अंतर्राष्ट्रीय संबंध
ईरान पर अमेरिका-इज़रायल का हमला
प्रिलिम्स के लिये: प्रतिरोध की धुरी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य, संयुक्त व्यापक कार्ययोजना, हिज़बुल्लाह, गाज़ा में हमास, हूती
मेन्स के लिये: भारत की मध्य पूर्व नीति और रणनीतिक स्वायत्तता, अमेरिका, इज़रायल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों का संतुलन, पश्चिम एशिया में संघर्ष समाधान
चर्चा में क्यों?
अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर समन्वित हमले किये, जिसमें कथित तौर पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई (एक शिया धर्मगुरु) की मृत्यु हो गई और रणनीतिक संरचनाओं को निशाना बनाते हुए शासन परिवर्तन का आह्वान किया गया।
- इस संयुक्त हमले से क्षेत्रीय तनाव में भारी वृद्धि हुई, जिसे अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और इज़रायल ने ऑपरेशन लायंस रोर नाम दिया।
- ईरान द्वारा 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4' के तहत जवाबी कार्रवाई में इज़रायल और खाड़ी के पड़ोसी देशों पर मिसाइल हमले किये गए। यह तनाव अमेरिका-ईरान परमाणु वार्त्ता में हालिया प्रगति के बावजूद हुआ है, जिससे व्यापक पश्चिम एशियाई संघर्ष और गंभीर वैश्विक परिणामों की आशंका बढ़ गई है।
सारांश
- अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किये गए हमलों और तेहरान की जवाबी कार्रवाई ने पश्चिम एशियाई तनाव को काफी बढ़ा दिया है, जिससे चल रही परमाणु वार्त्ता के बावजूद वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्गों और भू-राजनीतिक स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो गया है।
- भारत के लिये यह संघर्ष ऊर्जा आपूर्ति, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और रणनीतिक परियोजनाओं के लिये गंभीर जोखिम उत्पन्न करता है, जिसके लिये राष्ट्रीय हितों की रक्षा हेतु सावधानीपूर्वक राजनयिक संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता की आवश्यकता है।
अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर हमला क्यों किया?
- अमेरिका और इज़राइल का ईरान पर हमला: 2025 के हमलों के सीमित प्रभाव से असंतुष्ट और ईरान की निरंतर परमाणु महत्त्वाकांक्षाओं का हवाला देते हुए अमेरिका ने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइलों और कामिकेज़ ड्रोन के विशाल शस्त्रागार को खाड़ी में अमेरिकी सेनाओं और क्षेत्रीय सहयोगियों के लिये एक असहनीय खतरा माना।
- अतीत के अभियानों का मुख्य उद्देश्य केवल 'निवारण' तक सीमित था, किंतु फरवरी 2026 के हमलों का लक्ष्य पूरी तरह बदल चुका था—अब प्राथमिकता केवल रोकना नहीं, बल्कि पूर्णतः विनाश (Complete Annihilation) करना था।
- खबरों के मुताबिक, इन हमलों में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई और वाशिंगटन का मानना है कि उन्हें हटाने से अत्यधिक केंद्रीकृत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) में दरार पड़ सकती है।
- अमेरिकी सैन्य कार्रवाई परमाणु संबंधी चिंताओं, सत्ता परिवर्तन की महत्त्वाकांक्षाओं, घरेलू राजनीतिक दबाव, निवारक गणनाओं और रणनीतिक प्रतिबद्धताओं में वृद्धि के जटिल कारकों से प्रेरित थी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- वर्ष 1979 में अलग हुए: वर्ष 1979 से पहले ईरान और इज़रायल रणनीतिक सहयोगी थे। ईरानी क्रांति के बाद, नए इस्लामी शासन ने इज़रायल से संबंध तोड़ लिये और एक कट्टर पश्चिम-विरोधी विचारधारा अपना ली।
- नए शासन ने अमेरिका को "बड़ा शैतान" और इज़रायल को "छोटा शैतान" करार दिया, दोनों को क्षेत्रीय शोषण का स्रोत बताया और अपने वैश्विक दृष्टिकोण के मूल स्तंभ के रूप में उपनिवेशवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी बयानबाज़ी का इस्तेमाल किया।
- ईरान का परमाणु भंडाफोड़: वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में जब विश्व को ईरान के गुप्त परमाणु कार्यक्रम का पता चला तो तनाव तेज़ी से बढ़ गया।
- क्षेत्रीय विस्तार: अमेरिका के नेतृत्व में इराक के सद्दाम हुसैन (तेहरान के एक प्रमुख क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी) को सत्ता से हटाए जाने के बाद, एक शक्ति शून्यता उत्पन्न हो गई।
- ईरान ने इसका लाभ उठाते हुए “विरोध की धुरी” का निर्माण किया — जो मध्य-पूर्व में सहयोगी प्रॉक्सी समूहों का एक नेटवर्क है (जिसमें लेबनान में हिज़्बुल्लाह, गाज़ा में हमास और यमन में हूती शामिल हैं) ताकि अमेरिका और इज़रायल के प्रभुत्व का मुकाबला किया जा सके।
- JCPOA समझौता: ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी और उसे नागरिक उपयोग तक सीमित करने के उद्देश्य से, वर्ष 2015 में P5+1 राष्ट्रों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, चीन, रूस और जर्मनी), यूरोपीय संघ और ईरान के बीच संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (JCPOA) नामक ऐतिहासिक समझौता संपन्न हुआ।
- इसने यूरेनियम संवर्द्धन पर सख्त सीमाओं के बदले प्रतिबंधों में राहत की पेशकश की।
- अमेरिकी वापसी (2018):वर्ष 2018 में अमेरिका ने संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (JCPOA) से एकतरफा रूप से हटने का निर्णय लिया। इस कदम के पीछे मुख्य तर्क यह था कि समझौते में गंभीर खामियाँ थीं, क्योंकि इसने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय नेटवर्क, जिसे 'विरोध की धुरी' (Axis of Resistance) कहा जाता है, के वित्तपोषण पर कोई अंकुश नहीं लगाया था। इसकी प्रतिक्रिया में ईरान ने आक्रामक रूप से अपने यूरेनियम संवर्द्धन को बढ़ा दिया, जिससे वह हथियार-ग्रेड क्षमता के करीब पहुँच गया।
- "विरोध की धुरी (Axis of Resistance)" का पतन (2023–24): अक्तूबर 2023 में हमास के हमले के बाद इज़रायल के विभिन्न अभियानों ने हमास को कमज़ोर कर दिया, हिज़्बुल्लाह के नेतृत्व का सफाया कर दिया और सीरिया के बशर अल-असद के पतन में योगदान दिया, जिससे ईरान के प्रमुख क्षेत्रीय कवच समाप्त हो गए।
- ऑपरेशन मिडनाइट हैमर (जून 2025): इज़रायल ने नतांज और इस्फहान में ईरान के परमाणु स्थलों पर पूर्व-निर्धारित हमले किये। बाद में अमेरिका भी इसमें शामिल हो गया, उसने सुरक्षित फोर्डो सुविधा पर हमला करने के लिये B-2 बमवर्षकों और बंकर-बस्टर बमों का इस्तेमाल किया।
- अमेरिका ने दावा किया कि हमलों ने ईरान की परमाणु सुविधाओं और बुनियादी ढाँचे को गंभीर नुकसान पहुँचाया है, जिसका उद्देश्य प्रमुख संवर्द्धन स्थलों और महत्त्वपूर्ण क्षमताओं को बाधित करके उसके परमाणु कार्यक्रम में विलंब करना था।
अमेरिका और इज़रायल-ईरान युद्ध के निहितार्थ क्या हैं?
वैश्विक
- वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिये खतरा: इस बढ़ते संघर्ष का सीधा प्रभाव होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर पड़ता है, जो एक महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।
- यह जलडमरूमध्य प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल कच्चे तेल (वैश्विक खपत का लगभग 20%) और वैश्विक तरल प्राकृतिक गैस (LNG) के खेप का 20-30% हिस्सा सँभालता है।
- किसी भी जलडमरूमध्य (जैसे– स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़) की यदि ईरान द्वारा नाकाबंदी कर दिया जाए या उसमें बारूदी सुरंगें बिछा दी जाएँ, तो यह वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को पंगु बना सकता है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
- भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण: यह संघर्ष अन्य वैश्विक शक्तियों को भी शामिल कर सकता है। रूस और चीन ईरान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत कर सकते हैं, जबकि अमेरिका अपने पश्चिमी और अरब सहयोगियों को संगठित करेगा, जिससे वैश्विक व्यवस्था और अधिक ध्रुवीकृत हो जाएगी।
- वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान: पश्चिम एशियाई आकाश और समुद्र के सैन्यीकरण से एशिया और यूरोप को जोड़ने वाले महत्त्वपूर्ण व्यापार मार्ग प्रभावित हो रहे हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि हो रही है।
- वस्तु और बाज़ार अस्थिरता: प्रमुख व्यापारी ऊर्जा की आपूर्ति रोकने के कारण इस संघर्ष ने वैश्विक बाज़ारों में “युद्ध प्रीमियम” को बढ़ा दिया है।
- सोने की कीमतों में उछाल आया है क्योंकि निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर रुख कर रहे हैं, जबकि दुबई और अबू धाबी के शेयर बाज़ारों में ट्रेडिंग रोक दी गई है।
भारत
- ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था: भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है और अपनी ज़रूरतों का 85–88% से अधिक आयात करता है।
- इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत से लगभग 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से गुज़रता है।
- LPG का 80–85% और LNG का लगभग 60% आयात भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से होता है।
- भारत की तत्काल तेल आवश्यकताएँ फिलहाल पूरी हैं (संभावित रूप से रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और रूस से विविध आयात के कारण), लेकिन कच्चे तेल के विपरीत, LPG और LNG के लिये भारत के पास बड़े रणनीतिक भंडार नहीं हैं।
- LPG और LNG की तत्काल उपलब्धता सीमित है, जिससे आपूर्ति में व्यवधान को सँभालना कठिन हो जाता है।
- होर्मुज़ में लंबे समय तक व्यवधान होने पर तेल की कीमत 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है, जिससे भारत के आयात खर्च में तेज़ी से वृद्धि होगी।
- संक्षिप्त अवधि की ज़रूरतें भंडार और विविध आपूर्तिकर्त्ताओं के कारण सँभाली जा सकती हैं, लेकिन लंबे संघर्ष से चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, महंगाई बढ़ सकती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
- भारतीय प्रवासी की सुरक्षा: पश्चिम एशिया में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो देश में मुद्रा प्रेषण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।
- प्रवासी की सुरक्षा प्राथमिक चिंता है। स्थिति और बिगड़ने पर सरकार को बड़े पैमाने पर निकासी अभियान (जैसे– ऑपरेशन राहत या ऑपरेशन अजय) शुरू करना पड़ सकता है।
- कूटनीतिक संतुलन: भारत अमेरिका और इज़राइल के साथ गहरी रणनीतिक साझेदारी रखता है, जबकि ईरान के साथ भी उसके ऐतिहासिक, ऊर्जा और कनेक्टिविटी संबंध महत्त्वपूर्ण हैं।
- पक्षपाती रुख अपनाना भारत के हितों के विरुद्ध है। चुनौती यह है कि किसी भी रणनीतिक सहयोगी को असंतुष्ट किये बिना शांति का समर्थन करना और नागरिक हताहतों की निंदा करना।
- कनेक्टिविटी मार्गों में व्यवधान: खाड़ी क्षेत्र में सैन्यीकरण से भारत की रणनीतिक कनेक्टिविटी पहलों को गंभीर नुकसान पहुँच रहा है। चाबहार पोर्ट (ईरान) का संचालन जोखिम में है और अरब प्रायद्वीप के बंदरगाह संरचना के विनाश के कारण भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) की अस्तित्ववाद व्यवहार्यता भी चुनौतीपूर्ण हो गई है।
US और इज़रायल-ईरान संघर्ष के असर को कम करने हेतु भारत क्या कदम उठा सकता है?
- रणनीतिक भंडारों की सक्रियता: सरकार को घरेलू बाज़ार को तत्काल मूल्य झटकों से बचाने के लिये सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का उपयोग करने की तैयारी करनी चाहिये, साथ ही अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे गैर-खाड़ी देशों से LPG/LNG के वैकल्पिक स्रोतों की सक्रिय खोज करनी चाहिये।
- निकासी आपात योजना की तैयारी: भारतीय प्रवासियों की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करने के लिये नागर विमानन मंत्रालय और भारतीय नौसेना के साथ मिलकर निकासी के मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) को तैयार किया जाए।
- भारतीय वायुसेना और एयर इंडिया को बड़े पैमाने पर हवाई निकासी के लिये तैयार रखा जाए, जैसे कि ऑपरेशन गंगा (यूक्रेन) के दौरान किया गया था।
- भारतीय नौसेना की उपस्थिति को अरेबियन सागर और ओमान की खाड़ी में बढ़ाया जाए और ऑपरेशन संकल्प जैसे अभियानों का विस्तार किया जाए ताकि संघर्ष क्षेत्रों के पास भारतीय व्यापारी जहाज़ों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- कूटनीति में रणनीतिक स्वायत्तता: भारत को कूटनीतिक संतुलन बनाते हुए चलना चाहिये। वह वाशिंगटन या तेल अवीव को नाराज़ किये बिना ईरान और ओमान (मस्कट) के साथ गुप्त चैनलों के माध्यम से संवाद बनाए रखे, ताकि भारतीय जहाज़ों के लिये विशेष छूट सुनिश्चित की जा सके तथा वाणिज्यिक शिपिंग मार्गों का सैन्यीकरण रोका जा सके।
- अनुदान और कर हस्तक्षेप: वैश्विक "युद्ध प्रीमियम" का सीधे आम नागरिक पर असर न पड़े, इसके लिये केंद्र तथा राज्य सरकारों को पेट्रोल एवं डीज़ल पर उत्पाद शुल्क व मूल्य संवर्द्धित कर (VAT) में कटौती करके इसके प्रभाव को सहन करना पड़ सकता है।
- संयुक्त राष्ट्र में तनाव-नियंत्रण का समर्थन: भारत को लगातार यह रुख व्यक्त करना चाहिये कि “यह युद्ध का युग नहीं है।”
- नागरिक हताहतों की निंदा करते हुए भारत को ऐसा शून्य-योग (Zero-Sum) या पक्षपातपूर्ण रुख अपनाने से बचना चाहिये जो अमेरिका-इज़रायल गुट या ईरान में से किसी को भी पृथक् कर दे; इसके बजाय उसे पूरी तरह संवाद की पुनर्स्थापना और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की बहाली पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
निष्कर्ष
वर्ष 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के संदर्भ में उसकी संवेदनशीलता को उजागर किया है। अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए तथा शांति के लिये स्थिरता प्रदान करने वाली, निष्पक्ष आवाज़ के रूप में कार्य करते हुए ‘विश्व बंधु’ (वैश्विक मित्र) की भूमिका को मूर्त रूप प्रदान करते हुए भारत अपने हितों की रक्षा कर सकता है, साथ ही यह संदेश भी सुदृढ़ कर सकता है कि यह युद्ध का युग नहीं है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “पश्चिम एशियाई संकट केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक स्वायत्तता के लिये प्रत्यक्ष जोखिम है।” भारत पर अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष के बहुआयामी प्रभाव का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और ऑपरेशन लायन रोअर क्या हैं?
ये वर्ष 2026 में ईरान के नेतृत्व और रणनीतिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने वाले अमेरिका और इज़रायल के सैन्य अभियान हैं, जिसके परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया में तनाव काफी बढ़ गया है।
2. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इसके माध्यम से वैश्विक तेल का लगभग 20% तथा LNG की लगभग 20-30% आपूर्ति होती है; किसी भी प्रकार का व्यवधान वैश्विक कीमतों में तीव्र आघात उत्पन्न कर सकता है।
3. JCPOA क्या है और अमेरिका इससे क्यों बाहर हो गया?
वर्ष 2015 का यह परमाणु समझौता ईरान के यूरेनियम संवर्द्धन को सीमित करने के बदले प्रतिबंधों में राहत देता था; अमेरिका ने वर्ष 2018 में मिसाइल कार्यक्रमों और प्रॉक्सी समर्थन का हवाला देते हुए इससे अलग होने का निर्णय लिया।
4. यह संघर्ष भारत की ऊर्जा सुरक्षा को कैसे प्रभावित करता है?
भारत अपने कच्चे तेल का 85% से अधिक आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज़ मार्ग से आता है; इसलिये आपूर्ति में बाधा और कीमतों में वृद्धि का जोखिम बढ़ जाता है।
5. इस संघर्ष में भारत के लिये रणनीतिक स्वायत्तता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह भारत को प्रतिस्पर्द्धी शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखते हुए ऊर्जा, प्रवासी समुदाय और व्यापारिक हितों की सुरक्षा करने की क्षमता प्रदान करती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. दक्षिण-पश्चिमी एशिया का निम्नलिखित में से कौन-सा एक देश भूमध्यसागर तक फैला नहीं है? (2015)
(a) सीरिया
(b) जॉर्डन
(c) लेबनान
(d) इज़रायल
उत्तर: (b)
प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में उल्लिखित पद ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ किसकी गतिविधियों के संदर्भ में आता है ? (2018)
(a) चीन
(b) इज़रायल
(c) इराक
(d) यमन
उत्तर: (b)
प्रश्न. भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह विकसित करने का क्या महत्त्व है?(2017)
(a) अफ्रीकी देशों से भारत के व्यापार में अपार वृद्धि होगी।
(b) तेल-उत्पादक अरब देशों से भारत के संबंध सुदृढ़ होंगे।
(c) अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुँच के लिये भारत को पाकिस्तान पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।
(d) पाकिस्तान, इराक और भारत के बीच गैस पाइपलाइन का संस्थापन सुकर बनाएगा और उसकी सुरक्षा करेगा।
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. "भारत के इज़राइल के साथ संबंधों ने हाल में एक ऐसी गहराई एवं विविधता प्राप्त कर ली है, जिसकी पुनर्वापसी नहीं की जा सकती है।" विवेचना कीजिये। (2018)

भारतीय राजव्यवस्था
बुलडोज़र जस्टिस
प्रिलिम्स के लिये: प्रथम सूचना रिपोर्ट, विधि का शासन, नागरिक और राजनीतिक अधिकार पर अंतर्राष्ट्रीय नियम, अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 300A
मेंस के लिये: भारतीय लोकतंत्र में विधि का शासन, शक्तियों का पृथक्करण और कार्यकारी प्राधिकार की सीमाएँ, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आवास और आजीविका का अधिकार
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में "बुलडोज़र जस्टिस” की बढ़ती प्रथा पर संवैधानिक चिंताएँ व्यक्त की हैं, जहाँ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होने के तुरंत बाद आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों को ध्वस्त कर दिया जाता है।
सारांश
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय ने दंडात्मक ध्वस्तीकरण को उचित प्रक्रिया, शक्तियों के पृथक्करण और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में चिह्नित किया है। उन्होंने इस बात पर बल दिया है कि सज़ा केवल न्यायिक निर्णय के बाद ही दी जा सकती है।
- ध्वस्तीकरण शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने और विधि के शासन को बनाए रखने के लिये नोटिस, सुनवाई और जवाबदेही के सख्त अनुपालन के साथ-साथ संस्थागत सुधारों और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन अनिवार्य है।
“बुलडोज़र जस्टिस” के संदर्भ में क्या चिंताएँ हैं?
- विधि के शासन का उल्लंघन: भारतीय न्यायशास्त्र का आधार यह है कि राज्य को स्थापित विधिक प्रक्रियाओं के अनुसार कार्य करना चाहिये, न कि प्रभुत्व के आधार पर।
- दंडात्मक ध्वस्तीकरण मौलिक रूप से विधिक प्रवर्तन के संवैधानिक क्रम (आरोप, जाँच, न्यायिक निर्णय और सज़ा) को विफल कर देते हैं।
- आपराधिक आरोप के तुरंत बाद संपत्ति को नष्ट करके, राज्य प्रभावी रूप से मुकदमे की आवश्यकता को समाप्त कर देता है, जिससे आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई के उनके मौलिक अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।
- कार्यपालिका न्यायाधीश, निर्णायक मंडल (जूरी) और दंड देने वाले—तीनों की भूमिका एक साथ नहीं निभा सकती, क्योंकि इससे संवैधानिक शक्तियों के संतुलन को गंभीर रूप से क्षति पहुँचती है और विधि के शासन का उल्लंघन होता है।
- यह शक्तियों का अनुचित प्रयोग अर्थात किसी वर्जित या दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य के लिये विधिक अधिकार का उपयोग करना जो उचित प्रक्रिया को अनदेखा करता है, शक्तियों के पृथक्करण को कमज़ोर करता है और 'दोष सिद्ध होने तक निर्दोष' माने जाने की धारणा को कमज़ोर करता है।
- संवैधानिक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन:
- आवास का अधिकार (अनुच्छेद 21): जीवन के अधिकार में गरिमापूर्ण आश्रय (आवास) का अधिकार शामिल है।
- आकस्मिक और दंडात्मक बेदखली किसी परिवार की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा और आजीविका को स्थायी रूप से क्षति पहुँचाती है।
- संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 300A): संविधान यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति की संपत्ति केवल कानून के प्राधिकरण द्वारा ही छीनी जा सकती है और किसी भी राज्य द्वारा ज़ब्ती या नष्ट करने से पहले उचित और न्यायसंगत प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य है।
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14): भेदभावपूर्ण लक्ष्यीकरण की चिंताएँ यहाँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
- जब प्राधिकरण विशेष समुदायों या राजनीतिक विरोधियों की संपत्तियों को लक्षित करके ध्वस्त करते हैं, जबकि आसपास समान नगर निगम नियमों के उल्लंघनों की अनदेखी करते हैं, तो यह कानून के तहत समान सुरक्षा के अधिकार का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।
- आवास का अधिकार (अनुच्छेद 21): जीवन के अधिकार में गरिमापूर्ण आश्रय (आवास) का अधिकार शामिल है।
- सामूहिक दंड का मुद्दा: साझा घरों को तोड़ना किसी व्यक्ति के कथित अपराध के लिये उसके परिवार के निर्दोष सदस्यों को दंडित करने के बराबर है, जो व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
- इस प्रकार का सामूहिक दंड भारतीय आपराधिक कानून के अनुरूप नहीं है और यह जिनेवा कन्वेंशन 1949 का उल्लंघन करता है, जो सामूहिक दंड पर रोक लगाता है।
- नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध (ICCPR) के अनुसार, हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से या दूसरों के साथ मिलकर संपत्ति का अधिकार है और किसी को मनमाने ढंग से अपनी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
बुलडोज़र जस्टिस क्या है?
- परिचय: ‘बुलडोज़र जस्टिस’ उस अधिनियमित प्रथा को कहा जाता है जिसमें राज्य या नगर निगम के प्राधिकारी किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप लगने पर उसके घर, दुकान या संपत्ति को भारी मशीनरी से ध्वस्त कर देते हैं, बिना स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किये।
- सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश: नवंबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए समग्र भारत में दिशा-निर्देश जारी किये, जिनमें दंडात्मक ध्वंस को असंवैधानिक घोषित किया गया और किसी भी संपत्ति के ध्वंस से पहले कठोर उचित प्रक्रिया सुरक्षा उपायों को अपनाने का निर्देश दिया गया।
- अनिवार्य सूचना: अधिकारियों को संपत्ति के मालिक को कम-से-कम पंद्रह दिन पहले पंजीकृत डाक के माध्यम से लिखित सूचना देना अनिवार्य है।
- सुनवाई का अधिकार: प्रभावित पक्ष को ध्वस्तीकरण के फैसले पर अपनी आपत्ति दर्ज कराने के लिये व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिये और अधिकारियों को एक तर्कपूर्ण लिखित आदेश जारी करना चाहिये जिसमें स्पष्ट रूप से बताया गया हो कि ध्वस्तीकरण ही एकमात्र उचित विकल्प क्यों है।
- जवाबदेही और पारदर्शिता: सभी ध्वस्तीकरण कार्यवाहियों का वीडियो रिकॉर्डिंग किया जाना अनिवार्य है।
- अपवाद: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इसके निर्देश उन मामलों पर लागू नहीं होंगे जहाँ किसी सार्वजनिक स्थल, जैसे– सड़क, गली या फुटपाथ पर, रेलवे लाइनों या किसी नदी/जलाशय के किनारे कोई अनधिकृत निर्माण हो और उन मामलों में भी नहीं जहाँ ध्वस्तीकरण का आदेश किसी न्यायालय द्वारा पहले ही दिया गया हो।
- कोई भी सार्वजनिक अधिकारी जो इन दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता पाया जाएगा, उस पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा चलाया जाएगा और उसे नष्ट हुई संपत्ति की भरपाई अपने वेतन से व्यक्तिगत रूप से करनी होगी।
संपत्ति ध्वस्तीकरण से संबंधित न्यायिक निर्णय
- मेनका गांधी मामला, 1978: सर्वोच्च न्यायालय ने "कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया" की सीमा को बढ़ाया और फैसला दिया कि यह न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होना चाहिये, जिससे ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ का सिद्धांत स्थापित हुआ।
- इसलिये केवल संदेह या बिना ठोस आधार वाले आरोपों पर आधारित ध्वस्तीकरण न्याय, निष्पक्षता और गैर-अनियमितता के सिद्धांतों के विपरीत हैं।
- ओल्गा टेलिस मामला, 1985: सर्वोच्च न्यायालय ने पुष्टि की कि अनुच्छेद 21, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, इसमें आजीविका और आवास का अधिकार भी शामिल है।
- इसका मतलब है कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के घरों का ध्वस्तीकरण संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
- केटी प्लांटेशन (प्रा.) लिमिटेड मामला, 2011: सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि अनुच्छेद 300-A के तहत संपत्ति हरण के लिये बनाए गए कानून को न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होना चाहिये।
बुलडोजर जस्टिस की प्रथा को कैसे रोका जा सकता है?
- संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देशों को अपनाना: भारत को विकास-आधारित बेदखली और विस्थापन (2007) पर संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी सिद्धांतों और दिशा-निर्देशों को कानूनी तौर पर अपनाना चाहिये।
- ये दिशा-निर्देश दंडात्मक उपाय के रूप में जबरन बेदखली पर सख्त प्रतिबंध लगाते हैं तथा किसी भी राज्य-प्रेरित ध्वस्तीकरण से पहले समुचित एवं व्यापक पुनर्वास सुनिश्चित करना अनिवार्य करते हैं।
- आनुपातिकता सिद्धांत का संहिताकरण: राज्य विधानसभाओं को नगरपालिकीय कानूनों में संशोधन कर आनुपातिकता के परीक्षण को स्पष्ट रूप से शामिल करना चाहिये।
- किसी निर्माण के ध्वस्तीकरण को कानूनी रूप से अंतिम उपाय के रूप में ही स्वीकार किया जाना चाहिये और यह तभी अनुमेय हो जब अवैध संरचना तत्काल सार्वजनिक जोखिम उत्पन्न करती हो तथा उसे नियमितीकरण या आर्थिक दंड के माध्यम से वैध नहीं बनाया जा सकता हो।
- स्वतंत्र संपत्ति अधिकरणों की स्थापना: स्थानीय निकायों की पूर्ण निर्णायक शक्ति को सीमित करने के लिये स्वतंत्र नगरपालिकीय अधिकरणों की स्थापना की जानी चाहिये।
- सभी अंतिम ध्वस्तीकरण आदेशों को लागू करने से पूर्व इन अर्द्ध-न्यायिक निकायों द्वारा परीक्षण (वेटिंग) किया जाना चाहिये, जिससे नगरपालिका प्राधिकरण के दावों की निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ समीक्षा सुनिश्चित हो सके।
- स्वत: संज्ञान से न्यायिक हस्तक्षेप: उच्च न्यायालयों और ज़िला न्यायालयों को अपने रिट क्षेत्राधिकार का सक्रिय रूप से प्रयोग करते हुए ऐसे मामलों में अग्रिम स्थगनादेश जारी करना चाहिये, जब सांप्रदायिक झड़पों या विरोध प्रदर्शनों के बाद लक्षित ध्वस्तीकरण की प्रवृत्ति उभरती दिखाई दे।
- भ्रष्ट चुनावी आचरण के रूप में वर्गीकरण: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन कर निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा न्यायेतर ध्वस्तीकरण का सार्वजनिक समर्थन या आदेश देने को ‘भ्रष्ट चुनावी आचरण’ के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
बुलडोज़र जस्टिस पर अंकुश लगाने के लिये अंततः कानून प्रवर्तन और प्रशासनिक तंत्र के भीतर एक संस्थागत एवं वैचारिक परिवर्तन आवश्यक है। नागरिकों को राज्य की मनमानी शक्ति से कानूनी सुरक्षा प्रदान कर तथा दोषी अधिकारियों पर सख्त आर्थिक और पेशेवर दंड लागू कर राज्य यह सुनिश्चित कर सकता है कि आपराधिक न्याय का क्षेत्राधिकार केवल न्यायालयों के पास ही रहे, जिससे राष्ट्र की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संरचना सुरक्षित बनी रहे।
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दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न: प्रश्न. “बुलडोज़र जस्टिस विधि के शासन और विधिसम्मत प्रक्रिया को कमज़ोर करता है।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. बुलडोज़र जस्टिस क्या है?
यह उन व्यक्तियों से जुड़ी संपत्तियों के न्यायेतर ध्वस्तीकरण को संदर्भित करता है जिन पर आरोप लगाए गए हों, जिसमें विधिसम्मत प्रक्रिया और न्यायिक निर्णय को दरकिनार कर दिया जाता है।
2. दंडात्मक ध्वस्तीकरण से कौन-से संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं?
जब बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के ध्वस्तीकरण किया जाता है, तब अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन एवं आश्रय का अधिकार) तथा अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) प्रभावित होते हैं।
3. वर्ष 2024 में ध्वस्तीकरण के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या निर्णय दिया?
अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए न्यायालय ने दंडात्मक ध्वस्तीकरण को असंवैधानिक घोषित किया और नोटिस, सुनवाई, पारदर्शिता तथा जवाबदेही को अनिवार्य किया।
4. सामूहिक दंड के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय मानदंड क्या कहते हैं?
जिनेवा सम्मेलनों में सामूहिक दंड को निषिद्ध करते हैं, जबकि नागरिक-राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं की प्रकृति (ICCPR) निवास और संपत्ति में मनमाने हस्तक्षेप के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत में संपत्ति के अधिकार की क्या स्थिति है? (2021)
(a) यह विधिक अधिकार है, जो केवल नागरिकों को प्राप्त है
(b) यह विधिक अधिकार है, जो किसी भी व्यक्ति को प्राप्त है
(c) यह मूल अधिकार है, जो केवल नागरिकों को प्राप्त है
(d) यह न तो मूल अधिकार है, न ही विधिक अधिकार
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. भूमि अर्जन, पुनरुद्धार और पुनर्वासन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 पहली जनवरी 2014 से प्रभावी हो गया है। इस अधिनियम के लागू होने से कौन-से महत्त्वपूर्ण मुद्दों का समाधान निकलेगा? भारत में उद्योगीकरण और कृषि पर इसके क्या परिणाम होंगे? (2014)

