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प्रश्न :
प्रश्न. “केवल संवैधानिक प्रावधान अपने आप में लोकतांत्रिक शासन को बनाए रखने के लिये पर्याप्त नहीं हैं, जब तक कि उन्हें संवैधानिक नैतिकता द्वारा जीवंत न किया जाये।” विवेचना कीजिये। (250 शब्द)
06 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भूगोलउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत संवैधानिक नैतिकता (CM) को परिभाषित करके कीजिये।
- मुख्य भाग में यह तर्क दीजिये कि केवल संवैधानिक प्रावधान स्वयं में क्यों अपर्याप्त हैं।
- इसके बाद लोकतंत्र को बनाए रखने में संवैधानिक नैतिकता की भूमिका लिखें।
- अंत में संवैधानिक नैतिकता की रक्षा के उपाय प्रस्तुत कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
संवैधानिक नैतिकता वह आंतरिक निष्ठा है जो व्यक्ति को संविधान के मूल मूल्यों स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, विधि का शासन और संस्थागत सम्मान का पालन करने हेतु प्रेरित करती है, जो मात्र संवैधानिक प्रावधानों के शब्दशः अनुपालन से कहीं अधिक व्यापक है।
- भारतीय संदर्भ में डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा प्रतिपादित इस अवधारणा में संविधान और उसकी प्रक्रियाओं के प्रति सर्वोच्च निष्ठा निहित है।
- इस नैतिक दिशासूचक के बिना, संवैधानिक व्यवस्थाएँ व्यवहार में खोखली या अधिनायकवादी रूप भी ले सकती हैं।
मुख्य भाग:
केवल संवैधानिक प्रावधान ही क्यों अपर्याप्त हैं?
- नैतिक प्रतिबद्धता के बिना कानून को विकृत किया जा सकता है: एक संविधान औपचारिक नियम तो प्रदान करता है, लेकिन लोकतांत्रिक शासन इस तर्क पर निर्भर करता है कि उन नियमों की व्याख्या और क्रियान्वयन किस प्रकार किया जाता है।
- उदाहरण के लिये, अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) संवैधानिक रूप से वैध था, फिर भी अतीत में इसे दलगत हितों के लिये बार-बार दुरुपयोग किया गया, जिससे संघवाद कमज़ोर हुआ।
- यह स्वयं संवैधानिक प्रावधान नहीं था, बल्कि न्यायिक हस्तक्षेप (एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994) और विकसित होती संवैधानिक नैतिकता थी, जिसने इसके मनमाने उपयोग पर अंकुश लगाया।
- उदाहरण के लिये, अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) संवैधानिक रूप से वैध था, फिर भी अतीत में इसे दलगत हितों के लिये बार-बार दुरुपयोग किया गया, जिससे संघवाद कमज़ोर हुआ।
- संवैधानिक कानून और प्रशासनिक कार्यवाही के बीच अंतर: प्रणालीगत पूर्वाग्रह और नौकरशाही विवेकाधिकार कानूनों के असमान प्रवर्तन का कारण बन सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) जैसे स्पष्ट संवैधानिक अधिकार भी व्यवहार में वास्तविक न्याय सुनिश्चित नहीं कर पाते।
- अनुच्छेद 14 और 15 के अंतर्गत सार्थक समानता पर न्यायपालिका का ज़ोर यह दर्शाता है कि संवैधानिक मूल्य बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने के लिये आवश्यक हैं।
- संस्थागत स्वायत्तता हेतु नैतिक आत्म-नियंत्रण आवश्यक: निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और सिविल सेवा जैसी स्वतंत्र संस्थाएँ संविधान से अधिकार प्राप्त करती हैं, लेकिन उनकी विश्वसनीयता नैतिक निष्पक्षता तथा सत्यनिष्ठा पर निर्भर करती है।
- संविधान इन संस्थाओं को अधिकार प्रदान करता है, फिर भी संवैधानिक नैतिकता यह सुनिश्चित करती है कि ये अधिकार निष्पक्ष रूप से प्रयोग किये जाएँ, जैसा कि अनुच्छेद 124 और 217 के तहत न्यायपालिका की स्वतंत्रता संबंधी घोषणाओं में देखा गया है।
- विवेकाधिकार को नियंत्रित करने में संवैधानिक प्रावधानों की सीमाएँ: संविधान संवैधानिक अधिकारियों को व्यापक विवेकाधिकार प्रदान करता है, लेकिन यदि इसे संवैधानिक नैतिकता द्वारा मार्गदर्शन न किया जाए तो इसका दुरुपयोग लोकतंत्र को कमज़ोर कर सकता है।
- उदाहरण के लिये, अनुच्छेद 200 के तहत राज्यों के राज्यपालों का विवेकाधिकार बिलों को आरक्षित करने में प्राय: पक्षपातपूर्ण प्रश्न खड़े करता रहा है।
- तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (2025) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यपालों को राज्य बिलों पर समयबद्ध ढॉंचे के भीतर मंत्रिपरिषद की सहायता तथा परामर्श के अनुसार ही कार्य करना चाहिये और स्वतंत्र विवेकाधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिये।
- इसके अलावा, नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016) में न्यायिक टिप्पणियों ने यह उजागर किया कि संवैधानिक कार्यकर्त्ताओं को तटस्थता और संयम के साथ कार्य करना चाहिये, जो पाठ्य अधिकार से परे नैतिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- उदाहरण के लिये, अनुच्छेद 200 के तहत राज्यों के राज्यपालों का विवेकाधिकार बिलों को आरक्षित करने में प्राय: पक्षपातपूर्ण प्रश्न खड़े करता रहा है।
- विकसित होते सामाजिक संदर्भ: संवैधानिक प्रावधान स्थिर हैं, जबकि समाज समय के साथ विकसित होता है। यदि नैतिक प्रतिबद्धता न हो तो संविधान उभरती चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकता।
- नवतेज सिंह जौहर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में समलैंगिकता को गैर-अपराधिक घोषित करते समय सर्वोच्च न्यायालय ने यह ज़ोर दिया कि सामाजिक नैतिकता किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने का औचित्य नहीं दे सकती और संवैधानिक नैतिकता को सामाजिक नैतिकता के नाम पर बलिदान नहीं किया जाना चाहिये।
लोकतंत्र बनाए रखने में संवैधानिक नैतिकता की भूमिका
- व्यक्तिगत अधिकारों और गरिमा की रक्षा: संवैधानिक नैतिकता मौलिक अधिकारों के दायरे का विस्तार करने में केंद्रीय भूमिका निभाती है।
- अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्याएँ केवल प्रक्रियात्मक वैधता तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इसमें गरिमा, गोपनीयता और व्यक्तिगत स्वायत्तता को भी शामिल किया गया।
- यह स्पष्ट करता है कि नैतिक विवेचना संविधान के पाठ को प्रभावी बनाकर सामाजिक बदलावों के बीच लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करती है।
- सामाजिक न्याय और परिवर्तनकारी संवैधानिकता को बनाए रखना: भारत का संविधान स्वभाव में परिवर्तनकारी है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्यायों को सुधारना है।
- संवैधानिक नैतिकता ऐसे प्रावधानों की व्याख्या का मार्गदर्शन करती है, जैसे अनुच्छेद 17 (जो सभी रूपों में ‘अस्पृश्यता’ को समाप्त करता है), यह सुनिश्चित करते हुए कि सामाजिक न्याय केवल औपचारिक वादा न रहकर राज्य और समाज की नैतिक ज़िम्मेदारी के रूप में स्थापित हो।
- ज़िम्मेदार राजनीतिक आचरण सुनिश्चित करना: लोकतांत्रिक शासन केवल संवैधानिक पदों तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक व्यवहार पर भी निर्भर करता है।
- ऐसी प्रथाएँ जैसे विपक्ष का सम्मान, विधायी बहस और संसदीय परंपराएँ, हर समय कानून के माध्यम से लागू नहीं की जा सकतीं।
- ये प्रथाएँ इसलिए कायम रहती हैं क्योंकि लोकतांत्रिक संस्कृति में संवैधानिक नैतिकता अंतर्निहित है, न कि केवल लिखित प्रावधानों के चलते।
- संघीय संतुलन और सहकारी शासन को बनाए रखना: संवैधानिक नैतिकता अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकती है तथा अनुच्छेद 1, 245 और 246 में निहित संघीय सिद्धांतों के प्रति सम्मान को बढ़ावा देती है।
- उदाहरण के लिये, एस.आर. बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1994) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह ज़ोर दिया कि संघवाद संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। यह विभिन्न राज्यों में लोकतांत्रिक शासन सुनिश्चित करता है।
- संसदीय लोकतंत्र और परंपराओं की रक्षा: कई लोकतांत्रिक प्रथाएँ जैसे मंत्रिपरिषद की जवाबदेही, प्रश्नकाल और संसदीय विपक्ष का सम्मान, नियमों की बजाय परंपराएँ हैं।
- संवैधानिक नैतिकता अनुच्छेद 75 और 105 के तहत नैतिक विधायी आचरण को बढ़ावा देकर इन अलिखित परंपराओं को सुदृढ़ बनाए रखती है। जिससे केवल प्रक्रियात्मक बहुमत नहीं बल्कि जवाबदेही और विचार-विमर्श पर आधारित लोकतंत्र सुनिश्चित होता है।
- शांतिपूर्ण असहमति और लोकतांत्रिक बहुलवाद को सक्षम बनाना: लोकतंत्र की मज़बूती के लिये असहमति और विचारों की विविधता के प्रति सहिष्णु होना आवश्यक है। संवैधानिक नैतिकता अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्रताओं की व्याख्या में मार्गदर्शन करती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रतिबंध युक्तिसंगत और आनुपातिक हों।
- विद्रोह और निवारक हिरासत से जुड़े कानूनों पर न्यायिक समीक्षा इस सिद्धांत को दर्शाती है कि लोकतांत्रिक स्थिरता केवल संवैधानिक असहमति को दबाने के बल पर नहीं आ सकती।
संवैधानिक नैतिकता की रक्षा के उपाय
- संवैधानिक शक्तियों का नैतिक प्रयोग: संवैधानिक प्राधिकरणों को अपने विवेकाधिकार का प्रयोग संयम, निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ करना चाहिये। अध्यादेशों और राष्ट्रपति शासन से संबंधित प्रावधानों के तहत दी गई शक्तियों का उपयोग लोकतंत्र की भावना के अनुरूप अपवाद के रूप में किया जाना चाहिये, न कि राजनीतिक उपकरण के रूप में।
- संस्थागत स्वतंत्रता और जवाबदेही को सुदृढ़ करना: न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, विधायिका और सिविल सेवा जैसी संस्थाओं को स्वायत्त रूप से कार्य करना चाहिये, जबकि वे संवैधानिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह भी रहें।
- नियुक्तियाँ, स्थानांतरण और निर्णय प्रक्रिया को दलगत प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिये ताकि जन-विश्वास संरक्षित रहे।
- मौलिक अधिकारों और असहमति का सम्मान: स्वतंत्रता-भाषण, संगठनों और विचार की स्वतंत्रता की रक्षा संवैधानिक नैतिकता का केंद्रीय हिस्सा है।
- लोकतांत्रिक शासन में अनुकूलन, शांतिपूर्ण विरोध और अल्पसंख्यक दृष्टिकोणों के प्रति सहिष्णुता आवश्यक है, भले ही ये सत्ता में बैठे लोगों को चुनौती दें।
- राजनीतिक संस्कृति में संवैधानिक मूल्यों का आंतरिकरण: कानूनी अनुपालन से आगे बढ़कर, राजनीतिक अभिकर्त्ता संसदीय परंपराओं, विपक्ष के अधिकारों और विचार-विमर्श की प्रक्रिया का सम्मान करें।
- संवैधानिक नैतिकता का दैनिक प्रशासन में पालन समझौता, पारदर्शिता और शिष्टाचार जैसी लोकतांत्रिक मान्यताओं पर निर्भर करता है।
- नागरिक शिक्षा और जन जागरूकता: नागरिकों की भूमिका अहम है—वे स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों को समझें तथा उनका संरक्षण करें।
- शिक्षा, मीडिया और नागरिक समाज के माध्यम से संवैधानिक साक्षरता यह सुनिश्चित करती है कि नैतिकता केवल संस्थागत सीमाओं में न रहकर समाज में समाहित हो।
निष्कर्ष:
संवैधानिक प्रावधान लोकतंत्र की संरचनात्मक रूपरेखा प्रदान करते हैं, लेकिन संवैधानिक नैतिकता उसे जीवन और दिशा देती है। भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता केवल संविधान के शब्दों पर नहीं, बल्कि संस्थाओं, नेताओं और नागरिकों की उसकी भावना के प्रति सामूहिक नैतिक निष्ठा पर निर्भर करती है।
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