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हैबियस कॉर्पस रिट मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का महत्त्वपूर्ण निर्णय

  • 27 Apr 2022
  • 3 min read

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षी मामले में कहा कि लापता व्यक्तियों के मामलों को बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका के प्रावधान के तहत नहीं लाया जा सकता है। 

प्रमुख बिंदु 

  • जस्टिस अरूप कुमार गोस्वामी और जस्टिस एन.के. चद्रवंशी ने ऐसे मामलों के संदर्भ में कहा कि ‘‘लापता व्यक्तियों के मामले भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के नियमित प्रावधानों के तहत दर्ज़ किये जाने हैं और संबंधित पुलिस अधिकारी आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत निर्धारित तरीके से इसकी जाँच करने के लिये बाध्य हैं।’’ 
  • उच्च न्यायालय ने कहा कि जो चीज सुसंगत रहती है वह यह है कि ‘अवैध निरोध’ का आधार स्थापित करना और इस तरह की किसी भी ‘अवैध हिरासत’ के बारे में एक मज़बूत संदेह बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्थानांतरित करने के लिये एक शर्त है और संवैधानिक न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर विचार नहीं करेंगे, जहाँ ‘अवैध हिरासत’ के बारे में संदेह का कोई आरोप नहीं है।  
  • यूनियन ऑफ इंडिया बनाम युमनाम आनंद एम और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि ‘‘संविधान के अनुच्छेद 21 में यह घोषित है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार किसी भी व्यक्ति को जीवन और स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, अत्यधिक तत्परता के साथ अवैध हिरासत के प्रश्न की जाँच करने के लिये एक मशीनरी की निश्चित रूप से आवश्यकता है। बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट इस प्रकृति का एक उपकरण है।’’  
  • गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 32 में वर्णित संवैधानिक उपचारों के अधिकार के तहत 5 रिट- बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण एवं अधिकार पृच्छा का उल्लेख है।
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