, जो अपतटीय पवन क्षमता की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
  • इसी तरह राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (National Institute of Wind Energy-NIWE) को देश में अपतटीय पवन ऊर्जा के विकास और अपतटीय पवन ऊर्जा ब्लॉकों के आवंटन तथा संबंधित मंत्रालयों एवं एजेंसियों के साथ समन्वय व संबद्ध कार्यों के लिये प्रमुख एजेंसी के रूप में अधिकृत किया गया।
  • इसके अंतर्गत अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना और आधार रेखा से 200 समुद्री मील (नॉटिकल माइल) की दूरी तक देश में अथवा उसके आस-पास जल में अनुसंधान व विकास कार्यों समेत अपतटीय पवन ऊर्जा के विकास का मार्ग प्रशस्त किया गया।

अपतटीय पवन ऊर्जा की संभावनाएँ

  • प्राथमिक अध्‍ययनों से भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिणी छोर और पश्चिमी तट पर अपतटीय पवन ऊर्जा के लिये बड़ी मात्रा में हवाएँ उपलब्ध होने की संभावनाओं के बारे में पता चला है। इसके लिये गुजरात और तमिलनाडु के अपतटीय क्षेत्रों में प्राथमिक अध्‍ययन कराए गए।
  • पवन की गुणवत्ता को सटीक रूप से मापने के लिये गुजरात तट के निकट एक ‘लिडार’ लगाया गया है जो नवंबर, 2017 से ही अपतटीय क्षेत्रों में बहने वाली हवाओं की गुणवत्ता से जुड़े डेटा को सृजित कर रहा है।
  • अपतटीय हवाओं की बेहतर गुणवत्ता से प्रोत्‍साहित होकर निजी क्षेत्र की एक कंपनी ने भी अपतटीय पवन संसाधन को मापने के उद्देश्‍य से गुजरात के कच्‍छ की खाड़ी में एक लिडार लगाया है।
  • तमिलनाडु एवं गुजरात में भी इसी तरह के कई और उपकरण लगाने की योजनाएँ बनाई गई हैं।
  • विश्‍व स्‍तर पर ब्रिटेन, जर्मनी, डेनमार्क, नीदरलैंड और चीन की अगुवाई में लगभग 17-18 गीगावाट की अपतटीय पवन ऊर्जा क्षमता स्‍थापित की गई है। 

भारत सरकार द्वारा गुजरात के तट पर खंबात की खाड़ी (Gulf of Khambat) में प्रथम अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजना के लिये अभिरुचि पत्र (Expression of Interest-EoI) आमंत्रित किये गए हैं जिसमें देश-विदेश के उद्योग जगत ने काफी रुचि दिखाई है। हालाँकि पहली अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजना 1,000 मेगावाट है, तथापि सरकार की योजना वर्ष 2022 तक कम-से-कम 5 गीगावाट अपतटीय पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित करना है। यह इस बात के महत्त्व को रेखांकित करता है कि अमेरिका और चीन के बाद ग्रीनहाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जक के रूप में भारत अपनी प्रतिबद्धता के प्रति पूरी तरह से गंभीर है। यही कारण है कि यह अपनी 7,600 किलोमीटर की तटरेखा पर पवन ऊर्जा क्षमता में वृद्धि करते हुए अपतटीय ऊर्जा शुल्क को कम करने की योजना बना रहा है।

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