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प्रश्न :
प्रश्न. जलवायु परिवर्तन आपदाओं के लिये जोखिम-गुणक के रूप में कार्य कर रहा है। भारत में आपदा प्रबंधन के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
17 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आपदा प्रबंधनउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- जलवायु परिवर्तन के कारण और इसकी भूमिका का परिचय देते हुए उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये।
- आपदाओं के लिये जोखिम-गुणक के रूप में जलवायु परिवर्तन की विवेचना कीजिये।
- इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले प्रभावों का उल्लेख कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
जलवायु परिवर्तन अब केवल एक स्वतंत्र पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह आपदाओं की आवृत्ति, तीव्रता और प्रभाव को लगातार बढ़ा रही है। भारत में बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, समुद्र स्तर में वृद्धि तथा चरम मौसमी घटनाओं ने मौजूदा कमज़ोरियों को और बढ़ा दिया है, जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास के परिणाम जटिल हो गए हैं।
मुख्य भाग:
आपदाओं के लिये जोखिम गुणक के रूप में जलवायु परिवर्तन की भूमिका:
- चरम मौसमी घटनाओं में तीव्रता: IMD के आँकड़ों से पता चलता है कि अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में तेज़ी से वृद्धि हुई है, जो निरंतर बाढ़ की आवृत्ति में योगदान दे रही है (उदाहरण के लिये, हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2023 की बाढ़)।
- हीटवेव अधिक गंभीर तथा दीर्घकालिक होती जा रही हैं, वर्ष 2024 को सबसे लंबे हीटवेव कालों में से एक दर्ज किया गया, जिसमें स्वास्थ्य, उत्पादकता तथा जल सुरक्षा प्रभावित हुई।
- बाढ़ तथा भू-स्खलन जोखिम में वृद्धि: मानसून प्रतिरूपों में परिवर्तन के कारण अल्प अवधि में अत्यधिक तीव्र वर्षा हो रही है, जिससे शहरी जल-निकासी प्रणालियाँ विफल हो जाती हैं।
- NDMA ने जलवायु परिवर्तन को शहरी बाढ़ में वृद्धि के पीछे एक प्रमुख कारक के रूप में उजागर किया है (चेन्नई 2015, बंगलूरू में बार-बार आने वाली बाढ़)।
- हिमनदों के विगलन और अस्थिर ढलानों के कारण हिमालयी राज्यों में भूस्खलन का खतरा अधिक होता है।
- चक्रवातों और तटीय आपदाओं का प्रवर्द्धन: पर्यावरण मंत्रालय ने अरब सागर में चक्रवाती तूफानों में वृद्धि की सूचना दी है, जैसे कि चक्रवात तौकते और बिपरजॉय।
- समुद्र के स्तर में वृद्धि तथा महासागरों के गर्म होने से तूफानी लहरें और भी तीव्र हो जाती हैं, जिससे तटीय आजीविका एवं अधोसंरचना को खतरा उत्पन्न हो जाता है।
- सूखा, खाद्य और जल असुरक्षा: जलवायु परिवर्तनशीलता ने सूखे जैसी स्थितियों की आवृत्ति बढ़ा दी है, जिससे वर्षा आधारित कृषि प्रभावित हो रही है।
- NITI आयोग (समग्र जल प्रबंधन सूचकांक) जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाले जल संकट की गंभीर स्थिति के बारे में चेतावनी देता है।
- सामाजिक-आर्थिक कमज़ोरियों का बढ़ना: जलवायु आपदाएँ गरीबों, प्रवासियों और अनौपचारिक श्रमिकों को असमान रूप से प्रभावित करती हैं, जिससे खतरे मानवीय संकट में परिणत हो जाते हैं।
- IPCC की AR6 रिपोर्ट में दक्षिण एशिया का ऐसे हॉटस्पॉट के रूप में अभिनिर्धारण किया गया है जहाँ जलवायु जोखिम, गरीबी तथा उच्च जनसंख्या घनत्व परस्पर संबद्ध हैं।
भारत में आपदा प्रबंधन के लिये निहितार्थ
- प्रतिक्रियात्मक राहत से पूर्वानुमान-आधारित तथा जोखिम-सूचित नियोजन की ओर संक्रमण: पारंपरिक आपदा प्रबंधन आपदा के बाद राहत और मुआवज़े पर केंद्रित था। जलवायु परिवर्तन के कारण पूर्वानुमानित और निवारक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक हो गया है।
- उदाहरण के लिये, IMD की प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान प्रणाली और NDMA की हीट वेव एक्शन प्लान (जिसे पहली बार अहमदाबाद में लागू किया गया था) प्रारंभिक चेतावनी, संसाधनों की पूर्व-व्यवस्था एवं सार्वजनिक सलाह जारी करने में सक्षम बनाती है, जिससे हीट वेव के दौरान होने वाली मृत्यु दर में काफी कमी आती है।
- इसी प्रकार, पूर्वानुमान-आधारित वित्तपोषण राज्यों को आपदा आने से पहले कार्रवाई करने की अनुमति देता है, जिससे मानवीय और आर्थिक नुकसान कम होता है।
- जलवायु-अनुकूल अवसंरचना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित समाधान: आवास और शहरी मामलों का मंत्रालय बाढ़ एवं हीट वेव के तनाव से निपटने के लिये AMRUT व स्मार्ट शहरों के तहत जलवायु-अनुकूल शहरी योजना को बढ़ावा देता है।
- भारत की चक्रवात पूर्व चेतावनी प्रणाली (IMD + NDMA) ने चक्रवात से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम कर दिया है, जैसा कि चक्रवात फैनी (2019) के दौरान देखा गया था।
- पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित दृष्टिकोण: ओडिशा और सुंदरबन में मैंग्रोव का पुनर्स्थापन तूफानी लहरों के खिलाफ एक प्राकृतिक बफर के रूप में कार्य करता है, जिसे NDMA द्वारा एक लागत प्रभावी समुत्थानशील रणनीति के रूप में मान्यता दी गई है।
- जलवायु अनुकूलन का आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) ढाँचों के साथ एकीकरण: भारत की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (2019) सेंडाई फ्रेमवर्क के अनुरूप है, जो जलवायु परिवर्तन को आपदा जोखिम गुणक के रूप में स्पष्ट रूप से मान्यता देती है।
- मंत्रालयों को जलवायु अनुकूलन को क्षेत्रीय नियोजन में एकीकृत करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है, जैसे कि जलवायु-अनुकूल कृषि, जल प्रबंधन और तटीय क्षेत्र विनियमन, यह सुनिश्चित करते हुए कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं सतत विकास एक दूसरे को सुदृढ़ करें।
निष्कर्ष:
जलवायु परिवर्तन भारत में आपदाओं के लिये एक शक्तिशाली जोखिम कारक के रूप में कार्य करता है, जिससे खतरे बढ़ जाते हैं तथा अंतर्निहित कमज़ोरियाँ और भी गंभीर हो जाती हैं। इसलिये, जीवन और आजीविका की रक्षा करते हुए, सतत एवं जोखिम-आधारित विकास के माध्यम से सतत विकास लक्ष्यों— SDG11 (सतत शहर एवं संतुलित समुदाय), SDG 13 (जलवायु परिवर्तन कार्रवाई) को आगे बढ़ाने के लिये आपदा प्रबंधन को जलवायु विज्ञान, समुत्थानशक्ति निर्माण तथा समावेशी शासन के साथ सुदृढ़ रूप से एकीकृत किया जाना चाहिये।
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