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आपदा प्रबंधन

सेंदाई फ्रेमवर्क रिपोर्ट (Sendai Framework Report)

  • 15 May 2019
  • 19 min read

आपदा न्यूनीकरण के लिये सेंदाई फ्रेमवर्क 2015-30
(Sendai Framework for Disaster Reduction)

  • जापान के सेंदाई, मियागी (Miyagi) में 14 से 18 मार्च, 2015 तक आयोजित आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर तीसरे संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन (United Nations World Conference on Disaster Risk Reduction) में इसे अपनाया गया था।
  • संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (UN Office for Disaster Risk Reduction-UNDRR) जिसे पूर्व में आपदा न्यूनीकरण के लिये संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय नीति (United Nations International Strategy for Disaster Reduction-UNISDR) के रूप में जाना जाता था, संयुक्त राष्ट्र सचिवालय का हिस्सा है और इसके कार्य सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और मानवतावादी क्षेत्रों में विस्तारित हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1999 में आपदा न्यूनीकरण के लिये अंतर्राष्ट्रीय रणनीति अपनाई और इसका कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिये इसके सचिवालय के रूप में UNISDR की स्थापना की।
  • संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में आपदा जोखिम की कमी के लिये क्षेत्रीय संगठनों और सामाजिक-आर्थिक तथा मानवीय गतिविधियों के बीच समन्वय और सामंजस्य सुनिश्चित करने हेतु वर्ष 2001 में इसके जनादेश को संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में केंद्रबिंदु के रूप में कार्य करने हेतु विस्तारित किया गया था।
  • UNISDR को 18 मार्च, 2015 को सेंदाई, जापान में आयोजित आपदा जोखिम में कमी को लेकर तीसरे संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन में अपनाया गया था।

प्राथमिकता वाले चार क्षेत्र

  • आपदा जोखिम का अध्ययन
  • प्रासंगिक आँकड़ों के संग्रह, विश्लेषण, प्रबंधन एवं उपयोग को बढ़ावा देना तथा उपयोगकर्त्ताओं की विभिन्न श्रेणियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक सूचनाओं के प्रयोग को सुनिश्चित करना।
  • आपदा से हुए नुकसान का व्यवस्थित रूप से मूल्यांकन, रिकॉर्ड, साझाकरण एवं सार्वजनिक ख़ाका तैयार करना तथा इस संदर्भ में आर्थिक, सामाजिक, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रभावों को समझना।
  • अनुभव साझा करने, पुरानी घटनाओं से सबक लेकर बेहतर कार्यकलापों और आपदा जोखिम में कमी पर प्रशिक्षण एवं शिक्षा के माध्यम से सभी स्तरों पर सरकारी अधिकारियों, नागरिक समाजों, समुदायों तथा स्वयंसेवकों के साथ-साथ निजी क्षेत्र के ज्ञान में वृद्धि करना।
  • आपदा जोखिम मूल्यांकन तथा नीतियों के विकास एवं कार्यान्वयन में वैज्ञानिक ज्ञान को समाहित करने के लिये पारंपरिक, स्वदेशी, स्थानीय ज्ञान तथा प्रथाओं का उपयोग सुनिश्चित करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से आपदा जोखिम के अध्ययन को बढ़ावा देना, इसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, बेहतर पहुँच, गैर-संवेदनशील डेटा का साझाकरण एवं उपयोग तथा आपदा जोखिम के समय संचार के सफल कार्यान्वयन के संबंध में राष्ट्रीय उपायों का अपनाने आदि पर बल दिया गया है।
  • आपदा की रोकथाम, लचीलेपन (आपदा से उबरने) तथा एक ज़िम्मेदार नागरिकता की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये प्रभावी वैश्विक एवं क्षेत्रीय अभियान चलाना।
  • आपदा जोखिम प्रबंधन में सुधार करना:
  • स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर पहचान किये गए (चिह्नित) जोखिमों से निपटने के लिये तकनीकी, वित्तीय तथा प्रशासनिक आपदा जोखिम प्रबंधन क्षमता का आकलन करना।
  • भूमि उपयोग एवं शहरी नियोजन, भवन संहिता, पर्यावरण और संसाधन प्रबंधन तथा स्वास्थ्य एवं सुरक्षा मानकों को संबोधित करने वाले क्षेत्रीय कानूनों एवं नियमों की मौजूदा सुरक्षा में वृद्धि करने वाले प्रावधानों के अनुपालन हेतु उच्च स्तर सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक तंत्र की स्थापना करना तथा प्रोत्साहन देना।
  • 2015-2030 के लिये आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर सेंदाई फ्रेमवर्क को लागू करने हेतु एक निर्दिष्ट राष्ट्रीय केंद्रबिंदु और आपदा जोखिम को कम करने के लिये राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर प्रासंगिक हितधारकों को समाहित करने वाले सरकारी समन्वय मंचों को स्थापित कर उन्हें सशक्त बनाना।
  • निजी क्षेत्र, नागरिक समाज, पेशेवर संगठनों, वैज्ञानिक संगठनों तथा संयुक्त राष्ट्र की भागीदारी के साथ आपदा जोखिम प्रबंधन के लिये प्रमाण-पत्र एवं पुरस्कार जैसे गुणवत्तापूर्ण मानकों के विकास को बढ़ावा देना।
  • आपदा जोखिम वाले क्षेत्रों में मानव बस्तियों की सुरक्षा या पुनर्वास के मुद्दों को संबोधित करने हेतु सार्वजनिक नीतियों को तैयार करना।
  • लचीलेपन हेतु आपदा जोखिम में कमी के लिये निवेश:
  • विकास एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों, नीतियों, योजनाओं, कानूनों तथा विनियमों को सभी प्रासंगिक क्षेत्रों में लागू करने के लिये प्रशासन के सभी स्तरों पर आवश्यकतानुसार संसाधनों का आवंटन सुनिश्चित करना।
  • शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में आपदाओं के वित्तीय प्रभाव को कम करने के लिये सार्वजनिक तथा निजी निवेश के हस्तांतरण एवं बीमा, जोखिम-साझाकरण एवं प्रतिधारण तथा वित्तीय सुरक्षा हेतु तंत्र को बढ़ावा देना।
  • ग्रामीण विकास योजना में आपदा जोखिम मूल्यांकन, मानचित्रण एवं प्रबंधन को बढ़ावा देना तथा इसके साथ-साथ पहाड़ों, नदियों, तटीय बाढ़ के क्षेत्रों और सूखा एवं बाढ़ प्रवण अन्य सभी क्षेत्रों में आवश्यक प्रबंधन पर बल देना।
  • देश के महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे के आपदा के प्रति लचीलेपन (Resilience) में वृद्धि करना।
  • आपदा जोखिम को कम करके भूख एवं गरीबी के उन्मूलन के उद्देश्य को प्राप्त करने संबंधी अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को सुदृढ़ तथा व्यापक बनाना।
  • प्रभावी प्रतिक्रिया के लिये आपदा-रोधी तैयारी को बढ़ावा देना तथा पुनः प्राप्ति, पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण में ‘बेहतर निर्माण पर बल देना’
  • बचाव एवं राहत गतिविधियों को शुरू करने के लिये जन जागरूकता को बढ़ावा देना तथा आवश्यक सामग्रियों के भंडारण के लिये सामुदायिक केंद्र स्थापित करना।
  • आपदा के पश्चात् त्वरित प्रतिक्रिया हेतु मौजूदा कार्यबल एवं स्वैच्छिक श्रमिकों को आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करना तथा आपात स्थितियों में बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिये तकनीकी एवं रसद (logistical) क्षमताओं को मज़बूत बनाना।
  • आपदा के बाद पुनर्निर्माण की जटिल एवं महँगी प्रकृति को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय संस्थाओं के समन्वय हेतु प्रभावित समुदायों तथा व्यापार सहित सभी स्तरों पर विभिन्न संस्थानों, प्राधिकरणों एवं संबंधित हितधारकों के सहयोग को बढ़ावा देना।
  • आपदा के पश्चात् पुनर्निर्माण हेतु आवश्यक तैयारियों के लिये मार्गदर्शन प्रदान करना।
  • रुग्णता एवं मृत्यु दर की रोकथाम हेतु केस रजिस्ट्री के लिये एक तंत्र तैयार करना तथा आपदा के कारण होने वाली मृत्यु दर के संबंध में एक डेटाबेस स्थापित करना।
  • ज़रूरतमंद लोगों को आवश्यक मनोचिकित्सकीय सहायता तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना तथा अन्य सहायतार्थ योजनाओं को बढ़ावा देना।
  • देशों और सभी संबंधित हितधारकों के बीच अनुभव तथा ज्ञान के साझाकरण के लिये अंतर्राष्ट्रीय पुनर्प्राप्ति मंच (International Recovery Platform) जैसे अंतर्राष्ट्रीय तंत्र को बढ़ावा देना।

हितधारकों की अपेक्षित भूमिका

  • आपदा जोखिमों के प्रभावी कार्यान्वयन एवं लैंगिक आधार पर संवेदनशील आपदा जोखिमों को कम करने वाली नीतियों, योजनाओं तथा कार्यक्रमों के निर्माण और कार्यान्वयन हेतु आवश्यक संसाधनों की पूर्ति के लिये महिलाओं की भागीदारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अतः उन्हें इसके लिये ज़रुरी साधन एवं विकल्प उपलब्ध कराए जाने चाहिये।
  • ‘बच्चे एवं युवा’ परिवर्तन के महत्त्वपूर्ण घटक होते हैं। अत: उन्हें आपदा जोखिमो को कम करने की दिशा में योगदान करने हेतु उचित महत्त्व एवं साधन मुहैया कराए जाने चाहिये।
  • वृद्ध व्यक्तियों के पास वर्षों से अर्जित ज्ञान, कौशल एवं बुद्धिमता होती है, जो आपदा जोखिम को कम करने की दृष्टि से अमूल्य संपत्ति है, अतः उन्हें आपदा की प्रारंभिक चेतावनी जारी करने सहित नीतियों, योजनाओं एवं तंत्रों के निर्माण आदि में शामिल किया जाना चाहिये।
  • स्थानीय लोग अपने अनुभव एवं पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से आपदा की प्रारंभिक चेतावनी सहित योजनाओं तथा तंत्रों के विकास एवं कार्यान्वयन में महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान कर सकते हैं।
  • शैक्षणिक समुदाय, वैज्ञानिक तथा अनुसंधान संस्थाओं एवं नेटवर्क द्वारा आपदा जोखिम कारकों एवं परिदृश्यों पर विशेष रूप से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।
  • व्यापारियों, व्यावसायिक संघों तथा निजी क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों के साथ-साथ परोपकारी संस्थाओं को आपदा जोखिम-सूचित निवेश के माध्यम से आपदा जोखिम प्रबंधन को व्यवसाय मॉडल एवं प्रथाओं में एकीकृत करने पर बल देना चाहिये।
  • मीडिया द्वारा सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने और समझ में वृद्धि तथा योगदान हेतु स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर पर एक सक्रिय एवं समावेशी भूमिका निभाने की आवश्यकता है, ताकि छोटे पैमाने पर होने वाली आपदाओं के साथ-साथ बड़ी आपदाओं के संदर्भ में सटीक एवं उपयोगी जानकारियों का प्रसार किया जा सके।

अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की अपेक्षित भूमिका

  • संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय संगठनों, जो आपदा जोखिम को कम करने की दिशा में कार्यरत हैं, द्वारा अपनी रणनीतियों के समन्वय में वृद्धि की जानी चाहिये।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर संयुक्त राष्ट्र की कार्य योजना, संयुक्त राष्ट्र विकास सहायता फ्रेमवर्क एवं देशों के अपने कार्यक्रमों के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य कार्यप्रणालियों द्वारा संसाधनों के इष्टतम उपयोग को बढ़ावा देने तथा विकासशील देशों के अनुरोध पर वर्तमान ढाँचे के कार्यान्वयन में समर्थन दिये जाने की आवश्यकता है।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु संयुक्त राष्ट्र कार्यालय द्वारा वर्तमान फ्रेमवर्क के कार्यान्वयन, उसे और आगे बढ़ाने तथा समीक्षा के संदर्भ में समर्थन प्रदान किये जाने की उम्मीद है।
  • अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, जैसे कि विश्व बैंक एवं क्षेत्रीय विकास बैंकों द्वारा विकासशील देशों को एकीकृत आपदा जोखिमों को कम करने के लिये वित्तीय सहायता तथा ऋण प्रदान करने हेतु वर्तमान रूपरेखा की प्राथमिकताओं पर विचार करने की अपेक्षा की जाती है।
  • निजी क्षेत्र एवं व्यापार के साथ जुड़ाव हेतु संयुक्त राष्ट्र की मुख्य पहल के रूप में संयुक्त राष्ट्र ग्लोबल कॉम्पैक्ट द्वारा सतत् विकास एवं आपदा से उबरने के लिये आपदा जोखिम में कमी जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे को बढ़ावा दिये जाने की ज़रूरत हैं।
  • इसके अलावा अंतर-संसदीय संघों और अन्य प्रासंगिक क्षेत्रीय निकायों तथा संसदीय तंत्रों को आपदा जोखिम न्यूनीकरण का समर्थन करने एवं राष्ट्रीय कानूनी ढाँचे को मज़बूत बनाने के लिये यथोचित प्रयास करने चाहिये।

वर्ष 2005-15 के आँकड़ों के अनुसार

  • 10 वर्षों की इस समयावधि में लगभग 1.5 बिलियन से अधिक लोग विभिन्न प्रकार की आपदाओं से प्रभावित हुए हैं, इनमें महिलाएँ, बच्चे और कमज़ोर वर्ग के लोग विषमतापूर्वक प्रभावित हुए हैं।
  • इसके अलावा वर्ष 2008 तथा वर्ष 2012 के बीच 144 मिलियन लोग आपदाओं के परिणामस्वरूप विस्थापन के शिकार हुए।
  • बार-बार आने वाली छोटी-छोटी आपदाएँ तथा धीमी गति से असर करने वाली आपदाएँ विशेष रूप से समुदायों, घरों तथा छोटे एवं मध्यम आकार के उद्यमों को प्रभावित करती हैं, जो अन्य सभी प्रकार के नुकसानों के संदर्भ में बहुत अधिक होता है।
  • सभी देशों, विशेष रूप से विकासशील देशों, को जहाँ आपदाओं से होने वाली मौतें एवं आर्थिक नुकसान असामान्य रूप से अधिक होता है, वित्तीय एवं अन्य दायित्वों को पूरा करने के लिये अक्सर छिपी हुई लागतों (बहुत-से छोटे-छोटे ऐसे खर्च जो अनुमान के दायरे से बाहर होते हैं या जिन पर विशेष रूप से ध्यान नहीं दिया जाता है) तथा चुनौतियों के बढ़ते स्तर का सामना करना पड़ता है।
  • ह्यूगो फ्रेमवर्क फॉर एक्शन (Hyogo Framework for Action) को अपनाने के दस वर्ष बाद भी आपदाएँ सतत् विकास की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न कर रही हैं, हालाँकि सेंदाई फ्रेमवर्क के अंतर्गत आपदा जोखिम को कम करने संबंधी प्रयासों हेतु महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

सुझाव

  • व्यक्तियों, समुदायों तथा देशों को अधिक प्रभावी ढंग से सुरक्षित बनाने के लिये आपदा जोखिम का अनुमान लगाना, योजनाएँ बनाना तथा इस संदर्भ में प्रभावी कार्य करना आवश्यक है।
  • जोखिम तथा भेद्यता को कम करने के लिये योजनाओं का उत्कृष्ट कार्यान्वयन आवश्यक है। इस प्रकार नए आपदा जोखिमों को रोकने तथा आपदा जोखिम के प्रति सभी स्तरों पर जवाबदेहिता तय किये जाने की ज़रूरत है।
  • राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों को कुशल प्रबंधन के तहत मज़बूत बनाने तथा आपदा प्रतिक्रिया, पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण के लिये आवश्यक तैयारी व राष्ट्रीय समन्वय में सुधार करने पर बल दिया जाना चाहिये।
  • कुशल एवं प्रभावी क्रियान्वयन के लिये आपदा जोखिम के प्रबंधन में व्याप्त कमियों का निवारण करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप घरेलू संसाधनों के उपयोग हेतु (वित्तीय एवं तकनीकी सहायता के माध्यम से) विकासशील देशों की क्षमता में वृद्धि करना।
  • वर्ष 2012 में आयोजित सतत् विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के परिणामी दस्तावेज़ ‘’The future we want’’ के अनुसार, आपदाओं के मामले में लचीलेपन के निर्माण को सतत् विकास और गरीबी उन्मूलन के संदर्भ में संबोधित करने की आवश्यकता है, ताकि सभी स्तरों पर एकीकृत कार्यवाही की जा सके।

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