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विलय के लिए रियासतों को एक कर पाने की टेढ़ी खीर कहानी

वर्ष 1946 के अक्टूबर महीने तक तय हो चुका था कि भारत को आजादी दे दी जाएगी। जब 24 मार्च 1947 को लार्ड माउंटबेटन को सत्ता हस्तांतरण के लिए नया वायसराय बनाकर भारत भेजा गया तो उन्होंने आजादी की तारीख 15 अगस्त 1947 तय की। इस मुल्क का बंटवारा भी निश्चित हो गया था। बनने वाले दो नए राष्ट्र थे भारत और पाकिस्तान। माउंटबेटन के भारत आते ही सत्ता हस्तांतरण, सीमा निर्धारण और संपत्तियों के बंटवारे के काम में अचानक तेजी आ गई। 14 मई को देश के विभाजन पर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंतिम तौर पर स्वीकृति दे दी।

17 जून 1947 को भारतीय स्वाधीनता अधिनियम-1947 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया। 18 जुलाई को इसे शाही स्वीकृति मिली जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तथा उसके एक भाग को काट कर नवगठित राज्य पाकिस्तान का उदय हुआ।

पाकिस्तान के अधीन पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत एवं सिंध का भाग आया। ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहा शेष भू-भाग भारत के साथ रहा। इस अधिनियम से ब्रिटिश भारत की रियासतें अंग्रेजी राज की परमोच्चता से तो मुक्त हो गईं, परन्तु उन्हें राष्ट्र का दर्जा नहीं मिला। उन्हें यह सुझाव दिया गया कि भारत या पाकिस्तान में जुडऩे में ही उनका हित है। इस अधिनियम के लागू होते ही रियासतों की सुरक्षा की अंग्रेजों की जिम्मेदारी भी स्वयमेव समाप्त हो गई। जिस समय ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे, उस समय यहाँ के 562 रजवाड़ों में सिर्फ तीन को छोडक़र सभी ने भारत में विलय का फ़ैसला किया. ये तीन रजवाड़े थे कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद।

भारत में रियासतों का विलय

माउंटबेटन ने देशी राज्यों को सलाह दी थी कि भौगोलिक स्थिति के अनुकूल वो भारत या पाकिस्तान उपनिवेशों के साथ मिल जाएं। साथ ही उन्हें चेतावनी दी गई कि 15 अगस्त के बाद उन्हें ब्रिटेन से कोई प्रश्रय नहीं मिलेगा। राजाओं ने ये सलाह मान ली थी। लेकिन कुछ राजा इसके खिलाफ थे। इसकी अगुवाई भोपाल के नवाब कर रहे थे। जूनागढ़ और हैदराबाद के शासकों के साथ मिलकर वह रियासतों को उकसाने की अगुवाई कर रहे थे। मोहम्मद अली जिन्ना भी इन राजाओं को भडक़ा रहे थे। उन्होंने राजाओं से वादा किया था कि वो कराची को मुक्त बंदरगाह के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं।

भोपाल से कराची तक की राज्य माला में एक ही अड़चन थी, उदयपुर। उदयपुर के महाराजा ने इस साजिश में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा-अगर हमारे पुरखे मुगलों का साथ देते तो आज हमारा राज्य जयपुर और जोधपुर से कहीं ज्यादा बड़ा होता। भारतवर्ष के प्राचीनतम राजघराने के इस कदम ने महाराणा प्रताप के वंश का मान रख लिया। उदयपुर के तत्कालीन महाराणा ने अपने पितामह का ये सपना पूरा करने में सहयोग दिया कि भारत विदेशी दासता से मुक्त हो।

हालांकि देश में ऐसी रियासतों की कोई कमी नहीं थी, जो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखना चाहती थीं। उनकी यह इच्छा उस समय और बलवती हो गयी जब अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को विलय के लिए स्वविवेक का अधिकार दे दिया। उनके सामने ये विकल्प भी था कि वह अगर चाहें तो अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बचाये भी रख सकती हैं। बहुत से राजाओं ने स्वतंत्रता मिलते ही अपने को स्वतंत्र घोषित करने के सपने पालने आरंभ कर दिये। रामपुर और पालनपुर के मुस्लिम नवाब ऐसे शासक थे जिन्होंने बिना देरी किये और बिना किसी संकोच के भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी। जबकि मंगरोल के शासक ने कुछ हिचकिचाहट के साथ अपना अस्तित्व भारतीय संघ के साथ विलीन कर दिया।

इस बीच भोपाल, जूनागढ़, इंदौर और हैदराबाद की रियासतों से मांग उठ रही थी कि 15 अगस्त को उन्हें भारत में विलय से अलग रखा जाए। उन्हें अपना फैसला खुद करने दिया जाए। भोपाल के नवाब ने अपने सलाहकार को लंदन भेजा। साथ में इस बारे में माउंटबेटन और जिन्ना को भी खत लिखा। वहीं त्रावणकोर ने भी भारत में विलय नहीं होकर स्वतंत्र अस्तित्व रखने की घोषणा की। हैदराबाद ने भारत में विलय से इंकार कर दिया। उसने फ्रांस के राजनयिक संबंधों के लिए चोरी चुपके पहल की कोशिश की। नागालैण्ड ने भी खुद को स्वतंत्र राज्य घोषित करने की इच्छा जाहिर की।

अब सारे मामले में सरदार पटेल ने सक्रियता दिखानी शुरू की। उन्होंने बड़ी सफलता प्राप्त की। पटेल ने भारतीय नरेशों से सावधानी से वार्तालाप किया। पूरा ध्यान रखा कि किसी भी राजा के सम्मान को चोट न लगे और वह भारत में विलय की बात मान ले।

15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के उपरांत भोपाल के नवाब ने अपने चैम्बर ऑफ प्रिंसेस को अधिकृत कर कार्यरत घोषित कर दिया। भोपाल के नवाब 25 जुलाई 1947 की उस बैठक में भी नही गए थे, जिसे माउंट बेटन ने दिल्ली में आहूत किया था। लेकिन इसके बाद माउंट बेटन ने भोपाल के नवाब को समझाया और स्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें भारत में विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर के लिए सहमत होना पड़ा। कुछ हिचकिचाहट के साथ उन्होंने मान लिया। वहीं त्रावणकोर में जनता भारत के साथ विलय के पक्ष में थी, इसके चलते वहां हालात इतने बेकाबू होने लगे कि वहां के राजा को भी विलय पर हस्ताक्षर करने पड़े।

अब आते हैं हैदराबाद की रियासत पर। अंग्रेज़ों के दिनों में भी हैदराबाद की अपनी सेना, रेल सेवा और डाक तार विभाग हुआ करता था. उस समय आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राजघराना था। उसका क्षेत्रफल 82697 वर्ग मील था जो कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था।

हैदराबाद की आबादी का अस्सी फ़ीसदी हिंदू लोग थे जबकि अल्पसंख्यक होते हुए भी मुसलमान प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए थे। हैदराबाद के निजाम भी पूरी तरह से भारत में विलय के खिलाफ थे। इतिहासकार केएम मुंशी की किताब ''एंड ऑफ एन एरा'' में लिखा है कि निजाम ने जिन्ना को संदेश भेजकर जानने की कोशिश की क्या भारत के खिलाफ लड़ाई में वह हैदराबाद का समर्थन करेंगे?

प्रधानमंत्री नेहरू और माउंटबेटन इस पक्ष में थे कि पूरे मसले का हल शांतिपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए। सरदार पटेल नेहरू इससे सहमत नहीं थे. उनका मानना था कि उस समय का हैदराबाद 'भारत के पेट में कैंसर के समान था', जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था। पटेल को अंदाज़ा था कि हैदराबाद पूरी तरह से पाकिस्तान के कहने में था। यहां तक कि पाकिस्तान पुर्तगाल के साथ हैदराबाद का समझौता कराने की फिऱाक़ में था जिसके तहत हैदराबाद गोवा में बंदरगाह बनवाएगा और ज़रूरत पडऩे पर उसका इस्तेमाल कर सकेगा। और तो और हैदराबाद के निजाम ने राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने की भी इच्छा जाहिर की थी, जिसे एटली सरकार ने ठुकरा दिया था। निज़ाम के सेनाध्यक्ष मेजर जनरल एल एदरूस ने अपनी किताब ''हैदराबाद ऑफ़ द सेवेन लोव्स'' में लिखा है कि निज़ाम ने उन्हें ख़ुद हथियार खऱीदने यूरोप भेजा था। वह अपने मिशन में सफल नहीं हो पाए थे।

एक समय जब निज़ाम को लगा कि भारत हैदराबाद के विलय के लिए दृढ़संकल्प है तो उन्होंने ये पेशकश भी की कि हैदराबाद को एक स्वायत्त राज्य रखते हुए विदेशी मामलों, रक्षा और संचार की जि़म्मेदारी भारत को सौंप दी जाए। पटेल हैदराबाद पर सैन्य कार्रवाई के पक्ष में थे। उसी दौरान पटेल ने जनरल केएम करियप्पा को बुलाकर पूछा कि उनसे पूछा कि अगर हैदराबाद के मसले पर पाकिस्तान की तरफ़ से कोई सैनिक प्रतिक्रिया आती है तो क्या वह बिना किसी अतिरिक्त मदद के उन हालात से निपट पाएंगे? करियप्पा ने इसका एक शब्द का जवाब दिया-..हाँ..और इसके बाद बैठक ख़त्म हो गई।

इसके बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद के खिलाफ सैनिक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया। भारत के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल रॉबर्ट बूचर इस फ़ैसले के खिलाफ थे। उनका कहना था कि पाकिस्तान की सेना इसके जवाब में अहमदाबाद या बंबई पर बम गिरा सकती है। दो बार भारतीय सेना की हैदराबाद में घुसने की तारीख तय की गई लेकिन लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इसे रद्द करना पड़ा। निज़ाम ने गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी से व्यक्तिगत अनुरोध किया कि वे ऐसा न करें। इसी बीच पटेल ने गुप्त तरीके से योजना को अंजाम देते हुए भारतीय सेना को हैदराबाद भेज दिया। जब नेहरू और राजगोपालाचारी को भारतीय सेना के हैदराबाद में प्रवेश कर जाने की सूचना दी गई तो वो चिंतित हो गए। पटेल ने घोषणा की कि भारतीय सेना हैदराबाद में घुस चुकी है और इसे रोकने के लिए अब कुछ नहीं किया जा सकता। दरअसल नेहरू की चिंता ये थी कि कहीं पाकिस्तान कोई जवाबी कार्रवाई न कर बैठे। भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे यादा 17 पोलो के मैदान थे.

पाकिस्तान भी चुपचाप नहीं बैठा था। जैसे ही भारतीय सेना हैदराबाद में घुसी, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ाँ ने अपनी डिफ़ेंस काउंसिल की बैठक बुलाई और उनसे पूछा कि क्या हैदराबाद में पाकिस्तान कोई ऐक्शन ले सकता है?

बैठक में मौजूद ग्रुप कैप्टेन एलवर्दी (जो बाद में एयर चीफ़ मार्शल और ब्रिटेन के पहले चीफ़ ऑफ डिफ़ेंस स्टाफ़ बने) ने कहा:- 'नहीं'

लियाक़त ने ज़ोर दे कर पूछा:- “क्या हम दिल्ली पर बम नहीं गिरा सकते हैं?”

एलवर्दी का जवाब था:- हाँ ये संभव तो है लेकिन पाकिस्तान के पास कुल चार बमवर्षक हैं जिनमें से सिर्फ दो काम कर रहे हैं। इनमें से एक शायद दिल्ली तक पहुँच कर बम गिरा भी दे लेकिन इनमें कोई वापस नहीं आ पाएगा।

भारतीय सेना की कार्रवाई हैदराबाद में पांच दिनों तक चली, इसमें 1373 रज़ाकार मारे गए। हैदराबाद स्टेट के 807 जवान भी खेत रहे। भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 96 जवान घायल हुए। भारतीय सेना की कार्रवाई शुरू होने से दो दिन पहले ही 11 सितंबर 1948 को पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का निधन हो गया था।

पाकिस्तान ने फिर इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की कोशिश की, वो इसमें कामयाब भी हुआ। उस समय आठ सदस्यों ने वोट दिया कि इस पर विचार किया जाये। सोवियत संघ, चीन और यूक्रेन ने तटस्थ रहकर एक तरह से भारत का साथ दिया। अगर ये मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उठता तो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय तौर पर काफी फायदा मिल सकता था। संयुक्त राष्ट्र में मामले पर विचार के लिए 17 सितंबर 1948 की तारीख तय की गई। इससे एक दिन पहले ही हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खान ने आत्मसमर्पण कर दिया। पाकिस्तान और उसके समर्थकों का चेहरा फक पड़ गया। रही-सही कसर भारतीय प्रतिनिधियों के बैठक में नहीं आने से पूरी हो गई। यानि पूरा मामला ही खत्म हो गया। लंबे चौड़े हैदराबाद का कुछ हिस्सा बाद में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान महाराष्ट्र और कर्नाटक में चला गया और इसी के बड़े हिस्से को मिलाकर आंध्र प्रदेश बना।

  संजय श्रीवास्तव  

संजय श्रीवास्तव सीनियर जर्नलिस्ट हैं। इन्हें प्रिंट, टी.वी. और डिजिटल पत्रकारिता का 30 सालों से ज़्यादा का अनुभव है। ये कुल 4 किताबों का लेखन कर चुके हैं।

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