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पीआरएस कैप्सूल्स

विविध

दिसंबर 2019

  • 23 Jan 2020
  • 107 min read

PRS की प्रमुख हाइलाइट्स

  • गृह मामले
    • नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019
    • इनर लाइन परमिट
    • आयुध (संशोधन) विधेयक, 2019
    • विशेष सुरक्षा दल (संशोधन) विधेयक, 2019
    • दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव (केंद्रशासित प्रदेशों का विलय) विधेयक, 2019
    • जनगणना 2021 और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर
    • नगालैंड अफस्पा के अंतर्गत अशांत क्षेत्र
  • समष्टि आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) विकास
    • पॉलिसी रेपो दर तथा रिवर्स रेपो दर
  • वित्त
    • कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, 2019
    • अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण विधेयक, 2019
    • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता में संशोधन
    • आंशिक क्रेडिट गारंटी योजना
    • प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंकों में BoM बनाने हेतु दिशा-निर्देश
    • IIFCL के लिये अतिरिक्त पूंजी और इक्विटी सहायता
    • लघु वित्त बैंकों की ऑन टैप लाइसेंसिंग
    • आर्थिक संकेतकों के फ्रेमवर्क की समीक्षा हेतु समिति
  • सूचना और प्रसारण
    • निजी डेटा संरक्षण विधेयक, 2019
  • श्रम और रोज़गार
    • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2019
  • सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण
    • संविधान (126वाँ संशोधन) विधेयक, 2019
    • माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण (संशोधन) विधेयक, 2019
  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण
    • ई-सिगरेट पर प्रतिबंध विधेयक, 2019
  • परिवहन
    • जहाज़ पुनर्चक्रण विधेयक, 2019
    • BS-VI के उत्सर्जन संबंधी नियमों का मसौदा
  • रेलवे
    • भारतीय रेलवे का संगठनात्मक पुनर्गठन
  • आवासन और शहरी मामले
    • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (अनाधिकृत कॉलोनियों के निवासियों के संपत्ति के अधिकार को मान्यता) विधेयक, 2019
  • शिक्षा
    • केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक
  • विदेशी मामले
    • समुद्री जलदस्युता रोधी विधेयक, 2019
    • भारत-ब्राज़ील के बीच सामाजिक सुरक्षा समझौता
  • सांख्यिकी
    • मसौदा राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग विधेयक, 2019
  • रक्षा
    • चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ
  • खाद्य प्रसंस्करण
    • NIFTEM विधेयक, 2019 पर स्थायी समिति की रिपोर्ट
    • मसौदा राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण नीति
  • कृषि
    • जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के लिये बागवानी योजना
    • राष्ट्रीय मत्स्यपालन विकास बोर्ड विधेयक का मसौदा
  • पर्यावरण और वन
    • पर्यावरण पर खनन के प्रभाव और कोल इंडिया लिमिटेड
    • भारत वन स्थिति रिपोर्ट, 2019
  • जल शक्ति
    • अटल भूजल योजना
    • जल जीवन मिशन के संचालन हेतु दिशा-निर्देश
  • विद्युत्
    • विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा संयंत्र के विकास हेतु दिशा-निर्देश
    • शक्ति (SHAKTI) नीति
  • इस्पात
    • इस्पात क्षेत्र में ग्रीनफील्ड निवेश
  • पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
    • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना
  • संचार
    • दूरसंचार क्षेत्र में टैरिफ संबंधी मुद्दे
  • युवा मामले और खेल
    • खेलो इंडिया योजना पर स्थायी समिति की रिपोर्ट

गृह मामले

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 [Citizenship (Amendment) Bill] संसद में पारित हो गया। नागरिकता अधिनियम, 1955 उन विभिन्न तरीकों को स्पष्ट करता है जिनके आधार पर नागरिकता हासिल की जा सकती है। इसमें जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण (Naturalisation) और भारत में किसी परिक्षेत्र के समावेश द्वारा नागरिकता मिलने की बात कही गई है।

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इनर लाइन परमिट

वर्तमान में बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 (Bengal Eastern Frontier Regulation, 1873) के अंतर्गत अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और नगालैंड के कुछ क्षेत्रों को ‘इनर लाइन’ क्षेत्रों के रूप में अधिसूचित किया गया है। इन क्षेत्रों में किसी व्यक्ति का प्रवेश और निकासी इनर लाइन परमिट द्वारा विनियमित होती है।

  • भारत के गृह मंत्रालय ने इन क्षेत्रों को बदलने के लिये एक अधिसूचना जारी की है। इनर लाइन परमिट में अब निम्नलिखित क्षेत्र शामिल होंगे:
    • अरुणाचल प्रदेश
    • मणिपुर
    • मिज़ोरम
    • नगालैंड के अधिसूचित क्षेत्र
  • नगालैंड के गृह विभाग ने राज्य के बाकी क्षेत्रों की भाँति दीमापुर को भी इनर लाइन के अंतर्गत अधिसूचित किया है।

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आयुध (संशोधन) विधेयक, 2019

आयुध (संशोधन) विधेयक, 2019 [Arms (Amendment) Bill, 2019] संसद में पारित हो गया। यह विधेयक आयुध अधिनियम, 1959 (Arms Act, 1959) में संशोधन करता है।

यह विधेयक किसी व्यक्ति द्वारा लाइसेंसयुक्त बंदूकें रखने की सीमा को कम करता है तथा अधिनियम के अंतर्गत कुछ अपराधों की सज़ा बढ़ाता है। विधेयक में अपराधों की नई श्रेणियों को भी प्रस्तावित किया गया है।

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विशेष सुरक्षा दल (संशोधन) विधेयक, 2019

विशेष संरक्षण समूह (संशोधन) विधेयक, 2019 [Special Protection Group (Amendment) Bill, 2019] संसद में पारित हो गया। विधेयक विशेष संरक्षण समूह अधिनियम, 1988 [Special Protections Group Act, 1988] में संशोधन करता है।

यह अधिनियम प्रधानमंत्री, पूर्व-प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार के निकट सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करने हेतु विशेष सुरक्षा दल (Special Protection Group- SPG) के गठन और विनियमन का प्रावधान करता है।

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दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव (केंद्रशासित प्रदेशों का विलय) विधेयक, 2019

दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव (केंद्रशासित प्रदेशों का विलय) विधेयक, 2019 [Dadra and Nagar Haveli and Daman and Diu (Merger of Union Territories) Bill, 2019] संसद में पारित हो गया।

  • यह विधेयक दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव केंद्रशासित प्रदेशों (Union Territories- UTs) को एक केंद्रशासित प्रदेश में विलय करने का प्रावधान करता है।
  • इस विधेयक में निम्नलिखित संशोधन शामिल हैं:
    • लोकसभा के प्रतिनिधित्व को बरकरार रखना।
    • मुंबई उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार।
    • दोनों UT के सभी अधिकारियों को एक UT में अस्थायी रूप से आवंटित करना।

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जनगणना 2021 और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर

  • केंद्रीय कैबिनेट ने निम्नलिखित प्रस्तावों को मंज़ूरी दे दी:
    • देश में जनगणना, 2021 का संचालन करना।
    • असम राज्य को छोड़कर देश के सभी हिस्सों में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (National Population Register- NPR) को अपडेट करना।
  • जनगणना दो चरणों में की जाएगी:
    • अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 के दौरान प्रत्येक घर की सूची और उस घर में रहने वालों की संख्या।
    • फरवरी 2021 में जनसंख्या की गणना की जाएगी।
  • NPR को घरों की सूची और उसमें रहने वालों की संख्या के साथ अपडेट (असम को छोड़कर) किया जाएगा।
  • NPR देश में सामान्य निवासियों का एक रजिस्टर है। सामान्य निवासी उन लोगों को कहते हैं जो पिछले छह महीने या उससे अधिक समय से स्थानीय क्षेत्र में रहते हैं या अगले छह महीने या उससे अधिक समय तक उस क्षेत्र में निवास करने का इरादा रखते हैं।

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नगालैंड अफस्पा के अंतर्गत अशांत क्षेत्र

गृह मंत्रालय ने पूरे नगालैंड राज्य को सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 [Armed Forces (Special Powers) Act, 1958- AFSPA] के अंतर्गत 30 दिसंबर, 2019 से छह महीने की अवधि हेतु ‘अशांत क्षेत्र’ (Disturbed Area) घोषित किया है।

  • AFSPA, राज्य के गवर्नर या केंद्र सरकार को राज्य के किसी भी क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करने की शक्ति देता है। ‘अशांत क्षेत्र’ में सशस्त्र बलों को कुछ विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं।

समष्टि आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) विकास

पॉलिसी रेपो दर तथा रिवर्स रेपो दर

मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee- MPC) ने 2019-20 का पांचवाँ द्विमासिक मौद्रिक नीति का विवरण (Monetary Policy Statement) जारी किया। पॉलिसी रेपो दर (जिस दर पर RBI बैंकों को ऋण देता है) 5.15% पर अपरिवर्तनीय रही।

MPC के अन्य विवरणों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • रिवर्स रेपो दर (जिस दर पर RBI बैंकों से उधार लेता है) 4.9% पर अपरिवर्तनीय रहा।
  • सीमांत स्थायी सुविधा दर (जिस दर पर बैंक अतिरिक्त धन उधार ले सकते हैं) और बैंक दर (जिस दर पर RBI विनिमय पत्रों को खरीदता है) 5.4% पर अपरिवर्तनीय रहा।
  • MPC ने मौद्रिक नीति के समायोजन के रूख को बरकरार रखने का फैसला किया।

वित्त

कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, 2019

कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, 2019 [Taxation Laws (Amendment) Bill, 2019] संसद में पारित हो गया। यह विधेयक सितंबर 2019 में जारी अध्यादेश का स्थान लेगा। यह विधेयक आयकर अधिनियम, 1961 (Income Tax Act- IT Act) और वित्त (संख्या 2) अधिनियम, 2019 [Finance (No. 2) Act, 2019] में संशोधन करता है।

विधेयक में प्रावधान है कि कुछ कटौतियों का दावा न करने वाली घरेलू कंपनियों के पास निचली दर पर टैक्स चुकाने का विकल्प है। यह पूंजीगत प्राप्तियों पर सरचार्ज की वसूली से संबंधित कुछ प्रावधानों में भी संशोधन करता है।

इस विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • घरेलू कंपनियों के लिये 22% की टैक्स दर: वर्तमान में 400 करोड़ रुपए तक के वार्षिक टर्नओवर वाली घरेलू कंपनियाँ 25% की दर से इनकम टैक्स चुकाती हैं। दूसरी घरेलू कंपनियों के लिये यह दर 30% है। विधेयक में प्रावधान है कि अगर घरेलू कंपनियाँ IT Act के अंतर्गत कुछ कटौतियों का दावा नहीं करतीं तो उनके पास 22% की दर से आयकर चुकाने का विकल्प है।
  • इनमें निम्नलिखित के लिये प्रदत्त कटौतियाँ शामिल हैं:
    • स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) के अंतर्गत स्थापित नई इकाइयाँ।
    • अधिसूचित पिछड़े क्षेत्रों में नए संयंत्र या मशीनरी में निवेश करना।
    • वैज्ञानिक अनुसंधान, कृषि विस्तारीकरण और कौशल विकास की परियोजनाओं पर व्यय।
    • नए संयंत्र या मशीनरी का ह्रास (कुछ मामलों में)।
    • इनकम टैक्स अधिनियम में विभिन्न प्रावधान (अध्याय VI-A के अंतर्गत)।
  • नई घरेलू विनिर्माण कंपनियों के लिये 15% की टैक्स दर: अगर नई घरेलू विनिर्माण कंपनियाँ अधिनियम के अंतर्गत उपर्युक्त शर्तों के अनुसार कुछ कटौतियों का दावा नहीं करतीं, तो वे 15% की दर से आयकर चुकाने का विकल्प चुन सकती हैं। इसके लिये उन्हें 30 सितंबर, 2019 के बाद स्थापित और पंजीकृत होना चाहिये और 1 अप्रैल, 2023 से पहले विनिर्माण कार्य प्रारंभ कर देना चाहिये। इनमें निम्नलिखित कंपनियाँ शामिल नहीं होंगी:
    • मौजूदा व्यापार के विभाजन या पुनर्निर्माण से बनी कंपनियाँ।
    • विनिर्माण के अलावा दूसरे व्यापार में संलग्न।
    • भारत में पहले इस्तेमाल होने वाले संयंत्र या मशीनरी का प्रयोग करने वाली कंपनियाँ (कुछ विशिष्ट शर्तों को छोड़कर)।
  • कर की नई दरों की प्रयोज्यता: कंपनियाँ 2019-20 के वित्तीय वर्ष से नई कर की दरों (यानी आकलन वर्ष 2020-21) का विकल्प चुन सकती हैं। एक बार विकल्प चुनने के बाद आगामी वर्षों में यही विकल्प लागू होगा।
    • अगर नए विकल्प चुनने वाली कंपनियाँ कुछ शर्तों का पालन नहीं करतीं तो वे उस वर्ष और आगामी वर्षों के लिये नए विकल्प का प्रयोग नहीं कर सकतीं।
    • कुछ मामलों में अगर किसी कंपनी के लिये कर की 15% दर का विकल्प अवैध हो जाता है तो वह 22% दर को चुन सकती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण विधेयक, 2019

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण विधेयक, 2019 (International Financial Services Centres Authority Bill, 2019) संसद में पारित हो गया। विधेयक भारत में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों में वित्तीय सेवा बाजार को विकसित और विनियमित करने के लिये एक प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान करता है।

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दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता में संशोधन

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2019 [Insolvency and Bankruptcy Code (Amendment) Ordinance, 2019] को 28 दिसंबर, 2019 को जारी किया गया। अध्यादेश दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code, 2016) में संशोधन करता है।

संहिता कंपनियों और व्यक्तियों के बीच दिवालियापन के निष्पादन हेतु एक समयबद्ध प्रक्रिया प्रदान करती है। अध्यादेश के अंतर्गत निम्नलिखित संशोधन प्रस्तावित है:

  • निष्पादन प्रक्रिया शुरू करने की न्यूनतम सीमा: संहिता के अंतर्गत वित्तीय लेनदार (खुद या दूसरे वित्तीय लेनदारों के साथ संयुक्त रूप से) दिवालियापन के निष्पादन की प्रक्रिया की शुरुआत करने के लिये राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal- NCLT) में आवेदन कर सकता है।
  • अध्यादेश वित्तीय लेनदारों की कुछ विशेष श्रेणियों के लिये न्यूनतम सीमा तय करने के लिये इस प्रावधान में संशोधन करता है। रियल एस्टेट परियोजनाओं के मामले में निष्पादन प्रक्रिया शुरू करने के लिये किसी परियोजना के कम-से-कम 100 एलॉटीज़ (जिन व्यक्तियों को प्लॉट, अपार्टमेंट या भवन अलॉट हुए हैं या बेचे गए हैं) या कुल एलॉटीज़ के 10% सदस्यों (इनमें से जो भी कम हो) को संयुक्त रूप से आवेदन करना होगा।
  • पूर्व अपराधों के लिये उत्तरदायित्व: संहिता के अंतर्गत निष्पादन योजना के परिणामस्वरूप कॉरपोरेट देनदार के प्रबंधन या नियंत्रण में परिवर्तन हो सकता है। अध्यादेश कहता है कि कॉरपोरेट देनदारों को निष्पादन प्रक्रिया शुरू करने से पहले किये गए अपराधों के लिये उत्तरदायी नहीं ठहराया जाएगा। यह उत्तरदायित्व NCLT द्वारा योजना स्वीकृत करने की तारीख से समाप्त हो जाएगी।
  • कुछ मामलों में छूट: पूर्व अपराधों के लिये किसी व्यक्ति को छूट मिलेगी, अगर वह व्यक्ति:
    • प्रोमोटर या कॉरपोरेट देनदार के प्रबंधन या नियंत्रण में शामिल नहीं है या ऐसे व्यक्ति से संबंधित पक्ष का नहीं है।
    • वह व्यक्ति नहीं है जिसके खिलाफ जाँच अधिकारियों ने शिकायत सौंपी या दायर नहीं की है या जिसके बारे में इस बात को मानने के कारण हैं कि उसने अपराध के लिये उकसाया है या षडयंत्र रचा है।
  • दिवालियापन के आधार पर परमिट, लाइसेंस और पंजीकरण रद्द नहीं: अध्यादेश कहता है कि दिवालियापन के आधार पर सरकार या स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी किया गया कोई मौजूदा लाइसेंस, परमिट, पंजीकरण, कोटा, छूट या मंज़ूरी निरस्त नहीं होगी। हालाँकि इसे इस्तेमाल करने या जारी रखने के लिये बकाया देय के भुगतान में कोई बकाया नहीं होना चाहिये।
  • महत्त्वपूर्ण वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति नहीं रोकी जाएगी: अध्यादेश कहता है कि निष्पादक यह आदेश दे सकता है कि उन विशिष्ट वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति स्थगन अवधि के दौरान रोकी नहीं जा सकती जो कि कॉरपोरेट देनदार के कामकाज के लिये महत्त्वपूर्ण है।
    • स्थगन अवधि उस समय अवधि को कहते हैं जब NCLT लोगों को कॉरपोरेट देनदार के खिलाफ कार्रवाई करने से रोक सकती है, जैसे- उगाही संबंधी मुकदमा दायर करना।

उल्लेखनीय है कि ऐसे संशोधन दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2019 में भी प्रस्तावित थे जो कि लोकसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में प्रस्तुत की गई थी। इस विधेयक को वित्त संबंधी स्थायी कमिटी को भेजा गया है।

आंशिक क्रेडिट गारंटी योजना

केंद्रीय कैबिनेट ने आंशिक क्रेडिट गारंटी योजना में संशोधन को मंज़ूरी दी। केंद्रीय बजट 2019-20 में इस योजना की घोषणा की गई थी और 19 अगस्त, 2019 को इसे जारी किया गया था।

  • योजना के अंतर्गत वित्तीय रूप से मज़बूत गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (Non-Banking Financial Companies- NBFCs) और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों (Housing Finance Companies- HFCs) से उच्च श्रेणी की जमा संपत्ति को खरीदने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (Public Sector Banks- PSBs) को सरकारी गारंटी दी जाती है।
  • सरकार बैंकों द्वारा खरीदी गई संपत्ति के शुद्ध मूल्य के 10% तक या 10,000 करोड़ रुपए (इनमें से जो भी कम होगा) के शुरुआती नुकसान को समाविष्ट करेगी।
  • इस संशोधित योजना में NBFCs और HFCs भी शामिल होंगे जो कि 1 अगस्त, 2018 से पहले एक वर्ष की अवधि के दौरान SMA-0 उप-श्रेणी में आते हों।
  • SMA-0 उप-श्रेणी में वे एकाउंट्स शामिल हैं जिन्हें 30 दिनों तक देय मूलधन या ब्याज भुगतान वाले विशेष उद्धरित खाते (Special Mention Accounts- SMA) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। संशोधित योजना के अनुसार, PSB द्वारा खरीदी जा रही जमा संपत्ति की न्यूनतम रेटिंग BBB+ होनी चाहिये।
  • सरकार को उम्मीद है कि इस गारंटी से NBFCs और HFCs को अपनी तरलता या नकदी प्रवाह से जुड़ी समस्याएँ हल करने में मदद मिलेगी। यह योजना 30 जून, 2020 तक या ऐसी तारीख तक चालू रहेगी जब तक PSB एक लाख करोड़ रुपए मूल्य के एसेट्स खरीद नहीं लेते हैं (इनमें से जो भी पहले हो)।

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प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंकों में BoM बनाने हेतु दिशा-निर्देश

भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) ने प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंकों [Primary (Urban) Cooperative Banks- UCBs] के लिये बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट (Board of Management- BoM) का गठन करने हेतु दिशा-निर्देश जारी किये।

  • दिशा-निर्देशों के अनुसार, 100 करोड़ रुपए या उससे अधिक राशि जमा वाले सभी UCBs को BOM बनाने होंगे और बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer- CEO) की नियुक्ति के लिये RBI से अनुमति लेनी होगी।
  • नई शाखा खोलने या अपने कामकाज को विस्तार देने की स्थितियों में इन बैंकों के लिये BOM का गठन अनिवार्य है।
  • BOM में न्यूनतम पाँच और अधिकतम 12 सदस्य होंगे जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों जैसे- लेखांकन, बैंकिंग और कानून जैसे विभिन्न क्षेत्रों का विशेष ज्ञान होगा।
  • BOM बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को रिपोर्ट करेगा। इसके कार्यों में UCBs के बैंक संबंधी कार्यों पर नज़र रखना और नीति निर्धारण में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मदद करना शामिल है।

IIFCL के लिये अतिरिक्त पूंजी और इक्विटी सहायता

केंद्रीय कैबिनेट ने भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड (India Infrastructure Finance Company Limited- IIFCL) को अतिरिक्त पूंजी और इक्विटी सहायता को मंज़ूरी दे दी है।

  • IIFCL एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी है जो कि अवसंरचना परियोजनाओं को दीर्घकालीन वित्त प्रदान करती है।
  • वित्त वर्ष 2019-20 और 2020-21 के लिये अतिरिक्त इक्विटी सहायता क्रमशः 5,300 करोड़ रुपए और 10,000 करोड़ रुपए होगी। यह सहायता बजटीय सहयोग या पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड जारी कर प्रदान की जाएगी।
  • इसके अतिरिक्त IIFCL की अधिकृत पूंजी को भी 6,000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 25,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्ताव है।
  • अधिकृत पूंजी शेयरों की वह अधिकतम संख्या होती है जिसे कंपनी अपने निगमीकरण (Incorporation) के दस्तावेज़ों के अनुसार जारी कर सकती है।

लघु वित्त बैंकों की ऑन टैप लाइसेंसिंग

भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) ने देश में लघु वित्त बैंकों की ऑन टैप लाइसेंसिंग के लिये दिशा-निर्देश जारी किये। ऑन टैप लाइसेंसिंग का अर्थ है पूरे वर्ष के दौरान लाइसेंस देने की पद्धति।

  • वर्तमान में लघु वित्त बैंकों के लिये ऑन टैप लाइसेंसिंग विंडो नहीं है। लाइसेंसिंग की वर्तमान प्रक्रिया 2014 RBI के दिशा-निर्देशों द्वारा निर्देशित है जो कि निजी क्षेत्र में लघु वित्त बैंकों की लाइसेंसिंग करते हैं।

लघु वित्त बैंक, लघु व्यापार और असंगठित क्षेत्र के संस्थानों को तकनीक और कम लागत वाले ऑपरेशंस के ज़रिये ऋण सुविधा प्रदान करते हैं। इन दिशा-निर्देशों में निम्नलिखित प्रावधान हैं:

  • पात्रता: गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ (Non-Banking Financial Companies- NBFCs), सूक्ष्म वित्त संस्थान (Micro Finance Institutions) और निजी क्षेत्र के स्थानीय बैंक (जो कि निवासियों द्वारा नियंत्रित होते हैं) लघु वित्त बैंक में परिवर्तित होने का विकल्प चुन सकते हैं।
    • उन्हें इस क्षेत्र में कम से कम पाँच वर्ष का अनुभव होना चाहिये। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान, बड़े औद्योगिक घराने या व्यापारिक समूह तथा स्वायत्तशासी निकाय लाइसेंसिंग के लिये पात्र नहीं होंगे।
    • काम शुरू करने के तुरंत बाद लघु वित्त बैंकों को अनुसूचित बैंक का दर्जा (RBI अधिनियम, 1934 में सूचीबद्ध बैंक और RBI से उधारियों के लिये पात्र) दिया जाएगा।
  • गतिविधियों का दायरा: लघु वित्त बैंक डिपॉजिट कर सकते हैं और लघु व्यापारियों को ऋण दे सकते हैं। वे RBI की पूर्व मंज़ूरी के साथ म्यूचुअल फंड्स, बीमा उत्पाद और पेंशन उत्पाद जैसी वित्तीय सेवाएँ प्रदान कर सकते हैं।
  • न्यूनतम पूंजी अर्हता: लघु वित्त बैंक के लिये अपेक्षित न्यूनतम इक्विटी कैपिटल 200 करोड़ रुपए होगा (वर्तमान में यह 100 करोड़ रुपए है)। इसके अतिरिक्त लघु वित्त बैंक को न्यूनतम 15% पूंजी से जोखिम भारित संपत्ति अनुपात (Capital to Risk-Weighted Assets Ratio) (बैंक के कुल जोखिम भारित अनुपात के प्रतिशत के रूप में उसकी कुल पूंजी) बरकरार रखना होगा।

अन्य शर्तें: लघु वित्त बैंकों को अपना 75% शुद्ध ऋण उन क्षेत्रों को देना होगा जो कि प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (जैसे कृषि, सूक्ष्म और लघु उद्योग) के पात्र हैं। इसके अतिरिक्त इन बैंकों को कम-से-कम 50% ऋणों को निरंतर आधार पर 25 लाख रुपए तक रखना होगा।

आर्थिक संकेतकों के फ्रेमवर्क की समीक्षा के लिये समिति

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation- MoSPI) ने औद्योगिक क्षेत्र, सेवा क्षेत्र और श्रम बल सांख्यिकी से संबंधित आर्थिक संकेतकों के फ्रेमवर्क की समीक्षा के लिये आर्थिक सांख्यिकी संबंधी स्थायी समिति (अध्यक्ष: प्रनब सेन) का गठन किया।

  • इस समिति में 28 सदस्य होंगे जो कि संयुक्त राष्ट्र, भारतीय रिज़र्व बैंक, वित्त मंत्रालय, नीति आयोग और अर्थशास्त्रियों एवं सांख्यिकीविदों का प्रतिनिधित्व करेंगे। उल्लेखनीय है कि समिति के गठन संबंधी आदेश की प्रति पब्लिक डोमेन में उपलब्ध नहीं है।

सूचना और प्रसारण

निजी डेटा संरक्षण विधेयक, 2019

निजी डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। विधेयक व्यक्तियों के निजी डेटा के संरक्षण का प्रावधान करता है और इसके लिये डेटा संरक्षण प्राधिकरण (Data Protection Authority) की स्थापना करता है।

  • विधेयक के अनुसार, निजी डेटा वह डेटा होता है जो किसी व्यक्ति के पहचान की विशेषताओं, लक्षणों या गुणों से संबंधित होता है और उसे व्यक्ति की पहचान के लिये प्रयोग किया जा सकता है।

विधेयक मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • डेटा फिड्यूशरीज़ की बाध्यताएं: यह विधेयक डेटा फिड्यूशरी पर कुछ बाध्यताएँ लगाता है जिसे लोगों के निजी डेटा का एक्सेस होता है। डेटा का यह प्रसंस्करण कुछ निश्चित उद्देश्यों, संग्रहण और भंडारण कुछ सीमाओं के अधीन होगा।
  • व्यक्ति के अधिकार: विधेयक व्यक्तियों के कुछ अधिकारों को निर्धारित करता है। इनमें निम्नलिखित अधिकार शामिल हैं:
    • फिड्यूशरी से इस बात की पुष्टि करने का अधिकार कि किसी व्यक्ति के निजी डेटा को प्रसंस्कृत किया गया है।
    • गलत, अधूरे या पुराने निजी डेटा में संशोधन की मांग।
    • आवश्यकता न होने या सहमति वापस लेने पर फिड्यूशरी द्वारा व्यक्ति के निजी डेटा का खुलासा करते रहने पर प्रतिबंध।
    • इसके अतिरिक्त किसी व्यक्ति की सहमति मिलने पर फिड्यूशरीज़ द्वारा डेटा प्रसंस्कृत किया जा सकता है (सिवाय कुछ मामलों में जैसे- कानून या न्यायालय के आदेश द्वारा ऐसा करना अपेक्षित हो)।
  • डेटा संरक्षण प्राधिकरण: विधेयक डेटा संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना करता है जो कि:
    • लोगों के हितों की रक्षा करने के लिये कदम उठा सकती है।
    • पर्सनल डेटा के दुरुपयोग को रोक सकती है।
    • विधेयक का अनुपालन सुनिश्चित कर सकती है।
    • प्राधिकरण में डेटा संरक्षण और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के विशेषज्ञों को सदस्य बनाया जाएगा।
  • छूट: कुछ मामलों में विधेयक के कुछ प्रावधानों के अनुपालन से छूट है। उदाहरण के लिये केंद्र सरकार अपनी कुछ एजेंसियों को देश की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, संप्रभुता, एकता तथा विदेशी राज्यों से मित्रवत संबंध के दृष्टिकोण से विधेयक के कुछ प्रावधानों से छूट दे सकती है।
  • इसके अतिरिक्त विधेयक प्रावधान करता है कि केंद्र सरकार सेवाओं के बेहतर लक्ष्यीकरण के लिये डेटा फिड्यूशरी को निम्नलिखित के प्रसंस्करण हेतु निर्देश दे सकती है:
    • गैर निजी डेटा
    • बेनाम निजी डेटा (जहाँ व्यक्तिगत रूप से डेटा की पहचान करना संभव नहीं)।

इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया है, जो कि बजट सत्र 2020 के अंतिम सप्ताह के पहले दिन अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।

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श्रम और रोज़गार

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2019

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2019 (The Code on Social Security, 2019) लोकसभा में पेश की गई। यह संहिता सामाजिक सुरक्षा से जुड़े 9 कानूनों जैसे- कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम, 1952, मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 का स्थान लेती है। संहिता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ: संहिता के अंतर्गत केंद्र सरकार श्रमिकों के लाभ के लिये विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ अधिसूचित कर सकती है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    • कर्मचारी भविष्य निधि (Employee Provident Fund- EPF) योजना।
    • बीमारी, मातृत्व एवं अन्य लाभ प्रदान करने के लिये कर्मचारी राज्य बीमा (Employee State Insurance- ESI) योजना।
    • फ्रीलांस वर्कर्स (Gig Workers), प्लेटफॉर्म वर्कर्स (Platform Workers) औऱ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को विभिन्न लाभ जैसे जीवन और विकलांगता कवर प्रदान करने के लिये विभिन्न लाभ।
  • गिग वर्कर्स ऐसे श्रमिक होते हैं जो कि परंपरागत नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से बाहर होते हैं। प्लेटफॉर्म वर्कर्स ऐसे श्रमिक होते हैं जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से दूसरे संगठनों या व्यक्तियों तक पहुँचते हैं और उन्हें विशिष्ट सेवाएँ प्रदान करके धन अर्जित करते हैं। असंगठित श्रमिकों में गृह आधारित (घर पर रहकर काम करने वाले) या स्वरोज़गार प्राप्त श्रमिक शामिल होते हैं।
  • कवरेज़ और पंजीकरण: संहिता, योजनाओं की प्रयोज्यता के लिये अलग-अलग सीमाएँ निर्दिष्ट करती है। जैसे- EPF योजना 20 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों पर लागू होगी। इन सीमाओं को केंद्र सरकार द्वारा संशोधित किया जा सकता है। सभी पात्र प्रतिष्ठानों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संहिता के अंतर्गत पंजीकृत हों (यदि वे दूसरे किसी श्रम कानून के अंतर्गत पंजीकृत न हों)।
  • योगदान: EPF और ESI योजनाओं को नियोक्ता और कर्मचारियों के अंशदान से वित्त पोषित किया जाएगा। ऐच्छिक दान (Gratuity) के भुगतान, मातृत्व लाभ, भवन निर्माण श्रमिकों (Building Wokers) के लिये उपकर और कर्मचारी के मुआवज़े का भुगतान नियोक्ता द्वारा वहन किया जाएगा।
    • गिग वर्कर्स, प्लेटफॉर्म वर्कर्स और असंगठित श्रमिकों के लिये योजनाओं को नियोक्ता, कर्मचारी और संबंधित सरकार के अंशदानों से वित्त पोषित किया जा सकता है।
  • सामाजिक सुरक्षा संगठन: संहिता सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को प्रबंधित करने के लिये अनेक निकायों को स्थापित कर सकती है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    • EPF, EPS और EDLI योजनाओं को प्रबंधित करने के लिये केंद्रीय न्यासी बोर्ड
    • ESI योजना को प्रबंधित करने के लिये कर्मचारी राज्य बीमा निगम
    • असंगठित श्रमिकों से संबंधित योजनाओं को प्रबंधित करने के लिये राष्ट्रीय और राज्य स्तरों पर सामाजिक सुरक्षा बोर्ड।

सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण

संविधान (126वाँ संशोधन) विधेयक, 2019

संविधान (126वाँ संशोधन) विधेयक, 2019 संसद में पारित हो गया। विधेयक अनुसूचित जातियों (Scheduled Castes- SCs) और अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes- STs) के आरक्षण से संबंधित प्रावधानों में संशोधन करता है।

  • संविधान लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SCs और STs के लिये सीटों के आरक्षण और मनोनयन द्वारा एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रतिनिधित्व का प्रावधान करता है।
  • संविधान के लागू होने के बाद 70 वर्ष की अवधि के लिये यह प्रावधान लागू किया गया था और 25 जनवरी, 2020 को यह समाप्त हो जाएगा।
  • विधेयक SC और ST के लिये आरक्षण को 25 जनवरी, 2030 तक 10 वर्षों के लिये और बढ़ाने का प्रयास करता है लेकिन लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिये मनोनयन द्वारा सीटों के प्रावधान को नहीं बढ़ाया गया है।

माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण (संशोधन) विधेयक, 2019

माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण (संशोधन) विधेयक, 2019 [Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens (Amendment) Bill, 2019] लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। विधेयक माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 में संशोधन करता है।

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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण

ई-सिगरेट पर प्रतिबंध विधेयक, 2019

इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स पर प्रतिबंध (उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण, स्टोरेज और विज्ञापन) विधेयक, 2019 संसद में पारित हो गया। यह विधेयक सितंबर, 2019 में जारी किये गए ई-सिगरेट निषेध अध्यादेश का स्थान लेता है। विधेयक इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स के उत्पादन, व्यापार, स्टोरेज और विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाता है।

  • इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स: विधेयक इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट (ई-सिगरेट्स) की व्याख्या एक ऐसे बैटरी चालित उपकरण के रूप में करता है जोकि किसी पदार्थ को गर्म करता है ताकि कश लेने के लिये वाष्प पैदा हो।
    • इन ई-सिगरेट्स में निकोटिन और फ्लेवर हो सकते हैं और इनमें इलेक्ट्रॉनिक निकोटिन डिलिवरी सिस्टम के सभी प्रकार, हीट-नॉट बर्न उत्पाद, ई-हुक्का और ऐसे ही दूसरे उपकरण शामिल हैं।
  • ई-सिगेट्स पर प्रतिबंध: विधेयक भारत में ई-सिगरेट्स के उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण और विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाता है। इस प्रावधान का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को एक वर्ष का कारावास या एक लाख रुपए का जुर्माना या दोनों सज़ा भुगतनी होगी।
    • एक बार से अधिक बार अपराध करने पर तीन वर्ष तक का कारावास और पाँच लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ेगा।
  • ई-सिगेट्स का स्टोरेज: विधेयक के अंतर्गत ई-सिगरेट्स के स्टॉक के संग्रहण के लिये कोई व्यक्ति किसी स्थान का प्रयोग नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति ई-सिगरेट्स का स्टॉक रखता है तो उसे छह महीने का कारावास या 50,000 रुपए का जुर्माना या दोनों सज़ा भुगतनी पड़ेगी।
  • विधेयक के लागू होने के बाद ई-सिगरेट्स का मौजूदा स्टॉक रखने वालों को इन स्टॉक्स की घोषणा करनी होगी और उन्हें अधिकृत अधिकारी के निकटवर्ती कार्यालय में जमा कराना होगा। यह अधिकृत अधिकारी पुलिस अधिकारी (कम-से-कम उप-निरिक्षक स्तर का) या केंद्र या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत कोई अन्य अधिकारी हो सकता है।

परिवहन

जहाज़ पुनर्चक्रण विधेयक, 2019

जहाज़ पुनर्चक्रण विधेयक (Recycling of Ships Bill) 2019 संसद में पारित हो गया। विधेयक जहाज़ों में खतरनाक सामग्री के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाता है और जहाज़ों के पुनर्चक्रण को विनियमित करता है। विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विधेयक की प्रयोज्यता: विधेयक निम्नलिखित पर लागू होगा:
    • भारत में पंजीकृत नए और मौजूदा जहाज़।
    • भारत में किसी बंदरगाह, टर्मिनल या भारत के राज्यक्षेत्रीय समुद्र में प्रवेश करने वाला जहाज़।
    • कोई युद्धपोत या प्रशासन के स्वामित्व और उसके द्वारा संचालित सरकारी गैर-वाणिज्यिक सेवा के लिये प्रयोग होने वाला कोई अन्य जहाज़।
    • भारत में संचालित कोई जहाज़ पुनर्चक्रण केंद्र।
  • जहाज़ पुनर्चक्रण: विधेयक के अनुसार, जहाज़ पुनर्चक्रण किसी पुनर्चक्रण केंद्र में जहाज़ों को तोड़ने की प्रक्रिया को कहते हैं ताकि उसके कुछ घटकों और सामग्रियों को पुनः इस्तेमाल करने के लिये हासिल किया जा सके और इस दौरान उत्पन्न होने वाली खतरनाक सामग्री का ध्यान रखा जा सके।
  • जहाज़ों के लिये आवश्यक: जहाज़ अधिसूचित की गई प्रतिबंधित खतरनाक सामग्रियों का इस्तेमाल नहीं करेंगे। केंद्र सरकार इस शर्त से कुछ श्रेणी के जहाज़ों को छूट दे सकती है। राष्ट्रीय प्राधिकरण निर्धारित शर्तों की पुष्टि के लिये आवधिक सर्वेक्षण करेगी।
    • जहाज़ पुनर्चक्रण से संबंधित सभी गतिविधियों का प्रशासन, पर्यवेक्षण और निगरानी करने के लिये केंद्र सरकार इस प्राधिकरण को अधिसूचित करेगी।
  • पुनर्चक्रण केंद्र: जहाज़ों को सिर्फ अधिकृत पुनर्चक्रण केंद्रों में पुनर्चक्रित किया जाएगा। ऐसे किसी केंद्र को अधिकृत करने हेतु आवेदन संबंधित प्राधिकरण को सौंपा जाएगा (जिसे केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया हो)।
    • इस आवेदन के साथ जहाज़ पुनर्चक्रण केंद्र की प्रबंध योजना और नियत शुल्क भी सौंपी जाएगी।
    • मौजूदा केंद्रों को अधिनियम के लागू होने के 60 दिनों के भीतर प्राधिकृति (Authorisation) के लिये आवेदन करना होगा। कोई केंद्र तब अधिकृत होगा जब संबंधित प्राधिकरण इस बात से संतुष्ट हो जाए कि वह केंद्र निर्दिष्ट मानदंडों का पालन करता है।
    • प्रमाण-पत्र निर्दिष्ट अवधि के लिये वैध होगा लेकिन यह अवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं होगी।
    • इन प्रावधानों का उल्लंघन करने पर एक वर्ष तक का कारावास भुगतना होगा, या 10 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना होगा या दोनों सज़ा भुगतनी होगी।

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BS-VI के उत्सर्जन संबंधी नियमों का मसौदा

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (Ministry of Road Transport and Highways) ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 (Central Motor Vehicles Rules, 1989) में संशोधनों का मसौदा प्रकाशित किया है।

  • मसौदे में 1 अप्रैल, 2020 को या उसके बाद विनिर्मित होने वाले चारपहिया वाहनों (Quadricycles) के लिये भारत स्टेज VI (Bharat Stage- BS VI) स्तर के उत्सर्जन मानकों को अनिवार्य किया गया है।
  • भारत स्टेज उत्सर्जन मानक (Bharat Stage Emission Standards- BSES) केंद्र सरकार द्वारा स्थापित उत्सर्जन मानदंड हैं ताकि मोटर वाहनों से निकलने वाले वायु प्रदूषकों के आउटपुट को विनियमित किया जा सके।
  • BSES अधिक कड़े मानदंडों के साथ प्रगतिशील मानक प्रदान करता है। वर्तमान में चारपहिया वाहनों के लिये लागू उत्सर्जन मानदंड भारत स्टेज IV हैं।

रेलवे

भारतीय रेलवे का संगठनात्मक पुनर्गठन

केंद्रीय कैबिनेट ने भारतीय रेलवे के संगठनात्मक पुनर्गठन को मंज़ूरी दी।

  • भारतीय रेलवे के ग्रुप ‘A’ की कई सेवाओं का एकीकरण: ग्रुप ‘A’ की आठ सेवाओं जैसे- भारतीय रेलवे ट्रैफिक सेवा (Indian Railways Traffic Service) और भारतीय रेलवे एकाउंट्स सेवा (Indian Railways Accounts Service) को एक सेवा में समाहित किया जाएगा जिसे भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा (Indian Railways Management Service) नाम दिया गया है।
    • यह रेल सुधारों पर गठित अनेक कमिटियों जैसे प्रकाश टंडन (1994) और बिबेक देबरॉय (2015) के सुझावों के अनुरूप है।
  • रेलवे बोर्ड का पुनर्गठन: रेलवे बोर्ड को रेलवे के कार्य पथ (Functional Lines) के आधार पर पुनर्गठित किया जाएगा। इसके एक अध्यक्ष होंगे जो कि मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer- CEO) के रूप में काम करेंगे। इसके चार सदस्य होंगे जो कि क्रमशः निम्नलिखित के लिये उत्तरदायी होंगे:
    • आधारिक संरचना
    • ऑपरेशंस और व्यवसाय विकास
    • रोलिंग स्टॉक
    • वित्त
  • बोर्ड में कुछ स्वतंत्र सदस्यों को सलाहकारी भूमिका निभाने के लिये नियुक्त किया जाएगा।
  • वर्तमान में रेलवे बोर्ड में एक अध्यक्ष और विभागीय सदस्य मौजूद होते हैं।

आवासन और शहरी मामले

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (अनाधिकृत कॉलोनियों के निवासियों के संपत्ति के अधिकार को मान्यता) विधेयक, 2019

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (अनाधिकृत कॉलोनियों के निवासियों के संपत्ति के अधिकार को मान्यता) विधेयक, 2019 लोकसभा में पारित हो गया।

विधेयक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में कुछ अनाधिकृत कालोनियों के निवासियों के संपत्ति के अधिकार को मान्यता देने का प्रावधान करता है।

विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • संपत्ति के अधिकार को मान्यता: विधेयक में प्रावधान है कि केंद्र सरकार अधिसूचना के माध्यम से कुछ अनाधिकृत कालोनियों के निवासियों की अचल संपत्तियों के लेन-देन को नियमित कर सकती है।
    • लेन-देन को हालिया अधिकार-पत्र (Power of Attorney), बिक्री समझौता (Agreement to Sale), वसीयत (Will), या कब्ज़ा पत्र (Possession Letter) जैसे दस्तावेज़ों के आधार पर नियमित किया जा सकता है।
    • अनाधिकृत कालोनी के जिस निवासी के पास ऐसे दस्तावेज़ होंगे वह बिक्रीनामा (Conveyance Deed) या प्राधिकरण पर्ची (Authorisation Slip) के ज़रिये स्वामित्व का अधिकार हासिल करने का पात्र होगा।
  • निवासी: विधेयक के अनुसार, निवासी वह व्यक्ति होता है जिसके पास पंजीकृत बिक्रीनामा या कुछ निश्चित दस्तावेज़ों के आधार पर संपत्ति का भौतिक कब्ज़ा होता है। इस परिभाषा में निवासियों के वैध उत्तराधिकारी शामिल हैं लेकिन इनमें किराएदार, लाइसेंसधारी या वे लोग शामिल नहीं हैं जिन्हें संपत्ति के प्रयोग की अनुमति मिली है।
  • अनाधिकृत कॉलोनी: अनधिकृत कॉलोनी को ऐसी कॉलोनी या उसके संलग्न क्षेत्र के तौर पर व्याख्यायित किया गया है जिसके लिये नक्शा या निर्माण योजना की अनुमति हासिल नहीं की गई है। इसके अतिरिक्त दिल्ली विकास प्राधिकरण (Delhi Development Authority- DDA) को नियमितीकरण के लिये कॉलोनी को अधिसूचित किया जाना चाहिये।
  • शुल्क का भुगतान: निवासियों को स्वामित्व हासिल करने के लिये कुछ शुल्क का भुगतान करना होगा। इस शुल्क को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जा सकता है। बिक्रीनामा या प्राधिकरण पर्ची में लिखित राशि पर स्टाम्प शुल्क (Stamp Duty) और पंजीकरण शुल्क (Registration Charge) देना होगा। संपत्ति से संबंधित पहले के किसी लेन-देन पर कोई स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण शुल्क नहीं चुकाना होगा।

शिक्षा

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक, 2019 (Central Sanskrit University Bill, 2019) लोकसभा में पारित हो गया। विधेयक संस्कृत के तीन मानद विश्वविद्यालयों को एक केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में समाहित करता हैं। ये विश्वविद्यालय हैं:

  1. राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली
  2. श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली
  3. राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, तिरुपति।

विदेशी मामले

समुद्री जलदस्युता रोधी विधेयक, 2019

समुद्री जलदस्युता रोधी विधेयक, 2019 (Anti-Maritime Piracy Bill, 2019) लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। विधेयक समुद्री जलदस्युता को रोकने और इसके अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान करता है। विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विधेयक की प्रयोज्यता: विधेयक भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone- EEZ) की सीमाओं से संलग्न और उससे बाहर के सभी समुद्री भागों पर लागू होगा। विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र समुद्र के उस क्षेत्र को कहते हैं जिसमें आर्थिक गतिविधियाँ करने का विशिष्ट अधिकार भारत के पास है।
  • जलदस्युता: विधेयक के अनुसार जलदस्युता का अर्थ है किसी निजी जहाज़ या एयरक्राफ्ट के चालकदल (Crew) या यात्रियों द्वारा निजी उद्देश्य के लिये किसी जहाज़, एयरक्राफ्ट, व्यक्ति या प्रॉपर्टी के खिलाफ हिंसा, बंधक बनाने या नष्ट करने की गैर-कानूनी कार्रवाई करना।
  • यह कार्रवाई खुले समुद्र में या भारत के क्षेत्राधिकार से बाहर हो सकती है। किसी को इस कार्रवाई के लिये जानबूझकर उकसाना या इसमें सहायता करना भी जलदस्युता माना जाएगी। इसमें ऐसी कार्रवाई भी शामिल है जिसे अंतर्राष्ट्रीय कानून के अंतर्गत पायरेसी माना जाता है।
  • जलदस्यु जहाज़ या एयरक्राफ्ट के संचालन में स्वैच्छिक रूप से हिस्सा लेना भी जलदस्युता में शामिल है। इसमें निम्नलिखित जहाज़ या एयरक्राफ्ट शामिल हैं:
    • जिनका जलदस्युता के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है।
    • जिनका जलदस्युता के लिये इस्तेमाल किया जा चुका है।
    • या उपर्युक्त दोनों स्थितियों में वह जहाज़ या एयरक्राफ्ट जलदस्युता के लिये दोषी व्यक्ति के नियंत्रण में है।
  • अपराध और दंड: पायरेसी पर निम्नलिखित दंड दिये जाएंगे:
    • आजीवन कारावास।
    • मृत्यु, अगर पायरेसी में हत्या की कोशिश शामिल है और उसके कारण किसी की मृत्यु हो जाती है।
    • अगर कोई पायरेसी करने की कोशिश करता है, उसमें मदद करता है, उसके लिये किसी को उकसाता है, या उसके लिये कुछ खरीदता है, या किसी दूसरे को जलदस्युता में भाग लेने के लिये निर्देश देता है तो उसके लिये 14 साल तक की सज़ा भुगतनी पड़ेगी और जुर्माना भरना पड़ेगा।
  • प्राधिकृत न्यायालय: केंद्र सरकार संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से सत्र न्यायालयों को विधेयक के अंतर्गत प्राधिकृत न्यायालय के रूप में अधिसूचित कर सकती है।
  • वह प्रत्येक प्राधिकृत न्यायालय के लिये क्षेत्राधिकार को भी अधिसूचित कर सकती है। प्राधिकृत न्यायालय निम्नलिखित व्यक्तियों द्वारा किये गए अपराधों पर विचार करेगी:
    • वह व्यक्ति जो भारतीय नौसेना या तटरक्षकों की कस्टडी में है, भले ही वह किसी भी देश का हो।
    • भारत का नागरिक, भारत में रहने वाला विदेशी नागरिक या राष्ट्रविहीन (Stateless) व्यक्ति।
    • इसके अतिरिक्त न्यायालय किसी व्यक्ति पर तब भी विचार कर सकती है, जब वह न्यायालय में शारीरिक रूप से मौजूद न हो।

भारत-ब्राज़ील के बीच सामाजिक सुरक्षा समझौता

केंद्रीय कैबिनेट ने भारत और ब्राज़ील के बीच सामाजिक सुरक्षा समझौते को स्वीकृति दी।

  • समझौते में कहा गया है कि अल्पावधि के लिये ब्राज़ील में काम करने वाले भारतीय पेशेवर और दक्ष श्रमिकों को किसी भी एक देश में सामाजिक सुरक्षा हेतु भुगतान करना होगा।
  • इसके अतिरिक्त समझौता उन मामलों में भी पेंशन के भुगतान का प्रावधान करता है जिन मामलों में श्रमिक किसी दूसरे देश में रह रहा हो।

सांख्यिकी

मसौदा राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग विधेयक, 2019

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation- MoSPI) ने मसौदा राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग विधेयक, 2019 (Draft National Statistical Commission Bill, 2019) को सार्वजनिक टिप्पणियों के लिये प्रकाशित किया है।

मसौदा विधेयक देश में सभी मुख्य सांख्यिकीय गतिविधियों के लिये एक नोडल नियामक निकाय के रूप में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (National Statistical Commission- NSC) के गठन का प्रावधान करता है। विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग का गठन: मसौदा विधेयक NSC का गठन करता है। NSC में नौ सदस्य होंगे। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    • चेयरपर्सन
    • पाँच पूर्णकालिक सदस्य
    • भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर
    • भारत के मुख्य संख्यिकिविद
    • वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार

अध्यक्ष और पाँच पूर्णकालिक सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी। ये नियुक्तियां केंद्र सरकार द्वारा गठित खोज समिति के सुझावों के आधार पर की जाएंगी।

  • NSC के कार्य: NSC केंद्र और राज्य सरकारों, न्यायालयों और अधिकरणों को सरकारी सांख्यिकी से संबंधित मामलों पर सलाह देगा।
    • इनमें राष्ट्रीय नीतियों, विधायी उपायों तथा सांख्यिकीय अवधारणाओं और प्रक्रियाओं से संबंधित मामले शामिल हैं।
    • यह सार्वजनिक वितरण के लिये सरकारी सांख्यिकी आँकड़ों का रखरखाव भी करेगा।
  • सांख्यिकीय लेखापरीक्षण (Statistical audit): मसौदा विधेयक NSC में एक राष्ट्रीय सांख्यिकी लेखापरीक्षण एवं मूल्यांकन संगठन (National Statistical Audit and Assessment Organization) की स्थापना करता है।
    • यह प्रशाखा सरकारी एजेंसियों के सांख्यिकीय सर्वेक्षण का आवधिक सांख्यिकीय परीक्षण करेगी।
    • मुख्य सांख्यिकीय लेखापरीक्षक (Chief Statistical Auditor) इसके प्रमुख होंगे जिनकी नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी।
  • राष्ट्रीय सांख्यिकी कोष (National Statistical Fund): मसौदा विधेयक राष्ट्रीय सांख्यिकी कोष की स्थापना करता है।
    • इस फंड में सरकारी अनुदानों, शुल्कों और केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किसी अन्य स्रोत से प्राप्त होने वाली राशि जमा की जाएगी।
    • कमीशन के सदस्यों के वेतन, भत्ते और दूसरे पारिश्रमिक के लिये इस फंड का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • जाँच, अपराध और सज़ा: NSC के पास निम्नलिखित स्थितियों में सरकारी एजेंसियों को चेतावनी देने या दंडित करने की शक्ति है:
    • यदि एजेंसी सांख्यिकी नैतिकता के मानदंडों का पालन नहीं करती।
    • यदि सरकारी सांख्यिकी में संलग्न कोई व्यक्ति पेशेवर दुर्व्यवहार करता है, गलत या भ्रामक बयान देता है या NSC को सूचना देने में कोई चूक करता है।

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रक्षा

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद के सृजन को मंज़ूरी

केंद्रीय कैबिनेट ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (Chief of Defence Staff- CDS) के पद के सृजन को मंज़ूरी दी। यह पद चार सितारा जनरल के रैंक वाली होगी। इसके अतिरिक्त रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत सैन्य मामले के विभाग (Department of Military Affairs) की स्थापना की जाएगी जिसके प्रमुख CDS होंगे। जनरल बिपिन रावत को 31 दिसंबर, 2019 से CDS नियुक्त किया गया है। 

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खाद्य प्रसंस्करण

NIFTEM विधेयक, 2019 पर स्थायी समिति की रिपोर्ट

कृषि संबंधी स्थायी समिति (अध्यक्ष: पी. सी. गद्दीगौदर) ने राष्ट्रीय खाद्य तकनीकी, उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान विधेयक, 2019 (National Institutes of Food Technology, Entrepreneurship and Management Bill, 2019) पर अपनी रिपोर्ट सौंपी।

विधेयक खाद्य तकनीक, उद्यमिता और प्रबंधन के कुछ संस्थानों को राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान घोषित करता है। ये संस्थान हैं- राष्ट्रीय खाद्य तकनीकी, उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान कुंडली (NIFTEM- Kundli) और भारतीय खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी संस्थान तंजावुर (IIFPT- Tanjavur)।

समिति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

  • गवर्नरों के बोर्ड का संयोजन: विधेयक में गवर्नरों के बोर्ड का प्रावधान है जो कि संस्थान का मुख्य कार्यकारी निकाय होगा। बोर्ड संस्थान के सामान्य निरीक्षण, निर्देशन और मामलों के नियंत्रण के लिये उत्तरदायी होगा।
    • खाद्य विज्ञान या तकनीक, प्रबंधन या लोक प्रशासन के क्षेत्र का विशिष्ट व्यक्ति इस बोर्ड का अध्यक्ष होगा।
    • समिति ने कहा कि चूँकि खाद्य प्रसंस्करण एक विशिष्ट क्षेत्र है इसलिये अध्यक्ष को उद्योग का व्यावहारिक तथा अकादमिक अनुभव होना चाहिये।
    • समिति ने सुझाव दिया कि अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने वाले लोगों में लोक प्रशासकों को हटाया जाना चाहिये। समिति ने कहा कि इससे संस्थान के कामकाज की नौकरशाह प्रवृत्ति को खत्म करने और उद्योग अनुकूल नीतियों को अपनाने में मदद मिलेगी।
    • समिति ने सुझाव दिया है कि प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961 (Institutes of Technology Act, 1961) की तर्ज पर गवर्नरों के बोर्ड में भी संसद सदस्य को शामिल किया जाए।
  • तकनीकी पाठ्यक्रमों के शुल्क की अधिकतम सीमा: अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (All India Council for Technical Education) के अंतर्गत राष्ट्रीय शुल्क समिति (National Fee Committee) पेशेवर पाठ्यक्रमों के लिये वसूली जाने वाली अधिकतम ट्यूशन और डेवलपमेंट शुल्क निर्धारित करती है।
    • समिति ने कहा कि राष्ट्रीय शुल्क समिति द्वारा सुझाए गए अधिकतम शुल्क की तुलना में NIFTEM, Kundli कुछ पाठ्यक्रमों के लिये अधिक फीस वसूल कर रहा है।
    • समिति ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि NIFTEM, कुंडली अब तक किस स्तर तक अतिरिक्त शुल्क वसूल चुका है, उसका विश्लेषण करने तथा सुधारात्मक उपाय करने के लिये एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाए।
    • इसके अलावा समिति ने खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय (Ministry of Food Processing Industries) को सुझाव दिया कि वह राष्ट्रीय शुल्क समिति के सुझावों के अनुसार वर्तमान शैक्षणिक वर्ष से मौजूदा पाठ्यक्रमों के शुल्क की सीमा तय करे।
    • समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि NIFTEM के विभिन्न पाठ्यक्रमों के शुल्क को उपयुक्त सीमा तक निर्धारित करने के लिये विधेयक में नया प्रावधान जोड़ा जाए।

मसौदा राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण नीति

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (Ministry of Food Processing Industries) ने मसौदा राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण नीति, 2019 (Draft National Food Processing Policy, 2019) को सार्वजनिक टिप्पणियों के लिये जारी किया।

इस मसौदा नीति का उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का विकास और उसकी प्रगति को प्रभावित करने वाली कमियों को दूर करना है। इसका एक उद्देश्य यह भी है कि वर्ष 2035 तक इस क्षेत्र में निवेश को छह गुना बढ़ाया जाए।

मसौदा नीति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • उद्देश्य (Objectives): इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
    • किसानों के स्तर पर बर्बादी को कम करना ताकि उनकी आय को बढ़ाया जा सके।
    • खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को सहयोग देना ताकि रोज़गार के अवसर पैदा हो सकें।
    • खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में उच्च क्रेडिट की सुविधा सुनिश्चित हो सके।
    • उपभोक्ताओं के लिये सुरक्षित, सस्ते और उच्च गुणवत्ता के खाद्य उत्पादों की उपलब्धता बढ़े।
    • इस क्षेत्र की मांगों को पूरा करने के लिये अवसंरचना और दक्षता निर्माण किया जाए।
  • अवसंरचना का विकास (Infrastructure Development): मसौदा नीति के तहत खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिये आपूर्ति शृंखला अवसंरचना (Supply Chain Infrastructure) के निर्माण को बढ़ावा दिया गया है। प्रस्तावित उपायों में निम्नलिखित प्रावधान शामिल हैं:
    • नए कृषि प्रसंस्करण और उत्पादन संकुलों को चिह्नित, विकसित और प्रोत्साहित करना।
    • लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे- क्लीनिंग और पैकिंग सुविधाओं के विकास को सहयोग देना।
  • प्रोत्साहन और सहायता उपाय (Incentives and Support Measures): मसौदा नीति में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के विकास हेतु प्रोत्साहन के अनेक उपाय सुझाए गए हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    • नई प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और मौजूदा इकाइयों के तकनीकी अद्यतन (Technology Upgradation) के लिये पूंजी निवेश सब्सिडी।
    • वित्तीय राहत देना, जैसे- खाद्य उत्पादों और फूड प्रोसेसिंग मशीनरी पर वस्तु एवं सेवा कर की निम्न दर।
    • बिजली शुल्क और ज़मीन पर कुछ रियायतें भी दी जा सकती हैं।
  • प्रशिक्षण और दक्षता विकास (Training and Skill Development): मसौदा नीति रोज़गार को बढ़ावा देने के लिये विभिन्न प्रोत्साहनों का प्रस्ताव रखती है, जैसे-
    • रोज़गार कल्याण को बढ़ावा देना।
    • किसानों को खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना में सहायता करना।
    • खाद्य प्रसंस्करण प्रशिक्षण सह ऊष्मायन केंद्र (Food Processing Training cum Incubation Centres) को बढ़ावा देना।

यह मसौदा नीति नए पाठ्यक्रम प्रारंभ करने और खाद्य तकनीकी, उद्यम और प्रबंधन में शोध भी प्रस्तावित करती है।


कृषि

जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के लिये बागवानी योजना

केंद्रीय कैबिनेट ने वर्ष 2021-22 तक जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख केंद्रशासित प्रदेशों में बागवानी विकास के लिये प्रधानमंत्री के विकास पैकेज (Prime Minister’s Development Package) को जारी रखने का प्रस्ताव किया है।

  • इस योजना को वर्ष 2016 में जम्मू एवं कश्मीर राज्य में नष्ट हुए बागवानी क्षेत्रों सहित बागवानी के विकास के लिये प्रस्तावित किया गया था।
  • योजना जम्मू और कश्मीर को विशेष लाभ प्रदान करती है ताकि सेबों की विशेष किस्मों के पौधों का आयात किया जा सके तथा उत्पादकता बढ़ाने की तकनीक के लिये अतिरिक्त सहायता दी जा सके।
  • इससे पूर्व इस योजना के कार्यान्वयन को वर्ष 2018-19 तक के लिये मंज़ूर किया गया था। इसे वर्ष 2021-22 तक तीन वर्षों के लिये विस्तार दिया गया है और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (Ministry of Agriculture and Farmers’ Welfare) के अनुमोदन के साथ इसे एक वर्ष और बढ़ाया जा सकता है।
  • योजना के लिये 500 करोड़ रुपए के परिव्यय को मंज़ूरी दी गई है। इसमें 40 करोड़ रुपए लद्दाख और 460 करोड़ रुपए जम्मू एवं कश्मीर के लिये निर्धारित हैं।

राष्ट्रीय मत्स्यपालन विकास बोर्ड विधेयक का मसौदा

मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने राष्ट्रीय मत्स्यपालन विकास बोर्ड (National Fisheries Development Board- NFDB) विधेयक का मसौदे जारी किया। वर्ष 2006 में NFDB को हैदराबाद तथा तेलंगाना में आंध्र प्रदेश सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 2001 के अंतर्गत पंजीकृत किया गया था।

यह देश में समग्र तरीके से मत्स्य उत्पादन को बढ़ाने और मत्स्य विकास में समन्वय स्थापित करता है। मसौदा विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • NFDB का पुनर्गठन: मसौदा विधेयक NFDB को कॉरपोरेट निकाय के तौर पर गठित करता है और इसे राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान घोषित करता है। इसके अतिरिक्त कुछ मौजूदा संस्थानों की संपत्तियों, देनदारियों, दूसरे अधिकारों एवं बाध्यताओं को NFDB में हस्तांतरित करता है।
  • बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स: NFDB को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा संचालित किया जाएगा। बोर्ड में निम्नलिखित व्यक्ति शामिल होंगे:
    • NFDB के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (बोर्ड का अध्यक्ष)।
    • संयुक्त सचिव, मत्स्यपालन विभाग।
    • राज्य मत्स्यपालन विभागों के सचिवों में से सात डायरेक्टर।
    • इस विषय के दो विशेषज्ञ।
  • NFDB के कार्य: NFDB के निम्नलिखित कार्य होंगे:
    • मत्स्यपालन और एक्वाकल्चर के विकास हेतु योजना बनाना और उसे बढ़ावा देना।
    • मत्स्यपालन के निरंतर विकास हेतु केंद्र सरकार की मंज़ूरी से योजनाएँ बनाना।
    • मत्स्यपालन की अवसंरचना को मज़बूती देना।
    • विभिन्न हितधारकों के प्रशिक्षण और कौशल विकास को सहज बनाना।
    • केंद्र सरकार को रेगुलेटरी उपायों के संबंध में सहायता देना।
  • वित्त: NFDB एक कोष बनाएगा जिसमें उसके मौजूदा उपक्रमों के स्थानांतरण से प्राप्त होने वाली राशि, उसकी गतिविधियों एवं अन्य स्रोतों से प्राप्त होने वाले शुल्क को जमा किया जाएगा। NFDB के खातों का भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India- CAG) द्वारा लेखापरीक्षण (Audit) किया जाएगा।

पर्यावरण और वन

पर्यावरण पर खनन के प्रभाव और कोल इंडिया लिमिटेड

भारतीय के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India- CAG) ने 11 दिसंबर, 2019 को पर्यावरण पर खनन के प्रभाव तथा कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited- CIL) और उसकी सहायक कंपनियों द्वारा उसके शमन (Mitigation) के आकलन पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • वायु प्रदूषण: CAG ने कहा कि जिन 28 खदानों का अध्ययन किया गया था, उनमें से 12 खदानों में निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (Ambient Air Quality Monitoring Station) की स्थापना के लिये राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (State Pollution Control Board) के निर्देशों का पालन नहीं किया गया था।
  • जल प्रदूषण: CAG ने कहा कि वर्ष 2013-18 के दौरान जिन 28 खदानों का अध्ययन किया गया, उनमें से 8 में प्रदूषक की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards- BIS) की निर्धारित सीमा से अधिक थी।
    • इसके अतिरिक्त कई खदानें केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (Central Ground Water Authority) से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (No-Objection Certificate- NOC) प्राप्त किये बिना अपने कामकाज के लिये भूजल का प्रयोग कर रही थीं।
  • पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली: वर्ष 2006 में राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (National Environmental Policy- NEP) तैयार की गई थी और इसमें सभी संबंधित केंद्रीय, राजकीय और स्थानीय निकायों से अपेक्षा की गई थी कि वे NEP के अनुकूल पर्यावरणीय संरक्षण कार्य योजनाएँ तैयार करें।
    • हालाँकि CIL ने अपनी मूल पर्यावरणीय नीति में संशोधन किया और वर्ष 2012 में व्यापक पर्यावरणीय नीति बनाई।
    • CAG ने कहा कि CIL की 7 में से 6 कोयला उत्पादक सहायिकाओं में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा मंज़ूर पर्यावरण नीति लागू नहीं थी, जैसा कि मंत्रालय ने निर्देश दिया था। उसने सुझाव दिया कि कोयला क्षेत्र की सभी कंपनियों को अपने संबंधित बोर्डों द्वारा मंज़ूर पर्यावरण नीति लागू करनी चाहिये।
  • पर्यावरण संरक्षण के लिये रेगुलेशंस का पालन: CAG ने कहा कि अप्रैल 1946 से जुलाई 2009 के बीच बंद होने वाली 35 खदानों के पास CIL अपेक्षित माइन क्लोजर स्टेटस रिपोर्ट (Mine Closure Status Report) नहीं थी। मार्च 2018 तक 16 इकाइयाँ वैध पर्यावरणीय दस्तावेज़ के बिना परिचालित हो रही थीं।
  • अन्य सुझाव: CAG ने कुछ अन्य सुझाव भी दिये जैसे:
    • सहायक कंपनियों को प्रदूषण नियंत्रण उपायों से संबंधित सभी पूंजीगत कार्यों को ज़ल्द-से-ज़ल्द पूरा करना चाहिये।
    • पर्यावरणीय लाभों को बढ़ाने के लिये सौर ऊर्जा से संचालित परियोजनाओं के कार्यान्वयन में सुधार करना चाहिये।

भारत वन स्थिति रिपोर्ट, 2019

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forests and Climate Change) ने भारत में वन क्षेत्र की स्थिति, 2019 पर एक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में देश में वन और वृक्ष क्षेत्रों का विवरण दिया गया है।

रिपोर्ट में मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:

  • देश में वन क्षेत्र कुल (Forest Cover) भौगोलिक क्षेत्र का 21.7% हैं। कुल वृक्ष क्षेत्र (Tree Cover) भौगोलिक क्षेत्र का 2.9% हैं।
  • वर्ष 2017 के पूर्व आकलन की तुलना में वन क्षेत्र में 0.6% और वृक्ष क्षेत्र में 1.3% की वृद्धि हुई है। पिछले आकलन की तुलना में मैन्ग्रोव क्षेत्र भी 1.1% बढ़ा है।
  • देश में वनों के औसत वार्षिक उत्पादन की तुलना में जंगलों के आस-पास रहने वाले ग्रामीणों द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 7% लकड़ियाँ काटी जाती हैं।
  • देश के लगभग 21.4% वन क्षेत्र में आग लगने की अत्यधिक आशंका है।

तालिका में 2019 में भारत में वन क्षेत्र को प्रदर्शित किया गया है।

भारत में वन क्षेत्र (2019)

श्रेणी क्षेत्र (वर्ग किमी) क्षेत्रफल का प्रतिशत

अत्यधिक घने जंगल (Very dense forest)

99,278 3.02%

औसत दर्जे के घने जंगल (Moderately dense forest)

3,08,472 9.38%

खुले जंगल (Open forest)

3,04,499 9.26%

कुल वन क्षेत्र (Total forest cover)

7,12,249 21.67%
वृक्ष कवर (Tree cover) 95,027 2.89%
गैर वन और झाड़ियाँ (Non-forest and scrub) 24,80,193 75.44%
कुल भौगोलिक क्षेत्र (Total geographical area) 32,87,469 100.00%

नोट: जंगल क्षेत्र में मैन्ग्रोव को भी शामिल किया गया है

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जल शक्ति

अटल भूजल योजना

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अटल भूजल योजना को मंज़ूरी दी जिसका उद्देश्य सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से भूजल प्रबंधन में सुधार करना है।

  • यह योजना सात राज्यों के कुछ चिन्हित प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में लागू होगी। ये राज्य हैं- गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश।
  • इसे पाँच वर्षों की अवधि (वर्ष 2020-21 से वर्ष 2024-25) के लिये लागू किया जाएगा।
  • केंद्र सरकार योजना के लिये 6,000 करोड़ रुपए का कुल अनुदान देगी। इसमें से 50% विश्व बैंक द्वारा ऋण के रूप में दिया जाएगा जिसे केंद्र सरकार चुकाएगी। शेष 50% राशि केंद्र सरकार नियमित बजटीय सहयोग द्वारा प्रदान करेगी।

योजना के दो प्रमुख घटक हैं:

  • संस्थागत मज़बूती: सतत् भूजल प्रबंधन के लिये संस्थागत व्यवस्था को मज़बूत किया जाएगा। इसमें मॉनीटरिंग तंत्र में सुधार, सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण जैसे उपायों के ज़रिये उपलब्ध भूजल का प्रभावी उपयोग और क्षमता निर्माण शामिल हैं।
  • प्रोत्साहन: भूजल प्रबंधन में सुधार करने के लिये राज्यों को प्रोत्साहित किया जाएगा। इनमें डेटा वितरण, जल सुरक्षा योजनाओं की तैयारी (विभिन्न मौजूदा/नई योजनाओं के संमिलन के ज़रिये) और प्रबंधन संबंधी कार्यक्रमों को लागू करना शामिल है।

जल जीवन मिशन के संचालन हेतु दिशा-निर्देश

जल शक्ति मंत्रालय ने जल जीवन मिशन के लिये संचालन हेतु दिशा-निर्देश जारी किये। इस मिशन को अगस्त 2019 में केंद्रीय कैबिनेट ने मंज़ूरी दी थी ताकि वर्ष 2024 तक प्रत्येक ग्रामीण घर को घर में ही चालू नल का कनेक्शन प्रदान किया जा सके।

वर्तमान में देश के 17.9 करोड़ ग्रामीण घरों में से लगभग 14.6 करोड़ (82%) घरों में नल का कनेक्शन नहीं है। दिशा-निर्देशों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • संस्थागत ढाँचा: मिशन में चार स्तरीय संस्थागत ढाँचा बनाने के लिये कुछ मौजूदा और नई योजनाओं को समाहित किया गया है:
    • केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जल जीवन मिशन।
    • राज्य स्तर पर राज्य जल और स्वच्छता मिशन।
    • जिला स्तर पर ज़िला जल और स्वच्छता मिशन।
    • ग्रामीण स्तर पर ग्राम पंचायत और/या उसकी उप समितियाँ।

दिशा-निर्देश विभिन्न स्तरों पर कार्य करने वाले विभिन्न निकायों को अधिकार, कार्य और उनके संरचना के लिये एक ढाँचा प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिये ग्राम पंचायत ग्रामीण स्तर की संरचना की योजना, डिज़ाइन बनाने, उनके कार्यान्वयन और परिचालन एवं रखरखाव में मदद देंगी।

  • वित्तपोषण: मिशन की कुल लागत 3.6 लाख करोड़ रुपए अनुमानित है। इसमें केंद्र का हिस्सा लगभग 2.1 लाख करोड़ रुपए है।
    • केंद्र और राज्यों के बीच फंड शेयरिंग पैटर्न हिमालयी एवं पूर्वोत्तर राज्यों के लिये 90:10 का होगा, अन्य राज्यों के लिये 50:50 और केंद्रशासित प्रदेशों के लिये 100% होगा।
    • यह प्रस्तावित किया गया है कि जल आपूर्ति संरचना के लिये 10% पूंजी का योगदान ग्राम से होना चाहिये।
    • पहाड़ी, वन क्षेत्रों और 50% से अधिक SC/ST जनसंख्या वाले गाँवों के लिये यह 5% होना चाहिये।
  • कार्यान्वयन: प्रत्येक गांव को एक ग्राम कार्य योजना बनानी होगी जिसमें निम्नलिखित घटक होंगे:
    • जल स्रोत और उसका रखरखाव।
    • जल आपूर्ति।
    • धूसर जल (नहाने और धोने जैसे कार्यों से जनित जल) प्रबंधन।

इन योजनाओं को ज़िला और राज्य स्तर पर एकीकृत किया जाएगा। इससे क्षेत्रीय ग्रिड, थोक जलापूर्ति और वितरण योजनाओं जैसे परियोजनाओं को समग्र दृष्टिकोण मिलेगा।

  • निरीक्षण: मिशन की भौतिक और वित्तीय प्रगति का निरीक्षण एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली द्वारा किया जाएगा। सार्वजनिक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग और स्थानीय समुदाय द्वारा पानी की गुणवत्ता की निगरानी और जाँच की जाएगी।

विद्युत्

विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा संयंत्र के विकास हेतु दिशा-निर्देश

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of New and Renewable Energy) ने विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा संयंत्र के विकास हेतु दिशा-निर्देश जारी किये। ये दिशा-निर्देश ग्रामीण क्षेत्रों में उपस्थित विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा परियोजनाओं से वितरण कंपनियों (Distribution Companies- Discoms) द्वारा सौर ऊर्जा की खरीद के लिये लागू होंगे।

ये दिशा-निर्देश सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते और विश्वसनीय सौर ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। इनकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • प्रयोज्यता: ये दिशा-निर्देश उन विकेंद्रीकृत संयंत्रों से Discoms द्वारा सौर ऊर्जा खरीदने पर लागू होंगे:
    • जिनकी क्षमता 2 मेगावॉट से अधिक है और जो 66/11 किलोवॉट या उससे अधिक की रेटिंग वाले वितरण सब-स्टेशनों से जुड़े हैं।
    • जिनकी क्षमता 2 मेगावॉट तक है और जो 33/11 किलोवॉट या उससे अधिक की रेटिंग वाले वितरण सब-स्टेशनों से जुड़े हैं। ऐसी परियोजनाएँ किसी व्यक्ति, सहकारी संघ या कंपनी द्वारा स्थापित की जा सकती हैं।
  • उत्पादकों के चयन की प्रक्रिया: Discoms कुछ कारकों के आधार पर सब-स्टेशनों की सौर ऊर्जा क्षमता को चिन्हित करेंगे, जैसे दिन के समय औसत लोड की जरूरत और तकनीकी व्यावहारिकता। वे निर्माण और संचालन के आधार पर सौर ऊर्जा संयंत्रों के विकास के लिये एक खुली प्रतिस्पर्द्धात्मक नीलामी प्रक्रिया संचालित करेंगे।
  • विद्युत् खरीद समझौता: Discoms और सौर ऊर्जा उत्पादक 25 साल की अवधि के लिये विद्युत् खरीद समझौता करेंगे। उत्पादक को समझौते की तारीख से नौ महीने के भीतर संयंत्र को चालू करना होगा, जहाँ डिस्कॉम द्वारा भूमि और कनेक्टिविटी प्रदान की जा रही हो।
    • अन्य मामलों में समय सीमा 12 महीने है। यदि न्यूनतम उत्पादन में कमी होती है तो उत्पादक को Discoms को मुआवज़ा देना होगा, जैसा कि विद्युत् खरीद समझौते के तहत सहमति दी गई हो। सभी सौर ऊर्जा संयंत्रों को ग्रिड नियमों का अनुपालन करना होगा।
  • समन्वय एजेंसी: राज्य की नोडल एजेंसी Discoms के साथ समन्वय करेगी और जरूरी मंज़ूरियों तथा परियोजनाओं के विकास में उत्पादक की मदद करेगी।

शक्ति (SHAKTI) नीति

विद्युत् मंत्रालय (Ministry of Power) ने जुलाई 2018 में तनावग्रस्त तापीय ऊर्जा परिसंपत्तियों (Stressed Thermal Power Assets) से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिये एक उच्च-स्तरीय सशक्त समिति (High-Level Empowered Committee) का गठन किया था।

  • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मार्च 2019 में समिति के कुछ सुझावों को मंज़ूरी दी। समिति के सुझावों में से एक सुझाव उन ऊर्जा संयंत्रों को अल्पावधि के लिये कोयला लिंकेज (Coal Linkage) प्रदान करना था जिनके पास विद्युत् खरीद समझौता (Power Purchase Agreements- PPA) न हो।
  • अल्पावधि का यह लिंकेज शक्ति नीति (SHAKTI Policy) के अंतर्गत प्रदान किया जाएगा। शक्ति नीति तापीय ऊर्जा संयंत्रों के बीच कोयले के आबंटन को पारदर्शी और उद्देश्यपूर्ण तरीके से प्रदान करने का प्रयास करती है।

मंत्रालय ने इस तरह के अल्पावधि के लिंकेज की नीलामी के लिये कार्यप्रणाली जारी की। इस कार्यप्रणाली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • पात्रता: बंद पड़े ऊर्जा संयंत्रों को छोड़कर सभी ऊर्जा संयंत्र, जिनकी कम-से-कम 50% अनपेक्षित क्षमता (PPA के बिना उत्पादन क्षमता) है, अल्पावधि के लिंकेज के लिये नीलामी में भाग लेने के लिये पात्र होंगे।
  • लिंकेज की अवधि: ऊर्जा संयंत्र तीन महीने की अवधि के लिये कोयला लिंकेज का उपभोग कर सकता है।
  • नीलामी का समय: कोयला लिंकेज की नीलामी प्रत्येक तीन महीने में एक बार की जाएगी। इस संबंध में कोयला कंपनियाँ एक वार्षिक कैलेंडर छापेंगी।
  • नीलामी की प्रक्रिया: कोयला कंपनी प्रतिस्पर्द्धात्मक नीलामी प्रक्रिया संचालित करेगी। नीलामी की बोली में कोयले की अधिसूचित कीमत के अतिरिक्त एक प्रीमियम शामिल होगा।
  • बिजली के उपयोग की शर्तें: इन कोयला लिंकेज से उत्पन्न बिजली को निम्नलिखित तरीके से बेचना होगा:
    • पॉवर एक्सचेंज के ज़रिये दिन-प्रतिदिन के बाज़ार में।
    • डिस्कवरी ऑफ एफीशियंट एनर्जी प्राइज़ (Discovery of Efficient Energy Price- DEEP) पोर्टल पर पारदर्शी नीलामी प्रक्रिया के जरिए अल्पावधि में।

DEEP पोर्टल वितरण कंपनियों द्वारा बिजली की अल्पावधि की सप्लाई की खरीद के लिये एक ई-बिडिंग और ई-रिवर्स नीलामी पोर्टल है।


इस्पात

इस्पात क्षेत्र में ग्रीनफील्ड निवेश

इस्पात मंत्रालय (Ministry of Steel) ने नए इस्पात संयंत्रों को बढ़ावा देने वाली नीति का मसौदा प्रकाशित किया।

  • मंत्रालय ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2424-25 तक घरेलू इस्पात की मांग को पूरा करने के लिये प्रति वर्ष इस्पात उत्पादन की 25-30 मिलियन टन की अतिरिक्त क्षमता की आवश्यकता है। इसके लिये 1-1.5 लाख करोड़ रुपए के निवेश के साथ नए संयंत्रों (ग्रीनफील्ड इस्पात संयंत्र) को स्थापित करने की आवश्यकता होगी।
  • मसौदा नीति नई परियोजनाओं को स्थापित करने की मुख्य चुनौतियों को हल करने का प्रयास करती है, जैसे:
    • भूमि की उपलब्धता।
    • प्रतिस्पर्द्धी मूल्य पर लौह-अयस्क की दीर्घकालिक उपलब्धता।
    • सांविधिक मंज़ूरियाँ ज़ल्द-से-ज़ल्द प्राप्त करना।
    • बड़े निवेश के लिये प्रोत्साहन।

मसौदा नीति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

ऑपरेटिंग मॉडल: मसौदा नीति नई परियोजनाओं के लिये भूमि और लौह-अयस्क खदानें प्रदान करने हेतु निम्नलिखित मॉडल प्रदान करती है:

  • इस्पात CPSEs से मदद: स्टील क्षेत्र के केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (Central Public Sector Enterprises- CPSEs) के पास उपलब्ध अतिरिक्त भूमि और इनके अंतर्गत आने वाली खदानों से लौह-अयस्क की सप्लाई इस उद्देश्य के लिये की जा सकती है।
  • राज्य सरकार की मदद: राज्य सरकारें परियोजनाओं के लिये उपयुक्त भूमि की पहचान करने हेतु ज़िम्मेदार होंगी। खदानों को निम्नलिखित विकल्पों के माध्यम से प्रदान किया जा सकता है:
    • किसी खदान की प्रत्यक्ष नीलामी।
    • एक निर्दिष्ट खदान एक CPSE/SPSE के लिये रिज़र्व हो सकती है और फिर परियोजना हेतु निर्दिष्ट खदान के लिये दीर्घावधि का (15 से अधिक वर्षों के लिये) लिंकेज प्रदान किया जा सकता है।
    • एक निर्दिष्ट खदान राज्य सरकार की कंपनी के लिये रिज़र्व हो सकती है और परियोजना के मालिक को कंपनी में 26% इक्विटी दी जा सकती है।
    • भूमि और खदानों के स्वामित्व को स्थानांतरित करने के लिये एक संयुक्त नीलामी आयोजित की जाएगी।

मंत्रालय की भूमिका: नीति के मसौदे पर स्टील मंत्रालय की मुख्य ज़िम्मेदारियाँ निम्नलिखित हैं:

  • परियोजनाओं की समीक्षा करने के लिये एक टास्क फोर्स का गठन, उन्हें अनुमोदन और ढाँचागत समर्थन देना।
  • पर्यावरणीय और वन मंज़ूरी के लिये एकल विंडो प्रदान करना।
  • इन परियोजनाओं के लिये राज्य की औद्योगिक नीतियों और केंद्र सरकार की योजनाओं के अंतर्गत प्रोत्साहन देना।
  • निर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर ग्रीनफील्ड परियोजना को पूरा करने के लिये प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग सेल की स्थापना।
  • रेलवे, सड़क और मलबे की पाइपलाइन जैसे लॉजिस्टिक्स अवसंरचना के विस्तार हेतु आवश्यक परियोजनाओं को प्राथमिकता देना।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना

भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General- CAG) प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (Pradhan Mantri Ujjwala Yojana- PMUY) की प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट सौंपी।

PMUY योजना मई 2016 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले (Below Poverty Line- BPL) परिवारों की महिलाओं को लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (Liquefied Petroleum Gas- LPG) कनेक्शन प्रदान करना है।

रिपोर्ट में मई 2016 से दिसंबर 2018 के बीच योजना के कार्यान्वयन को ऑडिट किया गया है। रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:

  • लाभार्थियों को चिह्नित करना: योजना के अंतर्गत कनेक्शन लेने के लिये पात्र लाभार्थियों (BPL परिवारों को महिलाओं को) को कुछ दस्तावेज़ जैसे- निवास प्रमाण-पत्र, आधार नंबर और बैंक खाते का विवरण आदि प्रदान करने होते हैं।
    • CAG ने कहा कि योजना के अंतर्गत कुल कनेक्शनों में से 42% कनेक्शन सिर्फ लाभार्थी के आधार नंबर पर दिये गए हैं।
    • रिपोर्ट में पता चला है कि लाभार्थियों की पहचान के कई बेमेल मामले सामने आए हैं।
    • उसने सुझाव दिया कि LPG वितरकों को डेटा सत्यापन और इलेक्ट्रॉनिक KYC जैसे उपाय करने चाहिये ताकि अपात्र लोगों को कनेक्शन न मिले।
  • LPG का निरंतर उपयोग: CAG ने कहा कि योजना के अंतर्गत 7.2 करोड़ कनेक्शन दिये गए थे, जबकि मार्च 2020 तक का लक्ष्य आठ करोड़ (90%) था।
    • हालाँकि लाभार्थियों के लिये औसत वार्षिक रीफिल की खपत कम बनी हुई है (जनवरी 2019 तक 3.18 करोड़ लाभार्थियों पर औसत वार्षिक रीफिल खपत 3.21 रीफिल प्रति वर्ष है)।
    • LPG वितरक लाभार्थियों को यह विकल्प देते हैं कि वे कुकिंग स्टोव और पहले रीफिल के खर्च को कवर करने के लिये लोन ले सकते हैं।
    • CAG ने कहा कि रीफिल की कम खपत ने वितरकों के लिये 1,235 करोड़ रुपए मूल्य की लोन रिकवरी को भी बाधित किया है।
    • CAG ने सुझाव दिया कि कनेक्शन देने का लक्ष्य व्यापक रूप से हासिल किया जा चुका है इसलिये योजना को अब उसके निरंतर उपयोग पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
  • सिलिंडरों की इंस्टालेशन और डायवर्जन में देरी: CAG ने सिलिंडरों के इंस्टॉलेशन में देरी के कई मामलों का पता लगाया। इसके अतिरिक्त ऐसे मामले भी देखे गए जहाँ वार्षिक उपभोग 12 सिलिंडर से अधिक था।
    • CAG ने कहा कि यह घरेलू सिलिंडरों के वाणिज्यिक प्रयोग की ओर संकेत देता है और यह सुझाव दिया कि अधिक उपभोग के मामलों की निरंतर समीक्षा की जानी चाहिये ताकि डायवर्जन को रोका जा सके।

संचार

दूरसंचार क्षेत्र में टैरिफ संबंधी मुद्दे

TRAI (Telecom Regulatory Authority of India- TRAI) ने दूरसंचार क्षेत्र में टैरिफ से संबंधी विषयों पर एक परामर्श पत्र जारी किया है।

  • टैरिफ का वर्तमान ढाँचा दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को विभिन्न दूरसंचार सेवाओं के लिये मौजूदा बाज़ार की स्थितियों के अनुसार शुल्क तय करने की स्वतंत्रता देता है।
  • TRAI केवल कुछ टैरिफ्स जैसे- नेशनल रोमिंग (National Roaming), ग्रामीण टेलीफोनी (Rural Telephony) और मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी शुल्क (Mobile Number Portability Charges) को निर्दिष्ट करता है। दूरसंचार क्षेत्र की वित्तीय स्थिति को देखते हुए कई प्रतिनिधिमंडल भी TRAI के पास फ्लोर प्राइज़ को तय करने के संबंध में मिल चुके हैं।
  • TRAI ने कहा कि बाज़ार की स्थितियों को देखते हुए टैरिफ तय करने की स्वतंत्रता और लचीलेपन ने दूरसंचार क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा को सहज बनाया है, हालाँकि दूरसंचार क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण सेवा सुनिश्चित करने और तकनीकी परिवर्तनों को अपनाने के लिये बड़े निवेश की जरूरत होती है इसलिये क्षेत्र की अच्छी वित्तीय स्थिति को सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

जारी परामर्श पत्र में निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणियाँ आमंत्रित की गई हैं:

  • मौजूदा चरण पर टैरिफ तय करने हेतु नियामक हस्तक्षेप की आवश्यकता।
  • कई दूरसंचार सेवा प्रदाताओं द्वारा टैरिफ बढ़ाने के बावजूद फ्लोर प्राइज़ तय करने की आवश्यकता।
  • मोबाइल डेटा सर्विस और वॉयस कॉल जैसी विभिन्न सेवाओं, रीटेल कस्टमर्स और कॉरपोरेट जैसे विभिन्न ग्राहक सेगमेंट्स के लिये फ्लोर प्राइज़ तय करने की आवश्यकता।
  • फ्लोर प्राइज तय करने की प्रणाली और मानदंड।
  • उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिये प्राइज़ सीलिंग की जरूरत (अगर फ्लोर प्राइज पर विचार किया जाता है)।
  • सीलिंग प्राइज़ तय करने की प्रणाली और मानदंड।

युवा मामले और खेल

खेलो इंडिया योजना पर स्थायी समिति की रिपोर्ट

मानव संसाधन विकास संबंधी स्थायी समिति ने खेलो इंडिया योजना पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस योजना का उद्देश्य भारत में खेल संस्कृति को पुनर्जीवित करना और खेल के क्षेत्र में उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है।

समिति के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • धन का उपयोग: समिति के अनुसार, 2018-19 और 2019-20 के दौरान खेलो इंडिया योजना का वास्तविक व्यय क्रमशः 324 करोड़ रुपए और 308 करोड़ रुपए था, हालाँकि अनुमानित आवंटन क्रमशः 520 करोड़ रुपए और 500 करोड़ रुपए था।
    • खेल विभाग ने योजना के कार्यान्वयन की बाधाओं के लिये अपर्याप्त धन और मानव संसाधन को ज़िम्मेदार माना।
    • समिति ने कहा कि इन बाधाओं को दूर करने के लिये बजट में बढ़ोतरी करने की आवश्यकता है। समिति ने सुझाव दिया कि विभाग को पहले उसे आवंटित धनराशि का प्रयोग करना चाहिये और फिर अन्य संसाधन जुटाने चाहिये।
    • अन्य संसाधनों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:
      • निजी और कॉरपोरेट क्षेत्र से धन प्राप्त करना।
      • खेल संबंधी अवसंरचना के निर्माण हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी।
      • सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के सदस्यों के साथ योजना का संमिलन। इस योजना के ज़रिये सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों में विकासपरक कार्य कर पाते हैं।
  • प्रशिक्षकों (Coaches) की कमी: समिति ने कहा कि प्रशिक्षकों के प्रत्येक 1,524 पद पर 544 प्रशिक्षकों की कमी है। समिति ने सुझाव दिया कि प्रशिक्षकों के रिक्त पदों को ज़ल्द-से-ज़ल्द भरा जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने में मदद के लिये विभाग को निजी खेल अकादमियाँ चलाने वाले प्रशिक्षकों से सहयोग प्राप्त करना चाहिये।
  • खेल के अवसंरचना: समिति ने कहा कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में खेल अवसंरचना की कमी है। इस कमी को दूर करने के लिये विभाग राज्यों को अनुदान देता है।
    • समिति ने पाया कि केवल 13 राज्यों को अनुदान दिये गए हैं। उसने कहा कि कुछ राज्यों जैसे- बिहार, झारखंड और ओड़िशा को कोई अनुदान नहीं मिला।
    • समिति ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को इन राज्यों और आदिवासी क्षेत्रों में खेल संबंधी अवसंरचना विकसित करना चाहिये जहाँ खेल प्रतिभाएँ मौजूद हो सकती हैं ताकि सभी राज्यों में एक समान खेल अवसंरचना सुनिश्चित हो सके।
  • शिक्षा: समिति ने कहा कि वर्ष 2018-19 में प्रशिक्षण के लिये चुने गए 1,518 खिलाड़ियों में से केवल 625 ने एक्रेडेटेड अकादमियों में दाखिला लिया और 893 ने छोड़ किया।
    • समिति ने कहा कि ड्रॉप-आउट का मुख्य कारण यह था कि अकादमियों में एकीकृत शिक्षा का अभाव था। उसने सुझाव दिया कि अकादमियों के पास शिक्षण और छात्रावास संबंधी सुविधाएँ होनी चाहिये ताकि प्रशिक्षु अपनी बुनियादी शिक्षा पूरी कर सकें।
    • इसके अतिरिक्त मौजूदा स्कूलों, कॉलेजों और छात्रावास वाली अकादमियों में ट्रेनिंग स्पेस को चिह्नित किया जाना चाहिये। इन्हें खेलो इंडिया योजना के साथ संबद्ध किया जा सकता है।
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