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स्वास्थ्य का अधिकार

  • 23 Mar 2021
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राजस्थान के मुख्यमंत्री ने राजस्थान के ‘पब्लिक हेल्थ मॉडल’ के कार्यान्वयन की घोषणा की है, जिसमें ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ के साथ-साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सुझाए गए निवारक, प्राथमिक एवं उपचारात्मक देखभाल के उपाय शामिल होंगे।

प्रमुख बिंदु

राजस्थान का ‘पब्लिक हेल्थ मॉडल’

  • राज्य सरकार द्वारा स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करने और सभी नागरिकों तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच सुनिश्चित करने हेतु ‘मुख्यमंत्री स्वास्थ्य चिरंजीवी योजना’ की शुरुआत की गई है।
    • यह योजना राज्य में प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपए तक का वार्षिक चिकित्सा बीमा प्रदान करेगी।
  • भारतीय स्वास्थ्य प्रबंधन अनुसंधान संस्थान (IIHMR) ने मरीज़ों के अधिकारों के साथ-साथ सेवा प्रदाताओं के लिये राज्य में उपलब्ध संसाधनों के अनुसार मानकों की स्थापना की सिफारिश की है। 
    • केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (IPHS) को मौजूदा कार्यक्रमों के बदलते प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए संशोधित किया गया है।

भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानक (IPHS)

  • IPHS देश में स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के वितरण की गुणवत्ता में सुधार के लिये परिकल्पित समान मानकों का एक समूह है।
  • IPHS संबंधी दस्तावेज़ों को मौजूदा कार्यक्रमों के बदलते प्रोटोकॉल और विशेष रूप से गैर-संचारी रोगों हेतु नए कार्यक्रमों की शुरुआत को ध्यान में रखते हुए संशोधित किया गया है।
  • इसमें राज्यों और क्षेत्रों की विविध आवश्यकताओं के अनुरूप लचीलापन लाया गया है।
  • IPHS दिशा-निर्देश, गुणवत्ता में निरंतर सुधार के लिये मुख्य चालक के रूप में और स्वास्थ्य सुविधाओं की कार्यात्मक स्थिति का आकलन करने हेतु बेंचमार्क के रूप में कार्य करते हैं।
  • राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों को मज़बूत बनाने के लिये इन IPHS दिशा-निर्देशों को अपनाया।
  • स्वास्थ्य का अधिकार: अन्य अधिकारों के साथ स्वास्थ्य के अधिकार में स्वतंत्रता और इसे प्राप्त करने का हक दोनों शामिल हैं।
    • स्वतंत्रता में किसी को भी अपने स्वास्थ्य और शरीर (उदाहरण के लिये-यौन और प्रजनन अधिकारों) को नियंत्रित करना और हस्तक्षेप से मुक्त होना (उदाहरण के लिये यातना और गैर-सहमति चिकित्सा उपचार और प्रयोग से मुक्त) शामिल है।
    • तथा इसे प्राप्त करने के हक के अंतर्गत सभी को स्वास्थ्य के उच्चतम प्राप्य स्तर का आनंद लेने का समान अवसर प्रदान करना शामिल है।

भारत में स्वास्थ्य के अधिकार से संबंधित प्रावधान:

  • अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय: भारत संयुक्त राष्ट्र द्वारा सार्वभौमिक अधिकारों की घोषणा (1948) के अनुच्छेद-25 का हस्ताक्षरकर्त्ता है जो भोजन, कपड़े, आवास, चिकित्सा देखभाल और अन्य आवश्यक सामाजिक सेवाओं के माध्यम से मनुष्यों को स्वास्थ्य कल्याण के लिये पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार देता है। 
  • मूल अधिकार: भारत के संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है। स्वास्थ्य का अधिकार गरिमायुक्त जीवन के अधिकार में निहित है।
  • राज्य नीति के निदेशक तत्त्व: अनुच्छेद 38, 39, 42, 43 और 47 ने स्वास्थ्य के अधिकार की प्रभावी प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिये राज्यों का मार्गदर्शन किया है।
  • न्यायिक उद्घोषणा: पश्चिम बंगाल खेत मज़दूर समिति मामले (1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक कल्याणकारी राज्य में सरकार का प्राथमिक कर्तव्य लोगों का कल्याण सुनिश्चित करना और लोगों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा प्रदान करना है।
    • परमानंद कटारा बनाम भारत संघ मामले (1989) में अपने ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि हर डॉक्टर चाहे वह सरकारी अस्पताल में हो या फिर अन्य कहीं, को जीवन रक्षा के लिये उचित विशेषज्ञता के साथ अपनी सेवाएँ देना उसका पेशेवर दायित्व है।

भारत के लिये स्वास्थ्य के अधिकार का महत्त्व:

  • स्वास्थ्य सेवा आधारित अधिकार: लोग स्वास्थ्य के अधिकार के हकदार हैं और सरकार द्वारा इस दिशा में कदम उठाना उसका उत्तरदायित्त्व  है।
  • स्वास्थ्य सेवाओं तक व्यापक पहुँच: यह सभी को सेवाओं का उपयोग करने में सक्षम बनाता है और सुनिश्चित करता है कि सेवाओं की गुणवत्ता उन लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिये पर्याप्त है,  जो उन्हें प्राप्त करते हैं।
  • व्यय कम करना: लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यय करने के वित्तीय परिणामों से बचाता है और उन्हें गरीबी में धकेलने जैसे जोखिम को कम करता है।

चुनौतियाँ:

  • प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में कमी: देश में मौजूदा सार्वजनिक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल का दायरा सीमित है।
    • यहाँ तक ​​कि एक अच्छी तरह से कार्यरत सार्वजनिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी केवल गर्भावस्था देखभाल, सीमित चाइल्ड केयर और राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों से संबंधित कुछ सेवाएँ प्रदान की जाती हैं।
  • अपर्याप्त धन: भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य निधि पर व्यय लगातार कम रहा है (सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.3%)।
    • OECD के अनुसार, भारत का कुल ‘आउट-ऑफ-पॉकेट’ खर्च जीडीपी का लगभग 2.3% है

आगे की राह:

  • अधिक धन आवंटित करना: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में की गई परिकल्पना के अनुसार, स्वास्थ्य पर सार्वजनिक वित्त को जीडीपी के कम-से-कम 2.5% तक बढ़ाया जाना चाहिये।
  • इस संबंध में स्वास्थ्य के अधिकार को शामिल करने वाला एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून संसद द्वारा पारित किया जा सकता है।
  • एक नोडल स्वास्थ्य एजेंसी का निर्माण: रोग निगरानी संबंधी कार्यों को करने के लिये एक नामित और स्वायत्त एजेंसी बनाने की आवश्यकता है, जो प्रमुख गैर-स्वास्थ्य संबंधी विभागों की नीतियों के स्वास्थ्य पर प्रभाव की जानकारी एकत्र करे, राष्ट्रीय स्वास्थ्य आँकड़ों का रखरखाव करे ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य नियमों का प्रवर्तन और इससे संबंधित सूचनाओं का प्रसार जनता तक हो।

स्रोत- द हिंदू

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