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पीआरएस कैप्सूल्स

विविध

नवंबर, 2019

  • 26 Dec 2019
  • 141 min read

पीआरएस की प्रमुख हाइलाइट्स

  • समष्टि आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) विकास
    • 2019-20 की दूसरी तिमाही में जीडीपी में 4.5% की वृद्धि
    • 2019-20 की दूसरी तिमाही में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि में 0.4% की गिरावट
  • वित्त
    • कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत
    • चिट फंड्स (संशोधन) विधेयक, 2019 संसद में पारित
    • अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत
    • 15वें वित्त आयोग की अवधि एक वर्ष के लिये विस्तारित
    • रुकी हुई आवासीय परियोजनाओं हेतु स्पेशल विंडो फंड
    • छह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का रणनीतिक विनिवेश
    • RBI ने नियामक सैंडबॉक्स के अंतर्गत पहले कोहोर्ट को खोलने की घोषणा की
    • कोर निवेश कंपनियों के लिये विनियामक और पर्यवेक्षी ढाँचे पर कार्यदल की रिपोर्ट
    • NBFCs के लिये तरलता जोखिम प्रबंधन फ्रेमवर्क में संशोधन
  • कानून और न्याय
    • ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2019 संसद में पारित
    • वित्त अधिनियम, 2017 के तहत न्यायाधिकरणों के पुनर्गठन पर निर्णय
    • सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 के एक प्रावधान को निरस्त किया
    • CJI का कार्यालय सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत
    • सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक के 17 विधायकों की अयोग्यता बरकरार रखी
  • श्रम
    • औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत
  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण
    • इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट पर प्रतिबंध विधेयक, 2019 लोकसभा में पारित
    • सरोगेसी (विनियमन) विधेयक , 2019 चयन समिति को भेजा गया
    • राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग विधेयक, 2019 पर स्थायी समिति की रिपोर्ट
    • भारतीय चिकित्सा प्रणाली हेतु राष्ट्रीय आयोग विधेयक, 2019 पर स्थायी समिति की रिपोर्ट
  • गृह मामले
    • विशेष सुरक्षा दल (संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में पारित
    • आयुध अधिनियम में संशोधन
    • दादरा और नगर हवेली तथा दमन एवं दीव (केंद्रशासित प्रदेशों का विलय) विधेयक, 2019
    • निजी सुरक्षा एजेंसी केंद्रीय (संशोधन) मॉडल नियम, 2019 का मसौदा सार्वजनिक टिप्पणियों के लिये जारी
  • आवासन और शहरी मामले
    • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (अनधिकृत कालोनियों के निवासियों की संपत्ति के अधिकार को मान्यता) विधेयक, 2019
  • परिवहन
    • जहाज़ पुनर्चक्रण विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत
  • वाणिज्य और उद्योग
    • राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान (संशोधन) विधेयक, 2019 संसद में पारित
  • संस्कृति
    • जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक, 2019 संसद में पारित
  • कॉरपोरेट मामले
    • गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के दिवालियापन का समाधान के लिये नियम अधिसूचित
    • कंपनी कानून समिति ने रिपोर्ट जारी की
  • खाद्य और सार्वजनिक वितरण
    • कैबिनेट द्वारा FCI की अधिकृत पूंजी में वृद्धि
  • उपभोक्ता मामले
    • प्रतीक और नामों के अनुचित उपयोग के लिये जुर्माना बढ़ाने पर संशोधन मसौदा जारी
    • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अंतर्गत कुछ मसौदा नियम जारी किये गए
  • सूचना और प्रसारण
    • प्रेस और पत्रिका पंजीकरण विधेयक, 2019 का मसौदा जारी
    • TRAI ने सेट टॉप बॉक्स की अंतर्संक्रियता पर टिप्पणियाँ आमंत्रित कीं
    • TRAI ने DTH ऑपरेटरों द्वारा प्लेटफॉर्म सर्विसेज़ पर सुझाव जारी किये
  • टेलीकॉम
    • कैबिनेट ने स्पेक्ट्रम नीलामी की किस्तों के भुगतान को स्थगित किया
    • TRAI ने अंतर्राष्ट्रीय कॉल्स पर इंटरकनेक्शन टर्मिनेशन चार्जेज़ पर टिप्पणियाँ मांगीं
  • इस्पात
    • इस्पात मंत्रालय ने इस्पात अपशिष्ट पुनर्चक्रण नीति जारी की
    • इस्पात संकुल के विकास के लिये मसौदा नीति जारी
  • विद्युत
    • सौर और वायु ऊर्जा का इस्तेमाल करके बिजली उत्पादित करने पर अंतर्राज्यीय ट्रांसमिशन शुल्क पर छूट की अवधि बढ़ी
    • पीएम-कुसुम योजना के एक घटक के कार्यान्वयन संबंधी दिशा-निर्देश जारी
  • विदेशी मामले
    • 11वीं ब्रिक्स शिखर वार्ता के बाद ब्रासीलिया घोषणापत्र जारी
    • जर्मनी की चांसलर का भारत दौरा

समष्टि आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) विकास

2019-20 की दूसरी तिमाही में जीडीपी में 4.5% की वृद्धि

2019-20 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के दौरान देश में सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product- GDP) में 2011-12 की स्थिर कीमतों पर पिछले वर्ष की तुलना में 4.5% की वृद्धि हुई।

जीडीपी में वृद्धि (% में, वर्ष-दर-वर्ष)

GDP-increase

  • विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में जीडीपी वृद्धि को सकल मूल्य संवर्द्धन (Gross Value Added- GVA) में मापा जाता है।
  • सभी क्षेत्रों में संयुक्त GVA वृद्धि दर वर्ष 2018-19 की दूसरी तिमाही में 6.9% थी, जबकि 2019-20 की दूसरी तिमाही में यह घटकर 4.3% हो गई।
  • खनन को छोड़कर सभी क्षेत्रों में GVA वृद्धि दर में गिरावट देखी गई। खनन क्षेत्र में GVA वृद्धि दर -2.2% से बढ़कर 0.1% हो गई।
  • उल्लेखनीय है कि विनिर्माण क्षेत्र के लिये GVA में 2019-20 की दूसरी तिमाही में 1% की कमी हुई, जबकि एक वर्ष पूर्व इसी अवधि के दौरान इसमें 6.9% की वृद्धि हुई थी।

विभिन्न क्षेत्रों में GVA (वृद्धि % में, वर्ष-दर-वर्ष)

क्षेत्र तिमाही 2
2018-19
तिमाही 1
2019-20
तिमाही 2
2019-20
कृषि 4.9% 2.0% 2.1%
खनन -2.2% 2.7% 0.1%
विनिर्माण 6.9% 0.6% -1.0%
विद्युत 8.7% 8.6% 3.6%
निर्माण 8.5% 5.7% 3.3%
सेवाएँ 7.3% 6.9% 6.8%
GVA 6.9% 4.9% 4.3%

2019-20 की दूसरी तिमाही में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि में 0.4% की गिरावट

2018-19 की दूसरी तिमाही की तुलना में 2019-20 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (Index of Industrial Production - IIP) में 0.4% की कमी हुई।

  • विद्युत क्षेत्र में 0.4% की वृद्धि देखी गई, जबकि विनिर्माण और खनन क्षेत्रों में क्रमशः 0.4% और 1.2% की गिरावट हुई।
  • रेखाचित्र 2019-20 की दूसरी तिमाही के लिये औद्योगिक उत्पादन, समग्र और सभी क्षेत्रों में वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि को स्पष्ट करता है।

2019-20 की दूसरी तिमाही में आईआईपी में वृद्धि (वर्ष-दर-वर्ष)

2019-20-IIP


वित्त

कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत

कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, 2019 [Taxation Law (Amendment) Bill, 2019] लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। यह विधेयक सितंबर 2019 में उद्घोषित अध्यादेश के स्थान पर लाया गया।

यह विधेयक आयकर अधिनियम, 1961 (Income Tax Act, 1961- IT Act) और वित्त (संख्या 2) अधिनियम, 2019 [Finance (No. 2) Act, 2019] में संशोधन करता है। विधेयक घरेलू कंपनियों को निचली दर पर टैक्स चुकाने का विकल्प देता है यदि वे कुछ कटौतियों का दावा न करें।

इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • घरेलू कंपनियों के लिये 22% टैक्स दर: वर्तमान में 400 करोड़ रुपए तक के वार्षिक टर्नओवर वाली घरेलू कंपनियाँ 25% की दर से आयकर चुकाती हैं। दूसरी घरेलू कंपनियों के लिये यह दर 30% है। विधेयक में प्रावधान है कि अगर घरेलू कंपनियाँ IT Act के अंतर्गत कुछ कटौतियों का दावा नहीं करती हैं तो उनके पास 22% की दर से आयकर चुकाने का विकल्प है। इनमें निम्नलिखित कटौतियाँ शामिल हैं:
    • विशेष आर्थिक क्षेत्रों (Special Economic Zones) के अंतर्गत स्थापित नई इकाइयाँ।
    • अधिसूचित पिछड़े क्षेत्रों में नए संयंत्र या मशीनरी में निवेश करना।
    • वैज्ञानिक अनुसंधान, कृषि विस्तारीकरण और कौशल विकास की परियोजनाओं पर व्यय।
    • नए संयंत्र या मशीनरी का मूल्यह्रास (कुछ मामलों में)।
    • आयकर अधिनियम के अंतर्गत अन्य विभिन्न प्रावधान।
  • नई घरेलू विनिर्माण कंपनियों के लिये 15% टैक्स दर: यदि नई घरेलू विनिर्माण कंपनियाँ IT Act के अंतर्गत उपर्युक्त कटौतियों का दावा नहीं करती हैं तो वे 15% की दर से आयकर चुकाने का विकल्प चुन सकती हैं। इसके लिये उन्हें 30 सितंबर, 2019 के बाद स्थापित और पंजीकृत होना चाहिये तथा 1 अप्रैल, 2023 से पहले विनिर्माण शुरू कर देना चाहिये। इनमें निम्नलिखित कंपनियाँ शामिल नहीं होंगी:
    • मौजूदा व्यापार के विभाजन या पुनर्निर्माण से बनी कंपनियाँ।
    • विनिर्माण के अलावा किसी अन्य व्यापार में संलग्न।
    • भारत में पहले इस्तेमाल होने वाले किसी संयंत्र या मशीनरी का प्रयोग करने वाली कंपनियाँ (कुछ विशिष्ट शर्तों को छोड़कर)।
  • टैक्स की नई दरों की व्यावहारिकता: कंपनियाँ 2019-20 के वित्तीय वर्ष (यानी आकलन वर्ष 2020-21) से नई दरों का विकल्प चुन सकती हैं। एक बार विकल्प चुनने के बाद आगामी वर्षों में भी यही विकल्प लागू होगा। अगर नए विकल्प चुनने वाली कंपनियाँ कुछ शर्तों का पालन नहीं करती हैं तो वे उस वर्ष और आगे के वर्षों के लिये नए विकल्प का प्रयोग नहीं कर सकतीं। कुछ मामलों में यदि किसी कंपनी के लिये 15% टैक्स दर का विकल्प अवैध हो जाता है तो वह 22% टैक्स दर को चुन सकती है।

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चिट फंड्स (संशोधन) विधेयक, 2019 संसद में पारित

चिट फंड्स (संशोधन) विधेयक, 2019 [Chit Funds (Amendment) Bill, 2019] को संसद में पारित कर दिया गया। यह विधेयक चिट फंड्स अधिनियम, 1982 (Chit Funds Act, 1982) में संशोधन करता है। अधिनयम चिट फंड्स को विनियमित करता है और राज्य सरकार की पूर्व मंज़ूरी के बिना फंड बनाने पर प्रतिबंध लगाता है।

किसी चिट फंड के अंतर्गत लोग इस बात के लिये सहमत होते हैं कि वे समय-समय पर एक निश्चित राशि फंड में जमा करेंगे। फिर एक नियत समय पर चिट निकालकर एक सबस्क्राइबर को चुना जाता है जिसे पुरस्कार स्वरूप फंड में से राशि दी जाती है।

विधेयक के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं:

  • चिट फंड का नाम: अधिनियम ऐसे विभिन्न नाम विनिर्दिष्ट करता है जिनका इस्तेमाल चिट फंड के लिये किया जा सकता है। इनमें चिट, चिट फंड और कुरी शामिल हैं। जबकि विधेयक द्वारा इसे ‘बंधुत्त्व कोष’ (Fraternity Fund) और ‘आवृत्ति बचत तथा ऋण संस्थान’ (Rotating Savings and Credit Institutions) नाम दिया गया है।
  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये सबस्क्राइबरों की उपस्थिति: अधिनियम विनिर्दिष्ट करता है कि कम-से-कम दो सबस्क्राइबरों की उपस्थिति में चिट निकाली जाएगी। विधेयक इन सबस्क्राइबरों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये उपस्थित होने की अनुमति देता है।
  • फोरमैन का कमीशन: अधिनियम के अंतर्गत चिट फंड को चलाने की ज़िम्मेदारी फोरमैन (Foreman) की है। वह चिट की कुल राशि का अधिकतम 5% कमीशन के तौर पर पाने के लिये अधिकृत है। विधेयक इस कमीशन को बढ़ाकर 7% करता है। इसके अतिरिक्त विधेयक सबस्क्राइबर्स की जमा राशि (Credit Balance) पर फोरमैन के वैध अधिकार की अनुमति देता है।
  • चिट्स की अधिकतम राशि: अधिनियम के तहत चिट्स एक व्यक्ति, चार व्यक्तियों के सहयोग से या किसी फर्म द्वारा चलाए जा सकते हैं। अधिनियम चिट फंड्स के तहत जमा की जा सकने वाली अधिकतम राशि विनिर्दिष्ट करता है। इसकी निम्नलिखित सीमाएँ हैं:
    • किसी एक व्यक्ति द्वारा चलाए जाने वाले तथा चार से कम साझेदार वाली किसी फर्म या संगठन में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा चलाए जाने वाले चिट्स के लिये एक लाख रुपए।
    • चार या उससे अधिक साझेदारों वाली फर्म के लिये छह लाख रुपए। विधेयक इस सीमा को क्रमशः 3 लाख रुपए और 18 लाख रुपए करता है।
  • अधिनियम का अनुप्रयोग: वर्तमान में अधिनियम निम्नलिखित पर लागू नहीं होता:
    • अधिनियम लागू होने से पहले शुरू किये गए किसी चिट पर।
    • किसी ऐसे चिट (या एक ही फोरमैन द्वारा चलाए जाने वाले कई चिट्स) पर जिसकी राशि 100 रुपए से कम है।
    • विधेयक 100 रुपए की सीमा को हटाता है और राज्य सरकार को आधार राशि तय करने की अनुमति देता है जिससे अधिक की रकम होने पर अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे।

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अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण विधेयक, 2019 (International Financial Services Authority Bill, 2019) को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। विधेयक भारत में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों (International Financial Services Centres- IFSCs) में वित्तीय सेवा बाज़ार को विकसित और विनियमित करने के लिये एक प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान करता है।

उल्लेखनीय है कि ऐसा ही एक विधेयक पिछली लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था और उसे स्थायी समिति (Standing Committee) को भेजा गया था। इस सत्र में उस विधेयक को वापस ले लिया गया। विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विस्तार: यह विधेयक विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 (Special Economic Zones Act, 2005) के अंतर्गत गठित सभी IFSCs पर लागू होगा।
  • अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण: विधेयक में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान है। इस प्राधिकरण में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 9 सदस्य (अध्यक्ष सहित) होंगे।
    • प्राधिकरण के सदस्यों में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), सेबी (SEBI), भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (Insurance Regulatory and Development Authority of India- IRDA) और पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (Pension Fund Regulatory and Development Authority- PFRDA) एवं वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
    • इसके अतिरिक्त सर्च समिति के सुझाव पर प्राधिकरण के दो सदस्यों को नियुक्त किया जाएगा।
  • प्राधिकरण के कार्य: प्राधिकरण के निम्नलिखित कार्य होंगे:
    • किसी IFSC में वित्तीय उत्पादों (जैसे प्रतिभूतियों, जमा या बीमा अनुबंधों), वित्तीय सेवाओं और वित्तीय संस्थानों, जिन्हें विधेयक के लागू होने से पहले किसी विनियामक (जैसे- RBI या SEBI) द्वारा मंज़ूर किया गया है, का विनियमन करना।
    • किसी IFSC में अन्य वित्तीय उत्पादों, वित्तीय सेवाओं या वित्तीय संस्थानों का विनियमन करना जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जा सकता है।
    • केंद्र सरकार को किसी भी अन्य वित्तीय सेवाओं, उत्पादों या वित्तीय संस्थानों का सुझाव देना, जिन्हें IFSC में अनुमति दी जा सकती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण कोष: विधेयक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण कोष की स्थापना करता है। प्राधिकरण द्वारा प्राप्त अनुदान, फीस, शुल्क तथा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होने वाली राशि को कोष में जमा किया जाएगा।
  • विदेशी मुद्रा में लेनदेन: विधेयक के अनुसार, IFSCs में वित्तीय सेवाओं के सभी लेनदेन उस मुद्रा में किये जाएंगे जिसे प्राधिकरण केंद्र सरकार की सलाह से विनिर्दिष्ट करेगा।

15वें वित्त आयोग की अवधि एक वर्ष के लिये विस्तारित

राष्ट्रपति ने 15वें वित्त आयोग (15th Finance Commission) की अवधि (जिस अवधि के लिये यह सुझाव देगा) को एक वर्ष तक बढ़ाकर 2020-25 से 2020-26 कर दिया।

  • इससे पहले आयोग को नवंबर 2019 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी जिसमें 2020-21 से 2024-25 की अवधि के लिये सुझाव शामिल थे।
  • अब इसे दो रिपोर्ट्स प्रस्तुत करनी होंगी। पहली रिपोर्ट में वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिये सुझाव शामिल होंगे।
  • अंतिम रिपोर्ट में 2021-22 से 2025-26 तक की विस्तारित अवधि के लिये सुझाव शामिल होंगे। आयोग द्वारा अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये आवश्यक समय-सीमा को भी 30 अक्तूबर, 2020 तक बढ़ा दिया गया है।

रुकी हुई आवासीय परियोजनाओं हेतु स्पेशल विंडो फंड

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सस्ते और मध्यम आय वाले आवासीय क्षेत्रों में रुकी हुई आवासीय परियोजनाओं को पूरा करने के लिये एक स्पेशल विंडो फंड (Special Window Fund) बनाने की मंज़ूरी दी है।

  • केंद्र सरकार फंड में 10,000 करोड़ रुपए डालेगी। बैंकों, भारतीय जीवन बीमा निगम और अन्य के योगदान से 25,000 करोड़ रुपए की राशि एकत्रित की जाएगी। किसी भी एक परियोजना के लिये अधिकतम वित्त 400 करोड़ रुपए होगा।
  • यह फंड सेबी (SEBI) में पंजीकृत श्रेणी-2 के वैकल्पिक निवेश ऋण कोष (Alternate Investment Debt Fund) के रूप में स्थापित किया जाएगा। श्रेणी-2 ऐसे फंड्स होते हैं जो केवल दिन-प्रतिदिन की परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये उधार देते हैं (अधिकांश रियल ऐस्टेट फंड्स इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं)।
  • सस्ते या मध्यम आय वाले आवासीय प्रोजेक्ट्स में ऐसी परियोजनाएँ शामिल हैं जहाँ आवासीय इकाई का अधिकतम कारपेट एरिया 200 वर्ग मीटर (बाहरी दीवारों, बालकनी या बरामदा द्वारा आच्छादित किये गए क्षेत्र को छोड़कर उपयोग योग्य समतल क्षेत्र) होता है।
  • इसके अतिरिक्त परियोजना की निम्नलिखित लागत होनी चाहिये:
    • मुंबई महानगर क्षेत्र में दो करोड़ रुपए तक।
    • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR), चेन्नई, कोलकाता, पुणे, हैदराबाद, बंगलूरू और अहमदाबाद में 1.5 करोड़ रुपए तक।
    • शेष भारत में एक करोड़ रुपए तक।
  • लगभग 4.58 लाख हाउसिंग इकाइयों के साथ 1,509 आवासीय परियोजनाएँ रुकी हुई हैं। इन रुकी हुई परियोजनाओं में से 90% वहनीय तथा मध्यम आय वर्ग के अंतर्गत हैं।
  • उल्लेखनीय है कि इन आवासीय परियोजनाओं में गैर-निष्पादित संपत्तियाँ (Non Performing Assets- NPA) या ऐसी परियोजनाएँ शामिल हो सकती हैं जिनके खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal- NCLT) में कार्रवाई चल रही है (उन परियोजनाओं को छोड़कर जहाँ मामले उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं)।

छह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का रणनीतिक विनिवेश

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने छह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (Central Public Sector Enterprises- CPSEs) के रणनीतिक विनिवेश को मंज़ूरी दी। इन सभी CPSEs में विनिवेश के साथ प्रबंधन नियंत्रण के हस्तांतरण को स्वीकृति दी गई है।

CPSEs की सूची और कैबिनेट द्वारा उनके विनिवेश के लिये स्वीकृत इक्विटी

CPSEs इक्विटी विनिवेश (% में) क्रेता
भारत पेट्रोलियम निगम लिमिटेड
(BPCL)
53.29% -
नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड
(NRL)
61.65% तेल और गैस क्षेत्र CPSE
भारतीय नौवहन निगम लिमिटेड
(SCI)
63.75% -
भारतीय कंटेनर निगम लिमिटेड
(CONCOR)
30.8% -
टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड
(THDCIL)
74.23% नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन
(NTPC)
नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पॉवर कॉरपोरेशन लिमिटेड
(NEEPCO)
100% नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन
(NTPC)
  • कैबिनेट ने प्रबंधन के नियंत्रण को बरकरार रखते हुए कुछ CPSEs में केंद्र सरकार की इक्विटी को 51% से कम रखने की मंज़ूरी दी।
  • यह कमी भिन्न-भिन्न मामलों के आधार पर सरकार तथा इसके द्वारा नियंत्रित संस्थानों की शेयरधारिता को ध्यान में रखकर की जाएगी।
  • कुछ CPSEs में विनिवेश के स्तर को बढ़ाने के उद्देश्य से यह मंज़ूरी दी गई है।

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RBI ने नियामक सैंडबॉक्स के अंतर्गत पहले कोहोर्ट को खोलने की घोषणा की

भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) ने नियामक सैंडबॉक्स (Regulatory Sandbox) के अंतर्गत पहले कोहोर्ट (Cohort) को खोलने की घोषणा की। RBI ने अगस्त 2019 में नियामक सैंडबॉक्स लागू करने के लिये रूपरेखा (Framework) जारी की थी।

  • सैंडबॉक्स एक ऐसा परिवेश प्रदान करता है जिसमें बाज़ार के प्रतिभागियों को एक नियंत्रित माहौल में ग्राहकों के साथ नए उत्पाद, सेवाओं या व्यवसाय मॉडल को टेस्ट करने का मौका मिलता है।
  • पहले कोहोर्ट के लिये डिजिटल भुगतान में नए प्रयोग को बढ़ावा देने हेतु खुदरा भुगतान की व्यवस्था चुनी जाएगी। RBI ने दिये गए विषय के अंतर्गत निम्नलिखित उत्पादों/सेवाओं के लिये आवेदन मांगे हैं:
    • ऑफलाइन भुगतान की सुविधा।
    • संपर्क रहित (Contactless Payment) भुगतान।
    • फीचर फोन (Feature Phone) आधारित भुगतान सेवाएँ।

कोर निवेश कंपनियों के लिये विनियामक और पर्यवेक्षी ढाँचे पर कार्यदल की रिपोर्ट

  • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने कोर निवेश कंपनियों (Core Investment Companies- CICs) के लिये विनियामक और सुपरवाइज़री फ्रेमवर्क की समीक्षा करने वाले कार्यदल (Working Group) की रिपोर्ट जारी की।
  • कोर निवेश कंपनी एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (Non Banking Financial Company- NBFC) होती है जो शेयरों (Shares) और प्रतिभूतियों (Securities) के अधिग्रहण का कारोबार करती है।
  • इनकी 90% निवल संपत्ति ग्रुप कंपनियों के इक्विटी शेयरों (Equity Shares), बॉण्ड (Bonds), डिबेंचर (Debentures), ऋण (Debts) या कर्ज़ (Loan) के रूप में होनी चाहिये।
  • इनकी 60% संपत्ति ग्रुप कंपनियों के इक्विटी शेयर्स में निवेश के रूप में होनी चाहिये।
  • कार्यदल के अनुसार, विभिन्न स्तरों वाली बड़ी कंपनियों के कारण ग्रुप कंपनियों की संरचना जटिल हो जाती है। इसके अलावा कंपनी अधिनियम, 2013 (Companies Act, 2013) का प्रावधान जो ग्रुप कंपनियों की संरचना को दो स्तरों तक सीमित करता है, NBFC पर लागू नहीं होता है (और इसलिये CICs पर लागू नहीं होता है)।
  • यह भी देखा गया है कि NBFCs के विपरीत ग्रुप कंपनी में CIC के ऋण जोखिम (Exposure) (इक्विटी या ऋण के रूप में) को उसकी पूंजी से घटाया नहीं जाता है।
  • स्तरों की संख्या पर प्रतिबंध न होने के कारण यह CIC द्वारा उच्च ऋण जोखिम उत्पन्न कर सकता है। इसके अतिरिक्त कार्यदल ने पाया कि कॉरपोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) संबंधी दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से CIC पर लागू नहीं होते हैं।
  • इनके तहत कार्यदल ने निम्नलिखित सुझाव दिये:
    • CIC द्वारा एक स्टेप-डाउन कोर निवेश कंपनी (Step-Down CIC) (एक सहायक कंपनी की सहायक) में पूंजीगत योगदान, जो कि उसके अपने स्वामित्व वाले फंड्स से 10% अधिक होता है, को उसके समायोजित निवल मूल्य (Adjusted Net Worth) से घटाया जाना चाहिये।
    • एक समूह में CICs की स्तरों की संख्या दो तक सीमित होनी चाहिये।
    • Step-Down CIC को किसी दूसरी CIC में निवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती।
    • CIC वाले प्रत्येक समूह में एक समूह जोखिम प्रबंधन समिति (Group Risk Management Committee) होनी चाहिये।
    • दो बोर्ड स्तरीय समितियों (ऑडिट समिति, नामांकन और पारिश्रमिक समिति) का अनिवार्य रूप से गठन किया जाना चाहिये।
    • RBI, CIC का निश्चित समय पर साइट पर निरीक्षण कर सकता है।

NBFCs के लिये तरलता जोखिम प्रबंधन फ्रेमवर्क में संशोधन

आरबीआई ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (Non-Banking Financial Companies- NBFCs) के लिये परिसंपत्ति-देयता प्रबंधन (Asset-Liability Management-ALM) और तरलता कवरेज़ अनुपात (Liquidity Coverage Ratio-LCR) फ्रेमवर्क पर अंतिम दिशा-निर्देश जारी किये।

  • NBFCs एक ऐसी कंपनी होती है जो सरकारी प्रतिभूतियों (Securities) और शेयरों के अधिग्रहण और ऋण या अग्रिम राशि (Advances) का कारोबार करती है।
  • यह डिमांड डिपॉज़िट स्वीकार नहीं करती है और भुगतान उपकरण (Payment Instruments) जारी नहीं कर सकती है। इसके अतिरिक्त इसके आधे से अधिक संपत्तियों में वित्तीय संपत्तियाँ (इक्विटी शेयरों, प्रतिभूतियों तथा ऋणों में निवेशित) शामिल होनी चाहिये।
  • तरलता जोखिम प्रबंधन फ्रेमवर्क (Liquidity Risk Management Framework) का लक्ष्य पर्याप्त तरलता सुनिश्चित करना है।
  • यह उच्च गुणवत्ता वाले तरल परिसंपत्ति (Liquid Asset) के ज़रिये किया जाता है।

तरल परिसंपत्ति: वे परिसंपत्तियाँ जो आसानी से बेची या नकदी में परिवर्तित हो सकती हैं, या जोखिम की स्थिति में धन प्राप्त करने के लिये कोलेट्रल के रूप में उपयोग की जा सकती हैं।

  • मौजूदा फ्रेमवर्क में निम्नलिखित प्रावधान शामिल हैं:
    • गवर्नेंस के उपाय जैसे- जोखिम प्रबंधन समिति की संरचना
    • अन्य उपायों के साथ परिपक्वता रूपरेखा (Maturity Profiling) (विभिन्न टाइम बकेट्स पर नकदी प्रवाह को मापना)।
  • संशोधित दिशा-निर्देशों ने भी LCR को NBFC की कुछ श्रेणियों के लिये तरलता जोखिम प्रबंधन हेतु एक अतिरिक्त उपाय के रूप में प्रस्तुत किया है।
  • LCR 30 दिनों की अवधि के लिये NBFC के कुल नकदी निःस्राव (Cash Outflow) के लिये उच्च गुणवत्ता वाली तरल परिसंपत्तियों के स्टॉक का अनुपात है।
  • दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी जमा स्वीकार करने वाले NBFC (NBFC-D) और जमा स्वीकार न करने वाले NBFC (NBFC-ND) को अत्यधिक तनाव को झेलने के लिये न्यूनतम LCR बरकरार रखना होगा।

न्यूनतम LCR की शर्तें

निम्न तिथि से श्रेणी 1
(NBFC-D & NBFC-ND)
श्रेणी 2
(NBFC-ND Only)
दिसंबर 2020 50% 30%
दिसंबर 2021 60% 50%
दिसंबर 2022 70% 60%
दिसंबर 2023 85% 85%
दिसंबर 2024 100% 100%
  • श्रेणी 1 में शामिल NBFC की परिसंपत्ति 10,000 करोड़ रुपए और उससे अधिक है।
  • श्रेणी 2 में शामिल NBFC की परिसंपत्ति 5,000 करोड़ रुपए से 10,000 करोड़ रुपए के बीच है।
  • एनबीएफसीज़ के लिये ये शर्तें 1 दिसंबर, 2020 से बाध्यकारी होंगी।

कानून और न्याय

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2019 संसद में पारित

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2019 [Transgender Persons (Protection of Rights) Bill, 2019] संसद में पारित किया गया। इस विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषाः विधेयक कहता है कि ट्रांसजेंडर वह व्यक्ति है जिसका लिंग जन्म के समय नियत लिंग से मेल नहीं खाता।
    • इसमें परा-पुरुष (Transmen) और परा-स्त्री (Trans-Women), अंतर लिंगीय भिन्नताओं (Intersex Variations) और जेंडर क्वीयर (Gender Queer) आते हैं।
    • इसमें सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति जैसे- किन्नर और हिजड़ा भी शामिल हैं।
    • अंतर लिंगीय भिन्नताओं वाले व्यक्तियों में ऐसे लोग शामिल हैं जो जन्म के समय अपनी मुख्य यौन विशेषताओं, बाहरी जननांगों (External Genitalia), क्रोमोसोम्स (Chromosomes) या हारमोंस (Hormones) में पुरुष या महिला शरीर के आदर्श मानकों से भिन्नता प्रदर्शित करते हैं।
  • भेदभाव पर प्रतिबंध: यह विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से भेदभाव किये जाने पर प्रतिबंध लगाता है। इसके तहत निम्नलिखित सेवाएँ प्रदान करने से इनकार करना या अनुचित व्यवहार करना शामिल हैः
    • शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवा तथा सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध उत्पादों, सुविधाओं और अवसरों तक पहुँच एवं उसका उपभोग।
    • कहीं आने-जाने (Movement) का अधिकार।
    • किसी भू-संपत्ति में निवास करने, उसे किराये पर लेने, स्वामित्व हासिल करने या अन्यथा उसे कब्ज़े में लेने का अधिकार।
    • सार्वजनिक या निजी पद को ग्रहण करने का अवसर।
    • किसी सरकारी या निजी प्रतिष्ठान तक पहुँच जिसकी देखभाल या निगरानी किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा की जाती है।
  • स्वास्थ्य सेवा: सरकार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने के लिये कदम उठाएगी जिसमें अलग एचआईवी सर्विलांस सेंटर (HIV Surveillance Centre), सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी (Sex Reassignment Surgery) इत्यादि शामिल है।
    • सरकार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्वास्थ्य से जुड़े मामलों पर ध्यान देने के लिये चिकित्सा पाठ्यक्रम की समीक्षा करेगी।
    • इसके अलावा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को चिकित्सा बीमा योजनाएँ प्रदान करेगी।
  • पहचान से जुड़ा प्रमाण-पत्र: एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ज़िला मजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकता है कि ट्रांसजेंडर के रूप में उसकी पहचान से जुड़ा प्रमाण-पत्र जारी किया जाए।
    • संशोधित प्रमाण-पत्र (Revised Certificate) तभी हासिल किया जा सकता है, अगर उस व्यक्ति ने पुरुष या महिला के तौर पर अपना लिंग परिवर्तन करने के लिये सर्जरी कराई है।

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वित्त अधिनियम, 2017 के तहत न्यायाधिकरणों के पुनर्गठन पर निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने वित्त अधिनियम, 2017 (Finance Act, 2017) के विभिन्न प्रावधानों के तहत न्यायाधिकरणों (Tribunals) के पुनर्गठन से संबंधित निर्णय दिया।

  • सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष निम्नलिखित मुद्दे थे:
    • क्या वित्त अधिनियम, 2017 संविधान के अंतर्गत धन विधेयक (Money Bill) की शर्तों को पूरा करता है?
    • क्या अधिनियम के अंतर्गत अधिसूचित न्यायाधिकरण संबंधी नियम अत्यधिक अधिकार देते हैं?
    • क्या यह नियम संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुकूल है?
  • वित्त अधिनियम, 2017 के विभिन्न प्रावधानों के माध्यम से न्यायाधिकरणों के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा-शर्तों को स्पष्ट किया गया है तथा न्यायाधिकरणों के विलय हेतु कुछ अधिनियमों में संशोधन किया गया है।
  • न्यायालय ने यह फैसला नहीं किया कि क्या ये प्रावधान धन विधेयक में पारित किये जा सकते हैं और इस मामले को सात न्यायाधीशों वाली खंडपीठ के पास भेज दिया। विशेष रूप से यह संदर्भ संविधान के अनुच्छेद-110 की व्याख्या करने के लिये था और यह तय करने के लिये कि क्या धन विधेयक की परिभाषा में "केवल" शब्द का अर्थ कराधान या व्यय से संबंधित किसी पद के अतिरिक्त कोई भी है अथवा नहीं।
  • वित्त अधिनियम की धारा-184 में केंद्र सरकार को इस बात की अनुमति दी गई है कि वह न्यायाधिकरण और दूसरे प्राधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की अर्हता, नियुक्ति, सेवा शर्तों और वेतन से संबंधित नियम बना सकती है। न्यायालय ने कहा कि यह अत्यधिक अधिकार देना नहीं है और इस धारा को कायम रखा।
  • हालाँकि न्यायालय ने न्यायाधिकरण, अपीलीय न्यायाधिकरण और अन्य प्राधिकरण (सदस्यों की अर्हताएँ, अनुभव और अन्य सेवा-शर्तें) नियम, 2017 [Tribunal, Appellate Tribunal and other Authorities (Qualifications, Experience and other Conditions of Service of Members) Rules, 2017] को समाप्त कर दिया।
  • न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि ये नियम संविधान के सिद्धांतों के विपरीत थे जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से निर्धारित किया गया था। उदाहरण के लिये न्यायालय ने उल्लेख किया कि नियमों के अंतर्गत न्यायाधिकरण के सदस्यों की नियुक्ति मुख्य रूप से केंद्र सरकार के मनोनीत व्यक्ति (Nominee) द्वारा की जाती हैं तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश या उसके द्वारा नामित व्यक्ति का केवल सांकेतिक (Token) प्रतिनिधित्व होता है।
  • न्यायालय ने अपने पहले के निर्णयों का उल्लेख किया जहाँ उसने न्यायाधिकरण में नियुक्ति और उसके प्रशासन के लिये एक स्वतंत्र प्रणाली की ज़रूरत पर बल दिया था और कहा था कि वह किसी अन्य न्यायालय की नियुक्ति, अर्हता और सेवा की शर्तों के समान होना चाहिये।
  • इसलिये न्यायालय ने कहा कि ये नियम न्यायाधिकरण के सदस्यों की नियुक्ति में कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप जैसे हैं और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिये हानिकारक होंगे। यह कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को कमज़ोर करेगा।
  • न्यायालय ने केंद्र सरकार को न्यायाधिकरणों के कामकाज से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के पिछले निर्णयों के अनुसार इन नियमों को पुनर्निर्मित करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश भी दिया कि न्यायाधिकरण में नियुक्तियाँ वित्त अधिनियम, 2017 के अधिनियमन से पहले के संबंधित अधिनियमों के अनुसार होंगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 के एक प्रावधान को निरस्त किया

सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 [Arbitration and Conciliation (Amendment) Act, 2019] (जो कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 में संशोधन करता है) के प्रावधान को निरस्त किया।

  • इस प्रावधान में मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 [Arbitration and Conciliation (Amendment) Act, 2015] की प्रयोज्यता (Applicability) की तिथि को स्पष्ट किया गया था। इसके तहत कहा गया कि 2015 का संशोधन अधिनियम केवल मध्यस्थता से संबंधित कार्यवाहियों पर लागू होगा जो 23 अक्तूबर, 2015 को या उसके बाद शुरू हुई थीं।
  • 2015 के संशोधन अधिनियम ने 1996 के अधिनियम में संशोधन किये थे ताकि उसमें कुछ परिवर्तन किये जा सकें।
  • 1996 के अधिनियम में एक प्रावधान था कि मध्यस्थता की कार्रवाई में सुनाए गए फैसले को निरस्त करने के लिये कोई पक्ष आवेदन दायर कर सकता है। न्यायालयों ने इस प्रावधान की व्याख्या इस प्रकार की है कि एक बार किसी फैसले को निरस्त करने का आवेदन दायर किया जाता है तो उस फैसले पर स्वतः रोक लग जाती है।
  • 2015 का संशोधन अधिनियम इसमें परिवर्तन करता है तथा स्पष्ट करता है कि न्यायालय के समक्ष मध्यस्थता के फैसले को निरस्त करने के आवेदन का यह अर्थ नहीं है कि उस फैसले पर रोक लग जाए।
  • हालाँकि 2015 का संशोधन अधिनियम सिर्फ उन कार्यवाहियों पर लागू होगा जो कि 23 अक्तूबर, 2015 को या उसके बाद शुरू की गई थीं। इसमें यह स्पष्ट नहीं था कि क्या वह उन कार्यवाहियों पर भी लागू होगा जो कि 23 अक्तूबर, 2015 के बाद दायर की गई लेकिन उस तिथि से पहले की कार्यवाहियों से संबंधित हैं।
  • इस प्रावधान को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई और कई कंपनियों द्वारा कहा गया कि इस स्पष्टता के अभाव में मध्यस्थता संबंधी फैसले (23 अक्तूबर, 2015 से पहले दिये गए) पर विपरीत पक्ष द्वारा तब भी रोक लगाई जा सकती है जब आवेदन 2015 के अधिनियम के लागू होने की तारीख यानी 23 अक्तूबर, 2015 के बाद दायर किया गया हो।
  • 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान की व्याख्या की, कि 2015 संशोधन अधिनियम 23 अक्तूबर, 2015 को या उसके बाद शुरू होने वाली सभी प्रक्रियाओं पर लागू होगा, साथ ही उस तारीख के बाद लंबित या शुरू हुई न्यायालयी कार्यवाही पर भी। न्यायालय ने कहा कि किसी भी अन्य व्याख्या से मध्यस्थता के निपटान में देरी होगी और मध्यस्थता के मामलों में न्यायालयों का हस्तक्षेप बढ़ेगा।
  • 2019 के संशोधन अधिनियम ने 2015 के संशोधन अधिनियम की प्रयोज्यता से संबंधित इस प्रावधान को फिर से सम्मिलित किया। इस प्रावधान को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी।
  • न्यायालय ने माना कि नया प्रावधान मनमाना था और संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता था। यह प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के निर्णय का संदर्भ दिये बिना लागू किया गया था। इसलिये इसे बिना पर्याप्त आधार के अनुचित रूप से लागू किया गया था तथा यह 1996 के अधिनियम और 2015 के संशोधन अधिनियम के अंतर्गत जनहित के खिलाफ था।

CJI का कार्यालय सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत

पिछले दशक में सर्वोच्च न्यायालय के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (Central Public Information Officer- CPIO) के कार्यालय से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति, संपत्तियों और पत्राचारों का विवरण मांगा गया जिसे देने से CPIO द्वारा मना कर दिया गया था। तत्पश्चात् CPIO के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय में दलील दायर की गई थी।

  • 2010 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India- CJI) का कार्यालय सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत आएगा। परिणामतः सर्वोच्च न्यायालय के CPIO ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील दायर की।
  • सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष निम्नलिखित प्रश्न थे:
    • क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई अधिनियम, 2005 के अंतर्गत आएगा?
    • क्या इस तरह की जानकारी साझा करने से न्यायिक स्वतंत्रता कमज़ोर होगी?
    • क्या जानकारी साझा करना कोई अपवाद है?
  • सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि CJI का कार्यालय RTI Act, 2005 के अंतर्गत ‘लोक प्राधिकरण’ (Public Authority) की परिभाषा में शामिल है।
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है, इसलिये RTI Act के अंतर्गत मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को लाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमज़ोर नहीं करेगा।
  • हालाँकि, न्यायालय ने ज़ोर दिया कि जब जनहित में सूचना के प्रकटीकरण की मांग की जाए तो न्यायिक स्वतंत्रता को ध्यान में रखा जाना चाहिये।

सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक के 17 विधायकों की अयोग्यता बरकरार रखी

सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक के पूर्व अध्यक्ष के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें उन्होंने 17 विधायकों को अयोग्य घोषित किया था। हालाँकि उन्हें दोबारा चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी गई।

  • जुलाई 2019 में कर्नाटक के तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) ने विधानसभा के कार्यकाल के अंत में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के अंतर्गत 17 विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया था।
  • इनमें से 15 विधायकों ने इस फैसले से पहले ही अपना त्यागपत्र सौंप दिया था। इन विधायकों का कहना था कि त्यागपत्र देना उनका अधिकार है और अध्यक्ष को उसे तुरंत स्वीकार करना चाहिये क्योंकि वे अध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से सूचना दे चुके हैं कि उनका त्यागपत्र स्वैच्छिक और वास्तविक है।
  • न्यायालय के समक्ष निम्नलिखित प्रश्न थे:
    • किसी त्यागपत्र को स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय लेने में अध्यक्ष की क्या भूमिका है?
    • क्या अध्यक्ष के त्यागपत्र को अस्वीकार करने और विधायकों को अयोग्य ठहराने का आदेश वैध है?
    • क्या विधानसभा के कार्यकाल के अंत तक के लिये अध्यक्ष विधायकों को अयोग्य ठहरा सकता है?
  • न्यायालय ने कहा कि त्यागपत्र को स्वीकार या अस्वीकार करने के संबंध में अध्यक्ष की भूमिका इस बात तक सीमित है कि क्या त्यागपत्र स्वैच्छिक या वास्तविक है। इसके अतिरिक्त न्यायालय ने कहा कि सदस्यों द्वारा त्यागपत्र सौंपने पर भी अयोग्यता (Disqualification) की प्रक्रिया जारी रखी जा सकती है, यदि त्यागपत्र देने से पहले अयोग्य ठहराने वाली कार्रवाई की गई हो। अन्यथा दल-बदल विरोधी कानून का मंतव्य विफल हो जाएगा।
  • न्यायालय ने अध्यक्ष के सिर्फ अयोग्यता संबंधी आदेश को बरकरार रखा तथा कहा कि अध्यक्ष को विधानसभा के कार्यकाल के अंत तक सदस्यों को अयोग्य ठहराने का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि संविधान अयोग्य सदस्यों के लिये कुछ प्रतिबंध लगाता है। इनमें अयोग्यता की तिथि से लेकर कार्यकाल की समाप्त तक मंत्री के रूप में नियुक्ति या लाभप्रद राजनैतिक पद पर आसीन होने पर प्रतिबंध या विधानसभा चुनाव न लड़ पाना (इनमें से जो भी पहले हो) शामिल है।

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श्रम

औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत

औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक, 2019 (Industrial Relations Code Bill, 2019) को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। यह संहिता विधेयक तीन श्रम कानूनों- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (Industrial Disputes Act, 1947), ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 (Trade Unions Act, 1926) और औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 [Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946] का स्थान लेता है। विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • ट्रेड यूनियन (Trade Union): संहिता के अंतर्गत किसी ट्रेड यूनियन के सात या उससे अधिक सदस्य उसे पंजीकृत करने का आवेदन कर सकते हैं।
    • कम-से-कम 10% श्रमिकों वाली या 100 श्रमिकों वाली (इनमें से जो भी कम हो) ट्रेड यूनियन पंजीकृत की जाएंगी।
    • केंद्र और राज्य सरकार द्वारा ट्रेड यूनियन या ट्रेड यूनियन के परिसंघ को क्रमशः केंद्रीय या राज्य ट्रेड यूनियन के रूप में मान्यता दी जा सकती है।
  • नेगोसिएटिंग यूनियन (Negotiating Unions): संहिता के तहत किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में नियोक्ता से बातचीत करने के लिये नेगोसिएशन अर्थात् समझौता इकाई का प्रावधान किया गया है।
    • यदि किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में सिर्फ एक ट्रेड यूनियन है तो नियोक्ता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस ट्रेड यूनियन को श्रमिकों की एकमात्र नेगोसिएटिंग यूनियन के रूप में मान्यता देगा।
    • यदि औद्योगिक प्रतिष्ठान में कई ट्रेड यूनियन हैं तो कम-से-कम 75% श्रमिकों द्वारा समर्थित ट्रेड यूनियन को केंद्र या राज्य सरकार द्वारा नेगोसिएटिंग यूनियन के रूप में मान्यता दी जाएगी।
  • कामबंदी और छँटनी (Lay-off and Retrenchment): संहिता के अनुसार, कामबंदी को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि कोयले, बिजली की कमी या मशीनों के खराब होने के कारण नियोक्ता द्वारा श्रमिकों को रोज़गार न दे पाने की असमर्थता है।
    • विधेयक में नियोक्ताओं द्वारा श्रमिकों की सेवाओं को समाप्त करने अर्थात् छँटनी का भी प्रावधान है।
  • 100 श्रमिकों वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों से यह अपेक्षा की गई है कि उन्हें कामबंदी, छँटनी या प्रतिष्ठान बंद करने से पहले केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी।
    • केंद्र या राज्य सरकार अधिसूचना के ज़रिये श्रमिकों की संख्या की सीमा में परिवर्तन कर सकती है।
    • इस प्रावधान का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों को एक लाख रुपए से लेकर 10 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना होगा।
  • औद्योगिक विवाद का समाधान: केंद्र या राज्य सरकारें औद्योगिक विवादों में मध्यस्थता करने और समझौता कराने के लिये सुलह अधिकारियों को नियुक्त कर सकती हैं। ये अधिकारी विवाद की जाँच करेंगे और सुलह की प्रक्रिया को विवाद के उचित और सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुँचाएंगे। अगर कोई समाधान नहीं निकलता है तो विवाद का कोई भी पक्ष औद्योगिक न्यायाधिकरण में आवेदन कर सकता है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण

इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट पर प्रतिबंध विधेयक, 2019 लोकसभा में पारित

इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट पर प्रतिबंध (उत्पादन, विनिर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण, भंडारण और विज्ञापन) विधेयक, 2019 [Prohibition of Electronic Cigarettes (Production, Manufacture, Import, Export, Transport, Sale, Distribution, Storage, and Advertisement) Bill, 2019] लोकसभा में प्रस्तुत और पारित किया गया।

यह विधेयक सितंबर 2019 में जारी किये गए अध्यादेश का स्थान लेता है। विधेयक इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट के उत्पादन, व्यापार, स्टोरेज और विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाता है।

  • इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स: यह विधेयक इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट (e-Cigarettes) की व्याख्या एक ऐसे बैटरी चालित उपकरण के रूप में करता है जो कि किसी पदार्थ को गर्म करता है ताकि कश लेने (Inhalation) के लिये वाष्प पैदा हो।
    • इन ई-सिगरेट्स में निकोटिन और फ्लेवर हो सकते हैं तथा इनमें इलेक्ट्रॉनिक निकोटिन वितरण प्रणाली (Electronic Nicotine Delivery Systems) के सभी प्रकार के हीट-नॉट बर्न उत्पाद (Heat-Not-Burn Products), ई-हुक्का (e-Hookah) एवं ऐसे ही दूसरे उपकरण शामिल हैं।
  • ई-सिगरेट पर प्रतिबंध: यह विधेयक भारत में ई-सिगरेट के उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण और विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाता है।
    • इस प्रावधान का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को एक वर्ष तक के कारावास या एक लाख रुपए का जुर्माना या दोनों सज़ा भुगतनी होगी।
    • एक से अधिक बार अपराध करने पर तीन वर्ष तक का कारावास भुगतना पड़ेगा और साथ ही पाँच लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ेगा।
  • ई-सिगेट्स का भंडारण: विधेयक के अंतर्गत ई-सिगरेट्स के स्टॉक के भंडारण के लिये कोई व्यक्ति किसी स्थान का प्रयोग नहीं कर सकता।
    • अगर कोई व्यक्ति ई-सिगरेट्स का स्टॉक रखता है तो उसे छह महीने तक का कारावास या 50,000 रुपए तक का जुर्माना या दोनों सज़ा भुगतनी पड़ेगी।
    • बिल के लागू होने के बाद ई-सिगरेट्स का मौजूदा स्टॉक रखने वालों को इन स्टॉकों की घोषणा करनी होगी और उन्हें अधिकृत अधिकारी के निकटवर्ती कार्यालय में जमा कराना होगा।
    • यह अधिकृत अधिकारी पुलिस अधिकारी (कम-से-कम सब इंस्पेक्टर स्तर का) या केंद्र या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत कोई अन्य अधिकारी हो सकता है।

सरोगेसी (विनियमन) विधेयक , 2019 चयन समिति को भेजा गया

सरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2019 [Surrogacy (Regulation) Bill, 2019] राज्यसभा की चयन समिति के पास भेजा गया है। विधेयक को अगस्त 2019 में लोकसभा में प्रस्तुत और पारित किया गया था।

यह विधेयक सरोगेसी को ऐसे कार्य के रूप में परिभाषित करता है जिसमें कोई महिला किसी इच्छुक दंपत्ति के लिये बच्चे को जन्म देती है और जन्म के बाद उस इच्छुक दंपत्ति को बच्चा सौंप देती है।

लोकसभा में पारित विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • सरोगेसी का विनियमन (Regulation of Surrogacy): विधेयक वाणिज्यिक सरोगेसी को प्रतिबंधित करता है लेकिन परोपकारी सरोगेसी (Altruistic Surrogacy) की अनुमति देता है।
    • परोपकारी सरोगेसी में सेरोगेट माता को गर्भावस्था के दौरान दिये जाने वाले मेडिकल खर्च और बीमा कवरेज के अतिरिक्त कोई मौद्रिक मुआवज़ा शामिल नहीं है।
    • वाणिज्यिक सरोगेसी में सरोगेसी या उससे संबंधित प्रक्रियाओं के लिये बुनियादी मेडिकल खर्च और बीमा कवरेज की सीमा से अधिक मौद्रिक लाभ या पुरस्कार (नकद या किसी वस्तु के रूप में) लेना शामिल है।
  • इच्छुक दंपत्ति के लिये योग्यता का मानदंड: इच्छुक दंपत्ति के पास समुचित प्राधिकरण द्वारा जारी ‘अनिवार्यता का प्रमाण-पत्र’ (Certificate of Essentiality) और ‘योग्यता का प्रमाण-पत्र’ (Certificate of Eligibility) होना चाहिये।
    • अनिवार्यता का प्रमाण-पत्र निम्नलिखित परिस्थितियों में ही जारी किया जाएगा-
      • अगर इच्छुक दंपत्ति में से एक या दोनों सदस्यों के प्रमाणित बाँझपन का प्रमाण-पत्र (Certificate of Proven Infertility) ज़िला मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी किया गया हो।
      • मजिस्ट्रेट के न्यायालय ने सरोगेट बच्चे के पितृत्व एवं संरक्षण (Parentage and Custody) से संबंधित आदेश जारी किये हों।
      • बीमा कवरेज 16 महीने की अवधि के लिये सरोगेट माता की प्रसवोत्तर जटिलताओं (Postpartum Complications) की व्यवस्था करता हो।
    • योग्यता का प्रमाण-पत्र इच्छुक दंपत्ति द्वारा निम्नलिखित शर्तें पूरी करने पर ही जारी किया जाएगा:
      • यदि वे भारतीय नागरिक हों और उन्हें विवाह किये हुए कम-से-कम पाँच वर्ष हो गए हों।
      • यदि उनमें से महिला (पत्नी) 23 से 50 वर्ष के बीच की और पुरुष (पति) 26 से 55 वर्ष का हो।
      • उनका कोई जीवित बच्चा (बायोलॉजिकल, गोद लिया हुआ या सेरोगेट) न हो, इसमें ऐसे बच्चे शामिल नहीं हैं जो मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग हैं या जीवन को जोखिम में डालने वाली या प्राणघातक बीमारी से ग्रस्त हैं।
      • कोई ऐसी स्थिति जिसे विनियमों द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
  • सरोगेट माता के लिये योग्यता का मानदंड: समुचित प्राधिकरण से योग्यता का प्रमाण-पत्र हासिल करने के लिये सरोगेट माता द्वारा निम्नलिखित शर्तें पूरी करना आवश्यक है:
    • उसे इच्छुक दंपत्ति का निकट संबंधी होना चाहिये।
    • उसे विवाहित होना चाहिये और उसका अपना बच्चा होना चाहिये।
    • उसे 25 से 35 वर्ष के बीच होना चाहिये।
    • उसने पहले सरोगेसी न की हो।
    • उसके पास सरोगेसी करने के लिये मेडिकल और मनोवैज्ञानिक स्वस्थता का प्रमाण-पत्र हो।
    • इसके अतिरिक्त सरोगेट माता सरोगेसी के लिये अपने युग्मक (Gametes) नहीं दे सकती।

राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग विधेयक, 2019 पर स्थायी समिति की रिपोर्ट

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति (अध्यक्ष: राम गोपाल यादव) ने राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग विधेयक, 2019 (National Commission for Homoeopathy Bill, 2019) पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। यह विधेयक होम्योपैथी केंद्रीय परिषद अधिनियम, 1973 (Homoeopathy Central Council Act, 1973) को निरस्त करता है तथा होम्योपैथी औषधि की शिक्षा और अभ्यास को विनियमित करता है।

समिति के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग (National Commission for Homoeopathy- NCH) की संरचना: समिति ने कहा कि विधेयक में प्रस्तावित NCH की सदस्य संख्या और राज्यों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाना चाहिये ताकि वह प्रभावी तरीके से कार्य कर सके। उसने यह भी कहा कि NCH में निर्वाचित मेडिकल पेशेवरों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं है क्योंकि उनमें से 80% नामित हैं।
    • समिति ने सुझाव दिया कि NCH की कुल सदस्य संख्या को 20 से बढ़ाकर 27 करना चाहिये। इन 27 सदस्यों में अध्यक्ष, 7 पदेन सदस्य, राज्य/केंद्रशासित राज्यों के नामित 10 सदस्य (अंशकालिक), छह निर्वाचित पंजीकृत मेडिकल पेशेवर (अंशकालिक) और 3 अन्य अंशकालिक सदस्य होंगे।
    • NCH के अंतर्गत तीन स्वायत्त बोर्ड हैं। समिति ने सुझाव दिया कि चिकित्सा मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड (Medical Assessment and Rating Board) तथा नैतिकता एवं पंजीकरण बोर्ड (Board of Ethics and Registration) की सदस्य संख्या को 3 से 4 किया जाना चाहिये।
  • शुल्क का विनियमन (Fee Regulation): समिति ने कहा कि राज्यों में मौजूदा प्रक्रिया यह है कि वे निजी मेडिकल कॉलेजों के शुल्क को विनियमित करें। यह स्थानीय कारकों, आरक्षण कोटा और संबंधित राज्यों के अन्य मुद्दों पर निर्भर करता है।
    • हालाँकि विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि होम्योपैथी कॉलेजों के शुल्क का विनियमन किया जाए। विनियमन के अभाव में निजी मेडिकल कॉलेज अत्यधिक शुल्क वसूल सकते हैं।
    • इसलिये समिति ने सुझाव दिया कि निजी मेडिकल कॉलेजों और मानद विश्वविद्यालयों की कम-से-कम 50% सीटों के लिये शुल्क को विनियमित किया जाए।
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction): NCH के सभी फैसले केंद्र सरकार के अपीलीय क्षेत्राधिकार में आते हैं। इस संबंध में समिति ने कहा कि केंद्र सरकार को अपीलीय क्षेत्राधिकार देना शक्ति के विभाजन (Separation of Power) के संवैधानिक प्रावधान से मेल नहीं खाता।
    • उसने सुझाव दिया कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली और होम्योपैथी के लिये मेडिकल अपीलीय न्यायाधिकरण (Medical Appellate Tribunal for Indian System of Medicine and Homoeopathy) की स्थापना की जाए। NCH के फैसले केंद्र सरकार के स्थान पर इस निकाय के अपीलीय क्षेत्राधिकार में आएंगे।

भारतीय चिकित्सा प्रणाली हेतु राष्ट्रीय आयोग विधेयक, 2019 पर स्थायी समिति की रिपोर्ट

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति (चेयरपर्सन: राम गोपाल यादव) ने भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग विधेयक, 2019 (National Commission for Indian System of Medicine Bill, 2019) पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। विधेयक भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद अधिनियम, 1970 (Indian Medicine Central Council Act, 1970) को निरस्त करता है और आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और सोवा-रिग्पा की शिक्षा और अभ्यास को विनियमित करता है।

समिति के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • भारतीय चिकित्सा हेतु राष्ट्रीय प्रणाली आयोग (National Commission for Indian System of Medicine- NCISM) की संरचना: समिति ने कहा कि विधेयक में प्रस्तावित NCISM की सदस्य संख्या और राज्यों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाना चाहिये ताकि वह प्रभावी तरीके से कार्य कर सके।
    • समिति ने कहा कि भारत में 8 लाख पंजीकृत आयुष डॉक्टर हैं। इनमें से 56% आयुर्वेद, 6.4% यूनानी और 1.4% सिद्ध और प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) से संबंधित हैं।
    • विधेयक आयुर्वेद से तीन सदस्य और यूनानी, सिद्ध तथा सोवा-रिग्पा से एक-एक सदस्य का प्रावधान करता है।
    • आयुर्वेद के डॉक्टरों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिये समिति ने सुझाव दिया कि इनकी संख्या 3 से 6 की जाए।
    • समिति ने यह भी सुझाव दिया कि NCISM की कुल सदस्य संख्या 29 से 44 की जाए। इन 44 सदस्यों में 1 अध्यक्ष, 20 पदेन सदस्य और 23 अंशकालिक सदस्य होंगे।
  • यह विधेयक NCISM की निगरानी में कुछ स्वायत्त बोर्डों का गठन करता है। ये बोर्ड हैं:
    • आयुर्वेद बोर्ड (Board of Ayurveda) और यूनानी, सिद्ध एवं सोवा-रिग्पा बोर्ड (Board of Unani, Siddha, and Sowa-Rigpa)
    • भारतीय चिकित्सा प्रणाली के लिये चिकित्सा मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड (Medical Assessment and Rating Board)
    • नैतिकता और चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड (Ethics and Medical Registration Board)।
    • योग और प्राकृतिक चिकित्सा के लिये केंद्रीय नियामक ढाँचे हेतु समिति ने सुझाव दिया कि एक योग और प्राकृतिक चिकित्सा बोर्ड (Board of Yoga and Naturopathy) भी बनाया जाए।
    • समिति ने अनुसंधान बोर्ड (Board of Research) बनाने का भी प्रस्ताव दिया।
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction): NCISM के सभी फैसले केंद्र सरकार के अपीलीय क्षेत्राधिकार में आते हैं। इस संबंध में समिति ने कहा कि केंद्र सरकार को अपीलीय क्षेत्राधिकार देना शक्ति के विभाजन (Separation of Power) के संवैधानिक प्रावधान से मेल नहीं खाता।
    • समिति ने सुझाव दिया कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली और होम्योपैथी के लिये मेडिकल अपीलीय न्यायाधिकरण (Medical Appellate Tribunal for Indian System of Medicine and Homoeopathy) की स्थापना की जाए। NCISM के फैसले केंद्र सरकार के स्थान पर इस निकाय के अपीलीय क्षेत्राधिकार में आएंगे।

गृह मामले

विशेष सुरक्षा दल (संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में पारित

विशेष सुरक्षा दल (संशोधन) विधेयक, 2019 [Special Protection Group (Amendment) Bill, 2019] लोकसभा में पारित किया गया। यह विधेयक विशेष सुरक्षा दल अधिनियम, 1988 (Special Protections Group Act, 1988) में संशोधन करता है।

1988 का अधिनियम प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार के निकट सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करने हेतु विशेष सुरक्षा दल (Special Protection Group- SPG) के गठन और विनियमन का प्रावधान करता है। विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • अधिनियम के अंतर्गत SPG प्रधानमंत्री और उनके परिवार के निकट सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करता है। पद छोड़ने की तिथि के एक वर्ष बाद तक पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार के निकट सदस्यों को भी SPG सुरक्षा प्रदान की जाती है। इस अवधि के बाद खतरे के स्तर को देखते हुए SPG सुरक्षा दी जाती है।
  • खतरे के स्तर का निर्धारण केंद्र सरकार करती है। यह खतरा निम्नलिखित प्रकार का होना चाहिये:
    • अगर वह किसी हिंसक या आतंकवादी संगठन द्वारा उत्पन्न हो रहा हो।
    • वह गंभीर और निरंतर जारी रहने वाला हो।
  • विधेयक इस प्रावधान में संशोधन करता है और कहता है कि SPG प्रधानमंत्री एवं उनके साथ सरकारी आवास में रहने वाले परिवार के निकट सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करेगा। वह पूर्व प्रधानमंत्रियों और उन्हें आवंटित आवास में उनके साथ रहने वाले परिवार के निकट सदस्यों को भी सुरक्षा प्रदान करेगा। यह पद छोड़ने की तिथि के पाँच वर्ष बाद तक उन्हें सुरक्षा प्रदान करेगा।
  • अधिनियम में प्रावधान है कि अगर किसी पूर्व प्रधानमंत्री से SPG सुरक्षा हटाई जाती है, तो उसके परिवार के निकट सदस्यों से भी यह सुरक्षा हटा ली जाएगी, बशर्ते परिवार के निकट सदस्यों पर खतरे का स्तर इसे न्यायसंगत ठहराता हो।
  • विधेयक इस शर्त को हटाता है और कहता है कि अगर किसी पूर्व प्रधानमंत्री की SPG सुरक्षा हटाई जाती है तो उसके परिवार के निकट सदस्यों की सुरक्षा भी हटा दी जाएगी।

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आयुध अधिनियम में संशोधन

गृह मामलों के मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में आयुध (संशोधन) विधेयक, 2019 [Arms (Amendment) Bill, 2019] प्रस्तुत किया। यह विधेयक आयुध अधिनियम, 1959 (Arms Act, 1959) में संशोधन करता है। यह विधेयक किसी व्यक्ति द्वारा धारित लाइसेंस-युक्त बंदूकों की संख्या में कमी करता है तथा आयुध अधिनियम, 1959 के अंतर्गत शामिल कुछ अपराधों की सज़ा को बढ़ाता है। विधेयक में अपराधों की नई श्रेणियों का भी प्रस्ताव किया गया है।

इसकी मुख्य विशेषताओं में शामिल हैं:

  • बंदूक खरीदने के लिये लाइसेंस: विधेयक बंदूकों की अनुमत संख्या को तीन से एक करता है।
    • इसमें उत्तराधिकार या विरासत के आधार पर मिलने वाला लाइसेंस भी शामिल है।
    • यह विधेयक बंदूकें जमा कराने के लिये 1 वर्ष की समय-सीमा प्रदान करता है।
    • इस विधेयक के तहत बंदूकों के लाइसेंस की वैधता अवधि को बढ़ाकर 3 से 5 वर्ष किया गया है।
  • सज़ा में बढ़ोतरी: विधेयक अनेक अपराधों से संबंधित सज़ा में संशोधन करता है। उदाहरण के तौर पर आयुध अधिनियम, 1959 में सज़ा के संबंध में निम्नलिखित प्रावधान हैं:
    • गैर-लाइसेंस युक्त हथियार से डील करना।
    • लाइसेंस के बिना बंदूकों को छोटा करना या उनमें परिवर्तन।
    • प्रतिबंधित बंदूकों का आयात या निर्यात।
    • इन अपराधों के लिये 3 से 7 वर्ष की सज़ा का प्रावधान है, साथ ही जुर्माना भी भरना पड़ता है।
    • जबकि विधेयक के तहत 7 वर्ष से आजीवन कारावास तक की सज़ा का प्रावधान किया गया है जिसके साथ जुर्माना भी भरना पड़ेगा।
  • नए अपराध: विधेयक नए अपराधों को जोड़ता है। इनमें निम्नलिखित अपराध शामिल हैं:
    • पुलिस या सशस्त्र बलों से ज़बरन हथियार लेने पर 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा और साथ ही जुर्माना।
    • उत्सव के दौरान गोलीबारी करने जिससे मानव जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा खतरे में पड़ती है, पर दो वर्ष तक की सज़ा या एक लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों सज़ा भुगतनी पड़ेगी।
  • यह विधेयक संगठित आपराधिक सिंडिकेट/समूहों (Organised Crime Syndicates) और अवैध तस्करी के अपराधों को भी स्पष्ट करता है। अधिनियम का उल्लंघन करते हुए सिंडिकेट के सदस्यों द्वारा बंदूक या अस्त्र-शस्त्र (Ammunition) रखने पर 10 वर्ष से आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है।
    • यह सजा उन लोगों पर भी लागू होगी, जो कि सिंडिकेट की ओर से गैर-लाइसेंस युक्त बंदूकों का व्यापार करते हैं तथा लाइसेंस के बिना बंदूकों में बदलाव या उनका आयात या निर्यात करते हैं।
    • अवैध तस्करी के लिये 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा तथा जुर्माने का प्रावधान है।

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दादरा और नगर हवेली तथा दमन एवं दीव (केंद्रशासित प्रदेशों का विलय) विधेयक, 2019

दादरा और नगर हवेली तथा दमन एवं दीव (केंद्रशासित प्रदेशों का विलय) विधेयक, 2019 लोकसभा में पारित हो गया। विधेयक दादरा और नगर हवेली तथा दमन एवं दीव केंद्रशासित प्रदेशों (Union Territories- UTs) को एक UT में विलय करने का प्रावधान करता है।

इसके अतिरिक्त यह विधेयक कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण संशोधन करता है जैसे- लोकसभा में इनके प्रतिनिधित्व को बरकरार रखना, मुंबई उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार और विलय होने पर दोनों UTs के सभी अधिकारियों को नए UT में अंनतिम (Provisionally) रूप से नियुक्त करना।

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निजी सुरक्षा एजेंसी केंद्रीय (संशोधन) मॉडल नियम, 2019 का मसौदा सार्वजनिक टिप्पणियों के लिये जारी

गृह मामलों के मंत्रालय ने निजी सुरक्षा एजेंसी केंद्रीय (संशोधन) मॉडल नियम, 2019 [Private Security Agencies Central (Amendment) Model Rules, 2019] का मसौदा जारी किया।

यह नियम निजी सुरक्षा एजेंसी केंद्रीय मॉडल नियम, 2006 (Private Security Agencies Central Model Rules, 2006) में संशोधन करता है जो कि निजी सुरक्षा एजेंसी (विनियमन) अधिनियम, 2005 [Private Security Agencies (Regulation) Act, 2005] के प्रावधानों के प्रवर्तन संबंधी विवरण प्रस्तावित करता हैं।

निजी सुरक्षा एजेंसी (विनियमन) अधिनियम, 2005 प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसियों के कामकाज को विनियमित करता है। निजी सुरक्षा एजेंसियाँ सुरक्षा सेवाएँ प्रदान करने के काम में लगी गैर-सरकारी संस्थाएँ होती हैं जो कि सुरक्षाकर्मी (Security Guard) प्रदान कर उन्हें प्रशिक्षित करती हैं।

मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • पुलिस सत्यापन नियमावली (2006 के नियमों के अनुसार) के स्थान पर नियंत्रक प्राधिकरण (Controlling Authority) आवेदक की पृष्ठभूमि के सत्यापन के लिये अपराध और अपराधियों के इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस का इस्तेमाल करेगा। इस डेटाबेस में अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्याय प्रणाली शामिल है।
  • आवेदक की पहचान को साबित करने के लिये आधार नंबर का इस्तेमाल किया जाएगा। वर्तमान में यह पुलिस सत्यापन द्वारा किया जाता है।
  • वर्तमान में चरित्र और पृष्ठभूमि के सत्यापन की रिपोर्ट 3 वर्ष तक वैध रहती है। संशोधित नियम इसे तीन वर्ष तक वैध रखने का प्रावधान करता है भले ही उस व्यक्ति का नियोक्ता बदल जाए।
  • सुरक्षाकर्मी के प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (National Skill Qualification Framework) के अनुरूप होगा। यह फ्रेमवर्क ज्ञान और कौशल के स्तरों के अनुसार योग्यता को तय करता है और मानकीकृत प्रशिक्षण परिणामों को निर्धारित करता है।

मसौदा संशोधन नियमों पर टिप्पणियाँ 6 दिसंबर, 2019 तक आमंत्रित हैं।


आवासन और शहरी मामले

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (अनधिकृत कालोनियों के निवासियों की संपत्ति के अधिकार को मान्यता) विधेयक, 2019

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (अनधिकृत कालोनियों के निवासियों की संपत्ति के अधिकार को मान्यता) विधेयक, 2019 [National Capital Territory of Delhi (Recognition of Property Rights of Residents in Unauthorised Colonies) Bill, 2019] लोकसभा में पारित हो गया।

यह विधेयक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (National Capital Territory- NCT) दिल्ली में कुछ अनधिकृत कालोनियों के निवासियों की संपत्ति के अधिकार को मान्यता देने का प्रावधान करता है।

विधेयक की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • संपत्ति के अधिकार को मान्यता: विधेयक में प्रावधान है कि केंद्र सरकार अधिसूचना के ज़रिये कुछ अनधिकृत कालोनियों के निवासियों की अचल संपत्तियों (Immovable Properties) के लेन-देन को नियमित कर सकती है।
    • वर्तमान में लेन-देन को अधिकार-पत्र (Power of Attorney- POA), बिक्री समझौता (Agreement to Sale), वसीयत या कब्ज़ा पत्र (Possession Letter) जैसे दस्तावेज़ों के आधार पर नियमित किया जा सकता है।
    • अनधिकृत कालोनी के जिस निवासी के पास ऐसे दस्तावेज़ होंगे वह बिक्रीनामा (Conveyance Deed) या प्राधिकरण पर्ची (Authorisation Slip) के ज़रिये स्वामित्व का अधिकार हासिल करने का पात्र होगा।
  • निवासी: विधेयक के अनुसार, निवासी वह व्यक्ति होता है जिसके पास पंजीकृत बिक्रीनामा या कुछ निश्चित दस्तावेज़ों के आधार पर संपत्ति का भौतिक कब्ज़ा होता है। इस परिभाषा में निवासियों के वैध उत्तराधिकारी शामिल हैं लेकिन इनमें किरायेदार (Tenants), लाइसेंधारी (Licensee) या वे लोग शामिल नहीं हैं जिन्हें संपत्ति के उपयोग की अनुमति मिली है।
  • अनधिकृत कालोनी: अनधिकृत कालोनी को ऐसी कालोनी या उसके संलग्न क्षेत्र के तौर पर व्याख्यायित किया गया है जिसके लिये नक्शा या निर्माण योजना की अनुमति हासिल नहीं की गई है। इसके अतिरिक्त दिल्ली विकास प्राधिकरण (Delhi Development Authority- DDA) को नियमितीकरण के लिये कालोनी को अधिसूचित किया जाना चाहिये।
  • शुल्क का भुगतान: निवासियों को स्वामित्व हासिल करने के लिये कुछ शुल्क का भुगतान करना होगा। इस शुल्क को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जा सकता है। बिक्रीनामा या प्राधिकरण पर्ची में लिखित राशि पर स्टाम्प शुल्क (Stamp Duty) और पंजीकरण शुल्क (Registration Charge) देना होगा। संपत्ति से संबंधित पहले के किसी लेन-देन पर कोई स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण शुल्क नहीं चुकाना होगा।

परिवहन

जहाज़ पुनर्चक्रण विधेयक, 2019 लोकसभा में प्रस्तुत

जहाज़ पुनर्चक्रण विधेयक, 2019 (Recycling of Ships Bill, 2019) लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। विधेयक जहाज़ों में खतरनाक सामग्री के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है और जहाज़ों के पुनर्चक्रण को विनियमित करता है।

इस विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विधेयक की प्रयोज्यता (Applicability): विधेयक निम्नलिखित पर लागू होगा:
    • भारत में पंजीकृत नए और मौजूदा जहाज़।
    • भारत में किसी बंदरगाह, टर्मिनल या भारत के समुद्री क्षेत्र में प्रवेश करने वाला जहाज़।
    • कोई युद्ध-पोत या प्रशासन के स्वामित्व और उसके द्वारा संचालित होने वाला कोई अन्य जहाज़ जिसका प्रयोग गैर-वाणिज्यिक सरकारी सेवा के लिये होता हो।
    • भारत में संचालित जहाज़ पुनर्चक्रण केंद्र।
  • जहाज़ पुनर्चक्रण (Ship Recycling): विधेयक के अनुसार, जहाज़ पुनर्चक्रण किसी पुनर्चक्रण केंद्र में जहाज़ों को तोड़ने की प्रक्रिया को कहते हैं ताकि उसके कुछ घटकों और सामग्रियों को दोबारा उपयोग करने के लिये प्राप्त किया जा सके और इस दौरान उत्पन्न होने वाली खतरनाक सामग्री का ध्यान रखा जा सके।
  • जहाज़ों के लिये आवश्यक निर्देश: जहाज़ उन प्रतिबंधित खतरनाक सामग्रियों का इस्तेमाल नहीं करेंगे जिन्हें अधिसूचित किया जाएगा।
    • केंद्र सरकार इस शर्त से कुछ श्रेणी के जहाज़ों को छूट दे सकती है।
    • राष्ट्रीय प्राधिकरण (National Authority) निर्धारित शर्तों की पुष्टि के लिये आवधिक सर्वेक्षण (Periodic Survey) करेगी।
    • जहाज़ पुनर्चक्रण से संबंधित सभी गतिविधियों का प्रशासन (Administration), पर्यवेक्षण (Supervision) और निगरानी (Monitoring) करने के लिये केंद्र सरकार इस प्राधिकरण को अधिसूचित करेगी।
  • पुनर्चक्रण केंद्र (Recycling Facilities): जहाज़ों को सिर्फ अधिकृत पुनर्चक्रण केंद्रों में पुनर्चक्रित किया जाएगा। ऐसे किसी केंद्र को अधिकृत करने हेतु सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) को आवेदन सौंपा जाएगा (जिसे केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाएगा)।
    • इस आवेदन के साथ जहाज़ पुनर्चक्रण केंद्र की प्रबंध योजना और निर्धारित शुल्क भी सौंपे जाएंगे।
    • मौजूदा पुनर्चक्रण केंद्रों को अधिनियम के लागू होने के 60 दिनों के भीतर प्राधिकृति (Authorisation) के लिये आवेदन करना होगा। कोई केंद्र तब अधिकृत होगा जब सक्षम प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट हो जाए कि वह केंद्र निर्दिष्ट मानदंडों का पालन करता है।
    • प्रमाण-पत्र निर्दिष्ट अवधि के लिये वैध होगा लेकिन यह अवधि 5 वर्ष से अधिक नहीं होगी।
    • इन प्रावधानों का उल्लंघन करने पर एक वर्ष तक का कारावास या 10 लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों सज़ा का प्रावधान है।

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वाणिज्य और उद्योग

राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान (संशोधन) विधेयक, 2019 संसद में पारित

राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान (संशोधन) विधेयक, 2019 [National Institute of Design (Amendment) Bill, 2019] संसद में पारित कर दिया गया। यह विधेयक राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान अधिनियम, 2014 (National Institute of Design Act, 2014) में संशोधन करता है जो राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान, अहमदाबाद (National Institute of Design, Ahmedabad) को राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान घोषित करता है।

  • यह विधेयक आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम और हरियाणा में स्थित चार अन्य राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थानों को राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान घोषित करता है।
  • वर्तमान में ये चारों संस्थान सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 (Societies Registration Act, 1860) के अंतर्गत सोसायटी के रूप में पंजीकृत हैं और इन्हें डिग्री या डिप्लोमा देने का अधिकार नहीं है।
  • राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान घोषित होने के बाद इन चारों संस्थानों को डिग्री और डिप्लोमा देने की शक्ति मिल जाएगी।

संस्कृति

जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक, 2019 संसद में पारित

जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक, 2019 [Jallianwala Bagh National Memorial (Amendment) Bill, 2019] संसद में पारित कर दिया गया। विधेयक जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक अधिनियम, 1951 [Jallianwala Bagh National Memorial Act, 1951] में संशोधन करता है।

1951 का अधिनियम अमृतसर स्थित जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को मारे गए और घायल लोगों की स्मृति में राष्ट्रीय स्मारक के निर्माण का प्रावधान करता है।

इसके अतिरिक्त अधिनियम राष्ट्रीय स्मारक के प्रबंधन के लिये एक न्यास (Trust) बनाता है।

  • न्यासियों का संयोजन (Composition of Trust): 1951 के अधिनियम के अंतर्गत स्मारक के न्यासियों में निम्नलिखित व्यक्ति शामिल हैं:
    • अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री
    • भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष
    • प्रभारी संस्कृति मंत्री
    • लोकसभा में विपक्ष का नेता
    • पंजाब का गवर्नर
    • पंजाब का मुख्यमंत्री
    • केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन प्रख्यात व्यक्ति।
    • विधेयक इस प्रावधान में संशोधन करते हुए न्यासी के रूप में शामिल भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष को हटाता है। इसके अतिरिक्त विधेयक स्पष्ट करता है कि जब लोकसभा में विपक्ष का कोई नेता नहीं होगा तो लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को न्यासी बनाया जाएगा।
  • अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन प्रख्यात व्यक्तियों का कार्यकाल पाँच वर्ष का होगा और उन्हें दोबारा नामित किया जा सकता है। विधेयक प्रावधान करता है कि केंद्र सरकार कोई कारण बताए बिना कार्यकाल खत्म होने से पहले नामित न्यासी को हटा सकती है।

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कॉरपोरेट मामले

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के दिवालियापन का समाधान के लिये नियम अधिसूचित

कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने दिवालियापन और शोधन अक्षम (वित्तीय सेवा प्रदाताओं के दिवालियापन और परिसमापन की कार्यवाही एवं न्यायिक प्राधिकरण को आवेदन) नियम, 2019 [Insolvency and Bankruptcy (Insolvency and Liquidation Proceedings of Financial Service Providers and Application to Adjudicating Authorities) Rules, 2019] अधिसूचित किया।

इन नियमों को दिवालियापन और शोधन अक्षम संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code, 2016- IBC) के अंतर्गत जारी किया गया। इस संहिता में कंपनियों और व्यक्तियों के बीच दिवालियापन के समाधान (Insolvency Resolution) करने के लिये समयबद्ध प्रक्रिया का प्रावधान है।

यह नियम वित्तीय सेवा प्रदाताओं (Financial Service Providers- FSP) या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित कुछ श्रेणियों के FSP हेतु दिवालियापन के समाधान के लिये एक फ्रेमवर्क बनाता है।

वर्तमान में सरकार ने 500 करोड़ रुपए या उससे अधिक की परिसंपत्ति वाली गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (Non-Banking Finance Companies- NBFCs) (हाउसिंग फाइनांस कंपनियों सहित) को FSP के रूप में अधिसूचित किया है।

ये नियम कहते हैं कि कॉरपोरेट कर्ज़दारों (Corporate Debtors) के दिवालियापन का समाधान, परिसमापन और स्वैच्छिक परिसमापन की प्रक्रिया कुछ संशोधनों के साथ FSPs पर भी लागू होगी। इसमें निम्नलिखित संशोधन शामिल हैं:

  • रेज़ोल्यूशन (Resolution): दिवालियापन के समाधान की प्रक्रिया को सिर्फ राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal- NCLT) द्वारा अधिसूचित वित्तीय नियामक (Financial Regulator) द्वारा शुरू किया जा सकता है।
    • यह गैर-वित्तीय कंपनियों के प्रावधानों से अलग है जो किसी भी वित्तीय ऋणदाता को कॉरपोरेट कर्ज़दार के दिवालियापन के समाधान की प्रक्रिया को शुरू करने के लिये NCLT के समक्ष आवेदन दायर करने की अनुमति देता है।
  • NCLT, नियामक द्वारा प्रस्तावित एक प्रशासक को नियुक्त करेगा जो दिवालियापन के समाधान की प्रक्रिया को संभाल सके।
    • किसी भी समाधान योजना की मंज़ूरी के लिये FSP के प्रबंधन को संभालने वाले व्यक्तियों के संबंध में नियामक से 'अनापत्ति’ (No Objection) की ज़रूरत होगी।
    • समाधान प्रक्रिया के दौरान FSP का लाइसेंस या पंजीकरण निलंबित या रद्द नहीं किया जा सकता है।
  • परिसमापन (Liquidation): FSP के परिसमापन के दौरान लिक्विडेटर को सुनवाई का अवसर दिये बिना FSP के लाइसेंस या पंजीकरण को निलंबित या रद्द नहीं किया जा सकता है।
    • इसके अतिरिक्त अगर कोई FSP स्वैच्छिक परिसमापन के लिये आवेदन करता है तो उसे नियामक की पूर्व अनुमति की आवश्यकता होगी।

कंपनी कानून समिति ने रिपोर्ट जारी की

कंपनी कानून समिति (Company Law Committee) (अध्यक्ष: इंजेती श्रीनिवास) ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति ने कंपनी अधिनियम, 2013 (Companies Act, 2013) के अंतर्गत कुछ अपराधों के फिर से वर्गीकरण के लिये सरकार को सुझाव दिये हैं। उसने व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) के लिये कुछ परिवर्तन करने के भी सुझाव दिये हैं। मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • फिर से वर्गीकरण करने का तर्क (Rationale for Re-Categorisation): समिति ने कहा कि कॉरपोरेट आचरण से संबंधित मामलों में दीवानी और आपराधिक प्रतिबंधों के बीच संतुलन होना चाहिये।
    • कानून के गंभीर उल्लंघन जैसे- विशेष रूप से धोखाधड़ी करना आदि को आपराधिक कानून के अंतर्गत निपटाया जाना चाहिये।
    • हालाँकि प्रक्रियात्मक, तकनीकी और मामूली गैर-अनुपालन दीवानी न्यायाधिकार में आते हैं।
  • आतंरिक न्याय निर्णयन (In-house Adjudication): समिति ने कहा कि कुछ अपराधों के मामले में निष्पक्ष निर्धारण या विवेक की कमी होती है और वे जनहित को प्रभावित नहीं करते। इन अपराधों को एक आतंरिक न्याय निर्णयन प्रणाली (In-house Adjudication Mechanism- IAM) द्वारा न्यायिक अधिकारी के अंतर्गत माना जा सकता है। इस तरह के अपराधों में किसी कंपनी के मालिक द्वारा जानकारी का खुलासा न करना शामिल है।
  • हटाए जाने वाले या वैकल्पिक फ्रेमवर्क के अंतर्गत आने वाले अपराध: समिति का मानना था कि कुछ अपराधों को दूसरे कानूनों या वैकल्पिक तरीके से निपटाया जाना चाहिये। उसने सुझाव दिया कि सात अपराधों को हटाया जाना चाहिये। इन अपराधों को अधिनियम से हटाया जा सकता है।
    • इनमें NCLT के आदेशों का पालन न करने से संबंधित अपराध शामिल हैं जो कि डिबेंचरों को भुनाने में असफलता से जुड़े हैं।
    • समिति ने यह सुझाव भी दिया कि पाँच अपराधों को वैकल्पिक फ्रेमवर्क जैसे दिवालियापन और शोधन अक्षम संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code- IBC) के अंतर्गत निपटाया जाना चाहिये। इन अपराधों में कंपनी परिसमापक (Company Liquidator) के साथ प्रमोटरों या निदेशकों के असहयोग से संबंधित अपराध शामिल थे।
  • जुर्माने तक सीमित अपराध (Offences restricted to fine only): समिति ने कहा कि कुछ अपराध ऐसे थे कि उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई तो दुरुस्त थी लेकिन कैद नहीं। इन पर दंड के रूप में जुर्माना लगाना पर्याप्त होगा।
    • इन अपराधों में उन धर्मार्थ प्रावधानों (Charitable Objects) (जैसे सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना) से जुड़े नियमों का अनुपालन न करना शामिल है जिनका पालन करना उनके लिये अनिवार्य है।
  • जीवन सुगमता (Ease of Living ) से संबंधित परिवर्तन: समिति ने कॉरपोरेट के लिये देश में जीवन सुगमता में सुधार करने से संबंधित सुझाव दिये। इनमें एक सुझाव यह है कि केंद्र सरकार कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (Corporate Social Responsibility- CSR) की बाध्यता की सीमा को बढ़ाए ताकि CSR अनुपालन में सुधार हो।

खाद्य और सार्वजनिक वितरण

कैबिनेट द्वारा FCI की अधिकृत पूंजी में वृद्धि

केंद्रीय कैबिनेट ने भारतीय खाद्य निगम (Food Corporation of India- FCI) की अधिकृत पूंजी को 3,500 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10,000 करोड़ रुपए करने का निर्णय लिया।

  • अधिकृत पूंजी वह अधिकतम मात्रा होती है जो कोई कंपनी अपने शेयरधारकों (Shareholders) को जारी कर सकती है।
  • FCI के सभी शेयर केंद्र सरकार के पास हैं और इस संशोधन से उसके इक्विटी आधार (Equity Base) में बढ़ोतरी होगी।

उपभोक्ता मामले

प्रतीक और नामों के अनुचित उपयोग के लिये जुर्माना बढ़ाने पर संशोधन मसौदा जारी

उपभोक्ता मामलों के विभाग ने प्रतीक और नाम (अनुचित उपयोग की रोकथाम) अधिनियम, 1950 [Emblems and Names (Prevention of Improper Use) Act, 1950] का संशोधन मसौदा जारी किया।

  • अधिनियम व्यावसायिक और वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिये कुछ प्रतीकों और नामों के अनुचित उपयोग का निषेध करता है।
  • मसौदा संशोधन प्रतीकों और नामों के अनुचित प्रयोग के लिये अधिकतम जुर्माने को 500 रुपए से बढ़ाकर 1 लाख रुपए करता है।
  • इसके अतिरिक्त अपराध दोहराने पर अधिक जुर्माना भरना पड़ेगा जो कि 5 लाख रुपए तक का जुर्माना या छह महीने तक की कैद या दोनों सज़ा भुगतनी पड़ सकती हैं।
  • संशोधन मसौदे पर 20 दिसंबर, 2019 तक टिप्पणियाँ आमंत्रित हैं।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अंतर्गत कुछ मसौदा नियम जारी किये गए

उपभोक्ता मामलों के विभाग (Department of Consumer Affairs) ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019) के अंतर्गत कुछ मसौदा नियमों और विनियमों को सार्वजनिक टिप्पणियों के लिये जारी किया। ये नियम और विनियम विभिन्न पहलुओं को समाहित करते हैं जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • ई-कॉमर्स (उपभोक्ता से व्यापार) और प्रत्यक्ष बिक्री में अनुचित कारोबार की रोकथाम।
  • उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग और केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद।
  • ज़िला और राज्य स्तरीय विवाद निवारण आयोग के सदस्य।
  • विवादों में मध्यस्थता।

मसौदा नियमों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • ई-कॉमर्स इकाइयों की ज़िम्मेदारियाँ (Liabilities of e-Commerce Entities): एक ई-कॉमर्स इकाई के लिये निम्नलिखित प्रतिबंधित हैं:
    • वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कीमत को प्रभावित नहीं करेगा और पारदर्शिता बरकरार रखेगा।
    • वह कोई ऐसा अनुचित या भ्रामक कार्य नहीं करेगा जिससे उपभोक्ताओं के फैसले प्रभावित हों।
    • वह खुद को उपभोक्ता के रूप में प्रस्तुत करके समीक्षाएँ पोस्ट (Post) नहीं करेगा या वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता की गलत जानकारी नहीं देगा।
  • ई-कॉमर्स इकाइयों की अन्य ज़िम्मेदारियाँ:
    • इकाइयों और उनके विक्रेताओं के बीच अनुबंध की शर्तों को प्रदर्शित करना।
    • यह सुनिश्चित करना कि वस्तुओं और सेवाओं के विज्ञापन उनकी वास्तविक विशेषताओं से मेल खाते हों।
    • यह सुनिश्चित करना कि उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत रूप से चिह्नित सूचनाओं को सुरक्षित रखा जाएगा और उनके उपयोग में कानूनी प्रावधानों का अनुपालन किया जाए।
  • विक्रेताओं की ज़िम्मेदारियाँ (Liabilities of sellers): विक्रेता (जो कि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन देते या बिक्री करते हैं) की ज़िम्मेदारियाँ निम्नलिखित हैं:
    • उत्पादों की बिक्री से जुड़े सभी शुल्कों को प्रदर्शित करना, जैसे- डिलीवरी शुल्क और टैक्स।
    • सामान पहुँचाने (Shipping), अदला-बदली (Exchange), वापसी (Return), धन-वापसी (Refund) और वारंटी से संबंधित नीतियों को प्रदर्शित करना।
    • उत्पादों के डिस्प्ले (Display) और बिक्री के स्थायी प्रावधानों का अनुपालन।
  • शिकायत दर्ज कराने की फीस: मसौदा नियम में उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Consumer Disputes Redressal Commission) में शिकायत दर्ज कराने के लिये ज़रूरी शुल्क को भी निर्दिष्ट किया गया है। यह शुल्क वस्तुओं या सेवाओं की कीमत तथा मुआवज़े की मांग पर निर्भर करता है।
    • अगर कीमत या मुआवज़ा 5 लाख रुपए तक का है तो कोई शुल्क नहीं चुकाना होगा।
    • इससे अधिक कीमत से जुड़ी शिकायतों के लिये फीस का दायरा 200 रुपए से 7,500 रुपए के बीच होगा।
  • राष्ट्रीय आयोग के सदस्यों की संख्या: अधिनियम में प्रावधान है कि राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (National Consumer Disputes Redressal Commission) में कम-से-कम चार सदस्य होंगे। मसौदा नियम में निर्दिष्ट किया गया है कि इसमें 11 से अधिक सदस्य नहीं होंगे तथा इनमें 1 सदस्य महिला होनी चाहिये।

सूचना और प्रसारण

प्रेस और पत्रिका पंजीकरण विधेयक, 2019 का मसौदा जारी

सूचना और प्रसारण मंत्रालय (Ministry of Information and Broadcasting) ने प्रेस और पत्रिका पंजीकरण विधेयक, 2019 (Press and Periodicals Bill, 2019) का मसौदा जारी किया। मसौदा विधेयक प्रेस और पुस्तकों का रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1867 (Press and Registration of Books Act, 1867) का स्थान लेगा।

मसौदा विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • प्रयोज्यता (Applicability): मसौदा विधेयक सार्वजनिक वितरण के लिये समाचार-पत्र और दूसरी पत्रिकाओं तथा किताबों को प्रकाशित करने वाले प्रिंटिंग प्रेस के विनियमन का प्रावधान करता है।
    • यह डिजिटल मीडिया पर समाचारों के प्रकाशकों के विनियमन का भी प्रावधान करता है।
    • डिजिटल मीडिया पर समाचार को डिजिटल फॉरमेट के समाचार के रूप में व्याख्यायित किया जाता है जिसे इंटरनेट, कंप्यूटर या मोबाइल नेटवर्क पर प्रसारित किया जा सके।
    • वर्तमान में डिजिटल मीडिया पर समाचारों को अधिनियम में समाहित नहीं किया गया है।
  • विनियामक प्राधिकरण (Regulatory Authority): अधिनियम में भारत के समाचार-पत्रों के पंजीयक (Registrar of Newspaper for India- RNI) के लिये प्रावधान है। मसौदा विधेयक भारत के प्रेस महापंजीयक (Press Registrar General of India) नामक नए प्राधिकरण का प्रावधान करता है। प्रेस रजिस्ट्रार जनरल के कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं:
    • प्रकाशन के पंजीकरण के लिये प्रमाण-पत्र जारी करना।
    • पंजीकृत समाचार-पत्रों और दूसरी पत्रिकाओं की एक सूची बनाना।
    • पत्रिका के शीर्षक की स्वीकार्यता और उपलब्धता के लिये दिशा-निर्देश बनाना।
  • प्रेस महापंजीयक की निम्नलिखित शक्तियाँ होंगी:
    • प्रकाशक से सूचना मांगना।
    • पत्रिका के पंजीकरण में संशोधन या उससे निरस्त करना।
    • जुर्माना तय करना।
  • प्रकाशकों का पंजीकरण (Registration of Publishers): किसी भी प्रकार का प्रकाशन करने वाले प्रिंटिंग प्रेस को ज़िला मजिस्ट्रेट या किसी अन्य निर्दिष्ट प्राधिकरण के समक्ष विशिष्ट सूचनाएँ प्रस्तुत करनी होंगी।
    • इसके अलावा पत्रिकाओं का प्रकाशन करने वाले प्रिंटिंग प्रेस से अपेक्षा की जाएगी कि वह प्रेस महापंजीयक के साथ पंजीकृत हो।
    • डिजिटल मीडिया पर समाचार प्रकाशित करने वाले प्रकाशक को भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक के साथ पंजीकृत कराना होगा।
    • मसौदा विधेयक, इस अधिनियम के अंतर्गत पुस्तकों के पंजीकरण से संबंधित विभिन्न प्रावधानों को हटाता है।
  • सरकार से लाभ प्राप्ति के मानदंड: केंद्र और राज्य सरकारें उन शर्तों को निर्धारित कर सकती हैं जिनके अंतर्गत वे प्रकाशकों को विज्ञापन, अनुदान और दूसरे लाभ जारी करेंगी।
  • अपराध और सज़ा: अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर प्रकाशक को 2,000 रुपए तक का जुर्माना या छह महीने तक की कैद, या दोनों सजाएँ भुगतनी पड़ सकती हैं। मसौदा विधेयक कैद के प्रावधान को हटाता है। जुर्माने को बढ़ाकर 50,000 रुपए किया गया है और रजिस्ट्रेशन निरस्त हो सकता है।

TRAI ने सेट टॉप बॉक्स की अंतर्संक्रियता पर टिप्पणियाँ आमंत्रित कीं

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (Telecom Regulatory Authority of India- TRAI) ने सेट टॉप बॉक्स की अंतर्संक्रियता (Interoperability) पर परामर्श-पत्र जारी किया।

  • एक सेट टॉप बॉक्स (Set Top Box) वह उपकरण है जो कि डिजिटल सिग्नल प्राप्त करके उसे डिकोड (Decode) करता है और टेलीविज़न पर उसे प्रदर्शित करता है।
  • वर्तमान में एक सेवा प्रदाता (Service Provider) के सेट टॉप बॉक्स द्वारा दूसरे सेवा प्रदाता की टेलीविज़न प्रसारण सेवाओं (Television Broadcasting Services) को अभिगमन (Accessing) के लिये इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
  • अगर सबस्क्राइबर अपने सेवा प्रदाता को बदलना चाहता है तो उसे नया सेट टॉप बॉक्स खरीदना पड़ता है। सेट टॉप बॉक्स की अंतर्संक्रियता से उपभोक्ताओं को इस बात की छूट होगी कि वे सेट टॉप बॉक्स को बदले बिना अपने सेवा प्रदाता को बदल सकेंगे।
  • TRAI ने निम्नलिखित पर विचार मांगे हैं:
    • सेट टॉप बॉक्स की अंतर्संक्रियता की वांछनीयता (Desirability)।
    • डायरेक्ट टू होम (Direct to Home) और केबल प्लेटफॉर्म (Cable Platform) के बीच सेट टॉप बॉक्स की अंतर्संक्रियता।
    • अंतर्संक्रिय सेट टॉप बॉक्स की खुले बाज़ार में उपलब्धता।
    • सेट टॉप बॉक्स की अंतर्संक्रियता के लिये सॉफ्टवेयर आधारित समाधान।

परामर्श पत्र पर टिप्पणियाँ 9 दिसंबर, 2019 तक आमंत्रित हैं।

TRAI ने DTH ऑपरेटरों द्वारा प्लेटफॉर्म सर्विसेज़ पर सुझाव जारी किये

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (Telecom Regulatory Authority of India- TRAI) ने डायरेक्ट टू होम (Direct to Home- DTH) ऑपरेटरों की प्लेटफॉर्म सेवाओं पर सुझाव जारी किये।

  • टीवी चैनलों के अनेक वितरण सेवा प्रदाता (Service Providers) हैं। यह वितरण तकनीक पर आधारित होता है, जैसे DTH सेवाएँ, स्थानीय केबल ऑपरेटर और इंटरनेट प्रोटोकॉल टेलीविज़न सर्विसेज़ (Internet Protocol Television Services- IPTV)।
  • सभी वितरण सेवा प्रदाता कुछ ऐसे कार्यक्रम देते हैं जो कि प्रत्येक प्लेटफॉर्म पर विशिष्ट होते हैं और सैटेलाइट आधारित प्रसारक (Satellite-Based Broadcasters) से प्राप्त नहीं किये जा सकते। इन कार्यक्रमों को प्लेटफॉर्म सेवा (Platform Service) कहा जाता है।
  • प्लेटफॉर्म सेवाओं से ऑपरेटरों को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होता है जो कि ऐसी सेवाओं के सबस्क्रिप्शन और उन सेवाओं पर विज्ञापनों से मिलता है। सैटेलाइट टीवी चैनलों की तरह प्लेटफॉर्म सेवा के लिये फिलहाल कोई विशिष्ट विनियमन नहीं है।
  • इस संबंध में मुख्य सुझावों में निम्न शामिल हैं:
    • प्लेटफॉर्म सेवाओं की परिभाषा (Definition of platform services): प्लेटफॉर्म सेवाएँ ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिन्हें ऑपरेटर केवल अपने सबस्क्राइबर के लिये प्रसारित करते हैं। इनमें दूरदर्शन चैनल, पंजीकृत सैटेलाइट टीवी चैनल या भारत में पंजीकृत विदेशी टीवी चैनल शामिल नहीं।
    • पंजीकरण (Registration): DTH ऑपरेटर से अपेक्षा की जाएगी कि वह संबंधित प्राधिकरण के साथ प्लेटफॉर्म सेवा चैनल को पंजीकृत करे और ऐसे प्रत्येक चैनल के लिये 10,000 रुपए का भुगतान करे।
    • प्लेटफॉर्म सर्विसेज़ को साझा करना: एक ऑपरेटर की प्लेटफॉर्म सेवा उसकी विशिष्ट सेवा होगी और उसे किसी दूसरे ऑपरेटर के साथ साझा नहीं किया जाएगा। इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर उस प्लेटफॉर्म सेवा चैनल के पंजीकरण को निरस्त किया जा सकता है जिसे साझा किया गया था।
    • प्लेटफॉर्म सेवा की संख्या की सीमा: ऑपरेटर की प्लेटफॉर्म सेवा की कुल संख्या प्लेटफॉर्म की क्षमता के कुल चैनलों का 3% या 15 (जो भी अधिक हो) होगी।
    • सैटेलाइट चैनलों से अलग: सैटेलाइट टीवी चैनल से अलग प्लेटफॉर्म सेवाओं को टीवी चैनलों की प्रोग्राम गाइड में प्लेटफॉर्म सेवाओं (Platform Services) के रूप में श्रेणीबद्ध किया जाएगा।

टेलीकॉम

कैबिनेट ने स्पेक्ट्रम नीलामी की किस्तों के भुगतान को स्थगित किया

केंद्रीय कैबिनेट ने दूरसंचार सेवा प्रदाताओं (Telecom Service Providers- TSPs) के लिये स्पेक्ट्रम नीलामी की किस्तों के भुगतान को स्थगित करने की स्वीकृति दे दी है।

TSPs के पास यह विकल्प होगा कि वह 2020-21 और 2021-22 के बकाया भुगतान को 1 या 2 वर्षों के लिये स्थगित कर सकते हैं।

TSP द्वारा इन धनराशियों की अदायगी समान किस्तों में की जाएगी। स्पेक्ट्रम आवंटन के नियम और शर्तों के अंतर्गत इस पर ब्याज लगाया जाएगा।

TRAI ने अंतर्राष्ट्रीय कॉल्स पर इंटरकनेक्शन टर्मिनेशन चार्जेज़ पर टिप्पणियाँ मांगीं

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (Telecom Regulatory Authority of India- TRAI) ने अंतर्राष्ट्रीय कॉल के लिये इंटरकनेक्शन टर्मिनेशन चार्ज (Interconnection Termination Charge) की समीक्षा के लिये परामर्श-पत्र जारी किया। दो पब्लिक टेलीकॉम नेटवर्क के बीच इंटरकनेक्शन से एक सेवा प्रदाता के उपभोक्ता दूसरे सेवा प्रदाता के उपभोक्ताओं से बात कर सकते हैं।

  • इंटरकनेक्शन उपयोग शुल्क (Interconnection Usage Charge- IUC) वह लागत होती है जो कि मोबाइल ऑपरेटर कॉल करने के लिये दूसरे ऑपरेटर को चुकाता है।
  • IUC में मुख्य रूप से शुरुआत (Origination), समाप्ति (Termination), वाहक (Carriage) और परिवर्तन (Transit) चार्ज शामिल होता है।
  • IUC के घटकों में से एक अंतर्राष्ट्रीय प्रसारण शुल्क (International Transmission Charge) है जो कि देश के बाहर से कॉल करने वाले ऑपरेटर द्वारा देश के प्रदाता तक पहुँच के लिये चुकाया जाता है।
  • मौजूदा विनियमों के अनुसार, आउटगोइंग कॉल के लिये अंतर्राष्ट्रीय टर्मिनेशन चार्ज घरेलू और विदेशी सेवा प्रदाता के बीच तय किये जाते हैं। हालाँकि TRAI इनकमिंग कॉल के लिये अंतर्राष्ट्रीय टर्मिनेशन चार्ज की निश्चित और एक समान दर निर्दिष्ट करता है।
  • वर्तमान में इनकमिंग कॉल के लिये निर्दिष्ट अंतर्राष्ट्रीय टर्मिनेशन चार्ज 0.30 रुपए प्रति मिनट है।
  • अनेक मामलों में विदेशी ऑपरेटर भारत से होने वाली आउटगोइंग कॉल के लिये तुलनात्मक रूप से उच्च दरों को तय करते हैं। टर्मिनेशन की ऐसी उच्च दरों को या तो उनके नियामकों द्वारा या उनके TSPs द्वारा वाणिज्यिक बातचीत के बाद तय किया जाता है।
  • इस विसंगति को देखते हुए TRAI ने इस संबंध में टिप्पणियाँ मांगी हैं कि क्या निश्चित और एक समान अंतर्राष्ट्रीय टर्मिनेशन चार्ज की मौजूदा प्रणाली को बदला जाना चाहिये? उसने दरें तय करने के लिये वैकल्पिक प्रणालियों पर सुझावों को आमंत्रित किया है।

टिप्पणियाँ 9 दिसंबर, 2019 तक आमंत्रित की गई हैं।


इस्पात

इस्पात मंत्रालय ने इस्पात अपशिष्ट पुनर्चक्रण नीति जारी की

इस्पात मंत्रालय ने इस्पात अपशिष्ट पुनर्चक्रण नीति (Steel Scrap Recycling Policy) जारी की है। यह नीति उपकरणों और वाहनों जैसे विभिन्न स्रोतों से निकलने वाले इस्पात अपशिष्ट के प्रसंस्करण (Processing) और पुनर्चक्रण हेतु धातु अपशिष्टिकरण केंद्रों (Metal Scrapping Centres) की स्थापना के लिये फ्रेमवर्क प्रदान करती है।

यह नीति संगठित, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल तरीके से इस्पात अपशिष्ट को जमा करने, उसे तोड़ने और उसे टुकड़ों में काटने के लिये दिशा-निर्देश देती है।

इस नीति में संकलन केंद्रों (Collection Centres), विखंडन केंद्रों (Dismantling Centres), अपशिष्ट प्रसंस्करण केंद्रों (Scrap Processing Centres) और सरकारों की भूमिका एवं ज़िम्मेदारियों को स्पष्ट किया गया है जो इस प्रकार हैं:

  • संकलन केंद्र: संकलन केंद्रों में व्यक्ति, स्थानीय अपशिष्ट विक्रेता और वितरक शामिल होते हैं जो कि अपशिष्ट जमा करते हैं। संकलन केंद्र अपशिष्ट की शुरुआती छँटाई और वर्गीकरण में प्रसंस्करण केंद्रों की मदद भी कर सकते हैं।
    • संकलन केंद्र भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards- BIS) द्वारा निर्धारित अपशिष्ट विनिर्देश और संहिताओं का अनुपालन करने में प्रसंस्करण केंद्रों के साथ कार्य कर सकते हैं।
  • विखंडन एवं प्रसंस्करण केंद्र: विखंडन एवं अपशिष्ट प्रसंस्करण केंद्रों से यह अपेक्षा की जाएगी कि वे कारखानों से संबंधित मौजूदा नियमों और अन्य औद्योगिक नियमों का अनुपालन करेंगे। इन केंद्रों से पर्यावरण, प्रदूषण नियंत्रण, व्यवसायगत सुरक्षा और खतरनाक कचरे सहित अन्य कचरों के प्रबंधन से जुड़े विभिन्न विनियमों के अनुपालन की अपेक्षा की जाएगी।
  • सरकार: इस्पात मंत्रालय निम्नलिखित को बढ़ावा देने के लिये कार्य करेगा:
    • अपशिष्ट केंद्रों की स्थापना में व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business)
    • अनुसंधान और विकास (Research and Development)
    • कौशल विकास (Skill Development)
    • गुणवत्ता मानकों का विकास (Development of Quality Standards)
    • इस्पात अपशिष्टिकरण के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी बाज़ार बनाना।
  • एक अंतर-मंत्रालयी समन्वय समिति (Inter-Ministerial Coordination Committee) का गठन किया जाएगा जिसमें निम्नलिखित मंत्रालयों और विभागों के प्रतिनिधि शामिल होंगे:
    • इस्पात मंत्रालय (Ministry of Steel)
    • सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (Ministry of Road Transport and Highways)
    • भारी उद्योग एवं लोक उद्यम मंत्रालय (Ministry of Heavy Industries and Public Enterprises)
    • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change)
    • श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय (Ministry of Labour and Employment)

यह समिति नीति के परिचालन और संबंधित विनियमों के प्रवर्तन की निगरानी करेगी।

इस्पात संकुल के विकास के लिये मसौदा नीति जारी

इस्पात मंत्रालय ने देश में इस्पात संकुल (Steel Clusters) के विकास के लिये मसौदा फ्रेमवर्क नीति जारी की। इस्पात संकुल वह निश्चित क्षेत्र होता है जिसमें इस्पात वैल्यू चेन (Value Chain) की कई इकाइयाँ एक-दूसरे के निकट स्थित होती हैं।

यह नीति इस्पात विनिर्माण में लघु और मध्यम स्तर के उद्द्यमों (Small and Medium Enterprises- SMEs) में आत्मनिर्भरता, लागत प्रतिस्पर्द्धा और विकास को बढ़ावा देने का प्रयास करती है।

नीति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

संकुल के प्रकार: नीति निम्नलिखित प्रकार के संकुलों को विकसित करने का प्रयास करती है:

  • सहायक और आनुप्रवाहिक संकुल (Ancillary and Downstream Clusters): इन संकुलों को इस्पात संयंत्रों के निकट विकसित किया जाएगा। इनमें सहायक और निर्माण इकाइयों (Ancillary and Fabrication Units) पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। सहायक इकाइयाँ उन हिस्सों का विनिर्माण करती हैं जिन्हें बड़े उद्योगों में इस्तेमाल किया जाता है।
  • मूल्य-वर्द्धित इस्पात संकुल (Value-added Steel Cluster): इन संकुलों को मांग केंद्रों (Demand Centres) के निकट स्थापित किया जाएगा।
    • मांग केंद्र वह केंद्रीय या क्षेत्रीय हब होता है जहाँ मार्केटिंग सेवाएँ (Marketing Services), अवसंरचना (Infrastructure) और प्रसंस्करण (Processes) साझा होते हैं। ऐसे संकुलों में द्वितीयक इस्पात उद्योग इकाइयाँ (Secondary Steel Industry Units) होंगी जो कि स्टेनलेस इस्पात जैसे अयस्क और कार्बन इस्पात का उत्पादन करेंगी।
  • संकुलों के लिये प्रावधान (Provisions for Clusters): संकुलों में निम्नलिखित उपलब्ध होगा:
    • रेलवे, सड़क मार्ग, अंतरर्देशीय जल-मार्ग और पोत क्षमता के ज़रिये लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी।
    • तर्कसंगत टैरिफ के साथ बिजली की आपूर्ति और कैप्टिव पॉवर जेनरेशन (Captive Power Generation) के लिये प्रावधान।
    • ज़मीन की उपलब्धता, साथ ही निर्दिष्ट समय-सीमा में क्लीयरेंस और मंज़ूरी के लिये एकल विंडो।
  • संकुल लगाने की पात्रता (Eligibility for Setting up Cluster): एक संकुल निम्नलिखित द्वारा स्थापित किया जा सकता है:
    • राज्य सरकार, केंद्रीय और राज्य स्तरीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम जैसी भू स्वामित्व वाली इकाई, राज्य औद्योगिक विकास संगठन एवं निजी कंपनियाँ।
    • गैर भू-स्वामित्व वाली इकाई जिसने आवश्यक भूमि के लिये किसी भू-स्वामित्व वाली इकाई से पूर्व सहमति हासिल की हो।
    • मौजूदा संकुल चलाने वाली संस्थाएँ।
    • किसी आवेदन के मूल्यांकन के मानदंडों में रोज़गार सृजन, पूर्व रिकॉर्ड, कार्यान्वयन की समय-सारणी और उत्पाद की कीमत शामिल होगी।
  • संस्थागत फ्रेमवर्क (Institutional Framework): मंत्रालय परियोजना के लिये एक कार्यदल और टास्क फोर्स बनाएगा। कार्यदल एक विस्तृत कार्ययोजना बनाएगा।
    • टास्क फोर्स कार्ययोजना के मूल्यांकन और मंज़ूरी के लिये ज़िम्मेदार होगा। संकुल को लगाने और उसके परिचालन के लिये मंत्रालय द्वारा एक विशेष उद्देश्य वाहन (Special Purpose Vehicle) तैयार किया जाएगा।
  • वित्तीय सहयोग (Financial Support): मंत्रालय के वित्तीय सहयोग में निम्नलिखित शामिल होंगे:
    • योजना की लागत को समाहित किया जाएगा।
    • मौजूदा केंद्रीय और राज्य योजनाओं, नीतियों तथा फंड के माध्यम से फंडिंग की जाएगी।
    • उसकी अपनी योजना से बजटीय संसाधनों के ज़रिये फंडिंग की जाएगी।

विद्युत

सौर और वायु ऊर्जा का इस्तेमाल करके बिजली उत्पादित करने पर अंतर्राज्यीय ट्रांसमिशन शुल्क पर छूट की अवधि बढ़ी

वर्ष 2016 में विद्युत मंत्रालय (Ministry of Power) ने सौर और वायु ऊर्जा का इस्तेमाल करके बिजली उत्पादित करने पर अंतर्राज्यीय ट्रांसमिशन शुल्क (inter-state transmission charges) और घाटे पर छूट की घोषणा की थी।

  • इस छूट का उद्देश्य यह था कि बिजली के नवीकरणीय स्रोतों को अधिक-से-अधिक अपनाया जाए। पहले सौर और वायु ऊर्जा परियोजनाओं के लिये यह छूट 31 मार्च, 2022 तक उपलब्ध थी। इस अवधि को अब 31 दिसंबर, 2022 तक बढ़ा दिया गया है।
  • यह छूट निम्नलिखित सौर और वायु ऊर्जा परियोजनाओं पर उपलब्ध है:
    • जिन्होंने अपनी नवीकरणीय खरीद बाध्यताओं को पूरा करने के लिये वितरण कंपनियों के साथ विद्युत खरीद समझौते (Power Purchase Agreements) किये हैं।
    • जिन्हें प्रतिस्पर्द्धी नीलामी प्रक्रिया के ज़रिये ठेके मिले हैं। यह छूट परियोजना के प्रवर्तन होने की तारीख से 25 वर्षों की अवधि के लिये उपलब्ध है।

पीएम-कुसुम योजना के एक घटक के कार्यान्वयन संबंधी दिशा-निर्देश जारी

प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (Pradhan Mantri Kisan Urja Suraksha evam Utthaan Mahabhiyan- PM-KUSUM) किसानों को वित्तीय और जल सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास करता है। इस योजना के घटक-C (Component-C) के अंतर्गत, 2022 तक 7.5 HP (Horse Power) की क्षमता वाले 10 लाख पंपों को सौर उर्जा से युक्त किया जाएगा। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने योजना के इस घटक के कार्यान्वयन हेतु दिशा-निर्देश जारी किये।

  • PM-KUSUM के घटक-C में निम्नलिखित प्रावधान हैं:
    • यह सिंचाई संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देता है।
    • किसानों को सक्षम बनाता है ताकि वे वितरण कंपनियों को अधिशेष सौर ऊर्जा बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित कर सकें (जिसे नेट मीटरिंग भी कहा जाता है)।
    • ऐसे एक लाख कृषि पंप लगाने के लिये एक पायलट फेज़ (Pilot Phase) शुरू किया जाएगा।
    • इसके बाद पायलट फेज़ के मूल्यांकन के आधार पर योजना को लागू किया जाएगा।

दिशा-निर्देशों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • कार्यान्वयन का मॉडल: सौर उर्जा चालित कृषि पंप दो तरीके से काम कर सकते हैं: (i) सौर पैनल और परंपरागत बिजली ग्रिड से बिजली लेना और (ii) सिर्फ सौर पैनल से बिजली लेना। कार्यान्वयन हेतु एजेंसियाँ इनमें से कोई एक या दोनों विकल्पों को चुन सकती हैं। राज्यों को इस बात की अनुमति है कि वे इन विकल्पों को चुनें या अपनी खुद की प्रणाली विकसित करें।
  • फीडर का चयन: योजना फीडर के आधार पर लागू होगी। फीडर को लोड, तकनीकी नुकसान, वाणिज्यिक नुकसान और उपभोक्ताओं की संख्या के आधार पर चुना जाएगा।
  • वित्तीय सहायता: केंद्र सरकार को पंप (7.5 HP तक के) के सौरकरण (Solarisation) की 30% लागत पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।
  • बिजली की खरीद के लिये टैरिफ: किसानों से अधिशेष बिजली की खरीद के लिये टैरिफ का निर्धारण संबंधित राज्य के विद्युत नियामक आयोग (Electricity Regulatory Commission) द्वारा किया जाएगा। मांग और आपूर्ति का प्रभावी प्रबंधन करने के लिये वितरण कंपनियाँ टाइम ऑफ डे टैरिफ (विभिन्न समय पर विभिन्न दर) शुरू कर सकती हैं। वास्तविक समय निरीक्षण (Real-Time Monitoring) हेतु स्मार्ट मीटर्स लगाए जाएंगे।
  • निर्दिष्ट मानकों का पालन: योजना के अंतर्गत लगाए गए सिस्टम्स को मंत्रालय और भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards- BIS) के मानकों का पालन करना होगा।

विदेशी मामले

11वीं ब्रिक्स शिखर वार्ता के बाद ब्रासीलिया घोषणापत्र जारी

भारत ने 14 नवंबर, 2019 को आयोजित 11वीं ब्रिक्स शिखर वार्ता में भाग लिया। शिखर वार्ता के बाद ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने ब्रासीलिया घोषणापत्र के रूप में एक संयुक्त बयान जारी किया। घोषणापत्र में विश्वव्यापी बहुपक्षीय प्रणालियों को मज़बूत करने, आर्थिक समन्वय, क्षेत्रीय संघर्षों को कम करने और ब्रिक्स देशों के बीच समन्वय का लक्ष्य रखा गया है। घोषणापत्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • बहुपक्षीय प्रणालियों को मज़बूत करना (Strengthening Multilateral Systems): घोषणापत्र में बहुपक्षीय प्रणाली, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन शामिल हैं, में समावेशीकरण की ज़रूरत पर बल दिया गया है। इसके अतिरिक्त सतत् विकास लक्ष्यों और जलवायु परिवर्तन पर पेरिस संधि के महत्त्व को देखते हुए घोषणापत्र कहता है कि विकसित देशों को विकासशील देशों के लिये संसाधन और दूसरी सहायता उपलब्ध करानी चाहिये।
  • आर्थिक समन्वय (Economic Cooperation): घोषणापत्र ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार का महत्त्व रेखांकित करता है। इसके अतिरिक्त वह व्यापार में सुधार करने के लिये निवेश और अवसंरचना की ज़रूरत पर बल देता है। वह एकतरफा और संरक्षणवादी उपायों की निंदा करता है और खुले बाज़ारों एवं उचित कारोबार तथा व्यापार का वातावरण तैयार करने का सुझाव देता है।
  • क्षेत्रीय संघर्ष (Regional Conflicts): घोषणापत्र में सीरिया, यमन, इज़राइल-फिलिस्तीन, खाड़ी क्षेत्र, लीबिया और अफगानिस्तान के क्षेत्रीय संघर्षों पर गौर किया गया है। यह विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिये सामूहिक प्रयासों की ज़रूरत को स्वीकार करता है और कहता है कि अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बरकरार रखना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है।
  • ब्रिक्स देशों के बीच समन्वय: घोषणापत्र कहता है कि ब्रिक्स देशों के बीच सुरक्षा, विज्ञान, तकनीक, औद्योगिक वृद्धि, पर्यावरण, ऊर्जा, वित्त, व्यापार और भ्रष्टाचार से निपटने जैसे क्षेत्रों में परस्पर सहयोग होना चाहिये।

जर्मनी की चांसलर का भारत दौरा

जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने 1 नवंबर, 2019 को भारत का दौरा किया। चांसलर के दौरे के दौरान दोनों देशों ने निम्नलिखित क्षेत्रों में विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर किये:

  • 2020-2024 की अवधि के लिये भारत और जर्मनी के विदेशी मामलों के मंत्रालयों के बीच मंत्रणा।
  • ग्रीन अर्बन मोबिलिटी (Green Urban Mobility) के लिये सहभागिता।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास।
  • समुद्री कचरे का निवारण।
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