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डेली न्यूज़

  • 08 Jun, 2020
  • 54 min read
सामाजिक न्याय

आदिवासी छात्रों के लिये 'मेगा शैक्षणिक परिसर'

प्रीलिम्स के लिये:

उड़ीसा में जनजातीय समुदायों की स्थिति, जनजातीय साक्षरता की स्थिति

मेन्स के लिये:

जनजातीय समुदाय की शिक्षा से जुड़े मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

ओडिशा सरकार जनजातीय जिलों में ‘मेगा शैक्षणिक परिसरों’ (Mega Educational Complexes) का निर्माण करने की योजना बना रही है, जहाँ छात्रों को शैक्षणिक (Academi) तथा खेल कौशल (Sporting Skills) दोनों से संबंधित शिक्षा प्रदान की जाएगी।

प्रमुख बिंदु:

  • ‘मेगा शैक्षणिक परिसरों’ की स्थापना उड़ीसा के जनजातीय बहुल ज़िलों जैसे- क्योंझर, सुंदरगढ़ और मयूरभंज में की जाएगी। इन ज़िलों में संथाल और भुइया प्रमुख जनजातीय समूह हैं।
  • एक निजी शैक्षिक समूह द्वारा पहले से ही उड़ीसा के विभिन्न ज़िलों में इस प्रकार के शैक्षणिक परिसर स्थापित किये जा चुके हैं।

मेगा शैक्षणिक परिसर (Mega Educational Complex):

  • प्रत्येक शैक्षणिक परिसर में 3,000 जनजातीय छात्रों की शिक्षा की व्यवस्था होगी। परिसर में कक्षा 1 से 12 तक के आदिवासी छात्रों के लिये शैक्षणिक के साथ-साथ खेल-कूदों में कौशल सुधार के लिये भी अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध होंगी।
  • इन परिसरों में 'कौशल विकास केंद्रों' को भी आवश्यक रूप से स्थापित किया जाएगा।
  • इन मेगा शैक्षणिक परिसरों की स्थापना के लिये निधि 'ओडिशा खनिज असर क्षेत्र विकास निगम (Odisha Mineral Bearing Areas Development Corporation OMBADC) प्रदान करेगा। 
  • OMBADC की स्थापना उड़ीसा के खनिज समृद्ध ज़िलों के विकास के लिये की गई। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि अधिकांश खनिज समृद्ध ज़िले, आदिवासी बहुल भी हैं।

उड़ीसा में जनजातीय समुदायों की स्थिति:

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनजातीय आबादी का लगभग 9.17% उड़ीसा में है। उड़ीसा की कुल जनसंख्या में जनजातीय आबादी का प्रतिशत लगभग 22.8 है।
  • उड़ीसा में 62 जनजातीय समुदाय पाए जाते हैं अर्थात भारत में सबसे अधिक जनजातीय विविधता उड़ीसा में है। भारत में जनजातियों की सर्वाधिक जनसंख्या के अनुसार राज्यों का विश्लेषण किया जाए तो मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र के बाद उड़ीसा तीसरे स्थान पर है।
  • भारत के 75 ‘विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों’ (Particularly Vulnerable Tribal Groups) में से 13 उड़ीसा में निवास करती हैं।
    • ओडिशा राज्य के घोषित समस्त पी.वी.टी.जी. की सूची में 1. चुकटिया भुंजिया  2. बिरहोर  3. बोंडो  4. दिदायी   5. डोंगरिया कोंध   6. जुआंग   7. खरिया   8. कुटिया कंधा  9. लांजिया सौरा   10. लोढ़ा   11. मनकीडिया  12. पौड़ी भुइया  13. सुरा शामिल हैं।
  • उड़ीसा के क्योंझर ज़िले में व्यापक लौह खनन का कार्य किया जाता है। क्योंझर ज़िले में, ओडिशा के कुल लौह अयस्क भंडार का 70% से अधिक पाया जाता है। इसके अलावा कोरापुट और मयूरभंज ज़िलों में भी व्यापक खनन कार्य किया जाता हैं।

जनजातीय साक्षरता की स्थिति व कारण:

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में कुल आबादी में जनजातीय समुदाय की आबादी 8.6% हैं तथा जनजातीय समुदाय की साक्षरता दर 58.96% है।
  • शिक्षा का माध्यम:
    • जनजातीय समुदायों को शिक्षा प्रदान करने में भाषा सबसे बड़ी बाधा रही है। अधिकतर  स्कूली पाठ्यक्रम राज्य या केंद्र की आधिकारिक भाषाओं में डिज़ाइन किये गए हैं जो जनजातीय समुदाय के अनुकूल नहीं हैं।
  • माता-पिता का दृष्टिकोण:
    • जनजातीय समुदायों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण लोग अपने बच्चों को  श्रमिक कार्यों तथा खनन कार्यों में लगाने को वरीयता देते हैं। चूंकि शिक्षा से कोई तात्कालिक आर्थिक लाभ नहीं मिलता है, अत: लोग अपने बच्चों को पारिश्रमिक रोज़गार में संलग्न करना पसंद करते हैं।
  • अवसंरचना की कमी:
    • जनजातीय क्षेत्रों में स्थित अधिकांश विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक अवसंरचनाओं की भी कमी है। विशेषकर छात्राओं के लिये 'सैनिटरी सुविधाओं' की कमी है।

सरकार द्वारा किये गए प्रयास:

  • एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (Eklavya Model Residential Schools- EMRSs):
    • वर्ष 2018 में 50 प्रतिशत से ज़्यादा जनजातीय आबादी एवं 20,000 जनजातीय जनसंख्या वाले प्रत्येक प्रखंड (block) में ‘एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय’ अथवा एकलव्य मॉडल रेज़िडेंशियल स्कूल खोलने को सैद्धांतिक मंज़ूरी प्रदान की थी। 
    • 163 जनजातीय बहुल ज़िलों में प्रति 5 करोड़ रुपए लागत वाली खेल सुविधाएँ (Sports Facilities) स्थापित की जाएंगी, इसमें से प्रत्‍येक का निर्माण वर्ष 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा।
  • राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप योजना (Rajiv Gandhi National Fellowship Scheme -RGNF):
    • RNGF को वर्ष 2005-2006 में जनजातीय समुदाय से संबंधित छात्रों को उच्च शिक्षा के लिये प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था।
  • जनजातीय क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र (Vocational Training Center in Tribal Areas): 
    • जनजातीय क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र को जनजातीय समुदाय के छात्रों के कौशल को उनकी योग्यता तथा वर्तमान बाज़ार के रुझान के आधार पर विकसित करने के उद्देश्य के आधार पर प्रारंभ किया गया था।

आगे की राह:

  • जनजातीय क्षेत्रों सहित कहीं भी शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को अपने परिवेश और समाज की समझ प्रदान करना होना चाहिये, ताकि उनमें योग्यता का विकास किया जाए, ताकि वे अपने स्थानीय समाज में अथवा जिनके पास इच्छा व क्षमता हो, राष्ट्रीय रोज़गार बाज़ार में आजीविका अर्जित कर सकें।
  • पाठ्यक्रम में स्थानीय संस्कृति, लोक कथाओं और इतिहास को शामिल करने से जनजातीय बच्चों के आत्मविश्वास का निर्माण करने और उनके जीवन में शिक्षा की प्रासंगिकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
  • पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से जनजातीय समुदाय के शैक्षणिक संस्थानों में समावेश को संस्थागत रूप देने की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू 


शासन व्यवस्था

मानव रहित विमान प्रणाली नियम, 2020

प्रीलिम्स के लिये:

ड्रोन, नागर विमानन महानिदेशालय

मेन्स के लिये:

मानव रहित विमान प्रणाली नियम, 2020 से संबंधित तथ्य

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नागर विमानन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) ने मसौदा ‘मानव रहित विमान प्रणाली नियम, 2020’ [Unmanned Aircraft System (UAS) Rules, 2020] को अधिसूचित किया है।

प्रमुख बिंदु:

  • गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा मानव रहित विमान के उत्पादन, आयात, व्यापार, स्वामित्त्व और संचालन को विनियमित करने हेतु नियम अधिसूचित किया गया है।
  • नागर विमानन मंत्रालय ने 30 दिनों के भीतर मसौदा ‘मानव रहित विमान प्रणाली नियम, 2020’ पर सार्वजनिक टिप्पणियाँ आमंत्रित की हैं जिसके बाद अंतिम नियम जारी किये जाएंगे।

मसौदा नियम:

  • नागर विमानन महानिदेशालय (Directorate General of Civil Aviation- DGCA) द्वारा अधिकृत किसी संस्था या व्यक्ति को ही किसी अधिकृत विनिर्माता से उपकरणों के खरीद की अनुमति होगी। 
  • मसौदा नियम के तहत केवल नैनो ड्रोन को ही भारत में संचालित करने की अनुमति है। 
  • मसौदा नियम के अनुसार, केवल योग्य पायलट द्वारा ही भारी ड्रोन को संचालित करने की अनुमति होगी। 
  • वैध बीमा पॉलिसी होने की स्थिति में ही  मानव रहित विमान प्रणाली से कार्य लिया जाएगा। 
  • ड्रोन का पेलोड नागर विमानन महानिदेशालय द्वारा निर्धारित मानक के अनुरूप ही होना चाहिये। 
  • किसी भी व्यक्ति को आपातकालीन स्थिति के अलावा ड्रोन से किसी भी वस्तु को लैंड किये बिना डिलीवरी की अनुमति नहीं होगी। 
  • ड्रोन से हथियार, गोला-बारूद, विस्फोटक वस्तुएँ, इत्यादि को ले जाने की अनुमति नहीं है। 
  • स्वामित्त्व:
    • ड्रोन के मालिक और ड्रोन को संचालित कर रहे व्यक्ति की आयु कम-से-कम 18 वर्ष होनी चाहिये। 
    • ड्रोन से संबंधित किसी भी तरह की कंपनी भारत में स्थापित होनी चाहिये एवं अध्यक्ष और कम-से-कम दो तिहाई निदेशक भारतीय नागरिक होने चाहिये। 

ड्रोन (Drone):

  • ड्रोन एक प्रकार का फ्लाइंग रोबोट (Flying Robot) होता है, जिसे मनुष्यों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इसकी खोज मनुष्यों ने अपने दैनिक कार्यों के संपादन के लिये की थी, परंतु वर्तमान में इसका प्रयोग खुफिया जानकारी प्राप्त करने हेतु भी काफी व्यापक स्तर पर किया जा रहा है।
  • ड्रोन को मानव रहित विमान (Unmanned Aerial Vehicle-UAV) भी कहा जाता है।
  • ड्रोन के प्रकार:
    • नैनो ड्रोन- वे ड्रोन जिनका वजन 250 ग्राम तक होता है।
    • सूक्ष्म ड्रोन- वे ड्रोन जिनका वजन 250 ग्राम से अधिक लेकिन 2 किलो ग्राम से कम होता है।
    • लघु ड्रोन- वे ड्रोन जिनका वजन 2 किलोग्राम से अधिक लेकिन 25 किलोग्राम से कम होता है।
    • मध्यम ड्रोन: वे ड्रोन जिनका वजन 25 किलोग्राम से अधिक लेकिन 150 किलोग्राम से कम होता है।
    • विशाल ड्रोन: वे ड्रोन जिनका वजन 150 किलो ग्राम से अधिक होता है।

ड्रोन के इस्तेमाल के लाभ:

  • ड्रोन, आधुनिक युग की तकनीक का एक नया आयाम है जिसे आसानी से किसी भी व्यक्ति द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है
  • ड्रोन उन स्थानों पर भी आसानी से पहुँच सकता है, जहाँ जाना इंसानों के लिये अपेक्षाकृत मुश्किल होता है या पूर्णतः असंभव होता है, अतः ड्रोन की यह विशेषता उसे आपदा प्रबंधन में प्रयोग करने के लिये भी एक अच्छा विकल्प बनाती है।
  • ड्रोन के प्रयोग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे न केवल लागत में कमी आती है, बल्कि समय की भी काफी बचत होती है, क्योंकि इसे सामान्यतः ट्रैफिक अवरोध का सामना नहीं करना पड़ता, साथ ही इसके प्रयोग से कंपनियों की श्रम लागत भी काफी कम हो जाती है।

ड्रोन के इस्तेमाल से नुकसान:

  • ड्रोन एक मशीन है और अन्य मशीनों की तरह इस पर भी यही खतरा बना रहता है कि इसे आसानी से हैक (Hack) किया जा सकता है। हैकर आसानी से इसकी नियंत्रण प्रणाली (Control System) पर हमला कर ड्रोन को नुकसान पहुँचा सकता है एवं गोपनीय जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है।
  • यदि ड्रोन जैसी तकनीक असामाजिक या आपराधिक तत्त्वों के पास पहुँच जाती है तो वह काफी खतरनाक साबित हो सकती है, क्योंकि ड्रोन के सहारे न सिर्फ जासूसी की जा सकती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसके सहारे हमला भी किया जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त ड्रोन के उड़ान भरते समय पक्षियों से टकराने का भी खतरा रहता है।

स्रोत: लाइव मिंट


जैव विविधता और पर्यावरण

बाघ संरक्षण: चुनौती और प्रयास

प्रीलिम्स के लिये

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, प्रोजेक्ट टाइगर 

मेन्स के लिये

भारत में बाघों की स्थिति और बाघ संरक्षण के समक्ष चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरण (Clarification) के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority-NTCA) के प्रयासों के फलस्वरूप देश में बाघ संरक्षण की दिशा में वांछित कार्य किया गया है।

प्रमुख बिंदु

  • मंत्रालय के अनुसार, यह सरकार के प्रयासों का ही परिणाम है कि देश में बीते कुछ वर्षों में बाघों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2006, वर्ष 2010, वर्ष 2014 और वर्ष 2018 में किये गए अखिल भारतीय बाघ अनुमान (All India Tiger Estimation) के निष्कर्षों से स्पष्ट है।
  • यह सभी परिणाम बाघों की 6 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर (Growth Rate) दर्शाते हैं, जो कि भारतीय संदर्भ में विभिन्न कारणों से होने वाले बाघों के नुकसान की कमी को पूर्ण करने के लिये पर्याप्त है।
  • वर्ष 2012 से वर्ष 2019 की अवधि के मध्य आँकड़ों पर गौर किया जाए तो ज्ञात होता है कि देश में प्रतिवर्ष बाघों की औसतन मृत्यु दर लगभग 94 रही है।

भारत में बाघों की स्थिति

  • अखिल भारतीय बाघ अनुमान, 2018 के अनुसार, वर्ष 2018 में भारत में बाघों की संख्‍या बढ़कर 2,967 हो गई थी। यह भारत के लिये एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, क्योंकि भारत ने बाघों की संख्या को दोगुना करने के लक्ष्य को चार वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया है।
    • सर्वेक्षण के अनुसार, देश में मध्य प्रदेश और कर्नाटक में बाघों की संख्या सबसे अधिक है। हालाँकि, बाघों की संख्या में हुई वृद्धि उन सभी 18 राज्यों में एक समान नहीं हुई है जहाँ बाघ पाए जाते हैं।
    • आँकड़ों के अनुसार, मध्‍य प्रदेश में बाघों की संख्‍या सबसे अधिक 526 पाई गई, इसके बाद कर्नाटक में 524 और उत्तराखंड में इनकी संख्‍या 442 थी।
  • वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2019 में देश भर में बाघों की मृत्यु के 85 प्रत्यक्ष मामले सामने आए और 11 मामलों में मरने की पुष्टि उनके अंगों के मिलने के आधार पर की गई, जबकि इससे पहले वर्ष 2018 के दौरान बाघों की मृत्यु के 100 मामले, वर्ष 2017 में 115 मामले और वर्ष 2016 में बाघों की मृत्यु के 122 मामले सामने आए थे।
  • अखिल भारतीय बाघ अनुमान, 2018 के अनुसार, तीन टाइगर रिज़र्व बक्सा (पश्चिम बंगाल), डंपा (मिज़ोरम) और पलामू (झारखंड) में बाघों के अनुपस्थिति दर्ज की गई।

भारत में बाघ जनगणना 

  • देश में प्रत्येक 4 वर्ष में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा पूरे भारत में बाघों की जनगणना की जाती है।
  • इस प्रकार का आयोजन सर्वप्रथम वर्ष 2006 में किया गया था।

बाघ संरक्षण के समक्ष चुनौतियाँ:

  • अवैध शिकार: उल्लेखनीय है कि अवैध बाज़ारों में बाघ के शरीर के प्रत्येक हिस्से का कारोबार होता है। बाघों का शिकार मुख्यतः दो कारणों से किया जाता है: सबसे पहला उनके कथित खतरे को देखते हुए और दूसरा मौद्रिक लाभ कमाने के उद्देश्य से। ज्ञातव्य है कि ऐतिहासिक रूप से राजा-महाराजा और धनी लोग अपना बाहुबल प्रकट करने के लिये भी शिकार करते थे। एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 1875 और वर्ष 1925 के मध्य भारत में कुल 80,000 बाघ मारे गए थे।
  • प्राकृतिक वास का नुकसान: मौजूदा दौर में बाघों की आबादी के लिये सबसे मुख्य खतरा उनके प्राकृतिक निवास स्थान का नुकसान है। एक अनुमान के अनुसार, विश्व भर के बाघों ने अपने प्राकृतिक निवास स्थान का तकरीबन 93 प्रतिशत हिस्सा खो दिया है। इन निवास स्थानों को अधिकांशतः मानव गतिविधियों द्वारा नष्ट किया गया है। वनों और घास के मैदानों को कृषि ज़रूरतों के लिये परिवर्तित किया जा रहा है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: बाघों के प्राकृतिक निवास स्थान और शिकार स्थान छोटे होने के कारण अधिकांश बाघ पशुधन को मारने के लिये मज़बूर है और जब वे ऐसा करते हैं तो किसान अक्सर जवाबी कार्रवाई करते हैं और बाघों को मार देते हैं।

सरकार के प्रयास- प्रोजेक्ट टाइगर 

  • शिकार और प्राकृतिक निवास स्थान के नुकसान के कारण 1970 के दशक में भारत में 2,000 से भी कम बाघ शेष बचे थे। वर्ष 1973 में भारत सरकार ने बाघ को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित किया और प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) नाम से एक संरक्षण योजना शुरू की जिसके तहत बाघों के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
  • 'प्रोजेक्ट टाइगर' पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक सतत् केंद्र प्रायोजित योजना है जो बाघ संरक्षण के लिये केंद्रीय सहायता प्रदान करती है।
  • वर्तमान में 'प्रोजेक्ट टाइगर' के तहत संरक्षित टाइगर रिज़र्व की संख्या 50 हो गई है, हालाँकि ये टाइगर रिज़र्व आकार में अपेक्षाकृत काफी छोटे हैं।

राष्ट्रीय संरक्षण प्राधिकरण

  • राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है।
  • राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की स्थापना वर्ष 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों में संशोधन करके की गई। प्राधिकरण की पहली बैठक नवंबर 2006 में हुई थी।
  • यह राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के प्रयासों का ही परिणाम है कि देश में विलुप्त होते बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

स्रोत: पी.आई.बी


जैव विविधता और पर्यावरण

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक- 2020

प्रीलिम्स के लिये:

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक- 2020

मेन्स के लिये:

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक- 2020 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘येल विश्वविद्यालय’ (Yale University) द्वारा द्विवार्षिक रूप से जारी किये जाने वाले 'पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक' (Environment Performance Index- EPI) में भारत 180 देशों में 168वें स्थान पर रहा है।

प्रमुख बिंदु:

  • ‘पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक’ येल विश्वविद्यालय के 'सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉ एंड पॉलिसी' तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय के 'सेंटर फॉर इंटरनेशनल अर्थ साइंस इंफॉर्मेशन नेटवर्क' की संयुक्त पहल है। EPI को ‘विश्व आर्थिक मंच’ (World Economic Forum- WEF) के सहयोग से तैयार किया जाता है। 
  • 'पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक' विश्व के विभिन्न देशों की सतत् स्थिति का आकलन विभिन्न प्रदर्शन आँकड़ों के आधार पर करता है।

EPI की श्रेणियाँ तथा प्रतिशत हिस्सा:

  • EPI को 11 विभिन्न मुद्दों से संबंधित श्रेणियों तथा 32 प्रदर्शन संकेतकों के आधार पर तैयार किया जाता है। 

EPI श्रेणी 

प्रतिशत हिस्सेदारी 

जैव विविधता और आवास 

15%

पारिस्थितिकी सेवाएँ 

6%

वायु गुणवत्ता 

20%

स्वच्छता और पेयजल 

16%

मत्स्यन 

6%

जल संसाधन 

3%

जलवायु परिवर्तन 

24%

प्रदूषक उत्सर्जन 

3%

कृषि 

3%

अपशिष्ट प्रबंधन 

2%

भारी धातु 

2%

Environment-Health

भारत का प्रदर्शन:

  • EPI- 2018 में भारत का स्थान 177वाँ तथा स्कोर 30.57 के स्कोर (100 में से) रहा था। जबकि EPI- 2020 में भारत का स्थान 168 वाँ तथा स्कोर 27.6 रहा है। 
  • भारत केवल 11 देशों; बुरुंडी, हैती, चाड, सोलोमन द्वीप, मेडागास्कर, गिनी, कोटे डी आइवर, सिएरा लियोन, अफगानिस्तान, म्यांमार और लाइबेरिया, से बेहतर स्थिति में है।
  • अफगानिस्तान को छोड़कर सभी दक्षिण एशियाई देश EPI रैंकिंग में भारत से आगे हैं।

प्रमुख देशों की EPI रैंक:

देश 

रैंक 

डेनमार्क 

1

लक्ज़मबर्ग 

2

अमेरिका 

24

चीन 

120

लाइबेरिया 

180

दक्षिण एशियाई देशों की EPI रैंक:

देश 

रैंक 

भूटान

107

श्रीलंका

109

मालदीव

127

पाकिस्तान

142

नेपाल

145

बांग्लादेश

162

भारत

168

अफगानिस्तान

178

भारत का विभिन्न संकेतकों के अनुसार प्रदर्शन:

  • भारत का पर्यावरणीय स्वास्थ्य संबंधी सभी प्रमुख मापदंडों; जिसमें वायु गुणवत्ता, स्वच्छता एवं पेयजल, भारी धातु, अपशिष्ट प्रबंधन आदि शामिल हैं, में प्रदर्शन अन्य देशों की तुलना में खराब रहा है।
  • जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं से संबंधित मापदंडों पर भी भारत का स्कोर दक्षिण एशिया के औसत स्कोर से कम रहा है।
  • दक्षिण एशियाई देशों में ’जलवायु परिवर्तन’ संकेतकों में भारत का स्थान पाकिस्तान के बाद दूसरे स्थान (106 वाँ स्थान) पर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, विगत 10 वर्षों में ब्लैक कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन और ग्रीन हाउस उत्सर्जन में वृद्धि हुई है।
  • EPI में 'जलवायु परिवर्तन' संबंधी श्रेणी का मूल्यांकन निम्नलिखित संकेतकों के आधार पर किया गया है।  
    • समायोजित उत्सर्जन वृद्धि दर; 
    • चार प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों तथा एक प्रदूषक से मिलकर बनी श्रेणी में वृद्धि; 
    • भूमि आच्छादन में कमी से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वृद्धि दर;
    • ग्रीनहाउस गैस की तीव्रता वृद्धि दर; 
    • प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन।

सुशासन का महत्त्व:

  • सुशासन किसी भी देश की पर्यावरणीय स्थिति को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • इसके लिये नीति निर्माण प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी, पारदर्शी विनियमन, लक्ष्यों तथा कार्यक्रमों पर खुली बहस, स्वतंत्र मीडिया, गैर-लाभकारी संगठनों की उपस्थिति, कानून के शासन आदि की भूमिका को बढ़ावा देना चाहिये। 

 रिपोर्ट का महत्त्व:

  • EPI संकेतक, समस्या को निर्धारित करने, लक्ष्य निर्धारित करने, रुझानों को ट्रैक करने, परिणामों को समझने तथा सर्वोत्तम नीतियों के निर्माण में मदद करता है।
  • EPI, संयुक्त राष्ट्र ‘सतत विकास लक्ष्यों’ (Sustainable Development Goals- SDGs) को पूरा करने की दिशा में आवश्यक नीति निर्माण में सहायक होता है।
  • EPI रैंकिंग यह समझने में मदद करता है कि कौन-से देश पर्यावरणीय चुनौतियों का प्रबंधन बेहतर तरीके से कर रहे हैं। अन्य देश EPI में बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों की नीतियों के अनुसार अपनी घरेलू नीतियों में आवश्यक परिवर्तन ला सकते हैं।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


जैव विविधता और पर्यावरण

नगर वन योजना

प्रीलिम्स के लिये: 

योजना के प्रमुख बिंदु, कार्बन सिंक, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम

मेन्स के लिये: 

योजना का महत्त्व 

चर्चा में क्यों?  

हाल ही विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day- WED) के अवसर पर पर्यावरण,वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change) द्वारा अगले पाँच वर्षों में देश भर में 200 शहरी वन विकसित करने के लिये ‘नगर वन योजना’ के कार्यान्वयन की घोषणा की गई हैI

प्रमुख बिंदु:

  • इस वर्ष COVID-19 महामारी के चलते इस वर्ष के थीम- नगर वन (शहरी वन) पर ध्यान केंद्रित करते हुए पर्यावरण,जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन वर्चुअल रूप से किया गया ।
  • यह योजना नगर निकायों, गैर सरकारी संगठनों तथा स्‍थानीय नागरिकों के बीच भागीदारी और सहयोग पर आधारित होगीI
  • इस योजना के क्रियान्वयन के लिये भुगतान राशि की व्यवस्था क्षतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम, 2016 (Compensatory Afforestation Fund Act, 2016- CAMPA) की निधि द्वारा की जाएगी।
  • इस योजना की शुरुआत वर्ष 2015 में पुणे में की गई। 
  • पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक फिल्म का भी प्रदर्शन किया गया, जिसमें दिखाया गया कि किस तरह  पुणे वासियों की पहल के द्वारा वन विभाग तथा स्थानीय निकाय ने एक साथ मिलकर 16.8 हेक्टेयर में फैले ‘वारजे शहरी वन क्षेत्र’ (Warje Urban Forest)  बंजर पहाड़ी क्षेत्र को हरे-भरे जंगलों में बदल दिया।
  • वर्तमान  समय में आज इस क्षेत्र में जंगली पौधों की 23 प्रजातियों, 29 पक्षी प्रजातियों, 15 तितली प्रजातियों, 10 सरीसृप प्रजातियों और 3 स्तनपायी प्रजातियों के साथ जैव विविधता से समृद्ध है। 
  • जहाँ पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट, 2019 (The India State of Forests Report, 2019) में बताया गया है कि भारत के कुल वन आवरण में वर्ष 2015 और वर्ष 2019 के बीच 1.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वही दूसरी तरफ सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (Centre for Science and Environment’s) द्वारा जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट के पाँचवें संस्करण में बताया गया है कि देश के कुल 629 ज़िलों के 34 प्रतिशत जंगलों के क्षेत्रफल में कमी आई हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस:

  • विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन हर वर्ष 5 जून को किया जाता है। 
  • इसका आयोजन पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (The United Nations Environment Programme-UNEP) द्वारा घोषित थीम पर ध्यान केंद्रित करते हुए किया जाता है। 

कार्बन सिंक:

  • कार्बन सिंक एक वनस्पतिक क्षेत्र, एक जंगल, या फिर एक फाइटोप्लैंकटन-समृद्ध समुद्र हो सकता है जो जीवाश्म ईंधन के जलने से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में सहायक होता है।
  • कार्बन सिंक के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को निष्कासित करने की प्रक्रिया, कार्बन प्रच्छादन (Carbon Sequestration) के रूप में जानी जाती है।

योजना का महत्त्व:

  • भारत पशुओं और पौधों की कई प्रजातियों से समृद्ध जैव विविधता से संपन्न क्षेत्र है जहाँ विश्व में मौज़ूद जैव-विविधता के 35 वैश्विक हॉटस्पॉट्स में से 4 भारत में विद्यमान है।
  • समय के साथ बढ़ती जनसंख्या, वनों की कटाई, शहरीकरण और औद्योगीकरण ने प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डाल दिया है, जिससे जैव विविधता की निरंतर हानि हो रही है।
  • इन सबके साथ बढ़ते शहरीकरण के साथ शहरी क्षेत्रों में भी जैव विविधता को सुरक्षित रखने और बचाने की आवश्यकता उत्पन्न हो गई है।
  • नगर वन योजना इस अंतर को खत्म करने का एक बेहतर तरीका है। इसलिये  मंत्रालय द्वारा भी शहरी क्षेत्रों में जैव विविधता के प्रोत्‍साहन और संरक्षण के लिये ‘नगर वन’ को विश्व पर्यावरण-2020 की थीम के रूप में अपनाया गया है।
  • यह योजना कार्बन सिंक (Carbon Sink) की अतिरिक्त मात्रा का संचयन करने में मददगार साबित होगी।
  • पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट, 2019 में कहा गया है कि भारत के कुल वन आवरण में 2015 और 2019 के बीच 1.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
  • इन सब के अलावा यह योजना शहरों में ग्रामीण वन की पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित करने में मददगार साबित होगी।

स्रोत: पीआईबी


भारतीय अर्थव्यवस्था

तीन नई कोयला खदानों की शुरुआत

प्रीलिम्स के लिये:

संवाद एप, डब्ल्यूसीएल आई, मिशन 100 डेज़

मेन्स के लिये:

कोयला उत्पादन में वृद्धि एवं निगरानी से संबंधित तथ्य 

चर्चा में क्यों?

कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited- CIL) की सहायक कंपनी ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ (Western Coalfields Ltd- WCL) ने महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में 3 नई कोयला खदानों की शुरुआत की है। 

प्रमुख बिंदु:

  • गौरतलब है कि ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ द्वारा ‘संवाद’ (SAMVAAD) नामक एक एप भी लॉन्च किया गया है। 
  • इसके साथ ही ‘डब्ल्यूसीएल आई’ (WCL EYE) और ‘मिशन 100 डेज़’ (Mission 100 Days) की भी शुरुआत की गई है।
  • ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ द्वारा शुरू की गईं इन खदानों की संयुक्त वार्षिक उत्पादन क्षमता 2.9 MT (मिलियन टन) होगी।
  • ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ कंपनी इन खदानों पर कुल 849 करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय करेगी जिससे 647 लोगों को प्रत्यक्ष रोज़गार के अवसर उपलब्ध होंगे।
  • उल्लेखनीय है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 तक ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ ने 20 नई परियोजनाओं को शुरू करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। जिनमें से 14 परियोजनाएँ महाराष्ट्र और 6 परियोजनाएँ मध्य प्रदेश में शुरू की जाएंगी। 
  • इन परियोजनाओं पर कुल 12753 करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय किया जाएगा जिससे 14000 से भी अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोज़गार के अवसर उपलब्ध होंगे। 
  • ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ द्वारा इन नए कोयला खदानों की शुरुआत 20 नई परियोजनाओं का हिस्सा हैं। 
  • गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2019-20 में ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ ने 57.64 मिलियन टन कोयले का उत्पादन किया था, जो कि पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 8% से भी अधिक की वृद्धि को दर्शाता है।

नए कोयला खदान:

1. अदसा खदान (महाराष्ट्र के नागपुर क्षेत्र में), जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 1.5 मिलियन टन होगी।
2. शारदा भूमिगत खदान (मध्य प्रदेश के कन्हान क्षेत्र में), जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 0.4 मिलियन टन होगी।
3. धनकसा भूमिगत खदान (मध्य प्रदेश के पेंच क्षेत्र में), जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 1 मिलियन टन होगी।

उद्देश्य:

  • वित्तीय वर्ष 2023-24 तक ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ द्वारा 75 MT (मिलियन टन) कोयला उत्पादन करने का लक्ष्य है। 
  • वित्तीय वर्ष 2023-24 तक ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ द्वारा 1 बिलियन टन उत्पादन करने का लक्ष्य है।

संवाद एप (SAMVAAD App):

  • ‘संवाद’ एप कर्मचारियों और हितधारकों के लिये एक मोबाइल और डेस्कटॉप एप है, जो सुझाव/प्रतिक्रिया/अनुभव साझा करने के लिये एक आभासी या वर्चुअल प्‍लेटफॉर्म प्रदान करेगा।
  • त्‍वरित प्रतिक्रि‍या टीमें 7 दिनों की निर्धारित अवधि में प्रश्नों और फीडबैक का जवाब देंगी।

डब्ल्यूसीएल आई (WCL EYE):

  • ‘डब्ल्यूसीएल आई’ एक निगरानी प्रणाली है जिसके माध्यम से ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ की 15 प्रमुख खदानों के परिचालन की चौबीसों घंटे निगरानी की जाएगी।  
  • 15 प्रमुख खदानों की हिस्‍सेदारी ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ के कुल कोयला उत्पादन में 70% है। 
  • ‘डब्ल्यूसीएल आई’ कोल स्टॉक की निगरानी और कार्यस्थल पर कोयले की उपलब्धता एवं रेलवे के पास कोयले की रैक और लोडिंग की निगरानी तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने में भी मदद करेगी।

मिशन 100 डेज़ (Mission 100 Days):

  • वित्तीय वर्ष 2020-21 में ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ ने 62 मिलियन टन कोयला उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु ‘मिशन 100 डेज़’ के नाम से एक रोडमैप लॉन्च किया है।
  • ‘मिशन 100 डेज़’ कंपनी के मध्यमकालिक और दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्‍त करने में भी मदद करेगा।

वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (Western Coalfields Ltd- WCL)

  • ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ की आठ सहायक कंपनियों में से एक है। यह कंपनी कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) के प्रशासनिक नियंत्रण में है ।
  • ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत निगमित है। इसका पंजीकृत कार्यालय नागपुर में स्थित है।
  • मार्च 2007 में ‘वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ को ‘मिनीरत्न’ (Miniratna) का दर्जा प्रदान किया गया था।

स्रोत: पीआईबी


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

लॉकडाउन में पुरातत्त्वविदों द्वारा कार्य

प्रीलिम्स के लिये: 

LiDAR तकनीकी तथा इसके अनुप्रयोग 

मेन्स के लिये:

पुरातात्त्विक कार्यों में LiDAR तकनीकी का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में COVID-19 महामारी के चलते जहाँ विश्व स्तर पर पुरातत्त्वविदों को स्थलों/साइट्स की खुदाई करने से रोक दिया गया है, वहीं यूनाइटेड किंगडम के पुरातत्त्वविदों के एक दल द्वारा अपने शोध कार्य को घर से ही ‘लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग’ (Light Detection and Ranging- LiDAR) तकनीकी के माध्यम से जारी रखा गया।

प्रमुख बिंदु:

  • पुरातत्त्वविदों के दल द्वारा हवाई सर्वेक्षण से प्राप्त डेटा के माध्यम से  LiDAR तकनीकी का प्रयोग करते हुए हज़ारों डेटा छवियों का विश्लेषण किया।
  • दल द्वारा हवाई सर्वेक्षण के माध्यम से इन चित्रों को दो स्रोतों से प्राप्त किया गया है, पहला टेलस साउथ वेस्ट प्रोजेक्ट (Tellus South West Project) नामक एक अनुसंधान परियोजना से तथा दूसरा यू.के. पर्यावरण एजेंसी द्वारा।
  • डेटा छवियों का विश्लेषण करने के दौरान दल को निम्नलिखित साइटों के बारे में जानकारी मिली-
    • दो रोमन सड़कों के हिस्से प्राप्त हुए।
    • 30 प्रागैतिहासिक काल के बड़े रोमन तटबंधों के बाड़ों का पता लगाया गया।
    • 20 प्रागैतिहासिक काल के मृतक टीले, मध्ययुगीन काल के सैकड़ों खेत तथा कुछ खदानों की पुष्टि की गई।

वर्तमान स्थल:

  • पुरातत्त्वविदों के इस दल द्वारा वर्तमान में तामार घाटी (Tamar Valley) का अध्ययन किया जा रहा  है, जो एक समृद्ध पुरातात्त्विक स्थल है।
  • तामार घाटी में लौह युग और रोमन युग से संबंधित कई स्थल विद्यमान हैं।

Tamar-Valley

LiDAR तकनीकी/पद्धति: 

  • यह तकनीकी लेज़र प्रकाश के साथ लक्ष्य को रोशन करने तथा एक सेंसर के साथ प्रतिबिंब को मापने के लिये दूरी को मापने की तकनीकी है। 
  • LiDAR तकनीकी/पद्धति का प्रयोग सामान्यत: भू-वैज्ञानिकों तथा सर्वेक्षणकर्त्ताओं द्वारा उच्च-रिज़ॉल्यूशन क्षमता के नक्शे तैयार करने के अलावा किसी साइट का सर्वेक्षण करने के लिये किया जाता है
  • प्राप्त प्रतिबिंब को एक सेंसर से मापा जाता है।

तामार घाटी:

  • तामार घाटी ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में स्थित है।
  • यह घाटी ताम्र नदी के दोनों ओर लाउंसेस्टन से बास स्ट्रेट तक 60 किमी उत्तर में स्थित,  तस्मानिया के सबसे सुंदर क्षेत्रों में से एक है।

भारत में LiDAR:

  • भारत में LiDAR तकनीकी का प्रयोग कृषि और भू विज्ञान से संबंधित अनुप्रयोगों के लिये ही किया गया है  
  • भारत में पुरातात्विक कार्यों के लिये इस तकनीकी का प्रयोग अभी संभव नहीं हो पाया है जिसका मुख्य कारण इस तकनीकी में प्रयुक्त डाटा के विश्लेषण एवं प्रयोग के लिये विशेषज्ञों की आवश्यकता का होना है। 
  • इसके अलावा डाटाओं को प्राप्त कर उनका विश्लेषण एक महँगी प्रक्रिया भी है। 

LiDAR तकनीकी का महत्त्व:

  • LiDAR तकनीकी का प्रयोग घरेलू वास्तुकला और क्षेत्र में खंदक और किलेबंदी जैसी रक्षात्मक वास्तुकला को समझने में मददगार हो सकता है।
  • यह तकनीकी जल विज्ञान और जल प्रबंधन प्रणालियों को ओर अधिक विस्तार से समझाने में मददगार साबित हो सकती है। 
  • इस तकनीकी के माध्यम से समय की बचत होगी।  

स्रोत: द हिंदू


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 07 जून, 2020

रिचर्ड डॉकिंस अवार्ड

भारत के प्रसिद्ध गीतकार और प्रख्यात लेखक जावेद अख्तर को हाल ही में रिचर्ड डॉकिंस अवार्ड (Richard Dawkins Award) से सम्मानित करने की घोषणा की गई है। उल्लेखनीय है कि जावेद अख्तर यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय हैं। यह पुरस्कार विज्ञान, शोध, शिक्षा या मनोरंजन के क्षेत्र से एक प्रतिष्ठित व्यक्ति को दिया जाता है, जिसने सार्वजनिक रूप से तर्कसंगत होकर धर्मनिरपेक्षता के प्रति कार्य किया है। यह पुरस्कार प्रसिद्ध अंग्रेज़ी विकासवादी जीवविज्ञानी रिचर्ड डॉकिंस (Richard Dawkins) के नाम पर दिया जाता है। रिचर्ड डॉकिंस ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर थे और सृष्टिवाद (Creationism) के मुखर आलोचक थे। जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में हुआ था। उर्दू लेखक जाँनिसार अख्तर और लेखिका साफिया अख्तर के पुत्र जावेद अख्तर 70 और 80 के दशक के दौरान सबसे प्रसिद्ध पटकथा लेखकों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी सिनेमा की कुछ बेहतरीन फिल्मों जैसे- ‘शोले’ और ‘मिस्टर इंडिया’ आदि में बतौर लेखक कार्य किया। कुछ ही समय में जावेद अख्तर ने पटकथा लेखन छोड़ दिया और गीतकार तथा सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्त्ता बन गए। जावेद अख्तर को वर्ष 1999 में पद्म श्री से और उसके पश्चात् वर्ष 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। जावेद अख्तर को अपने काव्य संग्रह ’लावा’ के लिये उर्दू में साहित्य अकादमी पुरस्कार और फिल्म उद्योग में योगदान के लिये कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Awards) भी प्राप्त हुए हैं। 

पोषण स्तर में सुधार हेतु कार्यदल 

भारत सरकार ने पोषण स्तर बेहतर करने से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ कुछ अन्‍य संबंधित विषयों पर गौर करने के लिये एक कार्यदल का गठन किया है। जया जेटली को इस कार्यदल का अध्यक्ष नामित किया गया है, साथ ही इस कार्यदल में राज्य के विभिन्न विभागों के सचिवों को भी पदेन सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। यह कार्यदल विवाह एवं मातृत्व की आयु के साथ निम्नलिखित के सह-संबंध पर गौर करना (1) माँ का स्वास्थ्य, चिकित्सीय सेहत एवं पोषण की स्थिति (2) प्रमुख मापदंड जैसे कि शिशु मृत्यु दर (Infant Martality Rate), मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Rate) और कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) आदि (3) इस संदर्भ में स्वास्थ्य एवं पोषण से संबंधित कोई अन्य प्रासंगिक बिंदु। इसके अतिरिक्त यह लड़कियों के बीच उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के उपाय सुझाने का कार्य भी करेगा। इस संबंध में जारी आधिकारिक सूचना के अनुसार, कार्यदल को नीति आयोग द्वारा सचिवालयी या दफ्तरी सहायता प्रदान की जाएगी और कार्यदल 31 जुलाई, 2020 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। 

‘स्पंदन’ अभियान

छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में पुलिस कर्मियों के मानसिक तनाव और डिप्रेशन को कम करने के लिये ‘स्पंदन’ नाम से एक अभियान की शुरुआत की है। इस संबंध में राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को मनोचिकित्सकों या मनोवैज्ञानिकों द्वारा अवसादग्रस्त अधिकारियों और कर्मचारियों के लिये परामर्श और चिकित्सा उपचार के बारे में दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिये गए हैं। इस कार्यक्रम के दौरान परामर्श सत्र, संगीत और योग थेरेपी की व्यवस्था की जाएगी। योग कक्षाओं के संचालन के लिये स्थानीय योग शिक्षकों का सहयोग मांगा गया है। उल्लेखनीय है कि बीते दो वर्षों में छत्तीसगढ़ में 50 से अधिक पुलिस कर्मियों ने आत्महत्या की है, जो कि राज्य के पुलिस कर्मियों में मानसिक तनाव की गंभीर स्थिति को दर्शाता है। कुछ ही समय पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पुलिस कर्मियों के मध्य बढ़ती अवसाद और मानसिक तनाव की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए पुलिस विभाग को इस संबंध में जल्द-से-जल्द कार्य योजना तैयार करने के निर्देश दिये थे, ताकि पुलिस कर्मियों में हो रहे मानसिक तनाव को कम किया जा सके और इसके कारण होने वाली आत्महत्या और हिंसक घटनाओं को रोका जा सके। 

विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस

प्रत्येक वर्ष 07 जून को विश्व भर में विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस (World Food Safety Day) मनाया जाता है। इस दिवस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित खाद्य मानकों को बनाए रखने के बारे में जागरूकता पैदा करना और खाद्य जनित बीमारियों के कारण होने वाली मौतों को कम करना है। उल्लेखनीय है कि 7 जून, 2019 को पहली बार विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस (World Food Safety Day) मनाया गया था, जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दिसंबर 2018 में खाद्य और कृषि संगठन (Food and Agriculture Organization-FAO) के सहयोग से अपनाया गया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दूषित खाद्य या बैक्टीरिया युक्त खाद्य से प्रत्येक वर्ष 10 में से एक व्यक्ति बीमार होता है, विश्व भर की जनसंख्या के अनुसार देखा जाए तो यह संख्या 60 करोड़ से भी अधिक है। संयुक्त राष्ट्र ने अपनी दो एजेंसियों - खाद्य और कृषि संगठन (Food and Agriculture Organization- FAO) तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization- WHO) को दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिये नामित किया है।


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