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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. आपदाएँ केवल प्राकृतिक घटनाएँ मात्र नहीं हैं, बल्कि शासन व्यवस्था की विफलताओं का भी परिणाम हैं। इस कथन की भारत में हाल की आपदाओं के संदर्भ में समालोचनात्मक परीक्षणकीजिये। (250 शब्द)

    31 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आपदा प्रबंधन

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत हालिया घटनाक्रमों को उजागर करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह तर्क दीजिये कि शासन की विफलता कैसे इन घटनाओं को बढ़ाती है।
    • इस मुद्दे को संबोधित करने के लिये उपाय प्रस्तुत कीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय

    आपदा प्राय: प्राकृतिक घटनाओं के रूप में देखी जाती हैं, लेकिन वास्तव में उनकी व्यापकता और प्रभाव बड़े पैमाने पर मानव निर्णयों तथा शासन संबंधी विफलताओं द्वारा आकारित होते हैं। भारत में हालिया आपदाएँ जैसे शहरी बाढ़, चक्रवात, हीटवेव एवं भूस्खलन यह स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि प्राकृतिक खतरे और कमज़ोर शासन के बीच एक मज़बूत संबंध है। असंगत योजना, कमज़ोर क्रियान्वयन और तैयारी की कमी प्राय: प्राकृतिक घटनाओं को मानवजनित आपदाओं में बदल देती हैं।

    मुख्य भाग:

    आपदाएँ कैसे शासन की विफलताओं को दर्शाती हैं:

    • खराब शहरी योजना और अवसंरचना की असफलताएँ: तीव्र और अनियोजित शहरीकरण ने आपदा संवेदनशीलता को बढ़ा दिया है। चेन्नई (2015 की बाढ़) और बंगलूरू (2022–23 की बाढ़) जैसे शहरों में भारी बारिश के अलावा, झीलों, वेटलैंड तथा जल निकासी चैनलों पर अतिक्रमण ने भी गंभीर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न की है। 
      • यह खराब शहरी शासन और आपदा प्रभाव के बीच के स्पष्ट संबंध को दर्शाता है।
    • प्रारंभिक चेतावनी और तैयारी प्रणालियों का कमज़ोर कार्यान्वयन: भारत ने मौसम पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणालियों में सुधार किया है, लेकिन अंतिम स्तर तक पहुँचाने में शासन संबंधी कमियाँ अभी भी मौजूद हैं। 
      • उदाहरण के लिये, साइक्लोन बिपरजॉय (2023) और साइक्लोन अम्फान (2020) के दौरान प्रारंभिक चेतावनी मौजूद थी, फिर भी असमान निकासी, आश्रय की कमी तथा कमज़ोर स्थानीय समन्वय ने कुछ क्षेत्रों में संवेदनशीलता बढ़ा दी।
    • पर्यावरणीय क्षरण और नीति की उपेक्षा: अनियंत्रित खनन, वनों की कटाई और पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण ने आपदाओं को और तीव्र किया है।
      • उदाहरण के लिये, जोशीमठ भू-धंसाव (2023) की घटना इस तथ्य का प्रमाण है कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और क्षेत्रीय वहन क्षमता की निरंतर उपेक्षा, क्रमिक पारिस्थितिक असंतुलन को एक भीषण आपदा का रूप दे सकती है।
    • जलवायु परिवर्तन और अपर्याप्त अनुकूलन उपाय: उत्तर भारत में हीटवेव तथा  हिमाचल प्रदेश में बाढ़ (2023) यह दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन और शासन की विफलताएँ कैसे आपस में जुड़ी हुई हैं। 
      • हीट एक्शन प्लान और आपदा दिशा-निर्देशों के बावजूद, कमज़ोर क्रियान्वयन तथा स्थानीय स्तर पर तैयारी की कमी मृत्यु दर एवं आर्थिक नुकसान को बढ़ा देती है।
    • कमज़ोर संस्थागत समन्वय और प्रतिक्रिया तंत्र: आपदाएँ प्राय: केंद्रीय, राज्य और स्थानीय प्राधिकरणों के बीच के अंतर को उजागर करती हैं। भूस्खलन और आकस्मिक बाढ़ के दौरान विभाजित ज़िम्मेदारियाँ तथा  विलंबित प्रतिक्रिया यह दर्शाती हैं कि एक एकीकृत आपदा प्रबंधन प्रणाली की कमी है।

    शासन की विफलताओं को दूर करना: क्या बदलने की आवश्यकता है?

    • राहत से जोखिम न्यूनीकरण की ओर बदलाव: आपदा प्रबंधन केवल आपदा के बाद राहत तक सीमित नहीं रहना चाहिये। इसके बजाय, सरकार को विकास गतिविधियों में आपदा जोखिम न्यूनीकरण को एकीकृत करके पूर्व-योजना बनानी चाहिये
      • इसमें भूमि उपयोग की सटीक योजना बनाना, बाढ़ क्षेत्रों या संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण से बचना और आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे का विकास शामिल है।
      • आपदा प्रबंधन (संशोधन) अधिनियम, 2025 सही दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
    • स्थानीय सरकार और सामुदायिक सहभागिता को सुदृढ़ करना: आपदाओं के समय पंचायती राज संस्थाएँ और शहरी स्थानीय निकाय पहले प्रतिक्रिया देने वाले होते हैं।
      • उन्हें पर्याप्त वित्तीय संसाधन, प्रशिक्षण और अधिकार प्रदान करने से तैयारी तथा त्वरित प्रतिक्रिया में सुधार होता है। स्थानीय समुदायों को शामिल करने से सचेतना बढ़ती है और आपात स्थिति में त्वरित निकासी सुनिश्चित होती है।
    • प्रारंभिक चेतावनी और संचार प्रणालियों में सुधार: सटीक और समय पर चेतावनी जीवन बचा सकती है। 
      • जानकारी को मोबाइल अलर्ट, स्थानीय रेडियो, सोशल मीडिया और सामुदायिक स्वयंसेवकों जैसे विभिन्न माध्यमों से लोगों तक पहुँचाया जाना चाहिये, विशेषकर स्थानीय भाषाओं में, ताकि अंतिम स्तर तक कनेक्टिविटी सुनिश्चित हो।
    • बेहतर निर्णय-निर्माण के लिये डेटा और प्रौद्योगिकी का उपयोग: मौसम, वर्षा और जोखिम क्षेत्रों से प्राप्त तत्काल जानकारी प्राधिकरणों को शीघ्र निर्णय लेने में सहायक होती है।
      • पारदर्शी डेटा साझा करना, आपदा प्रतिक्रिया का नियमित ऑडिट और GIS व सैटेलाइट मैपिंग जैसी तकनीकों का उपयोग आपदा प्रबंधन प्रयासों की जवाबदेही तथा प्रभावशीलता बढ़ा सकता है।

    निष्कर्ष:

    आपदाएँ केवल प्राकृतिक घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि शासन संबंधी निर्णयों और विकास मार्गों द्वारा आकारित परिणाम हैं। सेंडाई फ्रेमवर्क, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के ‘सुरक्षित और आपदा-प्रतिरोधी भारत’ के दृष्टिकोण और सतत विकास लक्ष्यों (विशेषकर SDG 11 एवं SDG 13) के अनुरूप, संस्थाओं को सुदृढ़ करना तथा जोखिम-सूचित योजना को बढ़ावा देना आवश्यक है। इससे आपदा प्रबंधन को प्रतिक्रियाशील राहत से सक्रिय अनुकूलन और सतत विकास की दिशा में ले जाया जा सकता है।

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