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डेली न्यूज़

  • 01 May, 2020
  • 45 min read
शासन व्यवस्था

मई दिवस: इतिहास और महत्त्व

प्रीलिम्स के लिये

मई दिवस, हे मार्केट

मेन्स के लिये

मई दिवस का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और उसका महत्त्व

चर्चा में क्यों?

प्रत्येक वर्ष दुनिया भर के कई हिस्सों में 1 मई को मई दिवस (May Day) अथवा ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ (International Workers’ Day) के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस जनसाधारण को नए समाज के निर्माण में श्रमिकों के योगदान और ऐतिहासिक श्रम आंदोलन का स्मरण कराता है। 

  • मई दिवस का इतिहास
  • सर्वप्रथम वर्ष 1889 में समाजवादी समूहों और ट्रेड यूनियनों के एक अंतर्राष्ट्रीय महासंघ ने शिकागो में हुई हे मार्केट (Haymarket, 1886) घटना को याद करते हुए श्रमिकों के समर्थन में 1 मई को ‘मई दिवस’ के रूप में नामित किया था। 
  • अमेरिका ने वर्ष 1894 में श्रमिक दिवस को एक अवकाश के रूप में मान्यता दी, जहाँ यह प्रत्येक वर्ष सितंबर के पहले सोमवार को मनाया जाता है। जल्द ही, कनाडा ने भी इस प्रथा को अपना लिया।
  • वर्ष 1889 में समाजवादी और श्रमिक दलों द्वारा बनाई गई संस्था सेकंड इंटरनेशनल (Second International) ने घोषणा की कि अब से 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
  • वर्ष 1904 में, एम्स्टर्डम (Amsterdam) में इंटरनेशनल सोशलिस्ट काॅॅन्ग्रेस (International Socialist Congress) ने सभी सोशल डेमोक्रेटिक संगठनों और सभी देशों की ट्रेड यूनियनों को एक दिन में कार्य के 8 घंटे की प्रथा की कानूनी स्थापना के लिये एक मई को उत्साहपूर्वक प्रदर्शन करने का आह्वान किया।
  • अंततः वर्ष 1916 में अमेरिका ने वर्षों के विरोध और संघर्ष के पश्चात् आठ घंटे के कार्य समय को आधिकारिक पहचान देना शुरू किया। 

हे मार्केट घटना

  • 1 मई, 1886 को शिकागो में हड़ताल का रूप सबसे आक्रामक था। शिकागो उस समय जुझारू वामपंथी मज़दूर आंदोलनों का केंद्र बन गया था। 
  • 1 मई को शिकागो में मज़दूरों का एक विशाल सैलाब उमड़ा और संगठित मज़दूर आंदोलन के आह्वान पर शहर के सारे औज़ार बंद कर दिये गए और मशीनें रुक गईं। 
  • मज़दूर आंदोलन को कभी भी वर्ग-एकता के इतने शानदार और प्रभावी प्रदर्शन का एहसास नहीं हुआ था। इस आंदोलन ने अमेरिकी मज़दूर वर्ग की लड़ाई के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
  • हालाँकि इस दौरान शिकागो प्रशासन एवं मालिक चुप नहीं बैठे और मज़दूरों को गिरफ्तारी शुरू हो गई। जिसके पश्चात् पुलिस और मज़दूरों के बीच हिंसक झड़प शुरू हो गई, जिसमें 4 नागरिकों और 7 पुलिस अधिकारियों की मौत हो गई।
  • कई आंदोलनकारी, जो श्रमिकों के अधिकारों के उल्लंघन का विरोध कर रहे थे और काम के घंटे कम करने और अधिक मज़दूरी की मांग कर रहे थे उन्हें गिरफ्तार कर रहे थे और आजीवन कारावास अथवा मौत की सजा दी गई।

मई दिवस- एक अवकाश से कहीं अधिक

  • श्रम न केवल उत्पादन में, बल्कि अन्य सभी आर्थिक गतिविधियों में भी एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है। डेविड रिकार्डो और कार्ल मार्क्स जैसे क्लासिक अर्थशास्त्रियों ने उत्पादन के मुख्य स्रोत के रूप में श्रम को प्रमुख स्थान दिया। 
  • इस प्रकार श्रमिक किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। श्रमिकों की इसी भूमिका को एक पहचान देने और श्रमिक आंदोलनों के गौरवशाली इतिहास को याद करने के उद्देश्य से ‘मई दिवस’ अथवा ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ मनाया जाता है।
  • विश्व के अधिकांश देशों में मई दिवस को एक ‘अवकाश’ घोषित किया गया है, विडंबना यह है कि नई पीढ़ी ‘मई दिवस’ को केवल एक अवकाश के रूप में ही जानती है, लोगों के ज़हन में ‘मई दिवस’ और श्रमिकों की भूमिका धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है।

मई दिवस और काम के आठ घंटे 

  • मई दिवस का जन्म काम के घंटे कम करने के आंदोलन से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। काम के घंटे कम करने और मज़दूरों को उनके बुनियादी अधिकार दिलाने से संबंधित इस दिवस का मज़दूरों के लिये एक विशेष राजनीतिक महत्त्व है। 
  • जब अमेरिका में फैक्ट्री-व्यवस्था शुरू हुई, लगभग तभी यह संघर्ष भी सामने आया। हालाँकि अमेरिका में अधिक मज़दूरी की मांग, शुरुआती हड़ताल और संघर्ष में सर्वाधिक प्रचलित थी, किंतु जब मज़दूरों ने अपनी मांगों को सूचीबद्ध किया तो काम के घंटे कम करने का प्रश्न और संगठित होने के अधिकार का प्रश्न केंद्र में रहा।
  • जैसे-जैसे शोषण बढ़ता गया, मज़दूरों को अमानवीय रूप से लंबे काम के दिन और भी बोझिल महसूस होने लगे, इसके साथ ही काम के घंटों को कम करने की मांग भी और अधिक मज़बूत होती गई।
  • 19वीं सदी की शुरुआत में ही अमेरिका में मज़दूरों ने ‘सूर्योदय से सूर्यास्त’ (Sunrise to Sunset) तक के काम के समय के विरोध में अपनी शिकायतें स्पष्ट कर दी थीं। 
    • ध्यातव्य है कि वर्ष 1806 में अमेरिका की सरकार ने कुछ हड़तालियों के नेताओं पर मुकदमे चलाए। इस मामले में यह बात सामने आई कि मज़दूरों से तकरीबन 19 से 20 घंटे तक कार्य कराया जाता था।
  • 19वीं सदी का दूसरा और तीसरा दशक काम के घंटे कम करने के लिये हड़तालों से भरा हुआ है। इसी दौर में कई औद्योगिक केंद्रों ने तो एक दिन में काम के घंटे 10 करने की मांग भी निश्चित कर दी थी।
  • उल्लेखनीय है कि वह संघर्ष, जिससे ‘मई दिवस’ का जन्म हुआ, अमेरिका में वर्ष 1884 में ‘काम के घंटे आठ करो’ आंदोलन से ही शुरू हुआ था।

भारत में मज़दूर दिवस

  • भारत में मज़दूर दिवस पहली बार चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में 1 मई, 1923 को आयोजित गया था। यह पहल सर्वप्रथम लेबर किसान पार्टी के प्रमुख सिंगारवेलर द्वारा की गई थी।
  • लेबर किसान पार्टी के प्रमुख सिंगारवेलर ने इस अवसर को मनाने के लिये दो बैठकों का आयोजन किया। इनमें से एक ट्रिप्लिकेन बीच पर आयोजित की गई और दूसरी मद्रास उच्च न्यायालय के सामने समुद्र तट पर आयोजित की गई। 
  • इन बैठकों में सिंगारवेलर ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया था कि ब्रिटिश सरकार को भारत में मई दिवस या मज़दूर दिवस पर राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा करनी चाहिये।
  • मज़दूर दिवस या मई दिवस को भारत में 'कामगार दिन’ के रूप में भी जाना जाता है, मराठी में इसे ‘कामगार दिवस' और तमिल में 'उझिपालार नाल' (Uzhaipalar Naal) कहा जाता है। 
  • भारत में वर्ष 1986 का बाल श्रम अधिनियम, जिसके तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नियोजित करना प्रबंधित कर दिया, बेहतर श्रम मानकों को प्राप्त करने और बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को समाप्त करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। 

निष्कर्ष

मज़दूर दिवस एक विशेष अवसर है जब दुनिया भर में लोग मज़दूर वर्ग की सच्ची भावना और मज़दूर आंदोलन का जश्न मनाते हैं। यह वह दिन है दुनिया भर के कार्यकर्त्ता एकजुट होते हैं और अपनी एकता का प्रदर्शन करते हैं जो यह दर्शाता है कि वे समाज के मज़दूर वर्ग के लिये सकारात्मक सुधार लाने हेतु किस प्रकार प्रभावी ढंग से संघर्ष कर सकते हैं। मौजूदा समय में संपूर्ण विश्व महामारी का सामना कर रहा है, बीते दिनों देश में ऐसी कई घटनाएँ सामने आईं हैं, जिनमें देश के सामान्य वर्ग विशेष रूप से मज़दूर वर्ग के अधिकारों का हनन देखा गया। गौरतलब है कि हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सरकार से महामारी के दौरान देश के संवेदनशील वर्ग के अधिकारों की रक्षा करने का अनुरोध किया था। आवश्यक है कि सरकार मज़दूर वर्ग के मुद्दों को सुने और नीति निर्माण में मज़दूर वर्ग के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया जाए।

स्रोत: इंडियन एक्स्प्रेस


शासन व्यवस्था

‘मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी स्टेट’ संबंधी मुद्दा

प्रीलिम्स के लिये:

मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी स्टेट, टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम, कावासाकी रोग, पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर सोसाइटी

मेन्स के लिये:

मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी स्टेट से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ब्रिटेन की ‘पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर सोसाइटी’ (Paediatric Intensive Care Society-PICS) ने ‘मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी स्टेट’ (Multi-system Inflammatory State) से पीड़ित बच्चों की संख्या में वृद्धि दर्ज़ की है।

प्रमुख बिंदु:

  • कुछ डॉक्टरों का मत है कि ‘मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी स्टेट’ COVID-19 से संबंधित हो सकता है। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि ‘इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम’ COVID-19 से ही संबंधित है।
  • कुछ डॉक्टरों का मत है कि यह बीमारी किसी संक्रमण के पश्चात् प्रतिरक्षा प्रणाली के अति उत्तेजित होने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली स्थिति है।
  • उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन के बच्चों में तेज़ बुखार और धमनियों में सूजन के मामले सामने आए हैं। 
  • ‘मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी स्टेट’ (Multi-system Inflammatory State):
    • यह एक दुर्लभ बीमारी है जिसमें रक्त वाहिकाओं में सूजन और निम्न रक्तचाप की समस्या पाई जाती है। 
    • यह बीमारी पूरे शरीर को प्रभावित करने के साथ ही फेफड़ों और अन्य अंगों में तरल पदार्थ का निर्माण करती है।
    • लक्षण:
      • पेट और जठरांत्र से संबंधित समस्याएँ 
      • हृदय संबंधी समस्याएँ 
      • टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम (Toxic Shock Syndrome) एवं कावासाकी (Kawasaki) रोग से संबंधित समस्याएँ 
  • टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम (Toxic Shock Syndrome):
    • बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश करने के पश्चात् हानिकारक विषाक्त पदार्थ स्रावित करते हैं जिससे शरीर की सामान्य प्रक्रिया बाधित होती है। इस परिस्थिति को टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम कहते हैं। समय रहते उपचार न किये जाने की स्थिति में मृत्यु भी हो सकती है।
    • लक्षण:
      • सिरदर्द, खांसी, गले में खराश, दस्त, साँस लेने में कठिनाई, चक्कर आना।

  • कावासाकी (Kawasaki) रोग:
    • कावासाकी बच्चों की रक्त वाहिकाओं में सूजन के कारण होने वाला एक गंभीर रोग है। इस रोग से पाँच साल से कम उम्र वाले बच्चे अत्यधिक प्रभावित होते हैं।
    • कावासाकी रोग हृदय को अत्यधिक प्रभावित करता है। हालाँकि इसके कारण होने वाली सूजन शरीर के कई अन्य हिस्सों को भी प्रभावित करती है।
    • कावासाकी रोग से दिल का दौरा भी पड़ सकता है।
    • लक्षण:
      • तेज़ बुखार, गर्दन के लिम्फ नोड्स में सूजन, सूखे व फटे होंठ, जीभ का लाल होना।

‘पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर सोसाइटी’ (Paediatric Intensive Care Society- PICS):

  • पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर सोसाइटी की स्थापना वर्ष 1987 में हुई थी।
  • पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर सोसाइटी का उद्देश्य:
    • अनुसंधान को प्रोत्साहित करने और संश्रयकारी अध्ययन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रशिक्षण तथा शिक्षा को बढ़ावा देना।
    • विभिन्न चर्चाओं हेतु एक मंच प्रदान करना।
    • परिषद के माध्यम से जानकारी एकत्र करना।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

'ईयर ऑफ अवेयरनेस ऑन साइंस एंड हेल्‍थ’ कार्यक्रम

प्रीलिम्स के लिये

'ईयर ऑफ अवेयरनेस ऑन साइंस एंड हेल्‍थ’ कार्यक्रम

मेन्स के लिये

महामारी से निपटने में विज्ञान की भूमिका

चर्चा में क्यों?

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science & Technology-DST) के तहत नेशनल काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी कम्युनिकेशन (National Council for Science & Technology Communication-NCSTC) ने COVID-19 पर केंद्रित एक स्वास्थ्य एवं जोखिम संचार कार्यक्रम 'ईयर ऑफ अवेयरनेस ऑन साइंस एंड हेल्‍थ’ (Year of Awareness on Science & Health-YASH) की शुरुआत की है।

प्रमुख बिंदु

  • इस कार्यक्रम के तहत COVID-19 महामारी की चुनौती से निपटने के लिये आपातकालीन तैयारियों और आवश्‍यक कार्यों को संपन्‍न करने हेतु स्‍वयंसेवी संगठनों, शैक्षणिक संस्‍थानों, अनुसंधान और मीडिया संस्थानों को शामिल करने की रणनीतियाँ तैयार की गई हैं।
  • कार्यक्रम के तहत जोखिमों को संप्रेषित करने और जोखिम प्रबंधन के बारे में बताने के लिये प्रामाणिक वैज्ञानिक एवं स्वास्थ्य सूचनाओं के अनुवाद और उपयोग की भी योजना बनाई गई है।
  • ध्यातव्य है कि वर्तमान वैश्विक महामारी के परिदृश्‍य में चारों ओर चिंताएँ और चुनौतियाँ पैदा हो गई हैं, जिसके कारण वैज्ञानिक नवाचारों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण हो गई है।

उद्देश्य

  • इस कार्यक्रम का उद्देश्‍य लोगों की धारणाओं का आकलन करना, सार्वजनिक सहभागिता को प्रोत्साहित करना और जोखिम से संबंधित पारस्परिक संचार प्रक्रियाओं में भागीदारी को बढ़ावा देना है। 
  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य जन संचार गतिविधियों की मदद से सभी स्तरों पर जोखिम को कम करना भी है। 
    • साथ ही कार्यक्रम के तहत सामुदायिक देखभाल के लिये लोगों के मध्य विज्ञान की सामान्य समझ को बढ़ाने और व्यक्तिगत स्वच्छता, सोशल डिस्टेंसिंग, वांछित सामूहिक व्यवहार को बनाए रखने आदि स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों पर ज़ोर दिया जाएगा।
  • इस कार्यक्रम में जोखिम के भय को कम करना, स्वस्थ जीवन शैली को अपनाना और जनता तथा समाज के बीच वैज्ञानिक संस्कृति के पोषण हेतु आवश्यक समझ के साथ-साथ विश्वास निर्माण के लिये सूचना प्रसार तंत्र विकसित करना भी शामिल है।
  • यह कार्यक्रम परंपरा एवं स्वदेशी ज्ञान के साथ कार्य करने वाले लक्षित समूहों के बीच जोखिम की समझ को बेहतर करेगा। 
  • यह जोखिम और इससे संबंधित चुनौतियों, समाधानों और इस परिस्थिति से जूझने वाले लोगों में साहस तथा आत्मविश्वास पैदा करने के साथ ही लक्षित समूहों के व्यवहार में परिवर्तन लाएगा। 
  • साथ ही यह सामुदायिक नेताओं, डॉक्टरों, धार्मिक नेताओं के साथ कार्य संबंध को बेहतर करेगा। इसके अलावा यह गलत धारणाओं, गलत विश्वासों को स्पष्ट करने और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा विधिवत प्रमाणित ज्ञान के आधार पर प्रथाओं को पेश करने की क्षमता में सुधार लाएगा और आम लोगों के मध्य समाधान एवं सेवा प्रदाताओं की वैज्ञानिक दक्षता में भरोसा पैदा करेगा।

लाभ

  • यह कार्यक्रम स्‍वास्‍थ्‍य के संबंध में ज़मीनी स्तर पर बेहतरी और प्रतिक्रिया को बढ़ावा देने के लिये एक व्यापक एवं प्रभावी विज्ञान एवं स्वास्थ्य संचार प्रयास है। 
  • साथ ही यह बड़े पैमाने पर लोगों के जीवन को बचाने और उसे बेहतर बनाने में मदद करेगा। यह लोगों में आत्मविश्वास पैदा करेगा, वैज्ञानिक स्वभाव को बढ़ाएगी और उनके बीच स्वास्थ्य के प्रति सजगता को भी बढ़ावा देगा।
  • इस कार्यक्रम से क्षमता निर्माण करने, सभी हितधारकों को शामिल करने और समुदायों में जागरूकता की भावना विकसित करने में मदद मिलेगी। साथ ही इससे लोगों को विश्लेषण के योग्य बनाया जा सकेगा, लोगों के व्यवहार में बदलाव आएगा और वे स्‍वास्‍थ्‍य सेवा एवं उससे संबंधित जोखिम के बारे में सूचनाओं के आधार पर निर्णय लेने में समर्थ होंगे।

स्रोत: पी.आई.बी.


भारतीय अर्थव्यवस्था

वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र पर COVID- 19 महामारी का प्रभाव

प्रीलिम्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी

मेन्स के लिये:

COVID- 19 और ऊर्जा क्षेत्र 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में 'अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी' (International Energy Agency- IEA) ने वैश्विक ऊर्जा मांग और CO2 उत्सर्जन पर ‘वन्स-इन-ए-सेंचुरी क्राइसिस’ (Once-in-a-Century Crisis) नामक रिपोर्ट जारी की है। 

मुख्य बिंदु:

  • रिपोर्ट के अनुसार, लॉकडाउन के कारण प्रति सप्ताह ऊर्जा की मांग में औसतन 25% तक गिरावट देखी जा रही है।
  • भारत में लॉकडाउन के परिणामस्वरूप ऊर्जा मांग में 30% से अधिक की कमी देखी गई।
  • वर्ष 2020 में COVID- 19 महामारी के कारण वैश्विक ऊर्जा की मांग में वर्ष 2008 के वित्तीय संकट की तुलना में सात गुना अधिक तक कमी देखी जा सकती है।

वैश्विक ईंधन मांग पर प्रभाव:

  • तेल की मांग:
    • वर्ष 2020 में तेल की कीमतों में औसतन 9% या इससे अधिक की गिरावट हुई है तथा तेल की खपत वर्ष 2012 के स्तर पर पहुँच सकती है।
  • कोयले की मांग:
    • कोयले की मांग में 8% तक की कमी हो सकती है, क्योंकि बिजली की मांग में लगभग 5% कमी देखी जा सकती है।
  • गैस की मांग:
    • बिजली और औद्योगिक कार्यों में गैस की मांग कम होने से वर्ष 2020 की पहली तिमाही की तुलना में आने वाली तिमाही में और अधिक गिरावट देखी जा सकती है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा मांग:
    • परिचालन लागत कम होने तथा बिजली की आसान पहुँच को लॉकडाउन के दौरान तरजीह देने के कारण नवीकरणीय ऊर्जा मांग बढ़ने की उम्मीद है।

COVID-19 का CO2 उत्सर्जन पर प्रभाव:

  • द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से पहली बार वर्ष 2020 में CO2 उत्सर्जन में सर्वाधिक गिरावट देखी गई है। क्योंकि वर्ष 2020 की पहली तिमाही में कार्बन-गहन ईंधन की मांग में बहुत अधिक गिरावट देखी गई है। 
  • वैश्विक CO2 उत्सर्जन में, वैश्विक ऊर्जा मांग की तुलना में अधिक गिरावट हुई। वर्ष 2020 की पहली तिमाही में कार्बन उत्सर्जन वर्ष 2019 की तुलना में पाँच प्रतिशत कम रहा।

भारत की ऊर्जा मांग:

  • भारत की ऊर्जा मांग में 30% से अधिक की कमी देखी है। तथा लॉकडाउन को आगे बढ़ाने पर, प्रति सप्ताह के साथ ऊर्जा मांग में 0.6% की गिरावट हो सकती है।

ऊर्जा मांग में कमी के निहितार्थ:

  • ऊर्जा उद्योग:
    • ऊर्जा उद्योग की मूल्य श्रृंखलाएँ (Value Chains) वित्तीय रूप से प्रभावित हो सकती हैं। अधिकांश ऊर्जा कंपनियों के राजस्व में कमी देखी जा सकती है क्योंकि एक तरफ तो ऊर्जा उत्पादों यथा- तेल, गैस, कोयला और बिजली आदि की मांग में कमी हुई है दूसरी तरफ इन उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई है।
  • ऊर्जा सुरक्षा:
    • तेल की आपूर्ति और मांग में व्यापक बदलाव के कारण उत्पन्न होने वाले आर्थिक और वित्तीय व्यवधान के कारण उद्योगों की उत्पादन क्षमता मे बहुत कमी आ सकती है तथा इससे देशों की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होगी।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी

(International Energy Agency- IEA):

  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) एक स्वायत्त संगठन है जिसके वर्तमान में 30 सदस्य देश तथा 8 सहयोगी देश है। इसकी स्थापना (वर्ष 1974 में) वर्ष 1973 के तेल संकट के बाद हुई थी

मिशन:

  • सभी के लिये भविष्य में सुरक्षित और स्थायी ऊर्जा की उपलब्धता हो। 

सदस्यता:

  • IEA की सदस्यता के लिये उम्मीदवार देश को OECD का सदस्य होना आवश्यक है। इसके अलावा देश को अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करना करना आवश्यक है।
  • भारत को वर्तमान में सहयोगी सदस्य के रूप में मान्यता दी गई है।
  • वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक’ (World Energy Outlook- WEO) रिपोर्ट ‘अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ द्वारा जारी की जाती है। 

स्रोत: इंडियन एक्स्प्रेस


भारतीय अर्थव्यवस्था

आयुष उद्यमिता विकास कार्यक्रम

प्रीलिम्स के लिये:

आयुष उद्यमिता विकास कार्यक्रम, आयुष मंत्रालय

मेन्स के लिये:

‘आयुर्वेदिक उपचार और योग’ एवं ‘आयुष उद्यमिता’ को बढ़ावा देने हेतु सरकार द्वारा किये गए प्रयास

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘आयुष मंत्रालय’ (Ministry of Ayush) तथा ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय’ (Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises) द्वारा आयुष क्षेत्र को बढ़ावा देने हेतु ‘आयुष उद्यमिता विकास कार्यक्रम’ (Ayush Entrepreneurship Development Programme) की शुरुआत की गई है।

प्रमुख बिंदु:

  • ध्यातव्य है कि भारत की आयुष प्रथाएँ भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने में मददगार साबित हो सकती हैं क्योंकि उपचार के ये वैकल्पिक तरीके भारत में सदियों से प्रचलित हैं।
  • गौरतलब है कि ‘आयुष उद्यमिता विकास कार्यक्रम’ के माध्यम से इस क्षेत्र में अनुसंधान तथा नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
  • इस कार्यक्रम के तहत भारतीय आयुर्वेद, होम्योपैथी, योग एवं सिद्ध पद्धतियों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जाएगा, साथ ही उद्यमियों को विदेशों में क्लीनिक/आउटलेट खोलने हेतु प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि आयुष क्षेत्र में निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके।
  • वैश्विक स्तर पर आयुर्वेदिक उपचार और योग की बढ़ती मांग को देखते हुए इस कार्यक्रम के तहत विशेष रूप से आयुर्वेदिक उपचार तथा योग ख्याति प्राप्त विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में लोगों को प्रशिक्षित किया जाएगा।
  • प्रशिक्षित योग विशेषज्ञों/प्रशिक्षकों की मदद से संस्थानों में आयुर्वेदिक उपचार और योग संबंधित पाठ्यक्रम की शुरुआत की जाएगी।
  • आयुष क्षेत्र को बढ़ावा देने हेतु आयुष मंत्रालय एवं सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय द्वारा एक कार्य योजना बनाई गई है। हाल ही में दोनो मंत्रालयों ने एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किये हैं।
  • आयुष के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं:
    • अहमदाबाद, हुबली, त्रिशूर, सोलन, इंदौर, जयपुर, कानपुर, कन्नूर, करनाल, कोलकाता एवं नागपुर।
  • आयुष क्षेत्र के प्रोत्साहन हेतु अधिकारियों द्वारा आयुष क्लस्टरों की पहचान एवं मूल्यांकन कर उन्हें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की निम्नलिखित योजनाओं से जोड़ा जाएगा:
    • खरीद और विपणन सहायता योजना 
    • उद्यमिता और कौशल विकास कार्यक्रम
    • पारंपरिक उद्योगों के उन्‍नयन एवं पुनर्निर्माण के लिये कोष की योजना/स्‍फूर्ति योजना
    • क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी योजना, प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम
    • हब एंड स्पोक मॉडल

कार्यक्रम के लाभ:

  • भारतीय अर्थव्यवस्था मज़बूत होने के साथ ही साथ आयुष क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा।
  • आयुष क्षेत्र में औद्योगीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
  • रोज़गार में वृद्धि होगी।
  • वन/ग्रामीण/आदिवासी क्षेत्रों में उद्यमिता का विकास होगा।

आयुष मंत्रालय (Ministry of Ayush):

  • 9 नवंबर, 2014 को आयुष मंत्रालय की स्थापना की गई थी।
  • इससे पहले यह भारतीय चिकित्सा पद्धति और होम्योपैथी (Indian System of Medicine and Homeopathy-ISMH) विभाग के रूप में जाना जाता था, जिसे मार्च 1995 में स्थापित किया गया था।
  • वर्ष 2003 में इस विभाग का नाम बदलकर आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी विभाग (आयुष) रखा गया।
  • आयुष मंत्रालय का उद्देश्य आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध एवं होम्योपैथी में शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देना है।

स्रोत: पीआईबी


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

मणिपुर के काले चावल तथा गोरखपुर टेराकोटा को जीआई टैग

प्रीलिम्स के लिये:

चाक-हाओ , गोरखपुर टेराकोटा, मणिपुर के GI टैग 

मेन्स के लिये:

भौगोलिक संकेतक 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में मणिपुर के चाक-हाओ  (Chak-Hao) अर्थात काले चावल तथा गोरखपुर टेराकोटा को 'भौगोलिक संकेतक' (Geogrphical Indication- GI) का टैग दिया गया।

मुख्य बिंदु:

  • चाक-हाओ  को GI टैग प्रदान करने के लिये 'चाक-हाओ उत्पादक संघ' (Consortium of Producers of Chak-Hao) द्वारा आवेदन दायर किया गया था। जबकि गोरखपुर टेराकोटा के लिये आवेदन उत्तर प्रदेश के 'लक्ष्मी टेराकोटा मुर्तिकला केंद्र', द्वारा दायर किया गया था।
  • GI रजिस्ट्री के डिप्टी रजिस्ट्रार ने इन दोनों उत्पादों GI टैग देने की पुष्टि की है।

चाक-हाओ  (Chak-Hao):

Black-Rice

  • चाक-हाओ एक सुगंधित चिपचिपा चावल है जिसकी मणिपुर में सदियों से खेती की जा रही है। चावल की इस किस्म में विशेष प्रकार की सुगंध होती है। 
  • इसका उपयोग सामान्यत: सामुदायिक दावतों में किया जाता है तथा इन दावतों में चाक-हाओ  की खीर बनाई जाती है।
  • चाक-हाओ  का पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भी उपयोग किया जाता है।
  • चावल की इस किस्म में रेशेदार फाइबर की अधिकता होने के कारण इसे पकाने में चावल की सभी किस्मों से अधिक, लगभग 40-45 मिनट का समय लगता है।
  • वर्तमान में मणिपुर के कुछ हिस्सों में चाक-हाओ  की पारंपरिक तरीके से खेती की जाती है। परंपरागत रूप से या तो बीजों को भिगोकर सीधे खेतों में बुवाई की जाती है या चावल की सामान्य कृषि के समान धान के खेतों में नर्सरी में उगाए गए चावल के पौधों की रोपाई की जाती है।  

मणिपुर के अन्य GI टैग 

भौगोलिक संकेत  

प्रकार 

शफी लांफी (Shaphee Lanphee)

टेक्सटाइल  

वांग्खी फेई (Wangkhei Phee)

टेक्सटाइल

मोइरांग फेई (Moirang Phee)

टेक्सटाइल

कछई नींबू (Kachai Lemon)

कृषि 

गोरखपुर टेराकोटा (Gorakhpur Terracotta):

  • गोरखपुर का टेराकोटा कार्य सदियों पुरानी कला है जिसमें जहाँ स्थानीय कारीगरों द्वारा विभिन्न जानवरों जैसे कि घोड़े, हाथी, ऊँट, बकरी, बैल आदि की मिट्टी की आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
  • पूरा काम नग्न हाथों से किया जाता है तथा रंगने के लिये प्राकृतिक रंग का उपयोग करते हैं, जिसकी चमक लंबे समय तक रहती है। 1,000 से अधिक प्रकार के टेराकोटा के प्रकार यहाँ बनाए जाते हैं।

Gorakhpur-Terracotta

स्रोत: द हिंदू


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

स्थिरवैद्युत कीटाणुशोधन प्रौद्योगिकी

प्रीलिम्स के लिये:

स्थिरवैद्युत कीटाणुशोधन मशीन

मेन्स के लिये:

स्थिरवैद्युत कीटाणुशोधन मशीन

चर्चा में क्यों?

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद’ (Council of Scientific and Industrial Research- CSIR ) की एक इकाई ‘केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन’, (Central scientific instruments organization-CSIO) चंडीगढ़ ने कीटाणुशोधन और स्वच्छता की एक नवीन तकनीक को विकसित किया है।

मुख्य बिंदु:

  • ‘स्थिरवैद्युत कीटाणुशोधन मशीन’ (Electrostatic Disinfection Machine- EDM) को ‘स्थिरवैद्युत सिद्धांत’ (Electrostatic Principle) के आधार पर विकसित किया गया है।
  • वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को COVID- 19 महामारी तथा अन्य रोगाणुओं के प्रसार को रोकने में बहुत अधिक प्रभावी पाया है।
  • CSIR-CSIO ने व्यावसायीकरण तथा बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिये इस तकनीक को नागपुर की एक कंपनी को हस्तांतरित किया है।

 स्थिरवैद्युत कीटाणुशोधन:

  • स्थिरवैद्युत कीटाणुशोधन प्रक्रिया में आवेशित कणों का सतह पर छिड़काव किया जाता है।
  • स्थिरवैद्युत कीटाणुशोधन छिड़काव प्रक्रिया में विशेष प्रकार के विलयन का उपयोग करता है जो स्प्रेयर (Spraye) के अंदर मौजूद इलेक्ट्रोड की मदद से हवा के साथ संयुक्त होकर विशेष प्रकार के परमाणुओं (Atoms) का निर्माण करता है।
  • विलयन में धनात्मक आवेशित कण होते हैं अत: वे किसी भी सतह की ओर आकर्षित होकर चिपक जाते हैं तथा सतह को साफ करते है। 

EDM की कार्यप्रणाली:

  • यह सूक्ष्मजीवों तथा वायरस को खत्म करने के लिये कीटाणुनाशक की 10-20 माइक्रोमीटर आकार की समान और बारीक बूंदों का उत्पादन करता है। 
  • बूंदों का आकार होने के कारण इन बूंदों का सतही क्षेत्रफल बढ़ जाता है जिससे हानिकारक सूक्ष्मजीवों और कोरोना वायरस के साथ बूंदों का संपर्क क्षेत्र बढ़ जाता है तथा ये बूंदें वायरस को खत्म कर देती है।
    • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि किसी भी सतह का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ने पर अभिक्रिया की दर में वृद्धि हो जाती है। 

EDM की विशिष्टता:

  • यह मशीन पारंपरिक तरीकों की तुलना में बहुत कम कीटाणुशोधन सामग्री का उपयोग करती है। इससे प्राकृतिक संसाधनों को बचाने में मदद मिलती है तथा पर्यावरण में रासायनिक अपशिष्ट की वृद्धि भी नहीं के बराबर होती है।

स्वच्छ भारत मिशन (Swasth Bharat Mission):

  • यह तकनीक लोगों के जीवन शैली तथा आम जनता के स्वास्थ्य से जुड़ी होने के कारण भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन से प्रत्यक्षत: जुड़ी है। 

स्रोत: पीआईबी


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 01 मई, 2020

‘आयुरक्षा’ कार्यक्रम

हाल ही में आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) के तहत अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (All India Institute of Ayurveda-AIIA) एवं दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली में प्रदेश के पुलिसकर्मियों के लिये ‘आयुरक्षा’ (AYURAKSHA) नाम से एक संयुक्त कार्यक्रम लॉन्च किया है। ‘आयुरक्षा-कोरोना से जंग-दिल्ली पुलिस के संग’ नामक इस संयुक्त कार्यक्रम का लक्ष्य आयुर्वेद प्रतिरक्षण बढ़ाने वाले सरल उपायों के माध्यम से कोरोनावायरस (COVID-19) का मुकाबला करना है। ये उपाय आयुष मंत्रालय द्वारा जारी एडवाइज़री के अनुरूप हैं। इसमें च्वयनप्राश (मुख्य तत्व के रूप में आंवला), अनु तैला एवं संशामणि वटी (गुडुची से निर्मित) जैसे अनुशंसित फार्मूलेशन (Formulations) की सरल औषधियाँ शामिल हैं जो समय सिद्ध हैं और प्रतिरक्षण को बढ़ावा देने के लिये वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हैं। यह कार्यक्रम 80000 दिल्ली पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य के सुरक्षा के मद्देनज़र शुरू किया गया है। इसके अतिरिक्त दिल्ली पुलिस के प्रत्येक ज़िला मुख्यालय में एक कियोस्क की स्थापना करने की भी योजना बनाई गई है जिसमें अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के परामर्शदाताओं द्वारा आरंभ में 15 दिनों के लिये आहार एवं जीवनशैली संबंधित संपूर्ण जानकारी एवं प्रतिरक्षण को बढ़ावा देने में आयुर्वेदिक फार्मूलेशन की उपयोगिता के संबंध में जानकारी दी जाएगी। ध्यातव्य है कि पुलिसकर्मी अग्रिम पंक्ति में रहकर कोरोनावायरस महामारी का मुकाबला कर रहे हैं। ऐसे में वे इस महामारी के प्रति काफी संवेदनशील हो जाते हैं और उन्हें सुरक्षा प्रदान करना अनिवार्य हो जाता है। लॉकडाउन संबंधी नियमों को लागू करने में पुलिसकर्मी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं।

चुनी गोस्वामी

वर्ष 1962 में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जितने वाली टीम के कप्तान और भारत के महान पूर्व फुटबॉलर चुनी गोस्वामी का 82 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। चुनी गोस्वामी का जन्म 15 जनवरी, 1938 को बंगाल प्रेसीडेंसी के किशोरगंज ज़िले (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ था। चुनी गोस्वामी वर्ष 1962 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के कप्तान होने के अतिरिक्त बंगाल के लिये प्रथम श्रेणी क्रिकेट भी खेले थे। गोस्वामी ने भारत के लिये फुटबॉलर के तौर पर वर्ष 1956 से वर्ष 1964 तक 50 मैच खेले। वहीं क्रिकेटर के तौर पर वर्ष 1962 और वर्ष 1973 के बीच 46 प्रथम श्रेणी मैचों में बंगाल का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने वर्ष 1962 में एशिया के सर्वश्रेष्ठ स्ट्राइकर का पुरस्कार जीता था। इसके अतिरिक्त उन्हें वर्ष 1963 में अर्जुन पुरस्कार और वर्ष 1983 में पद्म श्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। गौरतलब है कि भारतीय डाक विभाग ने इसी वर्ष जनवरी माह में चुनी गोस्वामी के 82वें जन्मदिवस के अवसर पर भारतीय फुटबॉल में उनके योगदान के लिये विशेष डाक टिकट जारी किया था।

COVID-19 उपकर

नगालैंड ने डीज़ल, पेट्रोल और मोटर स्पिरिट के लिये COVID-19 उपकर लगाने की योजना शुरू की है। विदित हो कि राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ काफी कम हो गई हैं, जिससे राज्यों को राजस्व की कमी का सामना करना पड़ रहा है, राजस्व में आई इस कमी की पूर्ति के लिये राज्य सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर उपकर लगाने का फैसला किया है। नगालैंड सरकार द्वारा लिये गए निर्णय के अनुसार, 29 अप्रैल से डीजल के लिये 5 रुपए प्रति लीटर और पेट्रोल तथा मोटर स्प्रिट के लिये 6 रुपए का उपकर लगाया जाएगा। ध्यातव्य है कि यह फैसला नगालैंड (मोटर स्पिरिट और लुब्रीकेंट्स समेत पेट्रोलियम और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री) कराधान अधिनियम, 1967 (संशोधित) के तहत प्रदत्त शक्तियों के आधार पर लिया गया है। नगालैंड के अतिरिक्त मेघालय ने भी पेट्रोल और डीज़ल सहित मोटर स्पिरिट पर 2 प्रतिशत की दर से बिक्री कर अधिभार लगाया है।

आर.वी. स्मिथ

दिल्ली के प्रतिष्ठित इतिहासकार और इतिवृत्त लेखक रोनाल्ड विवियन स्मिथ (Ronald Vivian Smith) का 83 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। आर.वी. स्मिथ का जन्म वर्ष 1938 में आगरा में हुआ था, और वे ग्वालियर आर्मी के कर्नल सल्वाडोर स्मिथ (1783-1871) के परिवार से हैं। आर.वी. स्मिथ ने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होंने अपने प्रोफेशनल कैरियर की शुरुआत वर्ष 1956 में अखबारों में लिखने के साथ की थी। इसके पश्चात् उन्होंने दिल्ली में समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) और द स्टेटसमैन अखबार के लिये भी काम किया। वर्ष 1996 में वह समाचार संपादक के पद से सेवानिवृत्त हुए। उनकी प्रमुख किताबें हैं ‘दिल्ली : अननोन टेल्स ऑफ ए सिटी’ (Delhi: Unknown Tales of a City), ‘द दिल्ली दैट नो वन नोज़’ (The Delhi That No-One Knows) आदि हैं। इसके अलावा उन्होंने ताजमहल पर भी एक पुस्तक लिखी है।


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