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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    "भारतीय तटीय पारिस्थितिकी तंत्र विभिन्न प्रकार के संरक्षणात्मक और प्रबंधन संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है।" चर्चा कीजिये। इसके अलावा इस तरह की चुनौतियों पर काबू पाने के लिये सरकार की पहलों की चर्चा कीजिये।

    31 Jan, 2018 सामान्य अध्ययन पेपर 3 पर्यावरण

    उत्तर :

    उत्तर की रूपरेखा:

    • सर्वप्रथम तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का उल्लेख करते हुए संक्षेप में भूमिका लिखें
    • चुनौतियों की विस्तार से चर्चा करते हुए बताएँ कि इनके निवारण हेतु क्या उपाय अपनाये जा रहे हैं।

    भारतीय तटीय पारिस्थितिकी तंत्र एक समृद्ध जैव विविधता को समाहित किये हुए है जिसमें प्रवाल भित्तियाँ, लाखों हेक्टेयर में फैला मैंग्रोव क्षेत्र, मछलियाँ एवं समुद्री कछुओं तथा अन्य जीवों की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। लेकिन हाल के दिनों में यह पर्यावास विकास, अप्रभावी मत्स्यन प्रबंधन, जैव-संसाधनों का अतिदोहन, प्रदूषण तथा कानूनों का लचर क्रियान्वयन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।

    इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण संरक्षणात्मक तथा प्रबंधन संबंधी चुनौतियाँ निम्नांकित हैं:

    • पर्यावास का विकासः तटीय क्षेत्रों के अवनमन का मुख्य कारण तटों के सहारे वृहद् अवसंरचनात्मक विकास परियोजनाओं के साथ-साथ अनियोजित तथा अनियंत्रित विकास है। इसके कारण सागरीय पर्यावरण का गंभीर क्षय हो रहा है।
    • अवैज्ञानिक मत्स्य प्रबंधनः मशीन आधारित सघन मत्स्यन के कारण क्षेत्र विशेष में मछलियों की प्रजातियाँ विलोपन के कगार पर पहुँच रही हैं।
    • जैव-संसाधनों का अति दोहनः तटीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले जीवित जैव संसाधनों यथा समुद्री खीरा, घोंघा, समुद्री घोड़े, केकड़े, कछुए आदि के अत्यधिक दोहन से ये संकटापन्न स्थिति में आ गए हैं।
    • प्रदूषणः तटीय क्षेत्रों में औद्योगिक अपशिष्ट जल, ठोस, मानव मल, तलछट, खनिज तेलों का रिसाव आदि से सागरीय पारितंत्र पर गंभीर दुष्परिणाम दृष्टिगोचर हो रहा है।
    • कानूनों का लचर क्रियान्वयनः तटीय क्षेत्रों के नियमन हेतु अनेक अधिसूचनाएँ जारी की गईं एवं इनका संशोधन किया गया, लेकिन इनमें से अधिकांश अस्पष्ट हैं जिससे तटीय पर्यावरण पर संकट विद्यमान है। तटों के सहारे अवैधानिक निर्माण प्रक्रियाओं का जारी रहना, बालू खनन आदि गंभीर संकट उत्पन्न कर रहे हैं।
    • ज्ञान एवं जागरुकता की कमीः सागरीय व तटीय जैव-विविधता यथा समुद्री घास, प्रवाल भित्तियाँ, जलवायु परिवर्तन आदि के संदर्भ में हमारा ज्ञान काफी संकीर्ण है।

    उपरोक्त चुनौतियों को दूर करने हेतु निम्नांकित प्रयास किये जा रहे हैंः

    • सागरीय संरक्षित क्षेत्रों की समीक्षाः स्थानीय लोगों तथा उनके अधिकारों पर आधारित उस क्षेत्र के संसाधनों के अध्ययन से सागरीय संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा तथा इसे सागरीय पर्यावास को भी संरक्षित करने में मदद मिलेगी।
    • समुदाय आधारित मत्स्यन प्रबंधन प्रणालीः इससे स्थानीय समुदायों में स्थानीय मत्स्य संसाधनों के प्रति जागरूकता आएगी तथा वे विवेकशील दोहन की ओर अग्रसर होंगे।
    • समुदाय आधारित समुद्री कछुए का संरक्षणः समुद्री कछुए के संरक्षण हेतु यद्यपि कई प्रयास किये जा रहे हैं तथापि इन प्रयासों को उचित आर्थिक व अन्य प्रोत्साहनों के साथ मान्यता प्राप्त होनी चाहिये।
    • मत्स्य पालन के विविधीकरण का अध्ययनः विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय विशिष्टता के संदर्भ में मत्स्यन के विविधीकरण का अध्ययन, सागरीय पर्यावास को संरक्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
    • तटीय व सागरीय संरक्षण व जैव-विविधता संबंधी नीतियों की कानूनी समीक्षा करनाः इस तरह की समीक्षा अतीत के क्रियान्वयन, वर्तमान मुद्दों और सुधार की दिशा में पहल पर ध्यान देने वाली होनी चाहिये।
    • न्यायिक प्रशिक्षणः भारतीय न्यायिक प्रणाली तटीय तथा सागरीय जैव-विविधता संबंधी मुद्दों एवं कानूनों के संदर्भ में कम प्रभावी है। अतः इस संदर्भ में संवेदनशील न्यायिक प्रशिक्षण की ज़रूरत है।समुदाय तथा गैर सरकारी संगठनों को मददः इनकी पहल सरकारी विभाग की तुलना में विषय विशिष्ट होती है।

    इन नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन से भारतीय तटीय पारिस्थितिकी तंत्र से संबंधित विभिन्न प्रकार के संरक्षणात्मक और प्रबंधन संबंधी चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है।

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