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प्रश्न :
निबंध विषय
1. “संस्थाओं का आधार व्यक्ति नहीं, बल्कि मूल्यों का स्थायित्व होता हैं।”
24 Jan, 2026 निबंध लेखन निबंध
2. “संबद्ध विश्व में, सहानुभूति प्रभावी नेतृत्व की नई पहचान बन गई है।“उत्तर :
1. “संस्थाओं का आधार व्यक्ति नहीं, बल्कि मूल्यों का स्थायित्व होता हैं।”
निबंध को समृद्ध करने वाले उद्धरण:
- चेस्टर ए. आर्थर: "मनुष्य मर सकते हैं, लेकिन स्वतंत्र संस्थाओं की संरचना बनी रहती है।"
- जॉन एडम्स: "अंत तक यह विधि का शासन हो, न कि व्यक्तियों का।"
- जवाहरलाल नेहरू: "हम छोटे लोग हैं जो महान उद्देश्यों की सेवा कर रहे हैं, क्योंकि उद्देश्य महान हैं, उस महानता का कुछ अंश हम पर भी आ पड़ता है।"
परिचय: कथन की व्याख्या
- राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक संस्थाएँ व्यक्तियों के कार्यकाल से आगे भी निरंतरता बनाए रखने के लिये होती हैं।
- व्यक्ति उत्साह और दूरदर्शिता लेकर आते हैं, किंतु मूल्य संस्थाओं को वैधता, विश्वास तथा स्थायित्व प्रदान करते हैं।
- यह कथन संकेत देता है कि संस्थाएँ नेतृत्व परिवर्तन के बाद तभी टिकती हैं जब वे व्यक्तिगत सत्ता के बजाय साझा नैतिक आधारों में निहित हों।
- इतिहास दर्शाता है कि व्यक्तित्व-प्रधान व्यवस्थाएँ क्षीण हो जाती हैं, जबकि मूल्य-आधारित संस्थाएँ दीर्घकाल तक बनी रहती हैं।
दार्शनिक और नैतिक आधार
- संस्थागत स्मृति के रूप में मूल्य
- मूल्य संस्थाओं के नैतिक DNA की तरह कार्य करते हैं, जो संस्थापक अभिकर्त्ताओं की अनुपस्थिति में भी निर्णयों का मार्गदर्शन करते हैं।
- अरस्तू के अनुसार सद्गुण क्षणिक प्रतिभा नहीं, बल्कि सतत अभ्यास का परिणाम है और संस्थाएँ भी इसी सिद्धांत को दर्शाती हैं।
- भारतीय दृष्टिकोण
- मर्यादा (नियमात्मक सीमाएँ) की अवधारणा यह सुनिश्चित करती है कि संस्थाएँ व्यक्तियों से ऊपर कार्य करें।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने करिश्माई नेतृत्व से परे लोकतंत्र को बनाए रखने के लिये संवैधानिक नैतिकता पर ज़ोर दिया।
- सत्ता बनाम सिद्धांत
- व्यक्तियों पर आधारित संस्थाएँ अस्थिर और मनमानी होने की आशंका रखती हैं।
- मूल्य-आधारित संस्थाएँ अधिकार का वितरण करती हैं, जिससे पूर्वानुमेयता और निष्पक्षता सुनिश्चित होती है।
ऐतिहासिक और तुलनात्मक साक्ष्य
- भारतीय अनुभव
- राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद भारतीय संविधान सात दशकों से अधिक समय तक इसलिये कायम रहा है क्योंकि उसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों की गहरी नींव मौजूद है।
- चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं ने व्यक्तित्वों के बजाय नैतिक मानदंडों से संरक्षित रहने के कारण अपनी विश्वसनीयता बनाए रखी है।
- वैश्विक उदाहरण
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अपनी संस्थाओं का पुनर्निर्माण किया, जिससे सत्तावाद की वापसी रोकी जा सकी।
- इसके विपरीत, जिन सत्ताओं का आधार व्यक्ति-केंद्रित महिमामंडन था, वे प्राय: नेतृत्व बदलते ही पतन का शिकार हो गईं।
- कॉरपोरेट और सामाजिक संस्थाएँ
- मज़बूत नैतिक संस्कृति वाले संगठन दीर्घकाल में व्यक्तित्व-प्रधान कंपनियों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
- अध्ययनों से पता चलता है कि सुदृढ़ शासन ढाँचे वाली कंपनियों में अस्थिरता कम होती है और हितधारकों का विश्वास अधिक होता है।
समकालीन प्रासंगिकता
- शासन और प्रशासन
- बार-बार नेतृत्व परिवर्तन संस्थागत दृढ़ता की परीक्षा लेते हैं।
- पारदर्शिता, जवाबदेही और सेवा-भाव से संचालित संस्थाएँ सहज रूप से अनुकूलन कर लेती हैं।
- न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज
- संस्थागत विश्वसनीयता व्यक्तियों की प्रसिद्धि पर नहीं, बल्कि मूल्यों के पालन पर निर्भर करती है।
- जहाँ मूल्य क्षीण होते हैं, वहाँ प्रतिभा के बावजूद जन-विश्वास घटता है।
- डिजिटल युग की चुनौतियाँ
- प्रौद्योगिकी व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सत्ता को केंद्रीकृत कर सकती है।
- मनमानी और दुरुपयोग को रोकने के लिये सशक्त संस्थागत मूल्यों की आवश्यकता होती है।
नैतिक समन्वय
- व्यक्ति परिवर्तन की शुरुआत करते हैं और मूल्य उसे संस्थागत रूप देते हैं।
- व्यक्तिगत आकर्षण प्रेरणा दे सकता है, किंतु नैतिक स्थिरता ही उसे दीर्घकाल तक बनाए रखती है।
- संस्थाएँ तब स्थायी होती हैं जब नियम, मानदंड और अंतरात्मा व्यक्तियों से आगे तक बने रहते हैं।
निष्कर्ष
संस्थाएँ पीढ़ियों के बीच सामाजिक अनुबंध होती हैं। जब मूल्य व्यक्तियों से आगे तक बने रहते हैं, तब संस्थाओं को वैधता, दृढ़ता और जन-विश्वास प्राप्त होता है। जो समाज व्यक्तिगत आकर्षण के बजाय नैतिक आधारों को प्राथमिकता देते हैं, वे परिवर्तन के बीच भी निरंतरता सुनिश्चित करते हैं। अंततः सतत संस्थाएँ व्यक्तियों की नहीं, बल्कि साझा मूल्यों की स्मारक होती हैं।
2. “संबद्ध विश्व में, सहानुभूति प्रभावी नेतृत्व की नई पहचान बन गई है।“
निबंध को समृद्ध करने वाले उद्धरण:
- महात्मा गांधी: "स्वयं को खोजने का सबसे अच्छा तरीका, स्वयं को दूसरों की सेवा में खो देना है।"
- थियोडोर रूजवेल्ट: "लोग इस बात की परवाह नहीं करते कि आप कितना जानते हैं, जब तक उन्हें यह न पता हो कि आप उनकी कितनी परवाह करते हैं।"
- डैनियल गोलमैन: "सहानुभूति सभी सामाजिक दक्षताओं के लिये मूलभूत कौशल का प्रतिनिधित्व करती है।"
- मार्टिन लूथर किंग जूनियर: "जीवन का सबसे लगातार और तात्कालिक प्रश्न यह है: आप दूसरों के लिये क्या कर रहे हैं?"
परिचय: कथन की व्याख्या
- वैश्वीकरण, डिजिटल मीडिया और त्वरित संचार ने समाजों को गहराई से आपस में जोड़ दिया है।
- ऐसे विश्व में नेतृत्व अब केवल अधिकार के माध्यम से नहीं, बल्कि समझ और विश्वास के ज़रिये स्थापित होता है।
- यह कथन संकेत देता है कि सहानुभूति अर्थात दूसरों के अनुभवों को समझने और उनसे जुड़ने की क्षमता प्रभाव और वैधता का एक प्रमुख स्रोत बन गई है।
- आज नेतृत्व का मूल्यांकन तकनीकी दक्षता के साथ-साथ भावनात्मक बुद्धिमत्ता के आधार पर भी किया जाता है।
दार्शनिक और नैतिक आधार
- नैतिक बुद्धिमत्ता के रूप में सहानुभूति
- नैतिकता की शुरुआत दूसरों की गरिमा और पीड़ा को पहचानने से होती है।
- एडम स्मिथ ने तर्क दिया था कि सहानुभूति नैतिक निर्णय का आधार होती है।
- भारतीय नैतिक चिंतन
- करुणा भारतीय दर्शन के केंद्र में स्थित है।
- महात्मा गांधी के नेतृत्व को सबसे गरीब लोगों के प्रति सहानुभूति से नैतिक अधिकार प्राप्त हुआ।
- नियंत्रण से परे नेतृत्व
- अधिकार आज्ञापालन तो करा सकता है, लेकिन सहानुभूति समर्पण अर्जित करती है।
- विविध समाजों में सहानुभूतिपूर्ण नेतृत्व विभाजनों को कम करने का कार्य करता है।
शासन और सार्वजनिक जीवन में सहानुभूति
- नीति निर्माण
- सहानुभूतिपूर्ण शासन केवल अमूर्त आँकड़ों के बजाय वास्तविक जीवन की परिस्थितियों को ध्यान में रखता है।
- कोविड-19 के दौरान, उन सरकारों ने जो प्रवासी संकट को समझा और दस्तावेज़ीकरण मानदंडों में ढील दी, अधिक मानवता के साथ प्रतिक्रिया दी।
- विश्वास और वैधता
- एडेलमैन ट्रस्ट बैरोमीटर (2023) के अनुसार, सहानुभूति नेतृत्व में विश्वास के प्रमुख कारकों में से एक है।
- जो अभिकर्त्ता उदासीन माने जाते हैं, वे डिजिटल युग में जल्दी ही विश्वसनीयता खो देते हैं।
- संकटकालीन नेतृत्व
- प्राकृतिक आपदाएँ और संघर्ष केवल तर्कसंगत व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक आश्वासन की भी मांग करते हैं।
- सहानुभूति संकट के दौरान सामाजिक सामंजस्य को मज़बूत करती है।
कॉरपोरेट, सामाजिक और वैश्विक नेतृत्व
- कार्यस्थल नेतृत्व
- सहानुभूतिपूर्ण नेतृत्व कर्मचारियों की सहभागिता बढ़ाता है और थकावट को कम करते हैं।
- अध्ययन बताते हैं कि सहानुभूतिपूर्ण संस्कृति वाली संस्थाओं में उत्पादकता और कर्मचारियों के बने रहने की दर अधिक होती है।
- वैश्विक कूटनीति
- परस्पर जुड़े विश्व में, सांस्कृतिक समझ संघर्षों की तीव्रता को नियंत्रित करने में सहायता करती है।
- सॉफ्ट पावर अब बल या दबाव के बजाय मूल्यों और भावनात्मक सामंजस्य पर अधिक निर्भर करती है।
- प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया
- अभिकर्त्ता लगातार दृश्य और जवाबदेह होते हैं।
- सहानुभूति की कमी जल्दी ही सार्वजनिक धारणा में बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाती है और दंडित की जाती है।
चुनौतियाँ और भ्रांतियाँ
- सहानुभूति को प्राय: कमज़ोरी समझा जाता है, जबकि इसके लिये भावनात्मक ताकत की आवश्यकता होती है।
- बिना कार्रवाई वाली दिखावटी सहानुभूति विश्वास को कमज़ोर कर देती है।
- सच्ची सहानुभूति को समावेशी निर्णयों और निष्पक्ष परिणामों में परिवर्तित होना चाहिये।
नैतिक समन्वय
- परस्पर संपर्क संवाद का विस्तार करता है, जबकि सहानुभूति उस संवाद का मानवीय विश्लेषण करती है।
- आज का नेतृत्व पदानुक्रमिक नहीं, बल्कि संबंधपरक है।
- सहानुभूति शक्ति को विश्वास में और अधिकार को वैधता में बदल देती है।
निष्कर्ष
परस्पर जुड़े विश्व में, नेतृत्व दूर से नहीं बल्कि सहभागिता और समझ के माध्यम से किया जाता है। सहानुभूति अभिकर्त्ताओं को विविधता में मार्गदर्शन करने, संघर्ष को प्रबंधित करने और सहयोग को प्रेरित करने में सक्षम बनाती है। जैसे-जैसे समाज परस्पर जुड़ते हैं, अनुभव करने, ध्यान से सुनने और मानवीय तरीके से प्रतिक्रिया देने की क्षमता नेतृत्व का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन बन जाती है। सहानुभूति के बिना अधिकार हो सकता है, लेकिन नेतृत्व मौजूद नहीं होता।
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