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प्रश्न :
प्रश्न. वैश्विक जलवायु प्रयासों को गति देने हेतु COP-30 को पहले ग्लोबल स्टॉकटेक के बाद की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को देखते हुए, NDCs को और अधिक प्रभावी बनाने तथा महत्त्वाकांक्षाओं के अंतर को समाप्त करने में COP-30 की भूमिका का परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)
07 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 पर्यावरणउत्तर :
उत्तर की शुरुआत COP-30 के प्रमुख परिणामों को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिये कि COP-30 ने इन लक्ष्यों को किस प्रकार आगे सुदृढ़ किया।
- भारत के अद्यतन NDC का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये।
- इनमें निहित सीमाओं को भी उजागर कीजिये।
- अंत में इन्हें बेहतर बनाने के उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय
COP-30, जो नवंबर 2025 में ब्राज़ील के बेलेम (Belém) में आयोजित हुई, पेरिस समझौते की ग्लोबल स्टॉकटेक प्रक्रिया के बाद पहला बड़ा जलवायु सम्मेलन था।
- इसने ‘ग्लोबल मुतिराओ’ पैकेज प्रस्तुत किया, जिसने वर्ष 2030 तक अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने जैसे लक्ष्यों को पुनः पुष्ट किया तथा समानता और क्रियान्वयन को जलवायु कार्रवाई के केंद्र में रखने हेतु जस्ट ट्रांज़िशन फ्रेमवर्क की शुरुआत की।
- COP-30 ने ग्लोबल स्टॉकटेक की इस मांग को और मज़बूत किया कि देश अधिक महत्त्वाकांक्षी और संपूर्ण-अर्थव्यवस्था वाले राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) प्रस्तुत कीजिये।
मुख्य भाग:
NDC को सशक्त बनाने और महत्त्वाकांक्षा अंतर को कम करने में COP-30 का महत्त्व
- NDCs को ग्लोबल स्टॉकटेक फ्रेमवर्क में आधारित करना: COP-30 ने ग्लोबल स्टॉकटेक के निष्कर्षों पर आगे निर्माण करते हुए देशों को अधिक महत्त्वाकांक्षी बनने और अपने NDCs को दीर्घकालिक तापमान लक्ष्यों के अनुरूप लाने के लिये प्रोत्साहित किया। इससे NDC संशोधन के लिये राजनीतिक गति मिली।
- जस्ट ट्रांज़िशन और समानता पर ज़ोर: जस्ट ट्रांज़िशन मैकेनिज़्म की स्थापना के माध्यम से COP-30 ने जलवायु रणनीतियों में समानतापूर्ण निम्न-कार्बन संक्रमण को शामिल किया, जिससे भारत जैसे देशों को अपने NDCs में सामाजिक और आर्थिक न्याय को बेहतर ढंग से एकीकृत करने का अवसर मिला।
- अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने के प्रोत्साहन: वर्ष 2030 तक ‘अनुकूलन वित्त को तीन गुना’ करने के निर्णय ने ऐसी वित्तीय संरचनाओं को जन्म दिया जो विकासशील देशों को NDCs में अनुकूलन लक्ष्यों को शामिल करने में सक्षम बनाती हैं जिससे वे केवल न्यूनीकरण-केंद्रित न रहकर अधिक समग्र बन जाते हैं।
- क्रियान्वयन में तेज़ी को बढ़ावा: COP-30 ने ‘इम्प्लीमेंटेशन एक्सीलरेटर’ की शुरुआत की, जो मौजूदा NDCs पर कार्रवाई को गति देगा। इससे महत्त्वाकांक्षाओं को राष्ट्रीय नीतियों और निवेशों में रूपांतरित करने में सहायता मिलेगी, विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु लचीलापन जैसे क्षेत्रों में।
भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs):
- वर्ष 2030 तक 2005 के स्तर की तुलना में GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी।
- वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित विद्युत क्षमता को 50% तक बढ़ाना।
- वनीकरण और वृक्ष-आवरण बढ़ाकर 2.5–3 बिलियन टन CO₂ समतुल्य के अतिरिक्त कार्बन सिंक का निर्माण करना।
- भारत 2035 चक्र के लिये अपना संशोधित NDC प्रस्तुत करने की योजना बना रहा है, जो COP-30 के दौरान निर्धारित पोस्ट-ग्लोबल स्टॉकटेक अपेक्षाओं के अनुरूप होगा।
NDCs को सुदृढ़ करने में सीमाएँ:
- प्रमुख प्रतिबद्धताओं का स्वैच्छिक स्वरूप: अधिकांश COP-30 के परिणाम, जिनमें जीवाश्म ईंधन परिवर्तन के प्रयास शामिल हैं, स्वैच्छिक और गैर-बाध्यकारी हैं, जिससे उनके अनुपालन और महत्त्वाकांक्षा बढ़ाने की क्षमता सीमित हो जाती है।
- अद्यतन NDCs के देर से प्रस्तुतीकरण: पेरिस समझौते द्वारा फरवरी 2025 की समय-सीमा तय किये जाने के बावजूद कई देशों ने अपने अद्यतन NDCs समय पर जमा नहीं किये, जिससे COP-30 से पहले वैश्विक महत्त्वाकांक्षा असमान बनी रही।
- अपर्याप्त शमन लक्ष्य: नई प्रतिबद्धताओं के बावजूद कुल मिलाकर NDCs अब भी 1.5°C तापमान सीमा के अनुरूप मार्ग पर नहीं हैं, क्योंकि अनुमानित उत्सर्जन कटौती आवश्यक मात्रा से काफी कम बनी हुई है।
- सीमित जलवायु वित्त उपलब्धता: हालाँकि COP-30 ने वर्ष 2030 तक अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने की मांग की, लेकिन वास्तविक वित्तीय प्रतिबद्धताएँ अभी भी कम हैं तथा वितरण तंत्र अस्पष्ट हैं, विशेषकर उन विकासशील देशों के लिये जिन्हें शमन और अनुकूलन दोनों के लिये पर्याप्त सहायता चाहिये।
NDC लक्ष्य निर्धारण और क्रियान्वयन में सुधार के उपाय
- बाध्यकारी तंत्रों के माध्यम से महत्त्वाकांक्षा को औपचारिक बनाना: मध्यावधि, कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्यों (जैसे पाँच-वर्षीय रोलिंग शमन प्रतिबद्धताएँ) को अपनाने से स्वैच्छिक प्रतिज्ञाओं से आगे बढ़कर महत्त्वाकांक्षा और जवाबदेही को सुदृढ़ किया जा सकता है।
- पूर्वानुमेयता के साथ जलवायु वित्त को बढ़ाना: विकसित देशों को अनुच्छेद 9.1 के तहत अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट समय-सारिणी और बढ़े हुए समर्थन के साथ लागू करना चाहिये, जिससे शर्तों पर आधारित सहायता पर निर्भरता कम हो सके।
- राष्ट्रीय योजनाओं में जलवायु कार्रवाई का मुख्य धाराकरण: NDC लक्ष्यों को राष्ट्रीय विकास रणनीतियों, बजट ढाँचों और क्षेत्रीय नीतियों में एकीकृत करने से जलवायु कार्रवाई संस्थागत रूप ले सकती है, बजाय इसके कि वह केवल वार्ताओं तक सीमित रहे।
- निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) को सुदृढ़ करना: पारदर्शी प्रगति मूल्यांकन और नियमित पीयर-रिव्यू सहित MRV ढाँचों को बेहतर बनाने से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि देश निर्धारित मार्ग पर बने रहें तथा प्राप्त परिणामों के आधार पर नीतियों में संशोधन कर सकें।
निष्कर्ष
COP-30, पोस्ट-ग्लोबल स्टॉकटेक जलवायु एजेंडा को सुदृढ़ करने और अधिक मज़बूत व व्यापक NDCs को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जस्ट ट्रांज़िशन, अनुकूलन वित्त और क्रियान्वयन ढाँचों पर इसका ज़ोर महत्त्वाकांक्षा अंतर को कम करने के लिये नई दिशाएँ प्रदान करता है। फिर भी स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं और वित्तीय कमी यह दर्शाती है कि NDCs को वास्तविक वैश्विक जलवायु कार्रवाई में बदलने के लिये अधिक प्रभावी तंत्रों और पूर्वानुमेय समर्थन की आवश्यकता बनी हुई है।
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