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जैवविविधता और पर्यावरण

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक- 2020

  • 08 Jun 2020
  • 7 min read

प्रीलिम्स के लिये:

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक- 2020

मेन्स के लिये:

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक- 2020 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘येल विश्वविद्यालय’ (Yale University) द्वारा द्विवार्षिक रूप से जारी किये जाने वाले 'पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक' (Environment Performance Index- EPI) में भारत 180 देशों में 168वें स्थान पर रहा है।

प्रमुख बिंदु:

  • ‘पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक’ येल विश्वविद्यालय के 'सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉ एंड पॉलिसी' तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय के 'सेंटर फॉर इंटरनेशनल अर्थ साइंस इंफॉर्मेशन नेटवर्क' की संयुक्त पहल है। EPI को ‘विश्व आर्थिक मंच’ (World Economic Forum- WEF) के सहयोग से तैयार किया जाता है। 
  • 'पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक' विश्व के विभिन्न देशों की सतत् स्थिति का आकलन विभिन्न प्रदर्शन आँकड़ों के आधार पर करता है।

EPI की श्रेणियाँ तथा प्रतिशत हिस्सा:

  • EPI को 11 विभिन्न मुद्दों से संबंधित श्रेणियों तथा 32 प्रदर्शन संकेतकों के आधार पर तैयार किया जाता है। 

EPI श्रेणी 

प्रतिशत हिस्सेदारी 

जैव विविधता और आवास 

15%

पारिस्थितिकी सेवाएँ 

6%

वायु गुणवत्ता 

20%

स्वच्छता और पेयजल 

16%

मत्स्यन 

6%

जल संसाधन 

3%

जलवायु परिवर्तन 

24%

प्रदूषक उत्सर्जन 

3%

कृषि 

3%

अपशिष्ट प्रबंधन 

2%

भारी धातु 

2%

Environment-Health

भारत का प्रदर्शन:

  • EPI- 2018 में भारत का स्थान 177वाँ तथा स्कोर 30.57 के स्कोर (100 में से) रहा था। जबकि EPI- 2020 में भारत का स्थान 168 वाँ तथा स्कोर 27.6 रहा है। 
  • भारत केवल 11 देशों; बुरुंडी, हैती, चाड, सोलोमन द्वीप, मेडागास्कर, गिनी, कोटे डी आइवर, सिएरा लियोन, अफगानिस्तान, म्यांमार और लाइबेरिया, से बेहतर स्थिति में है।
  • अफगानिस्तान को छोड़कर सभी दक्षिण एशियाई देश EPI रैंकिंग में भारत से आगे हैं।

प्रमुख देशों की EPI रैंक:

देश 

रैंक 

डेनमार्क 

1

लक्ज़मबर्ग 

2

अमेरिका 

24

चीन 

120

लाइबेरिया 

180

दक्षिण एशियाई देशों की EPI रैंक:

देश 

रैंक 

भूटान

107

श्रीलंका

109

मालदीव

127

पाकिस्तान

142

नेपाल

145

बांग्लादेश

162

भारत

168

अफगानिस्तान

178

भारत का विभिन्न संकेतकों के अनुसार प्रदर्शन:

  • भारत का पर्यावरणीय स्वास्थ्य संबंधी सभी प्रमुख मापदंडों; जिसमें वायु गुणवत्ता, स्वच्छता एवं पेयजल, भारी धातु, अपशिष्ट प्रबंधन आदि शामिल हैं, में प्रदर्शन अन्य देशों की तुलना में खराब रहा है।
  • जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं से संबंधित मापदंडों पर भी भारत का स्कोर दक्षिण एशिया के औसत स्कोर से कम रहा है।
  • दक्षिण एशियाई देशों में ’जलवायु परिवर्तन’ संकेतकों में भारत का स्थान पाकिस्तान के बाद दूसरे स्थान (106 वाँ स्थान) पर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, विगत 10 वर्षों में ब्लैक कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन और ग्रीन हाउस उत्सर्जन में वृद्धि हुई है।
  • EPI में 'जलवायु परिवर्तन' संबंधी श्रेणी का मूल्यांकन निम्नलिखित संकेतकों के आधार पर किया गया है।  
    • समायोजित उत्सर्जन वृद्धि दर; 
    • चार प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों तथा एक प्रदूषक से मिलकर बनी श्रेणी में वृद्धि; 
    • भूमि आच्छादन में कमी से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वृद्धि दर;
    • ग्रीनहाउस गैस की तीव्रता वृद्धि दर; 
    • प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन।

सुशासन का महत्त्व:

  • सुशासन किसी भी देश की पर्यावरणीय स्थिति को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • इसके लिये नीति निर्माण प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी, पारदर्शी विनियमन, लक्ष्यों तथा कार्यक्रमों पर खुली बहस, स्वतंत्र मीडिया, गैर-लाभकारी संगठनों की उपस्थिति, कानून के शासन आदि की भूमिका को बढ़ावा देना चाहिये। 

 रिपोर्ट का महत्त्व:

  • EPI संकेतक, समस्या को निर्धारित करने, लक्ष्य निर्धारित करने, रुझानों को ट्रैक करने, परिणामों को समझने तथा सर्वोत्तम नीतियों के निर्माण में मदद करता है।
  • EPI, संयुक्त राष्ट्र ‘सतत विकास लक्ष्यों’ (Sustainable Development Goals- SDGs) को पूरा करने की दिशा में आवश्यक नीति निर्माण में सहायक होता है।
  • EPI रैंकिंग यह समझने में मदद करता है कि कौन-से देश पर्यावरणीय चुनौतियों का प्रबंधन बेहतर तरीके से कर रहे हैं। अन्य देश EPI में बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों की नीतियों के अनुसार अपनी घरेलू नीतियों में आवश्यक परिवर्तन ला सकते हैं।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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