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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • गुप्तकाल को मूर्तिकला के विकास का उत्कृष्ट काल कहा जाता है। गुप्तकालीन प्रतिमाएँ उत्तरोतर काल में न केवल भारतीय कला का 'मॉडल' रही बल्कि उन्होंने सुदूर-पूर्व तक 'आदर्शों' के रूप में अपनी पहचान भी बनाई। विवेचना करें।

    05 Apr, 2017 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृति

    उत्तर :

    गुप्तकाल में कला, विज्ञान और साहित्य ने अत्यधिक समृद्धि हासिल की। ब्राह्मणीय, जैन और बौद्ध देवताओं के प्रतिमा-विज्ञान के मानदण्डों को सटीक बनाया गया तथा उनका मानकीकरण किया गया जिसने उत्तरवर्ती शताब्दियों के लिये आदर्श नमूने के रूप में भारत ही नहीं बल्कि सुदूर-पूर्व तक कार्य किया।

    गुप्तकाल में मूर्तिकला की तकनीकों को संपूर्णता मिली। निश्चित शैलियों का विकास हुआ और सूक्ष्मता से सौन्दर्य के आदर्शों का सृजन हुआ। इस काल में पूर्ववर्ती चरणों के कलात्मक व्यवसायों की सभी प्रवृत्तियाँ और रूझान एकीकृत हो कला की पराकाष्ठा में पहुँच गए थे। यथा-गुप्त मूर्तिकला अमरावती और मथुरा की प्रारम्भिक उत्कृष्ट मूर्तिकला का तार्किक परिणाम दिखती है। इसने सुघट्यता मथुरा से और लालित्य अमरावती से लिया है। फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त मूर्तिकला का संबंध एक ऐसे क्षेत्र  से है जो पूर्णरूपेण भिन्न है। मूर्तियों को देखकर ऐसा लगता है कि गुप्त कलाकार एक उच्चतर आदर्श के लिये कार्य कर रहे हैं।

    गुप्त मूर्तिकला में तीनों धर्मों (बौद्ध, जैन, ब्राह्मण-हिन्दू धर्म) के अलावा गैर-धार्मिक विषयों की भी मूतियाँ बनाई गई। गुप्तकालीन मूर्तियों की निर्मलता, अंग सौन्दर्य, हाव-भाव एवं जीवन्तता ने मूर्तिकला को ऊँचाई प्रदान की। गुप्तकाल की सारनाथ से प्राप्त ‘धर्म चक्र प्रवर्त्तन मुद्रा’ तथा सुल्तानगंज (बिहार) से प्राप्त बुद्ध की ताम्रमूर्ति अतिविशिष्ट हैं। गुप्तकाल में जैन धर्म पर हिन्दू प्रभाव बढ़ रहा था, इसलिये तीर्थकर के बगल में इन्द्र, सूर्य, कुबेर आदि की मूर्तियाँ बनने लगी। इसी काल में दशावतार की मान्यता आर्ई। एलोरा (दशावतार मूर्तियाँ), खजुराहो, देवगढ़ आदि जगहों पर विष्णु के 10 अवतारों को मूर्त रूप दिया गया।

    यह कहा जा सकता है कि गुप्तकाल में भरहुत, अमरावती, सांची और मथुरा की कला एक-दूसरे के निकट आते-आते मिलकर एक हो गई और मूर्तिकला के नए मानदण्ड बने। संरचना में, महिला आकृति आकर्षण का केन्द्र बन गई एवं सौन्दर्य के नए आदर्श का आविर्भाव हुआ। गुप्त मूर्तिकला ने नग्नता को भी एक नियम के रूप में समाप्त कर आदर्श स्थापित किया। अतः यदि गुप्तकाल को मूर्तिकला का उत्कृष्ट काल कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

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