18 जून को लखनऊ शाखा पर डॉ. विकास दिव्यकीर्ति के ओपन सेमिनार का आयोजन।
अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें:

  संपर्क करें
ध्यान दें:

स्टेट पी.सी.एस.

  • 22 Apr 2024
  • 1 min read
  • Switch Date:  
उत्तराखंड Switch to English

उत्तराखंड में सद्भावना सम्मेलन

चर्चा में क्यों?

हाल ही में हरिद्वार में 'हर की पैड़ी' के बाएँ तट पर, उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री ने दो दिवसीय 'सद्भावना सम्मेलन' का आयोजन किया।

  • सम्मेलन में हज़ारों लोग एकत्र हुए, जिसमें मंत्री ने आध्यात्मिकता और हिंदुओं के लिये गंगा के महत्त्व पर बात की।

मुख्य बिंदु:

  • उत्तरी और पूर्वी भारत में 2,600 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर बहने वाली गंगा को देवी माना जाता है तथा यह हिंदुओं के लिये धार्मिक आस्था का केंद्र है
    • यह नदी छह राज्यों तथा उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के बीच एक केंद्रशासित प्रदेश में फैले गंगा नदी बेसिन में रहने वाली भारत की 1.4 अरब जनसँख्या में से 40% से अधिक के लिये पीने के जल का स्रोत है।
  • जल शक्ति मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, लगभग 30 लाख लीटर सीवेज प्रतिदिन गंगा में बहाया जाता है और उसमें से केवल आधा ही उपचारित किया जाता है।
    • फेकल/मल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का एक समूह है जो उष्ण रक्तीय जीव-जंतुओं की आँत और मल में पाया जाता है तथा इसका संदूषण मानव मल पदार्थ की उपस्थिति का संकेत देता है।
    • अनुमान है कि अकेले पवित्र शहर वाराणसी में प्रतिदिन नदी के किनारे 4,000 शव जलाए जाते हैं।
    • उत्तराखंड में बाँध नदी के प्रवाह को अवरुद्ध कर देते हैं, जिससे गर्मी के महीनों के दौरान कई स्थानों पर नदी धारा में बदल जाती है।
    • राज्य में जलविद्युत परियोजनाएँ ज़्यादातर नदी प्रवाह (ROR) पर आधारित हैं, सिवाय टिहरी बाँध परियोजना के, जो जलविद्युत विकास के लिये एक भंडारण परियोजना है और गैर-मानसूनी नदी के प्रवाह को बढ़ाती है।
    • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, नदी के किनारे 97 जल गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों में से 59 के नमूनों के परीक्षण में जनवरी 2023 में 70% स्थानों पर नदी में मल कोलीफॉर्म अनुमेय स्तर से ऊपर था।
    • वर्ष 2024 में, नमामि गंगे योजना, नदी को साफ करने और पुनर्जीवित करने के लिये विविध हस्तक्षेपों ने नदी में "प्रदूषण भार" को कम कर दिया।
    • पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अधिसूचित बाहरी स्नान मानदंडों के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये अनुमोदित कार्य योजनाओं के माध्यम से प्रदूषित नदी खंडों का कायाकल्प किया जा रहा था।

नमामि गंगे कार्यक्रम

  • नमामि गंगे कार्यक्रम एक एकीकृत संरक्षण मिशन है, जिसे जून 2014 में केंद्र सरकार द्वारा ‘फ्लैगशिप कार्यक्रम' के रूप में अनुमोदित किया गया था, ताकि प्रदूषण के प्रभावी उन्मूलन और राष्ट्रीय नदी गंगा के संरक्षण एवं कायाकल्प के दोहरे उद्देश्यों को पूरा किया जा सके।
  • यह जल संसाधन मंत्रालय, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग तथा जल शक्ति मंत्रालय के तहत संचालित किया जा रहा है।
  • यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) और इसके राज्य समकक्ष संगठनों यानी राज्य कार्यक्रम प्रबंधन समूहों (SPMGs) द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
  • नमामि गंगे कार्यक्रम (2021-26) के दूसरे चरण में राज्य परियोजनाओं को तेज़ी से पूरा करने और गंगा के सहायक शहरों में परियोजनाओं के लिये विश्वसनीय विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (Detailed Project Report- DPR) तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
    • छोटी नदियों और आर्द्रभूमि के पुनरुद्धार पर भी ध्यान दिया जा रहा है। प्रत्येक प्रस्तावित गंगा ज़िले में कम-से-कम 10 आर्द्रभूमि हेतु वैज्ञानिक योजना और स्वास्थ्य कार्ड विकसित करना है तथा उपचारित जल एवं अन्य उत्पादों के पुन: उपयोग के लिये नीतियों को अपनाना है।


उत्तराखंड Switch to English

उत्तराखंड में रिकॉर्ड 55% मतदान

चर्चा में क्यों?

उत्तराखंड में पाँच लोकसभा सीटों पर लगभग 55.01% मतदान हुआ, जिसमें वर्ष 2019 के चुनावों में 61.4% की तुलना में 6.3% वोटों (अनुमानित) की बड़ी गिरावट दर्ज की गई।

मुख्य बिंदु:

  • वर्ष 2024 के चुनावों में सभी पाँच निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की भागीदारी में गिरावट देखी गई।
  • अल्मोडा में सबसे कम 45.4% मतदान हुआ, सबसे अधिक मतदान नैनीताल-उधम सिंह नगर निर्वाचन क्षेत्र में 59.9% हुआ। इसके बाद हरिद्वार में 59.7%, टिहरी में 51.7%, पौरी गढ़वाल में 49.9% और SC आरक्षित सीट पर हुआ। भारत के आधिकारिक निर्वाचन आयोग ऐप की रिपोर्ट के अनुसार, अल्मोडा में 45.4% है।
  • उत्तराखंड में 83.2 लाख सामान्य मतदाता और इसके अलावा 93,357 सेवा मतदाता हैं।

वोटर टर्नआउट ऐप

  • चुनावों में नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने और मतदान के दिन मतदाताओं की उपस्थिति के बारे में तुरंत जानकारी प्रदान करने के लिये भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा 18 अप्रैल 2019 को यह एप्लिकेशन लॉन्च किया गया था।
  • वोटर टर्नआउट एप का उपयोग प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र/संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में पुरुष, महिला और थर्ड जेंडर सहित रियल टाइम वोटर टर्नआउट विवरण को प्रदर्शित करने के लिये किया जाता है। इस एप का उपयोग नागरिकों द्वारा लाइव वोटर टर्नआउट डाटा कैप्चर करने के लिये किया जा सकता है।
  • वोटर टर्नआउट एप नागरिकों को प्रत्येक राज्य के लिये अलग-अलग अनुमानित मतदाता प्रतिशत की जानकारी प्राप्त करने की सुविधा देता है। यह एप उपयोगकर्ताओं को अपने संपर्क के लोगों को फेसबुक, ट्विटर, जीमेल और वाट्सएप के जरिये मतदान प्रतिशत साझा करने की भी सुविधा देता है। यानी रियल टाइम मतदान के प्रतिशत को कोई भी व्यक्ति अपने सोशल मीडिया एकाउंट में शेयर भी कर सकता है।
  • वोटर टर्नआउट एप में कोई डेटा पहले से फीड नहीं किया जा सकता है। वोटर टर्नआउट एप को प्रत्येक राज्य के लिये अनुमानित वोटर टर्नआउट दिखाने के लिये डिजाइन किया गया है और इसका प्रयोग ज़िला और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र स्तर तक किया जा सकता है। मतदान के दिन इस पर राज्यवार, ज़िलेवार और विधानसभा क्षेत्रवार वोटर टर्नआउट का अपडेट देखा जा सकता है।


राजस्थान Switch to English

भिवाड़ी से दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CREDAI) ने राजस्थान सरकार से उभरते औद्योगिक और आवासीय केंद्र भिवाड़ी को दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से जोड़ने की सुविधा देने का आग्रह किया है।

मुख्य बिंदु:

  • CREDAI NCR भिवाड़ी नीमराना ने न केवल आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने, बल्कि वस्तुओं और लोगों की सुचारु आवाजाही को सुविधाजनक बनाने के लिये अनुरोध किया, जिससे क्षेत्रीय विकास तथा समृद्धि को बढ़ावा मिले।
    • यह CREDAI NCR के चैप्टरों में से एक है जो भिवाड़ी, धारूहेड़ा और नीमराना के डेवलपर्स का प्रतिनिधित्व करता है।
  • उन्होंने दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर इंटरचेंज के साथ डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) के साथ एक सड़क विकसित करने की संभावना तलाशने का भी सुझाव दिया।

कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CREDAI)

  • CREDAI 23 राज्यों और 170 शहर चैप्टरों में फैले 11,940 से अधिक रियल एस्टेट डेवलपर्स का प्रतिनिधित्व करने वाला शीर्ष संगठन है।
  • वर्ष 1999 में अपनी स्थापना के बाद से, CREDAI ने रियल एस्टेट क्षेत्र में निष्पक्षता, पारदर्शिता और नैतिक व्यवहार के मानकों में सुधार के लिये निरंतर कार्य किया है।

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC)

  • यह उच्च गति और उच्च क्षमता वाला विश्व स्तरीय तकनीक के अनुसार बनाया गया एक रेल मार्ग होता है, जिसे विशेष तौर पर माल एवं वस्तुओं के परिवहन हेतु बनाया जाता है।
  • डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) में बेहतर बुनियादी ढाँचे और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का एकीकरण शामिल होता है।
  • DFC में दो डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर हैं:
    • ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (EDFC):
      • यह डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पंजाब में साहनेवाल (लुधियाना) से शुरू होकर पश्चिम बंगाल के दनकुनी में समाप्त होता है।
      • ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (EDFC) के मार्ग में कोयला खदानें, थर्मल पावर प्लांट और औद्योगिक शहर मौजूद हैं।
      • इसके मार्ग में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल आदि राज्य शामिल हैं।
      • इस परियोजना का अधिकांश हिस्सा विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित है।
      • 351 किमी. लंबा ‘न्यू भूपुर-न्यू खुर्जा खंड’ ’मौजूदा कानपुर-दिल्ली लाइन पर भीड़ को कम करेगा और साथ ही यह मालगाड़ियों की गति को 25 किमी. प्रति घंटा से 75 किमी. प्रति घंटा कर देगा।
    • वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC):
      • 1504 किलोमीटर लंबा वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, जवाहरलाल नेहरू पोर्ट टर्मिनल (महाराष्ट्र) से दादरी (उत्तर प्रदेश) तक है और यह देश के प्रमुख बंदरगाहों से होकर गुज़रता है।
      •  इसमें हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश शामिल हैं।
      • यह जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) द्वारा वित्तपोषित है।

राजस्थान Switch to English

राजस्थान में कारीगरों को प्रोत्साहन

चर्चा में क्यों?

राजस्थान सरकार एक 'एकीकृत क्लस्टर विकास योजना' लागू करने की योजना बना रही है, जो हस्तशिल्प, हथकरघा और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्रों की उत्पादकता तथा गुणवत्ता को बढ़ावा देने में मदद करेगी।

  • इसके लिये एक प्रारूप पहले ही तैयार किया जा चुका था और हितधारकों से सुझाव मांगे जा रहे थे।

मुख्य बिंदु:

  • MSME को समर्थन देने के लिये केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों जैसे MSME, वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, सूचना एवं प्रौद्योगिकी और वाणिज्य एवं उद्योग द्वारा क्लस्टर विकास योजनाएँ चलाई जा रही हैं।
  • प्रारूप नीति के अनुसार, योजना के चार मुख्य घटक हैं:
    • मुख्य घटक में क्षमता निर्माण के लिये मध्यम हस्तक्षेप, संसाधनों की आसान उपलब्धता के लिये कच्चे माल बैंक के संचालन के साथ ही ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों के माध्यम से बाज़ार विकास हेतु कारीगरों, शिल्पकारों व बुनकरों को समर्थन शामिल है।
    • दूसरा, 5 करोड़ रुपए तक की परियोजनाओं के लिये राज्य सरकार की सहायता से सामान्य सुविधा केंद्र (Common Facility Centres- CFC) स्थापित करने हेतु MSME समूहों को समर्थन देना है।
    • एक अन्य घटक के तहत गैर-राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम (Rajasthan State Industrial Development and Investment Corporation- RIICO) औद्योगिक क्षेत्रों में मौजूदा समूहों तथा गैर-RIICO औद्योगिक क्षेत्रों में ग्रीनफील्ड समूहों के लिये बुनियादी ढाँचे के विकास पर ध्यान दिया जाता है।
  • प्रारूप नीति में कहा गया है कि कारीगरों, शिल्पकारों और बुनकरों से संबंधित क्लस्टर विकास परियोजना के कार्यान्वयन के लिये एक साझेदारी फर्म और/या एक ट्रस्ट या सोसायटी या सहकारी समिति या कंपनी या निर्माता कंपनी आदि जिसमें कम-से-कम दस कारीगर, शिल्पकार और/या बुनकर हों, जिनके पास पंजीकृत कारीगर आईडी कार्ड हो, के रूप में एक विशेष प्रयोजन वाहन (Special Purpose Vehicle- SPV) का गठन किया जाएगा। राजस्थान में अपना व्यापार करने वाले कारीगर, शिल्पकार और बुनकर SPV का हिस्सा बनने के पात्र होंगे।

राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (RIICO)

  • यह राजस्थान सरकार की एक प्रमुख एजेंसी है जिसने राजस्थान के औद्योगिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसका गठन वर्ष 1980 में किया गया था।
  • 28 मार्च 1969 को कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत राजस्थान राज्य औद्योगिक और खनिज विकास निगम (RSIMDC) के रूप में स्थापित एक सरकारी उद्यम को 1 जनवरी 1980 को दो संस्थाओं में विभाजित किया गया था:
    • राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम लिमिटेड  (Rajasthan State Industrial Development & Investment Corporation Limited- RIICO
    • राजस्थान राज्य खनिज विकास निगम (Rajasthan State Mineral Development Corporation- RSMDC

राजस्थान Switch to English

मानित वन स्थिति

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य से "वन भूमि के रूप में ओरान, दी-वान, रूंध और अन्य उपवनों की पहचान वन सर्वेक्षण के लिये उठाए जा रहे कदमों" को उज़ागर करने के लिये कहा। इसके प्रत्युत्तर में राजस्थान सरकार ने अंततः अपने पवित्र उपवनों, जिन्हें ओरांस के नाम से जाना जाता है, को "मानित वन" के रूप में अधिसूचित किया।

मुख्य बिंदु:

  • राजस्थान के सामुदायिक वनों में ओरान सामुदायिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं जो कभी-कभी सदियों पुराने होते हैं, जिन्हें पारंपरिक रूप से पवित्र माना जाता है, ग्रामीण समुदायों द्वारा संरक्षित एवं प्रबंधित किया जाता है, स्थानीय कानूनों व नियमों के साथ उनके उपयोग को नियंत्रित किया जाता है।
    • पशुचारक अपने पशुओं को चराने के लिये ओरान में ले जाते हैं।
    • ये समुदायों के सामाजिक कार्यक्रमों और त्योहारों के लिये एकत्रित होने के स्थान के रूप में भी काम करते हैं।
    • ये गंभीर रूप से संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) के लिये प्राकृतिक आवास भी हैं।
  • वन संरक्षण अधिनियम (FCA), 1980 में कुछ प्रतिबंधात्मक प्रावधान थे, जिसमें वन की स्थिति को गैर-वन भूमि में बदलने के लिये केंद्र की मंज़ूरी की आवश्यकता थी। लेकिन संशोधित FCA में मानित, अवर्गीकृत और निजी वनों की मंज़ूरी राज्य सरकार स्वयं कर सकती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के एक मामले में जहाँ इन संशोधनों की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है, न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश में कहा कि गोदावर्मन मामले, 1996 के अनुसार वनों को संरक्षित किया जाना चाहिये।

ओरान (Orans)

  • ये समुदाय-संरक्षित हरित स्थान हैं जिनमें खेजड़ी (Prosopis cineraria) और रोहिडा (Tecomella undulata) जैसे स्थानीय पेड़ शामिल हैं तथा आमतौर पर स्थानीय देवताओं को समर्पित हैं।
  • ये विनाश के कगार पर थे क्योंकि राजस्व रिकॉर्ड में इन्हें सरकारी भूमि की कृषि योग्य बंजर भूमि के रूप में चिह्नित किया गया था जिसे खेती के तहत लाया जा सकता था। इससे ओरान को गैर-वन गतिविधियों के लिये आवंटित करना आसान हो गया।

मध्य प्रदेश Switch to English

मध्य प्रदेश में विशिष्ट नस्ल की गायें

चर्चा में क्यों?

हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से आंध्र प्रदेश से लाई गई एक जोड़ी पुंगनूर गायों का स्वागत किया।

मुख्य बिंदु:

  • पुंगनूर गाय आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले की मूल और वामन मवेशी नस्ल है। यह विश्व की कूबड़ वाली मवेशियों की सबसे छोटी नस्लों में से एक है।
  • यह नस्ल अनावृष्टि के प्रति उच्च आघातसह है और यह कम गुणवत्ता वाले चारे पर भी अनुकूलित हो सकता है।
  • इस नस्ल की गायों का दूध भी बहुमूल्य है, जिसमें उच्च वसा मात्रा होती है, जो इसे घी के उत्पादन के लिये आदर्श बनाती है।
    • एक पुंगनूर गाय प्रतिदिन लगभग 1 से 3 लीटर दूध दे सकती है और दूध में वसा की मात्रा 8% होती है, जबकि अन्य देशी नस्लों में यह 3 से 4% होती है।
    • इनका दूध ओमेगा फैटी एसिड, कैल्शियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्त्वों से भी भरपूर होता है।
  • इसका माथा चौड़ा और सींग छोटे होते हैं। सींग अर्द्धचंद्राकार होते हैं जो प्रायः नर मवेशी में पीछे व आगे की ओर मुड़े होते हैं और मादा मवेशी में पार्श्व व आगे की ओर मुड़े होते हैं।
  • पुंगनूर गायों को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है, उन्हें संकर नस्लों की तुलना में कम जल, चारा और स्थान की आवश्यकता होती है।
  • आंध्र प्रदेश के कई मंदिर, जिनमें प्रसिद्ध तिरुपति तिरुमाला मंदिर भी शामिल है, में क्षीर अभिषेकम (भगवान को दूध चढ़ाना) के लिये पुंगनूर गाय के दूध का प्रयोग किया जाता है।


 Switch to English
close
एसएमएस अलर्ट
Share Page
images-2
images-2
× Snow