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मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना

  • 06 Feb 2020
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये:

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना

मेन्स के लिये

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के उद्देश्य एवं लाभ तथा मृदा में पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करने में मृदा स्वास्थ्य कार्ड की उपयोगिता

चर्चा में क्यों?

PIB द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार, उर्वरकों के उपयोग से मृदा में उपस्थित पोषक तत्त्वों में होने वाली कमी दूर करने के उद्देश्य से वर्ष 2014-15 में शुरू की गई 'मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना' (Soil Health Card scheme) के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।

प्रमुख बिंदु

  • योजना के दूसरे चरण में बीते दो वर्षों में कृषि मंत्रालय ने किसानों को 11.69 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये हैं।
  • केंद्र सरकार द्वारा मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरण के पहले चरण (वर्ष 2015 से 2017) में 10.74 करोड़ कार्ड और दुसरे चरण (वर्ष 2017-2019) में 11.69 करोड़ कार्ड वितरित किये गए हैं।
  • इन कार्डों की सहायता से किसान अपने खेतों की मृदा के बेहतर स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिये पोषक तत्त्वों का उचित मात्रा में उपयोग करने के साथ ही मृदा की पोषक स्थिति की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।
  • राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (National Productivity Council- NPC) द्वारा किये गए अध्ययन के अनुसार, मृदा स्वास्थ्य कार्ड पर सिफारिशों के तहत रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 8 से 10 प्रतिशत तक की कमी आई है, साथ ही उपज में 5-6 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है।
  • मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना हेतु इस योजना के तहत राज्यों के लिये अब तक 429 नई स्टेटिक लैब (Static Labs), 102 नई मोबाइल लैब (Mobile Labs), 8752 मिनी लैब (Mini Labs), 1562 ग्रामस्तरीय प्रयोगशालाओं की स्थापना और 800 मौजूदा प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण को मंज़ूरी दी गई हैं।

योजना के बारे में

  • 19 फरवरी, 2015 को राजस्थान के श्रीगंगानगर ज़िले के सूरतगढ़ में राष्ट्रव्यापी ‘राष्ट्रीय मृदा सेहत कार्ड’ योजना का शुभारंभ किया गया।
  • इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश भर के किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किये जाने में राज्यों का सहयोग करना है।
  • इस योजना की थीम है: स्वस्थ धरा, खेत हरा।
  • इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण युवा एवं किसान जिनकी आयु 40 वर्ष तक है, मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना एवं नमूना परीक्षण कर सकते हैं।
  • प्रयोगशाला स्थापित करने में 5 लाख रूपए तक का खर्च आता हैं, जिसका 75 प्रतिशत केंद्र एवं राज्य सरकार वहन करती है। स्वयं सहायता समूह, कृषक सहकारी समितियाँ, कृषक समूह या कृषक उत्पादक संगठनों के लिये भी यहीं प्रावधान है।
  • योजना के तहत मृदा की स्थिति का आकलन नियमित रूप से राज्य सरकारों द्वारा हर 2 वर्ष में किया जाता है, ताकि पोषक तत्त्वों की कमी की पहचान के साथ ही सुधार लागू हो सकें।

इस योजना के लक्ष्य और उद्देश्य निम्नानुसार हैं :

  • देश के सभी किसानों को प्रत्येक 3 वर्ष में मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी करना, ताकि उर्वरकों के इस्तेमाल में पोषक तत्त्वों की कमियों को पूरा करने का आधार प्राप्त हो सके।
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद/राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के संपर्क में क्षमता निर्माण, कृषि विज्ञान के छात्रों को शामिल करके मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं के क्रियाकलाप को सशक्त बनाना।
  • राज्यों में मृदा नमूनों को एकीकृत करने के लिये मानकीकृत प्रक्रियाओं के साथ मृदा उर्वरता संबंधी बाधाओं का पता लगाना और विश्लेषण करना तथा विभिन्न ज़िलों में तालुका/प्रखंड स्तरीय उर्वरक संबंधी सुझाव तैयार करना।
  • पोषक तत्त्वों का प्रभावकारी इस्तेमाल बढ़ाने के लिये विभिन्न ज़िलों में पोषण प्रबंधन आधारित मृदा परीक्षण सुविधा विकसित करना और उन्हें बढ़ावा देना।
  • पोषक प्रबंधन परंपराओं को बढ़ावा देने के लिये ज़िला और राज्यस्तरीय कर्मचारियों के साथ-साथ प्रगतिशील किसानों का क्षमता निर्माण करना।

आदर्श गाँवों का विकास नामक पायलेट प्रोजेक्ट

  • चालू वित्तीय वर्ष के दौरान आदर्श गाँवों का विकास नामक पायलेट प्रोजेक्ट के अंतर्गत किसानों की सहभागिता से कृषि जोत आधारित मिट्टी के नमूनों के संग्रहण और परीक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन हेतु प्रत्येक कृषि जोत पर मिट्टी के नमूनों के एकत्रीकरण एवं विश्लेषण हेतु प्रत्येक ब्लॉक में एक-एक आदर्श गाँव का चयन किया गया है। इसके अंतर्गत किसानों को वर्ष 2019-20 में अब तक 13.53 लाख मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये जा चुके हैं।

निष्कर्ष:

मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन योजना जहाँ एक ओर किसानों के लिये वरदान साबित हो रही है, वहीं ग्रामीण युवाओं के लिये यह रोज़गार का माध्यम भी बनी है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड में उर्वरकों की फसलवार सिफारिशें मुहैया कराई जाती हैं और इसके साथ ही किसानों को यह भी बताया जाता है कि कृषि‍ भूमि की उर्वरा क्षमता को किस प्रकार बढ़ाया जा सकता है। इससे किसानों को अपनी भूमि की सेहत जानने तथा उर्वरकों के विवेकपूर्ण चयन में मदद मिलती है। मृदा यानि कृषि भूमि की सेहत और खाद के बारे में पर्याप्त जानकारी न होने के चलते किसान आम तौर पर नाइट्रोजन का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, जो न सिर्फ कृषि उत्पादों की गुणवत्ता के लिये खतरनाक है बल्कि इससे भूमिगत जल में नाइट्रेट की मात्रा भी बढ़ जाती है। इससे पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड के ज़रिये इन समस्याओं से बचा जा सकता है।

स्रोत: PIB

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