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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. COP30 बहुपक्षीय जलवायु सहयोग की संभावनाओं तथा उसकी सीमाओं दोनों को प्रतिबिंबित करता है। वर्तमान वैश्विक जलवायु शासन संरचना की प्रमुख शक्तियों तथा संरचनात्मक कमज़ोरियों पर चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    26 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 3 पर्यावरण

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • COP30 का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
    • वर्तमान वैश्विक जलवायु शासन की प्रमुख शक्तियों और संरचनात्मक कमज़ोरियों पर चर्चा कीजिये। 
    • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित COP30 वैश्विक जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद इस सम्मेलन ने बहुपक्षीय सहयोग की शक्ति को प्रदर्शित किया। सम्मेलन में ऐतिहासिक वित्तीय प्रतिबद्धताएँ की गईं, वर्ष 2035 तक अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने का संकल्प लिया गया तथा न्यायसंगत संक्रमण एवं वनों की कटाई को रोकने के लिये नवाचारी पहलों की शुरुआत की गई। हालाँकि जीवाश्म ईंधन के प्रयोग के चरणबद्ध उन्मूलन पर स्पष्ट भाषा का अभाव रहा, फिर भी COP30 ने सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय लक्ष्यों को समन्वित करते हुए सहयोगात्मक वैश्विक ढाँचे में समानता-आधारित और अधिक महत्वाकांक्षी जलवायु रणनीतियों की तात्कालिक आवश्यकता को सुदृढ़ किया।

    मुख्य भाग: 

    वैश्विक जलवायु शासन की सशक्तियों को प्रदर्शित करने वाले COP30 के प्रमुख परिणाम

    • बेलेम पैकेज का अंगीकरण: COP30 में बेलेम पैकेज को अपनाया गया, जिसमें पेरिस समझौते के कार्यान्वयन को तीव्र करने के उद्देश्य से 29 निर्णय शामिल हैं। ये निर्णय जलवायु वित्त, एडैप्टेशन ट्रैकिंग, लैंगिक समावेशन और वैश्विक सहयोग को मज़बूत करने पर केंद्रित हैं। 
      • यह पैकेज केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है।
    • जलवायु वित्तीय प्रतिबद्धताएँ और अनुकूलन निधि: बेलेम पैकेज के माध्यम से, पक्षकारों ने वर्ष 2035 तक जलवायु परिवर्तन कार्रवाई के लिये प्रतिवर्ष कम-से-कम 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर संग्रहण के मार्ग पर सहमति व्यक्त की। इसमें कमज़ोर देशों के लिये अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने और पिछली व्यवस्थाओं के तहत देखे गए लगातार जलवायु वित्त अंतर को कम करने पर विशेष ज़ोर दिया गया।
    • ग्लोबल इम्प्लीमेंटेशन एक्सेलेरेटर और बेलेम मिशन टू 1.5°C: जलवायु लक्ष्यों की दिशा में राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्रगति की निगरानी के लिये इन पहलों की शुरुआत की गई। इनका उद्देश्य राष्ट्रीय निर्धारित योगदानों की मापनीय निगरानी के माध्यम से जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा देना तथा उत्सर्जन अंतर को कम करना है।
    • जीवाश्म ईंधन पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिये न्यायसंगत संक्रमण तंत्र: इसे बेलेम एक्शन मैकेनिज़्म के नाम से भी जाना जाता है, यह तंत्र जीवाश्म ईंधनों से सतत अर्थव्यवस्थाओं की ओर संक्रमण कर रहे श्रमिकों और देशों को सहयोग प्रदान करता है।
    • निर्वनीकरण और जीवाश्म ईंधन संक्रमण के लिये रोडमैप: ब्राज़ील ने दो प्रमुख रोडमैप पेश किये: एक वनों की कटाई को रोकने एवं वनों के पुनर्भरण के लिये तथा दूसरा न्यायसंगत और समतामूलक जीवाश्म ईंधन संक्रमण को आगे बढ़ाने के लिये, जो राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय आर्थिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है।
    • बेलेम हेल्थ एक्शन प्लान: यह जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई और सार्वजनिक स्वास्थ्य को जोड़ने वाली पहली वैश्विक योजना है, जो जलवायु-प्रेरित स्वास्थ्य जोखिमों का निवारण करती है तथा जलवायु न्याय पर बल देते हुए विश्वभर में लचीली स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखती है।
    • ट्रॉपिकल फॉरेस्ट्स फॉरएवर फैसिलिटी: एक प्रदर्शन-आधारित, दीर्घकालिक निधि जो वन संरक्षण के लिये देशों को प्रोत्साहित करती है। इसमें कम-से-कम 20 प्रतिशत निधि जनजातीय समुदायों और स्थानीय समुदायों को आवंटित की जाती है, जिससे जैव विविधता, आजीविका एवं जलवायु लक्ष्यों के बीच समन्वय स्थापित होता है।
    • समानता और समावेशी शासन का सुदृढ़ीकरण: COP30 ने लैंगिक रूप से संवेदनशील नीतियों एवं स्वदेशी नेतृत्व को समेकित करते हुए समानता, जलवायु न्याय, पारदर्शिता और अंतरपीढ़ीगत अधिकारों का सुदृढ़ीकरण किया।
    • क्लाइमेट–ट्रेड संवाद: यह पहल जलवायु उद्देश्यों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नीतियों के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करती है, जिससे कार्बन सीमा समायोजन जैसे अंतर्विरोध कम हों तथा सतत एवं न्यायसंगत संक्रमण को बढ़ावा मिले।
    • ग्लोबल मुतिराओ अग्रीमेंट: यह समझौता सामूहिक कार्रवाई की भावना को प्रोत्साहित करता है तथा भू-राजनीतिक विभाजनों के बीच बहुपक्षीयता एवं साझा उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।

    वे प्रमुख बाधाएँ जो देशों को वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने से रोकती हैं

    • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान ( NDC) प्रतिबद्धताओं और आवश्यक मार्ग के बीच अंतर: कई देशों के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) अभी भी वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिये आवश्यक स्तर से कम हैं।   
      • UNEPएमिशन गैप रिपोर्ट - 2025 के अनुसार वर्तमान NDCs वर्ष 2019 की तुलना में वर्ष 2035 तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में केवल लगभग 15 प्रतिशत की कमी ला पाएँगे, जबकि 1.5°C लक्ष्य के लिये 45–60 प्रतिशत की कमी आवश्यक है। 
    • क्रियान्वयन अंतर: जहाँ लक्ष्य निर्धारित भी किये गए हैं, वहाँ उनका क्रियान्वयन धीमा है। क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर के अनुसार वर्ष 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन आवश्यक कटौती से 29–32 गीगाटन CO₂e अधिक रहने की संभावना है, जो गंभीर क्रियान्वयन अंतर को दर्शाता है।
    • जलवायु परिवर्तन के लिये अपर्याप्त वित्त पोषण: विकासशील देशों को शमन और अनुकूलन के लिये पर्याप्त धन की आवश्यकता है, परंतु उन्हें निरंतर वित्तीय अभाव का सामना करना पड़ता है।  
      • हालाँकि COP30 में वर्ष 2035 तक प्रतिवर्ष 1.3 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य रखा गया, वर्तमान में विकसित देशों द्वारा केवल लगभग 115 अरब डॉलर प्रतिवर्ष ही जलवायु वित्त के रूप में प्रवाहित हो रहा है, जो वर्ष 2020 के लिये निर्धारित 300 अरब डॉलर के लक्ष्य और भविष्य की आवश्यकताओं से बहुत कम है।
    • भू-राजनीतिक तनाव और उत्तरदायित्व विवाद: वैश्विक राजनीतिक विभाजन जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने और न्यायसंगत वित्त बंटवारे जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर आम सहमति में बाधा डालते हैं। वैश्विक राजनीतिक विभाजन जीवाश्म ईंधन के प्रयोग के चरणबद्ध उन्मूलन और न्यायसंगत वित्तीय साझेदारी जैसे मुद्दों पर सहमति में बाधा उत्पन्न करते हैं। 
      • COP30 में जीवाश्म ईंधन के प्रयोग का चरणबद्ध तरीके से उन्मूलन करने के लिये किसी बाध्यकारी समझौते के अभाव ने इस बात को उजागर किया। 
    • प्रौद्योगिकीय सीमाएँ और क्षमता अंतर: उन्नत स्वच्छ प्रौद्योगिकियों तक अभिगम्यता असमान है। 
      • कई विकासशील देशों में नवीकरणीय ऊर्जा को प्रभावी ढंग से लागू करने या कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों के अंगीकरण के लिये आवश्यक अवसंरचना और विशेषज्ञता का अभाव है, जिससे उनकी महत्त्वाकांक्षी प्रतिबद्धताओं की पूर्ति सीमित हो जाती है।
    • डेटा ट्रांसपेरेंसी और रिपोर्टिंग में कमियाँ: उत्सर्जन और जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई पर सटीक एवं समयोचित डेटा वैश्विक जवाबदेही के लिये अनिवार्य है। 
      • कई देशों को व्यापक ग्रीनहाउस गैस इन्वेंट्री और पारदर्शी रिपोर्टिंग में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे विश्वास कमज़ोर होता है तथा नीतिगत समायोजन में बाधा आती है। 
      • एकसमान रिपोर्टिंग मानकों की कमी प्रगति की निगरानी में असंगतता का कारण बनती है।
        • वर्ष 1997 से 2019 के दौरान 133 विकासशील देशों पर किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि आधे से अधिक देशों ने GHG इन्वेंट्री क्षमताओं में बहुत कम या कोई प्रगति नहीं की और कई ने आवश्यक होने पर भी इन्वेंट्री प्रस्तुत नहीं की।
    • सामाजिक-आर्थिक और न्यायसंगत संक्रमण की चुनौतियाँ: जीवाश्म ईंधनों से संक्रमण कोयला, तेल और गैस उद्योगों से जुड़े लाखों श्रमिकों को प्रभावित करता है। 
      • पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा और पुनः-कौशल कार्यक्रमों के अभाव में प्रतिरोध बढ़ता है, जिससे नीतिगत निर्णयों में विलंब होता है।

    न्यायसंगत और प्रभावी वैश्विक जलवायु परिवर्तन कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक कदम

    • मज़बूत राष्ट्रीय विकास दिशानिर्देशों (NDC) के साथ महत्त्वाकांक्षा के अंतराल को दूर करना: अधिकांश वर्तमान राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित करने के लिये अपर्याप्त हैं।
      • भारत सहित अन्य देशों को अधिक महत्त्वाकांक्षी, विज्ञान-आधारित लक्ष्य अपनाने की आवश्यकता है और उन्हें नियमित रूप से संशोधित करते हुए उनमें अंतर्निहित जवाबदेही शामिल करनी चाहिये। 
    • सशक्त शासन और निगरानी के माध्यम से क्रियान्वयन अंतर को समाप्त करना: देशों को प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट समयसीमा और अनुपालन प्रोत्साहन के साथ लागू करने योग्य नीतियों में बदलना होगा।  देशों को प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट समय-सीमा और अनुपालन प्रोत्साहनों के साथ प्रवर्तनीय नीतियों में रूपांतरित करने की आवश्यकता है। 
      • डोमिनिकन रिपब्लिक की राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन परिषद विभिन्न सरकारी विभागों के समन्वय का सफल उदाहरण प्रस्तुत करती है।
    • पारदर्शिता और नवाचार के साथ जलवायु वित्त का विस्तार: वित्त की कमी को दूर करने के लिये ग्रीन बॉण्ड, मिश्रित वित्त और जलवायु कोष जैसे विविध साधनों की आवश्यकता होती है। ज़ाम्बिया के ग्रीन बॉण्ड और दक्षिण अफ्रीका के सॉवरेन ग्रीन बॉण्ड प्रभावी विस्तार रणनीतियों के उदाहरण हैं।  
    • बहुपक्षीय सहयोग और न्यायसंगत उत्तरदायित्व साझेदारी को सुदृढ़ करना: भू-राजनीतिक विभाजनों को समाप्त करने में पेरिस समझौते के तहत पारदर्शिता और जवाबदेही कार्यढाँचे को मज़बूत करना, साथ ही सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों (CBDR) को क्रियान्वित करना शामिल है। 
    • प्रौद्योगिकी अंतरण और क्षमता निर्माण में निवेश: प्रौद्योगिकी संबंधी अंतर को दूर करने के लिये सहयोगात्मक अनुसंधान एवं विकास, क्षमता निर्माण और तकनीकी सहायता योजनाओं की आवश्यकता है।
    • डेटा ट्रांसपेरेंसी और रिपोर्टिंग की सटीकता बढ़ाना: एकसमान और विश्वसनीय डेटा ही जवाबदेही की आधारशिला है।
    • सामाजिक सुरक्षा के साथ न्यायसंगत संक्रमण सुनिश्चित करना: सामाजिक सुरक्षा संजाल और पुनः-प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से जीवाश्म ईंधनों से संक्रमण को सहज बनाया जा सकता है तथा व्यापक समर्थन प्राप्त किया जा सकता है।

    निष्कर्ष: 

    1.5°C के लक्ष्य प्राप्त करने के लिये वैश्विक जलवायु परिवर्तन कार्रवाई में तात्कालिक और परिवर्तनकारी बदलाव की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र के 8वें महासचिव बान की-मून के अनुसार “हम वह पहली पीढ़ी हैं जो गरीबी समाप्त कर सकती है और वही अंतिम पीढ़ी हैं, जो अनियंत्रित जलवायु परिवर्तन को रोक सकती है।” 

    राष्ट्रीय विकास घोषणापत्र (NDC) की महत्त्वाकांक्षा को सुदृढ़ करना, पारदर्शी वित्त व्यवस्था का विस्तार, प्रौद्योगिकी अंतरण को आगे बढ़ाना, न्यायसंगत संक्रमण सुनिश्चित करना तथा डेटा जवाबदेही में सुधार करना अनिवार्य है। ये सभी उपाय मिलकर सतत विकास लक्ष्यों— SDG7 (सस्ती और प्रदूषण-मुक्त ऊर्जा), SDG13 (जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई) और SDG17 (लक्ष्य हेतु भागीदारी) को आगे बढ़ाते हैं तथा विश्वभर में न्यायसंगत जलवायु अनुकूलन सुदृढ़ करते हैं।

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