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डेली न्यूज़

  • 15 Sep, 2021
  • 52 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

आगामी क्वाड बैठक

प्रिलिम्स के लिये :  

मालाबार नौसैनिक अभ्यास, क्वाड, वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट

मेन्स के लिये :

क्वाड का गठन एवं इसके उद्देश्य, क्वाड-चीन संबंध 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अमेरिका ने घोषणा की कि क्वाड देशों की पहली व्यक्तिगत बैठक अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित होगी। बैठक में चारों देशों (भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका) के प्रमुख शामिल होंगे।

  • आगामी शिखर सम्मेलन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चीन ने क्वाड की आलोचना की और कहा कि दूसरे देशों को लक्षित करने के लिये 'विशेष समूह' या गुटबाज़ी (मंडलियाँ) काम नहीं आएगी और इसका कोई भविष्य नहीं है।

Quad

प्रमुख बिंदु

  • क्वाड का गठन :
    • हिंद महासागर सुनामी (2004) के पश्चात् भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका ने आपदा राहत प्रयासों में सहयोग करने के लिये एक अनौपचारिक गठबंधन बनाया।
    • वर्ष 2007 में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने गठबंधन को चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता या क्वाड के रूप में औपचारिक रूप प्रदान किया ।
    • क्वाड को एशियन आर्क ऑफ डेमोक्रेसी स्थापित करना था, लेकिन इसके सदस्यों के बीच सामंजस्य की कमी के कारण बाधा उत्पन्न हुई और आरोप है कि यह अधिकांशत: चीन विरोधी समूह था।
    • वर्ष 2017 में चीन के बढ़ते खतरे का सामना करते हुए चार देशों ने क्वाड को पुनर्जीवित किया, इसके उद्देश्यों को व्यापक बनाया और एक तंत्र का निर्माण किया जिसका उद्देश्य धीरे-धीरे एक नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करना था।
    • वर्ष 2020 में भारत-अमेरिका-जापान त्रिपक्षीय मालाबार नौसैनिक अभ्यास का विस्तार ऑस्ट्रेलिया को शामिल करने के लिये किया गया, जो वर्ष 2017 में इसके पुनरुत्थान के बाद से क्वाड के पहले आधिकारिक समूह को चिह्नित करता है।
    • मार्च 2021 में क्वाड समूह के नेताओं ने पहली बार आभासी शिखर-स्तरीय बैठक में डिजिटल रूप से मुलाकात की और बाद में 'द स्पिरिट ऑफ द क्वाड' शीर्षक से एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें समूह के दृष्टिकोण और उद्देश्यों को रेखांकित किया गया था।
      • इसके अतिरिक्त यह एक दशक में चार देशों के बीच पहला संयुक्त सैन्य अभ्यास था।
  • क्वाड के उद्देश्य:
    • 'स्पिरिट ऑफ द क्वाड' के अनुसार, समूह के प्राथमिक उद्देश्यों में समुद्री सुरक्षा, कोविड-19 संकट का मुकाबला करना, विशेष रूप से वैक्सीन कूटनीति, जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को संबोधित करना, क्षेत्र में निवेश के लिये एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना एवं तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देना है।
    • हालाँकि क्वाड की व्यापक मुद्दों के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद इसका मुख्य फोकस क्षेत्र अभी भी चीन का मुकाबला करने के लिये माना जाता है।
    • क्वाड सदस्यों ने तथाकथित क्वाड प्लस के माध्यम से साझेदारी का विस्तार करने की इच्छा का भी संकेत दिया है जिसमें दक्षिण कोरिया, न्यूज़ीलैंड और वियतनाम शामिल होंगे।
  • चीन के साथ क्वाड का संबंध:
    • क्वाड के प्रत्येक सदस्य को दक्षिण चीन सागर में चीन की कार्रवाइयों और वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट’ जैसी पहलों के माध्यम से अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने के प्रयासों से खतरा है।
      • अमेरिका लंबे समय से चीन के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा को लेकर चिंतित है और उसने यह रुख कायम रखा है कि चीन का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था को खत्म करना है।
      • इसी तरह जापान और ऑस्ट्रेलिया दोनों दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति को लेकर चिंतित हैं।
      • चीन के साथ भारत के अपने लंबे समय से लंबित सीमा मुद्दे हैं।
    • दूसरी ओर चीन क्वाड के अस्तित्व को स्वयं को घेरने की एक बड़ी रणनीति के हिस्से के रूप में देखता है और उसने समूह के साथ सहयोग करने से बचने के लिये बांग्लादेश जैसे देशों पर दबाव डाला है।
      • चीनी विदेश मंत्रालय ने समूह पर एशिया में क्षेत्रीय शक्तियों के बीच खुले तौर पर कलह भड़काने का आरोप लगाया।
  • क्वाड से संबंधित मुद्दे:
    • अपरिभाषित दृष्टि: सहयोग की संभावना के बावजूद क्वाड परिभाषित रणनीतिक मिशन के बिना एक तंत्र बना हुआ है।
      • क्वाड एक विशिष्ट बहुपक्षीय संगठन की तरह संरचित नहीं है और इसमें एक सचिवालय और किसी भी स्थायी निर्णय लेने वाली संस्था का अभाव है।
      • इसके अतिरिक्त नाटो के विपरीत क्वाड में सामूहिक रक्षा के प्रावधान शामिल नहीं हैं, इसके बजाय एकता और कूटनीतिक सामंजस्य के प्रदर्शन के रूप में संयुक्त सैन्य अभ्यास करने का विकल्प चुना गया है।
    • समुद्री समूहन: इंडो-पैसिफिक पर पूरा ध्यान क्वाड को एक भूमि-आधारित समूह के बजाय एक समुद्र का हिस्सा बनाता है, यह सवाल उठता है कि क्या सहयोग एशिया-प्रशांत और यूरेशियन क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
    • भारत की गठबंधन प्रणाली का विरोध: तथ्य यह है कि भारत एकमात्र सदस्य है जो संधि गठबंधन प्रणाली के खिलाफ है, इसने एक मज़बूत चतुष्पक्षीय जुड़ाव बनाने की प्रगति को धीमा कर दिया है।

आगे की राह

  • स्पष्ट दृष्टि की आवश्यकता: क्वाड राष्ट्रों को सभी के आर्थिक एवं सुरक्षा हितों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से एक व्यापक ढाँचे में इंडो-पैसिफिक विज़न को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने की ज़रूरत है।
    • जो तटीय राज्यों को आश्वस्त करेगा कि क्वाड क्षेत्रीय लाभ हेतु एक महत्त्वपूर्ण कारक होगा और यह किसी प्रकार का सैन्य गठबंधन नहीं है, जैसा कि चीन द्वारा दावा किया जा रहा है।
    • आगामी मंत्रिस्तरीय बैठकें इस विचार को सही ढंग से परिभाषित करने और भविष्य के मार्ग की रूपरेखा तैयार करने का एक अवसर हो सकती हैं।
  • क्वाड का विस्तार: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत के कई अन्य साझेदार हैं, भारत ऐसे में इंडोनेशिया और सिंगापुर जैसे देशों को इस समूह में शामिल होने के लिये आमंत्रित कर सकता है।
    • भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित करना चाहिये, जिसमें वर्तमान एवं भविष्य की समुद्री चुनौतियों पर विचार करने, अपने सैन्य एवं गैर-सैन्य उपकरणों को मज़बूत करने और रणनीतिक भागीदारों को शामिल करने पर ध्यान दिया जाए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

राष्ट्रीय अभियंता दिवस

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय अभियंता दिवस,  मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया

मेन्स के लिये:

महत्त्वपूर्ण नहीं

चर्चा में क्यों?

प्रत्येक वर्ष 15 सितंबर को भारत महान इंजीनियर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की उपलब्धियों को मान्यता देने और उनका सम्मान करने के लिये राष्ट्रीय अभियंता दिवस (National Engineer’s Day) मनाता है।

  • भारत के साथ-साथ श्रीलंका और तंजानिया में भी यह दिवस मनाया जाता है।
  • यह दिन अभियंताओं के महान कार्य को याद करने और उनमें सुधार तथा नवाचार के लिये प्रोत्साहित करने हेतु मनाया जाता है।
  • यह यूनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष 4 मार्च को मनाए जाने वाले विश्व इंजीनियर दिवस से भिन्न है।

प्रमुख बिंदु

sir-m-visvesvaraya

  • मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया:
    • उनका जन्म वर्ष 1861 में कर्नाटक में हुआ, उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से कला स्नातक (BA) की पढ़ाई की और फिर पुणे में विज्ञान कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की तथा देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरों में से एक बन गए।
    • वह भारत के एक अग्रणी इंजीनियर थे जिनकी प्रतिभा जल संसाधनों के दोहन और देश भर में बाँधों के निर्माण और समेकन में परिलक्षित होती थी।
    • उनका काम की लोकप्रियता को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1906-07 में जल आपूर्ति और जल निकासी व्यवस्था का अध्ययन करने के लिये अदन (यमन) भेजा
      • उन्होंने अपने अध्ययन के आधार पर एक परियोजना तैयार की जिसे अदन में लागू किया गया।
    • उन्होंने वर्ष 1909 में मैसूर राज्य के मुख्य अभियंता और 1912 में मैसूर रियासत के दीवान के रूप में कार्य किया, इस पद पर वे सात वर्षों तक रहे।
      • दीवान के रूप में उन्होंने राज्य के समग्र विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया।
    • वर्ष 1915 में जनता की भलाई में उनके योगदान के लिये किंग जॉर्ज पंचम द्वारा उन्हें ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के नाइट कमांडर के रूप में नाइट की उपाधि दी गई थी।
    • वह एक इंजीनियर थे जिन्होंने वर्ष 1934 में भारतीय अर्थव्यवस्था की योजना बनाई थी।
    • उन्हें 50 वर्षों के लिये लंदन इंस्टीट्यूशन ऑफ सिविल इंजीनियर्स की मानद सदस्यता से सम्मानित किया गया।
    • उन्हें वर्ष 1955 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।
    • वर्ष 1962 में बंगलूरू, कर्नाटक में उनका निधन हो गया।
  • उनके द्वारा लिखित पुस्तकें: 
    • रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया' और प्लान्ड इकॉनमी फॉर इंडिया।
  • प्रमुख योगदान: अपने व्यावसायिक जीवन (Professional Life) के दौरान मैसूर, हैदराबाद, ओडिशा और महाराष्ट्र में कई उल्लेखनीय निर्माण परियोजनाओं का हिस्सा बनकर उन्होंने समाज के प्रति बहुत योगदान दिया है।
    • वह मैसूर में कृष्णा राजा सागर बाँध के निर्माण के लिये मुख्य कार्यकारी अभियंता (Engineer) थे।
      • इससे बंजर भूमि को खेती के लिये उपजाऊ भूमि में परिवर्तित करने में सहायता मिली।
    • वर्ष 1903 में पुणे में खड़कवासला जलाशय में स्वचालित वियर फ्लडगेट (Automatic Weir Floodgates) की एक प्रणाली को डिज़ाइन और पेटेंट कराने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था।
    • वर्ष 1908 में हैदराबाद में आई विनाशकारी बाढ़ (मुसी नदी) के बाद उन्होंने भविष्य में शहर को बाढ़ से बचाने के लिये एक जल निकासी व्यवस्था तैयार की।
    • उन्होंने ही तिरुमाला और तिरुपति के बीच सड़क निर्माण की योजना तैयार की थी।
    • विशाखापत्तनम बंदरगाह को समुद्री कटाव से बचाने के लिये उन्होंने एक प्रणाली विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • मैसूर राज्य में कई नई रेलवे लाइनों को भी उन्होंने चालू किया।
    • उन्होंने 1895 में सुक्कुर नगर पालिका के लिये वाटरवर्क्स का डिज़ाइन और संचालन किया था।
    • उन्हें बाँधों में अवरोधक प्रणाली (Block System) के विकास का भी श्रेय दिया जाता है जो बाँधों में पानी के व्यर्थ प्रवाह को रोकता है।
    • उन्होंने मैसूर साबुन कारखाना, मैसूर आयरन एंड स्टील वर्क्स (भद्रावती), श्री जयचामाराजेंद्र (Jayachamarajendra) पॉलिटेक्निक संस्थान, बैंगलोर (बंगलूरू) कृषि विश्वविद्यालय और स्टेट बैंक ऑफ मैसूर की स्थापना की ज़िम्मेदारी भी निभाई।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


शासन व्यवस्था

कनेक्ट करो 2021

प्रिलिम्स के लिये:

कनेक्ट करो 2021, विश्व संसाधन संस्थान, सकल घरेलू उत्पाद, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज, प्रधानमंत्री आवास योजना, अटल शहरी कायाकल्प और शहरी परिवर्तन मिशन, स्वच्छ भारत मिशन (शहरी)

मेन्स के लिये:

'कनेक्ट करो 2021' - टूवर्ड्स इक्विटेबल, सस्टेनेबल इंडियन सिटीज़' कार्यक्रम का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री ने 'कनेक्ट करो 2021' - टूवर्ड्स इक्विटेबल, सस्टेनेबल इंडियन सिटीज़' कार्यक्रम को संबोधित किया।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • यह विश्व संसाधन संस्थान (WRI) भारत द्वारा आयोजित और मेज़बानी किये जाने वाले कार्यक्रमों की एक वैश्विक शृंखला का हिस्सा है, ताकि भारतीय और वैश्विक नेताओं एवं अन्य हितधारकों को एक साथ लाया जा सके, जो समावेशी, टिकाऊ और जलवायु समर्थित भारतीय शहरों को डिज़ाइन करने के लिये प्रतिबद्ध हैं।
      • WRI India एक स्वतंत्र चैरिटी संस्थान है, जो कानूनी रूप से ‘इंडिया रिसोर्सेज़ ट्रस्ट’ के रूप में पंजीकृत है।
    • ‘कनेक्ट करो’ विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित प्रस्तुतकर्त्ताओं का अवलोकन करता है, जैसे-वायु प्रदूषण, विद्युत गतिशीलता, शहरी नियोजन, शहरी जल लचीलापन, जलवायु शमन और सार्वजनिक पारगमन एवं दूसरों के बीच अपनी अंतर्दृष्टि तथा शोध निष्कर्षों को साझा करना। 
  • शहरों का महत्त्व:
    • जीडीपी में योगदान:
      • वर्ष 2030 तक राष्ट्रीय ‘सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 70% शहरों से आएगा क्योंकि तेज़ी से शहरीकरण समूह की क्षमता की सुविधा प्रदान करता है।
      • विश्व स्तर पर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले शहर भारतीय शहरों की तुलना में राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में पाँच गुना अधिक योगदान करते हैं।
    • कोविड-19 का प्रभाव:
      • वर्ष 2030 तक भारत में शहरी आबादी लगभग दोगुनी होकर 630 मिलियन हो जाएगी और विकास के इस स्तर को सुविधाजनक बनाने के लिये शहरी बुनियादी ढाँचे को काफी उन्नत करने की आवश्यकता है तथा हमारे शहरों पर कोविड-19 के प्रभाव ने इसे और भी महत्त्वपूर्ण बना दिया है।
    • जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सहायता:
      • जैसा कि हाल ही में ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (आईपीसीसी) की रिपोर्ट बताती है, शहर जलवायु परिवर्तन से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने के साथ-साथ प्रमुख योगदानकर्त्ता हैं, इसलिये ये शहर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में प्रमुख स्थान रखते हैं।
        • यहाँ तक कि सतत् विकास लक्ष्य (एसडीजी)-11 में सार्वजनिक परिवहन में निवेश, हरित सार्वजनिक स्थान बनाना और शहरी नियोजन एवं प्रबंधन में भागीदारी तथा समावेशी तरीके से सुधार करना शामिल है।
  • सरकार की संबंधित पहलें:
    • प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): 25 जून, 2015 को प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) का शुभारंभ किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य वर्ष 2022 तक शहरी क्षेत्रों के लोगों को आवास उपलब्ध कराना है। 
    •  अटल शहरी कायाकल्प और शहरी परिवर्तन मिशन (AMRUT): इसे वर्ष 2015 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य सभी के लिये बुनियादी नागरिक सुविधाएंँ प्रदान करना है।
    • क्लाइमेट स्मार्ट सिटीज़ असेसमेंट फ्रेमवर्क: यह हमारे शहरों द्वारा सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने, उन्हें लागू करने और प्रसारित करने की दिशा में उठाया गया कदम है जो हरित, टिकाऊ एवं लचीले शहरी आवासों के निर्माण की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की तुलना में मानकों को निर्धारित करता है।
    • शहरी परिवहन योजना: इस योजना के तहत 20,000 से अधिक बसों के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से वित्तीय सुविधा उपलब्ध कराकर सार्वजनिक बस परिवहन सेवाओं को बढ़ाया जाएगा।
    • जल जीवन मिशन (शहरी): यह सभी शहरों में कार्यात्मक नल के माध्यम से घरों में पानी आपूर्ति की सार्वभौमिक कवरेज प्रदान करने से संबंधित है।  
    • स्वच्छ भारत मिशन (शहरी): इसे 2 अक्तूबर, 2014 में  लॉन्च किया गया था, जिसका उद्देश्य शहरी भारत को खुले में शौच से मुक्त बनाना और देश में नगरपालिका ठोस कचरे का 100% वैज्ञानिक प्रबंधन करना है।

नोट:

  • यूनेस्को का रचनात्मक शहरों का नेटवर्क (UCCN):
    • इसे वर्ष 2004 में स्थापित किया गया था और इसका उद्देश्य रचनात्मकता एवं सांस्कृतिक उद्योगों (Creativity & Cultural Industries)को स्थानीय स्तर पर उनकी विकास योजनाओं के केंद्र में रखना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रूप से सहयोग करना है।
    • UCCN में संगीत, कला, लोकशिल्प, डिज़ाइन, सिनेमा, साहित्य तथा डिजिटल कला और पाक कला जैसे सात रचनात्मक क्षेत्र शामिल हैं।
  • विश्व शहर सांस्कृतिक मंच:
    • इसे वर्ष 2012 में लंदन में स्थापित किया गया था। यह सदस्य शहरों के नीति निर्माताओं को अनुसंधान एवं खुफिया जानकारी साझा करने में सक्षम बनाता है और उनकी भविष्य की समृद्धि में संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका की खोज करता है।
    • कोई भी भारतीय शहर इस फोरम का हिस्सा नहीं है।

स्रोत: पी.आई.बी.


भारतीय विरासत और संस्कृति

हिंदी दिवस

प्रिलिम्स के लिये:

हिंदी दिवस, आठवीं अनुसूची, अनुच्छेद 351, प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद

मेन्स के लिये:

हिंदी दिवस से संबंधित विभिन्न तथ्य एवं इसकी प्रासंगिकता

चर्चा में क्यों?

भारत में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

  • इस दिन को मनाने के पीछे एक कारण देश में अंग्रेज़ी भाषा के बढ़ते चलन और हिंदी की उपेक्षा को रोकना है।

प्रमुख बिंदु

  • हिंदी दिवस का इतिहास:
    • देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को 14 सितंबर, 1949 को भारत गणराज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया गया था।
      • काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंददास ने हिंदी को राजभाषा बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
    • पहला हिंदी दिवस वर्ष 1953 में मनाया गया था।
    • हिंदी के अलावा अंग्रेजी दूसरी आधिकारिक भाषा है (संविधान का अनुच्छेद 343)।
    • हिंदी आठवीं अनुसूची की भाषा भी है।
    • अनुच्छेद 351 'हिंदी भाषा के विकास के लिये निर्देश' से संबंधित है।
    • हिंदी शास्त्रीय भाषा नहीं है।
  • विश्व हिंदी दिवस:
    • यह 10 जनवरी को मनाया जाता है।
    • 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में संपन्न प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की वर्षगाँठ के अवसर पर हुए आयोजन में 30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
    • पहली बार यह वर्ष 2006 में पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा दुनिया भर में हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मनाया गया था।
    • विश्व हिंदी सचिवालय भवन का उद्घाटन 2018 में मॉरीशस में किया गया था।
  • हिंदी भाषा के विषय में:
    • उद्भव 
      • हिंदी भाषा को अपना नाम फारसी शब्द ‘हिंद’ से प्राप्त हुआ है, जिसका अर्थ है 'सिंधु नदी की भूमि'। 11वीं शताब्दी की शुरुआत में तुर्की के आक्रमणकारियों ने सिंधु नदी के आसपास के क्षेत्र की भाषा को हिंदी यानी 'सिंधु नदी की भूमि की भाषा' नाम दिया।
      • आधुनिक देवनागरी लिपि भी 11वीं शताब्दी में ही अस्तित्व में आई।
    • भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में हिंदी का प्रयोग:
      • दुनिया में बोली जाने वाली कुल भाषाओं में हिंदी पाँचवीं सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।
        • वर्तमान में पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूज़ीलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, युगांडा, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, मॉरीशस और दक्षिण अफ्रीका में हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है।
  • संबंधित सरकारी प्रयास
    • वर्ष 1960 में शिक्षा मंत्रालय के तहत भारतीय राज्यों के गैर-हिंदी भाषी लोगों, विदेशों में बसे भारतीयों और हिंदी सीखने के इच्छुक विदेशी नागरिकों को पत्राचार के माध्यम से हिंदी का ज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य से ‘केंद्रीय हिंदी निदेशालय’ की स्थापना की गई थी।
    • भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) ने विभिन्न विदेशी विश्वविद्यालयों/संस्थानों में 'हिंदी चेयर' की स्थापना की है।
    • ‘लीला-राजभाषा’ (लर्न इंडियन लैंग्वेज थ्रू आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) हिंदी सीखने हेतु एक मल्टीमीडिया आधारित स्व-शिक्षण अनुप्रयोग है।
    • राजभाषा विभाग द्वारा विकसित ‘ई-सरल हिंदी वाक्य कोश’ और ‘ई-महाशब्द कोश मोबाइल एप’ का उद्देश्य हिंदी के विकास के लिये सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग को सुनिश्चित करना है।
    • ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार’ और ‘राजभाषा कीर्ति पुरस्कार’ हिंदी में योगदान को मान्यता देते हैं।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भूगोल

लिथियम

प्रिलिम्स के लिये :

लिथियम, भारत में लिथियम भंडार के संभावित क्षेत्र, लिथियम ट्रायंगल देश

मेन्स के लिये :

लिथियम का संक्षिप्त परिचय एवं इसके अनुप्रयोग 

चर्चा में क्यों?

अर्जेंटीना के विभिन्न प्रांत लिथियम धातु में निवेश आकर्षित करने हेतु माइनिंग लॉजिस्टिक  नोड्स निर्मित करने, सड़कों के माध्यम से पहुँच सुनिश्चित करने एवं कर की दरों को कम करने हेतु इस क्षेत्र के लिये नियमों को युक्तिसंगत बना रहे हैं।

  • उभरती वैश्विक लिथियम मांग और बढ़ती कीमतों ने तथाकथित 'लिथियम ट्रायंगल' जिसमें अर्जेंटीना, बोलीविया और चिली के कुछ हिस्से शामिल हैं, के प्रति रुचि बढ़ा दी है।
  • लिथियम नया 'सफेद सोना' (White Gold) बन गया है क्योंकि उच्च-क्षमता वाली रिचार्जेबल बैटरी में उपयोग के कारण इसकी मांग बढ़ रही है।

Chile

प्रमुख बिंदु

Lithium

  • लिथियम के गुण :
    • यह एक रासायनिक तत्त्व है जिसका प्रतीक  (Li) है। 
    • यह एक नरम तथा चाँदी के समान सफेद धातु है।
    • मानक परिस्थितियों में यह सबसे हल्की धातु और सबसे हल्का ठोस तत्त्व है।
    • यह अत्यधिक प्रतिक्रियाशील और ज्वलनशील है, अत: इसे खनिज तेल के रूप में संग्रहीत किया जाना चाहिये।
    • यह क्षारीय एवं एक दुर्लभ धातु है।
      • क्षार धातुओं में लिथियम, सोडियम, पोटेशियम, रुबिडियम, सीज़ियम और फ्रेंशियम रासायनिक तत्त्व शामिल होते हैं। ये हाइड्रोजन के साथ मिलकर समूह-1 (group- 1) जो आवर्त सारणी (Periodic Table) के एस-ब्लॉक (s-block) में स्थित है, का निर्माण करते हैं।
      • दुर्लभ धातुओं (Rare Metals- RM) में नायोबियम (Nb), टैंटेलम (Ta), लिथियम (Li), बेरिलियम (Be), सीज़ियम (Cs) आदि और दुर्लभ मृदा तत्त्वों  (Rare Earths- RE) में स्कैंडियम (Sc) तथा इट्रियम (Y) के अलावा लैंटेनियम (La) से लुटीशियम (Lu) तक के तत्त्व शामिल हैं।
        • ये धातुएँ अपने सामरिक महत्त्व के कारण परमाणु और अन्य उच्च तकनीकी उद्योगों जैसे- इलेक्ट्रॉनिकस, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, रक्षा आदि में उपयोग की जाती हैं।
  • अनुप्रयोग:
    • लिथियम धातु का अनुप्रयोग उपयोगी मिश्रित धातुओं को बनाने में किया जाता है।
      • उदाहरण के लिये मोटर इंज़नों में सफेद धातु की बियरिंग बनाने में, एल्युमीनियम के साथ विमान के पुर्जे बनाने तथा मैग्नीशियम के साथ आर्मपिट प्लेट बनाने में।
    • थर्मोन्यूक्लियर अभिक्रियाओं में।
    • विद्युत-रासायनिक सेल के निर्माण में। इलेक्ट्रिक वाहनों, लैपटॉप आदि के निर्माण में लिथियम एक महत्त्वपूर्ण घटक है।
  • सर्वाधिक भंडार वाले देश:
    • चिली> ऑस्ट्रेलिया> अर्जेंटीना
  • भारत में लिथियम:
    • परमाणु खनिज निदेशालय (भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के तहत) के शोधकर्त्ताओं ने हालिया सर्वेक्षणों से दक्षिणी कर्नाटक के मांड्या ज़िले में भूमि के एक छोटे से हिस्से में 14,100 टन के लिथियम भंडार की उपस्थिति का अनुमान लगाया है।
      • साथ ही भारत की पहली लीथियम भंडार साइट भी मिली।
  • भारत में अन्य संभावित साइटें:
    • राजस्थान, बिहार और आंध्र प्रदेश में मौजूद प्रमुख अभ्रक बेल्ट।
    • ओडिशा और छत्तीसगढ़ में मौजूद पैगमाटाइट (आग्नेय चट्टानें) बेल्ट
    • राजस्थान में सांभर और पचपदरा तथा गुजरात के कच्छ के रण का खारा/लवणीय जलकुंड।
  • संबंधित सरकारी पहलें:
    • भारत ने सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी ‘खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड’ के माध्यम से अर्जेंटीना, जहाँ विश्व में धातु का तीसरा सबसे बड़ा भंडार मौजूद है, में संयुक्त रूप से लिथियम की खोज करने के लिये अर्जेंटीना की एक कंपनी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।
      • खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड का प्राथमिक कार्य विदेशों में विशिष्ट खनिज संपदा जैसे- लिथियम और कोबाल्ट आदि का अन्वेषण करना है।
  • तारों में लिथियम उत्पादन:
    • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (Indian Institute of Astrophysics- IIA) के वैज्ञानिकों ने पहली बार साक्ष्य दिया है कि हीलियम (He) कोर बर्निंग चरण के दौरान कम द्रव्यमान वाले सूर्य जैसे तारों में लिथियम (Li) का उत्पादन आम बात है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


सामाजिक न्याय

ग्राउंड्सवेल रिपोर्ट: विश्व बैंक

प्रिलिम्स के लिये

ग्राउंड्सवेल रिपोर्ट, विश्व बैंक

मेन्स के लिये 

वैश्विक प्रवासन पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और इससे संबंधित सुझाव 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विश्व बैंक द्वारा जारी अद्यतित ‘ग्राउंड्सवेल रिपोर्ट’ ने संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन विश्व के छह प्रमुख क्षेत्रों में 216 मिलियन लोगों को वर्ष 2050 तक अपने देशों से स्थानांतरित करने के लिये मज़बूर कर सकता है।

  • जलवायु प्रवास के आंतरिक हॉटस्पॉट वर्ष 2030 की शुरुआत में ही सामने आ सकते हैं, जबकि वर्ष 2050 तक इनकी संख्या में तेज़ी से वृद्धि होगी।

प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट के विषय में
    • पहली ग्राउंड्सवेल रिपोर्ट: इसे वर्ष 2018 में प्रकाशित किया गया था और यह मुख्यतः तीन क्षेत्रों यथा- उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका पर ध्यान केंद्रित करते हुए भविष्य के जलवायु प्रवास के पैमाने, प्रक्षेपवक्र एवं स्थानिक पैटर्न को समझने हेतु एक मज़बूत एवं नवीन मॉडलिंग दृष्टिकोण का उपयोग करती है। 
    • दूसरी ग्राउंड्सवेल रिपोर्ट: यह पहली रिपोर्ट का विस्तार है,जिसमें तीन नए क्षेत्रों: ‘मध्य पूर्व तथा उत्तरी अफ्रीका’, ‘पूर्वी एशिया एवं प्रशांत’ और ‘पूर्वी यूरोप व मध्य एशिया’ को भी शामिल किया गया है।
      • साथ ही इसमें ‘मशरेक’ (अरब जगत का पूर्वी हिस्सा) और ‘लघु द्वीपीय विकासशील राज्यों’ (SIDS) में जलवायु से संबंधित गतिशीलता का गुणात्मक विश्लेषण भी प्रदान किया जाता है।
    • महत्त्व
      • दो रिपोर्टों का संयुक्त निष्कर्ष, वैश्विक स्तर पर आंतरिक जलवायु प्रवास के संभावित पैमाने की एक वैश्विक तस्वीर प्रदान करता है।
  • परिणाम:
    • आंतरिक जलवायु प्रवासी: विश्व के छह क्षेत्रों (2050 तक) में कम-से-कम 216 मिलियन लोग आंतरिक जलवायु प्रवासी हो सकते हैं। यह इन क्षेत्रों की कुल अनुमानित जनसंख्या का लगभग 3% है।
      • उप-सहारा अफ्रीका: 85.7 मिलियन आंतरिक जलवायु प्रवासी (कुल जनसंख्या का 4.2%)।
      • पूर्वी एशिया और प्रशांत: 48.4 मिलियन (2.5%)।
      • दक्षिण एशिया: 40.5 मिलियन (1.8%)।
      • उत्तरी अफ्रीका: 19.3 मिलियन (9%)।
      • लैटिन अमेरिका: 17.1 मिलियन (2.6%)।
      • पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया: 5.1 मिलियन (2.3%)।
    • सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र: आंतरिक जलवायु प्रवास का पैमाना सर्वाधिक कमज़ोर और जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में सबसे बड़ा होगा।
      • उप-सहारा अफ्रीका: मरुस्थलीकरण, नाजुक तटरेखा और कृषि पर जनसंख्या की निर्भरता के कारण सर्वाधिक कमज़ोर क्षेत्र में सबसे अधिक प्रवासी दिखाई देंगे।
      • उत्तरी अफ्रीका: यहाँ पर जलवायु प्रवासियों का सबसे बड़ा अनुपात (9%) होने का अनुमान है।
        • यह काफी हद तक जल की गंभीर कमी के साथ-साथ घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों और नील डेल्टा में समुद्र के स्तर में वृद्धि के प्रभावों के कारण है।
    • दक्षिण एशिया: दक्षिण एशिया में बांग्लादेश विशेष रूप से बाढ़ और फसल खराब होने से प्रभावित है, जो अनुमानित जलवायु प्रवासियों का लगभग आधा हिस्सा है, जिसमें 19.9 मिलियन लोग शामिल हैं, इसमें महिलाओं का बढ़ता अनुपात, वर्ष 2050 तक निराशावादी परिदृश्य के तहत आगे बढ़ रहा है।
  • नीतिगत सिफारिशें:
    • उत्सर्जन कम करें:
      • पेरिस समझौते के पाँच वर्ष बाद दुनिया अभी भी वर्ष 2100 तक कम-से-कम 3 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग की ओर अग्रसर है।
      • वैश्विक उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिये महत्त्वाकांक्षी कार्रवाई प्रमुख संसाधनों, आजीविका प्रणालियों और शहरी केंद्रों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बोझ को कम करने के लिये महत्त्वपूर्ण है जो लोगों को संकट में पलायन करने हेतु प्रेरित कर सकते हैं।
    • समावेशी और अनुकूलित विकास मार्ग:
      • विकास योजना में आंतरिक जलवायु प्रवास को एकीकृत करना गरीबी के कारकों को संबोधित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है जो लोगों को विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति संवेदनशील बनाते हैं, जैसे कि व्यवहार्य आजीविका विकल्पों की कमी और निम्न गुणवत्ता वाली संपत्ति।
    • प्रवासन के प्रत्येक चरण के लिये योजना: आंतरिक जलवायु प्रवासन की योजना का अर्थ है प्रवास के सभी चरणों हेतु लेखांकन (प्रवास के पहले, प्रवास के दौरान और इसके बाद)।
      • प्रवास से पहले, स्थानीय अनुकूलन समाधान समुदायों को उस स्थान पर बने रहने में मदद कर सकता है जहाँ स्थानीय अनुकूलन विकल्प व्यवहार्य हैं।
      • प्रवास के दौरान, नीतियाँ और निवेश उन लोगों के लिये गतिशीलता को सक्षम कर सकते हैं जिन्हें अपरिहार्य जलवायु जोखिमों से दूर जाने की आवश्यकता होती है।
      • प्रवास के बाद, नियोजन यह सुनिश्चित कर सकता है कि भेजने और प्राप्त करने वाले दोनों क्षेत्र अपनी आबादी की ज़रूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये अच्छी तरह से सुसज्जित हैं।
    • निवेश: क्षेत्रीय और देश स्तर पर आंतरिक जलवायु प्रवासन को बेहतर ढंग से समझने के लिये नए एवं अधिक सटीक डेटा स्रोतों और विभेदित जलवायु परिवर्तन प्रभावों सहित बड़े पैमाने पर अनुसंधान में अधिक निवेश की आवश्यकता है।

जलवायु परिवर्तन और प्रवासन चुनौतियों का समाधान करने हेतु वैश्विक प्रयास   

  • कैनकन अनुकूलन ढाँचा (2010) :
    • संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) औपचारिक रूप से 2010 के कैनकन अनुकूलन ढाँचे (Cancun Adaptation Framework) में जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में गतिशीलता को शामिल किया गया है, जिसमें देशों को जलवायु-प्रेरित विस्थापन, प्रवास और नियोजित स्थानांतरण के संबंध में उनकी सामान्य लेकिन अलग-अलग ज़िम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए "समझ, समन्वय एवं सहयोग बढ़ाने के उपायों" के लिये आह्वान किया गया है।
  • विस्थापन पर यूएनएफसीसीसी टास्क फोर्स (2013):
    • विस्थापन पर UNFCCC टास्क फोर्स, वारसॉ फ्रेमवर्क/मैकेनिज़्म के तहत स्थापित किया गया।
    • वारसॉ इंटरनेशनल मैकेनिज़्म फॉर लॉस एंड डैमेज, गतिशीलता पर प्रभाव सहित अचानक और धीमी गति से शुरू होने वाले जलवायु परिवर्तन प्रभावों से नुकसान और क्षति को रोकने और समाधान करने पर केंद्रित है। 
  • पेरिस समझौता (2015):
    • पेरिस समझौते की प्रस्तावना में कहा गया है कि "जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिये कार्रवाई करते समय पार्टियों को प्रवासियों पर अपने संबंधित दायित्वों का सम्मान, प्रचार और विचार करना चाहिये।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिये सेंदाई फ्रेमवर्क (2015-30):
    • सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा जोखिमों की रोकथाम, जोखिम कम करने हेतु कार्रवाई के लिये लक्ष्यों और प्राथमिकताओं की रूपरेखा तैयार करता है, जिसमें शासन के माध्यम से आपदा-रोधी तैयारी को बढ़ावा देना तथा पुनः प्राप्ति, पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण शामिल है।
    • यह तीन क्षेत्रों पर आपदा जोखिम में कमी और प्रबंधन में प्रवासियों को शामिल करने की आवश्यकता को स्पष्ट करता है।
  • शरणार्थियों पर संयुक्त राष्ट्र वैश्विक समझौता (2016):
  • सुरक्षित, व्यवस्थित और नियमित प्रवास के लिये संयुक्त राष्ट्र वैश्विक समझौता (2018):
    • यह संयुक्त विश्लेषण को मज़बूत करने और बेहतर मानचित्रण, समझ एवं अनुमानों के ज़रिये प्रवासी गतिविधियों का समाधान करने हेतु जानकारी साझा करने की आवश्यकता पर ज़ोर देता है, जैसे कि अचानक आने वाली और धीमी गति से शुरू होने वाली प्राकृतिक आपदाएँ जो जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के परिणामस्वरूप भी घटित हो सकती हैं। प्रवासन पर संभावित प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अनुकूलन और लचीली रणनीतियों का विकास करना।
  • UNFCCC पक्षकारों के 24वें सम्मेलन का निर्णय (2018):
    • COP24 निर्णय (विस्थापन पर UNFCCC टास्क फोर्स की एक रिपोर्ट द्वारा सूचित) प्रवासियों एवं विस्थापित व्यक्तियों, मूल समुदायों, पारगमन एवं गंतव्य की आवश्यकताओं पर विचार करने और श्रम गतिशीलता के माध्यम से नियमित प्रवास मार्गों के अवसरों में वृद्धि करके जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में व्यवस्थित, सुरक्षित, नियमित एवं उत्तरदायित्त्वपूर्ण प्रवासन तथा आवागमन की सुविधा के लिये UNFCCC पक्षकारों को आमंत्रित करता है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


कृषि

डिजिटल कृषि

प्रिलिम्स के लिये:

डिजिटल कृषि

मेन्स के लिये:

डिजिटल कृषि से संबंधित चुनौतियाँ और भारत सरकार के प्रयास

चर्चा में क्यों?

हाल ही में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने डिजिटल कृषि को आगे बढ़ाने के लिये निजी कंपनियों के साथ 5 समझौता ज्ञापनों (MOUs) पर हस्ताक्षर किये।

  • ये पायलट परियोजनाएँ डिजिटल कृषि मिशन का हिस्सा हैं और राष्ट्रीय किसान डेटाबेस पर आधारित होंगी, जिसमें पहले से ही मौजूदा राष्ट्रीय योजनाओं का उपयोग करने वाले 5.5 करोड़ किसान शामिल हैं।

प्रमुख बिंदु:

    • डिजिटल कृषि: 
      • संदर्भ: डिजिटल कृषि "सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) और डेटा पारिस्थितिकी तंत्र है जो सभी के लिये सुरक्षित पौष्टिक तथा किफायती भोजन प्रदान करते हुए खेती को लाभदायक एवं टिकाऊ बनाने हेतु समय पर लक्षित सूचना एवं सेवाओं के विकास व वितरण का समर्थन करता है।"
      • उदाहरण:
        • कृषि जैव प्रौद्योगिकी पारंपरिक प्रजनन तकनीकों सहित उपकरणों की एक शृंखला है, जो उत्पादों को बनाने या संशोधित करने के लिये जीवित जीवों या जीवों के कुछ हिस्सों को बदल देती है; पौधों या जानवरों में सुधार या विशिष्ट कृषि उपयोगों के लिये सूक्ष्मजीवों का विकास करती है।
        • परिशुद्ध कृषि (Precision Agriculture- PA) के अंतर्गत सेंसर, रिमोट सेंसिंग, डीप लर्निंग और अर्टीफिशियल इंटेलीजेंस तथा इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IOT) में हुए विकास को व्‍यवहार में लाकर दक्षता एवं पर्यावरणीय निरंतरता का संवर्द्धित उपयोग कर मृदा, पौधों एवं पर्यावरण की निगरानी के माध्यम से कृषि उत्‍पादकता बढ़ाने पर चर्चा करना है।
        • डेटा मापन, मौसम निगरानी, रोबोटिक्स/ड्रोन प्रौद्योगिकी आदि के लिये डिजिटल और वायरलेस प्रौद्योगिकियाँ।
      • लाभ:
        • कृषि उत्पादकता को बढ़ाती है।
        • मृदा के क्षरण को रोकती है।
        • फसल उत्पादन में रासायनिक अनुप्रयोग को कम करती है।
        • जल संसाधनों का कुशल उपयोग।
        • गुणवत्ता, मात्रा और उत्पादन की कम लागत के लिये आधुनिक कृषि पद्धतियों का प्रसार करती है।
        • किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में बदलाव लाती है।
      • चुनौतियाँ:
        • उच्च पूंजी लागत: यह किसानों को खेती के डिजिटल तरीकों को अपनाने के लिये हतोत्साहित करती है।
        • छोटी जोत: भारतीय खेत आकार में बहुत छोटे होते हैं और 1-2 एकड़ खेत के भूखंड काफी आम हैं। साथ ही भारत में कृषि भूमि को पट्टे पर देना भी व्यापक रूप से प्रचलित है।
        • भूमि किराए पर लेने और साझा करने की प्रथाएँ: सीमित वित्तीय संसाधनों और छोटे खेत के भूखंडों के कारण ट्रैक्टर, हार्वेस्टर आदि जैसे उपकरण और मशीनरी हेतु एकमुश्त खरीद के बजाय भूमि को किराए पर देना और साझा करना काफी आम है।
        • ग्रामीण क्षेत्र में निरक्षरता: बुनियादी कंप्यूटर साक्षरता की कमी ई-कृषि के तीव्र विकास में एक बड़ी बाधा है।
    • संबंधित सरकारी प्रयास
      • एग्रीस्टैक: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 'एग्रीस्टैक' के निर्माण की योजना बनाई है, जो कि कृषि में प्रौद्योगिकी आधारित हस्तक्षेपों का एक संग्रह है। यह किसानों को कृषि खाद्य मूल्य शृंखला में एंड टू एंड सेवाएँ प्रदान करने हेतु एक एकीकृत मंच का निर्माण करेगा।
      • डिजिटल कृषि मिशन: कृषि क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ब्लॉक चेन, रिमोट सेंसिंग और GIS तकनीक, ड्रोन व रोबोट के उपयोग जैसी नई तकनीकों पर आधारित परियोजनाओं को बढ़ावा देने हेतु सरकार द्वारा वर्ष 2021 से वर्ष 2025 तक के लिये यह पहल शुरू की गई है।
      • एकीकृत किसान सेवा मंच (UFSP): यह कोर इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा, एप्लीकेशन और टूल्स का एक संयोजन है जो देश भर में कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न सार्वजनिक और निजी आईटी प्रणालियों की निर्बाध अंतःक्रियाशीलता को सक्षम बनाता है। UFSP निम्नलिखित भूमिका निभाता है:
        • यह कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में एक केंद्रीय एजेंसी के रूप में कार्य करता है (जैसे ई भुगतान में UPI)।
        • सेवा प्रदाताओं (सार्वजनिक और निजी) और किसान सेवाओं के पंजीकरण को सक्षम करता है।
        • सेवा वितरण प्रक्रिया के दौरान आवश्यक विभिन्न नियमों और मान्यताओं को लागू करता है।
        • सभी लागू मानकों, एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस  (Application Programming Interface- API) और प्रारूपों के भंडार के रूप में कार्य करता है।
        • किसानों को व्यापक स्तर पर सेवाओं के वितरण सुनिश्चित करने के लिये विभिन्न योजनाओं और सेवाओं के बीच डेटा विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करना।
      • कृषि में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP-A): यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, इस योजना को वर्ष 2010-11 में 7 राज्यों में प्रायोगिक तौर पर शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य किसानों तक समय पर कृषि संबंधी जानकारी पहुँचाने के लिये सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के उपयोग के माध्यम से भारत में तेज़ी से विकास को बढ़ावा देना है।
        • वर्ष 2014-15 में इस योजना का विस्तार शेष सभी राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों में किया गया था।
      • अन्य डिजिटल पहलें: किसान कॉल सेंटर, किसान सुविधा एप, कृषि बाज़ार एप, मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) पोर्टल आदि।

    आगे की राह:

    • प्रौद्योगिकी के उपयोग ने 21वीं सदी को परिभाषित किया है। जैसे-जैसे दुनिया क्वांटम कंप्यूटिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बिग डेटा और अन्य नई तकनीकों की ओर बढ़ रही है, भारत के पास आईटी दिग्गज होने का लाभ उठाने और कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने का एक ज़बरदस्त अवसर है। जैसे कि हरित क्रांति ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की, वैसे ही भारतीय खेती में आईटी क्रांति अगला बड़ा कदम होना चाहिये।
    • उपग्रह इमेजिंग, मृदा स्वास्थ्य सूचना, भूमि रिकॉर्ड, फसल पैटर्न और आवृत्ति, बाज़ार डेटा एवं देश में एक मज़बूत डिजिटल बुनियादी ढाँचे के निर्माण की आवश्यकता है।
    • डेटा दक्षता को डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम), डिजिटल स्थलाकृति, भूमि उपयोग और भूमि कवर, मृदा मानचित्र आदि के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है।

    स्रोत- पीआईबी


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